वर्षांत में फारवर्ड प्रेस अपने सुधी पाठकों के लिए जल्द ही प्रो. कांचा आइलैय्या शेपर्ड की किताब ‘शूद्र विद्रोह : ताकि बन सके आत्मनिर्भर भारत’ प्रस्तुत कर रहा है। यह किताब प्रो. शेपर्ड की अंग्रेजी में किताब ‘दी शूद्रा रिबेलियन’ का हिंदी अनुवाद है। हिंदी के पाठकों को ध्यान में रखते हुए इस किताब का सहज अनुवाद किया अमरीश हरदेनिया द्वारा गया है।
किताब : ‘शूद्र विद्रोह : ताकि बन सके आत्मनिर्भर भारत’
लेखक : कांचा आइलैय्या शेपर्ड
अनुवाद : अमरीश हरदेनिया
मूल्य : 350 रुपए (खरीदने के लिए यहां क्लिक करें, डाक खर्च मुफ्त), अमेजन
कुल 11 अध्यायों वाले इस किताब में प्रो. शेपर्ड ब्राह्मण धर्म में शूद्रों की ऐतिहासिक वंचनाओं और उनके ज्ञान-कौशल की उपेक्षा का सवाल उठाते हैं। वे यह भी बताते हैं कि कैसे उनके इतिहास और उनके बोध पर कब्जा किया गया ताकि वे शोषित व वंचित बने रहें। वे इस पूरे विमर्श को वर्तमान के सापेक्ष व्याख्यायित करते हैं कि यदि भारत हिंदू राष्ट्र बना तो शूद्रों के सामने किस तरह के खतरे होंगे। इसके साथ ही वे यह भी बताते हैं कि छिटपुट तौर पर ही सही, शूद्रों के विद्रोह ने मानववादी सभ्यता और समता, समानता व बंधुता जैसे मूल्यों पर आधारित देश व समाज की अवधारणा को मजबूत किया है। लेकिन अपने अनुभव, ज्ञान, कौशल व अध्यात्म के जरिए सभ्यतागत विकास में हस्तक्षेप रूपी उनके विद्रोहों का व्यापक स्तर पर उभरना अभी बाकी है।
अपनी इस किताब ‘शूद्र विद्रोह : ताकि बन सके आत्मनिर्भर भारत’ में प्रोफेसर शेपर्ड समाज के सबसे बड़े, लेकिन वर्ण व्यवस्था में सबसे निचले तबके के ‘शूद्र’ या ‘पिछड़े’ वर्ग को केंद्र में रखते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस), जो कभी इतना शक्तिशाली और प्रभावशाली नहीं रहा जितना अभी है, और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अपनी हिंदू राष्ट्रवादी (हिंदुत्ववादी) परियोजना के अंतर्गत इस वर्ग की आंखों में धूल झोंकना चाहती है, उसे हिंदुत्व के झंडे तले लाना चाहती है और उसका शोषण कर मुट्ठी भर लोगों के खजाने भरना चाहती है। और इसे देश की प्रगति बताना चाहती है।
सन् 2021-22 के किसान आंदोलन से प्रभावित और प्रेरित प्रोफेसर शेपर्ड मानते हैं कि आरएसएस-भाजपा की प्रतिक्रांतिकारी परियोजना को विफल करने में शूद्र वर्ग ही निर्णायक भूमिका निभा सकता है। दलित और आदिवासी इस काम के लिए अपेक्षाकृत कम उपयोगी हैं, क्योंकि अतीत में वे वर्ण और जाति व्यवस्था से बाहर और अलग रहे और उनकी आबादी भी कम है। शूद्र आज हिंदुत्व के झंडाबरदार, उसके प्यादे बने हुए हैं। मगर उन्हें चाहिए कि वे शोषक और प्रतिगामी ब्राह्मणवाद के खिलाफ उठ खड़े हों। अतीत के ज्यादातर शूद्र राजाओं और यहां तक कि सरदार वल्लभ भाई पटेल के विपरीत। शूद्र समुदाय को ऐसे नेतृत्व की जरूरत है जो यह समझ सके कि आध्यात्मिक वर्चस्व और दूसरे का खून चूस कर जिंदा रहना हिंदू राष्ट्रवाद में अंतर्निहित ब्राह्मणवाद का हिस्सा है और जो इसकी जगह ऐसी आध्यात्मिक व्यवस्था को स्थापित कर सके जो सहभागी उत्पादन, समावेशी समृद्धि और वैज्ञानिक विकास को प्रोत्साहन दे।
इस किताब के बारे में शोषित समाज दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामचंद्र कटियार कहते हैं कि “इस किताब के जरिए प्रो. शेपर्ड ने उन सवालों की ओर ध्यान आकृष्ट कराया है, जिनके बारे में चर्चा ही नहीं होती। उदाहरण के लिए स्वतंत्रता आंदोलन के समय शूद्रों के नेतृत्व को लेकर उठने वाले सवाल। लेकिन ऐसे ही सवालों से मुठभेड़ करते हुए यह किताब शोषितों और शोषकों के बीच के अंतर को रेखांकित करती है तथा भविष्य के लिए राह बताती है। महामना रामस्वरूप वर्मा की सोच भी यही थी कि जब तक ब्राह्मणवाद के खिलाफ सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक सभी मोर्चों पर एक साथ लड़ाई नहीं होगी, तब तक सफलता नहीं मिलेगी।”
प्रो. कांचा आइलैय्या शेपर्ड, इसी किताब की भूमिका में लिखते हैं कि “इस किताब के माध्यम से शूद्र/ओबीसी युवा यह समझ सकेंगे कि अपनी ऐतिहासिक पहचान का उपयोग वे किस तरह राष्ट्रीय संस्थाओं में स्थान पाने के लिए कर सकते हैं। यद्यपि [इस पुस्तक के] हिंदी संस्करण से शूद्रों की समझ में वृद्धि होगी। मगर यह ज़रूरी है कि शूद्रों की युवा पीढ़ी आरएसएस-भाजपा के हिंदी राष्ट्रवाद के