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सीजेआई गवई पर हुए हमले का देश भर में विरोध

दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट के एक वकील सुभाष चंद्रन के.आर. ने अटार्नी जनरल आर. वेंकटारमणी को पत्र लिखकर आरोपी राकेश किशोर के खिलाफ न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 15 के तहत मुकदमा चलाए जाने की मांग की है। पढ़ें, यह खबर

गत 6 अक्टूबर, 2025 को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के बीच राकेश किशोर नामक एक ब्राह्मणवादी वकील द्वारा मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बी.आर. गवई के ऊपर जूता फेंके जाने की घटना का विरोध जारी है। राज्यसभा में विपक्ष के नेता व कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इसका विरोध किया है। अपने बयान में खरगे ने कहा कि ऐसे लोगों को दंडित किया जाना चाहिए जो ‘मनुस्मृति’ और सनातन धर्म के नाम पर लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन कर रहे हैं। बंगलुरु में अपने बयान में उन्होंने कहा कि केंद्र की वर्तमान सरकार में चाहे कोई आम दलित हो या फिर किसी बड़े पद पर आसीन दलित, उसका कोई सम्मान नहीं है।

दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने ‘एक्स’ पर जारी अपने बयान में कहा कि आरोपी को माफ कर जस्टिस गवई ने अपनी महानता का परिचय दिया है। लेकिन जूता फेंकने वाले के खिलाफ कठोर कार्रवाई जरूरी है। इस संपूर्ण घटना ने समूची न्यायपालिका को एक डरावना संदेश दिया है। अगर मुख्य न्यायाधीश पर जूता फेंकने वाला व्यक्ति बचकर बाहर निकल जाएगा तो अन्य जजों का क्या होगा। क्या अन्य न्यायाधीश सुरक्षित होंगे?

जस्टिस गवई पर इस हमले को सत्ता से जुड़े लोगों द्वारा न्यायपालिका पर बार-बार किए जा रहे मौखिक हमलों की अगली कड़ी के रूप में देखा जा सकता है। बताते चलें कि 20 सितंबर, 2025 को नई दिल्ली में आयोजित न्याय निर्माण सम्मेलन-2025 में प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य संजीव सान्याल ने अपने संबोधन में कहा था कि “विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हमारे पास 20-25 वर्ष हैं। लेकिन न्याय तंत्र और विधिक वातावरण, खासकर न्यायपालिका और उसका तंत्र, मेरी नजर में विकसित भारत बनने में व तेज विकास में एकमात्र सबसे बड़ी बाधा है।”

कर्नाटक की राजधानी बंगलुरु के पूर्व पुलिस आयुक्त व भाजपा नेता भास्कर राव ने आरोपी राकेश किशोर की यह कहकर तारीफ की कि वृद्ध होने के बावजूद उन्होंने सनातन धर्म की रक्षा के लिए ऐसा साहस किया। हालांकि बाद में भास्कर राव ने इसके लिए माफी मांगी। दूसरी ओर बंगलुरु पुलिस जस्टिस गवई पर जूता फेंकने वाले वकील राकेश किशोर के खिलाफ एक ‘जीरो एफआईआर’ दर्ज किया है। बताते चलें कि ‘जीरो एफआईआर’ देश के किसी हिस्से में होनेवाले अपराध के खिलाफ दर्ज कराई जा सकती है।

मुंबई में प्रदर्शन करते अधिवक्तागण

जस्टिस गवई के ऊपर जूता फेंकने के कुकृत्य का भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने भी विरोध किया है। जारी प्रेस विज्ञप्ति में इसे संविधान पर हमला बताया गया है। इसके मुताबिक, यह एक प्रकार का ब्राह्मणवादी आतंकवाद है और ऐसी जातिगत श्रेष्ठता पर आधारित द्वेष तथा धार्मिक उग्रवाद से न्यायिक व्यक्तियों की सुरक्षा की आवश्यकता है। हालांकि इस घटना में खुले न्यायालय में हमला होने के बावजूद कोई तत्काल मुकदमा दर्ज नहीं किया गया।

इस बीच देश के कई शहरों में उपरोक्त घटना के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया जा रहा है। दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट के एक वकील सुभाष चंद्रन के.आर. ने अटार्नी जनरल आर. वेंकटारमणी को पत्र लिखकर आरोपी राकेश किशोर के खिलाफ न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 15 के तहत मुकदमा चलाए जाने की मांग की है।

गत 8 अक्टूबर को ऑल इंडिया लॉयर्स यूनियन और मुंबई के अंधेरी न्यायालय के अधिवक्ताओं द्वारा मुंबई के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी के न्यायालय परिसर में विरोध प्रदर्शन आयोजित किया गया। इस विरोध प्रदर्शन में तीस से अधिक अधिवक्ता उपस्थित थे। इस मौके पर अधिवक्ता चंद्रकांत बोजगर, अधिवक्ता बलवंत पाटिल, अधिवक्ता सुभाष गायकवाड़, अधिवक्ता नंदा सिंह, अधिवक्ता पीएम चौधरी, अधिवक्ता सुल्तान शेख आदि ने अपने विचार व्यक्त किये।

बिहार की राजधानी पटना में प्रदर्शन करते अधिवक्तागण

अधिकांश वक्ताओं ने कहा कि यह निंदनीय कृत्य केवल एक व्यक्ति की विक्षिप्तता नहीं है, बल्कि इसे आरएसएस प्रायोजित दक्षिणपंथी विचारधारा के सांप्रदायिक तत्वों द्वारा न्यायपालिका की स्वतंत्रता, न्यायिक समीक्षा के अधिकार और भारतीय संविधान में निहित धर्मनिरपेक्षता के मूलभूत सिद्धांतों को कमजोर करने के लिए सुनियोजित और द्वेषपूर्ण अभियान का हिस्सा मानकर देखा जाना आवश्यक है। यह सीजेआई गवई ने एक सुनवाई के दौरान कानूनी संदर्भ में हिंदू देवता विष्णु का रूपकात्मक उल्लेख किया था, जिसकी हिंदुत्ववादी शक्तियों ने हिंदू धर्म या सनातन धर्म के अपमान के रूप में गलत व्याख्या के तौर पर प्रचारित करना शुरू कर दिया है। सीजेआई गवई की दलित पृष्ठभूमि के कारण जातीय पूर्वाग्रह के तहत उन्हे निशाना बनाया जा रहा है।

वक्ताओं ने कहा कि यह हमला राष्ट्र की विवेकशीलता के लिए चौंकाने वाला है। भारत के लिए खतरनाक “नाथूराम मानसिकता” केवल न्यायपालिका के लिए ही नहीं बल्कि हमारी लोकतांत्रिक संविधान की मूलभूत संरचना के लिए भी खतरा पैदा करती है। यह न्यायालय कक्ष में सुरक्षा के बारे में, धार्मिक और जातीय तनावों में न्यायिक निष्पक्षता के बारे में और धर्म से जुड़े कानूनों की समीक्षा में न्यायालयों की भूमिका की बदनामी के माध्यम से धर्मनिरपेक्षता को कमजोर करने के व्यापक राजनीतिक प्रयासों के बारे में गंभीर सवाल उठाता है।

वहीं बिहार की राजधानी पटना में भी गत 8 अक्टूबर को पटना हाई कोर्ट परिसर स्थित डॉ. आंबेडकर की प्रतिमा के पास एक विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शन का आयोजन एडवोकेट फॉर सोशल जस्टिस, राजद विधि प्रकोष्ठ, इंडियन एसोसिएशन ऑफ लॉयर्स, ऑल इंडिया लॉयर्स यूनियन और ऑल इंडिया लॉयर्स एसोसिएशन फॉर जस्टिस के द्वारा संयुक्त रूप से किया गया था। प्रदर्शन में अधिवक्ता मनीष रंजन, अधिवक्ता अरुण कुशवाहा, अधिवक्ता मणि लाल, अधिवक्ता राम जीवन प्रसाद सिंह, अधिवक्ता दिवाकर यादव, अधिवक्ता उपेंद्र यादव, अधिवक्ता कुमार विवेकानंद, अधिवक्ता विनीता कुमारी, अधिवक्ता राजराम राय, और अधिवक्ता प्रेम पासवान आदि शामिल हुए। इस मौके पर वक्ताओं ने कहा कि मुख्य न्यायाधीश पर हमला सीधे तौर पर भारतीय न्यायपालिका एवं संविधान पर हमला है। संघियों व ब्राह्मणवाद, मनुवाद के पैरोकारों को दलित समुदाय से आने वाले मुख्य न्यायाधीश बर्दाश्त नहीं हो रहे हैं और साजिशन इस तरह का कार्य किया जा रहा है।

(संपादन : नवल/अनिल)


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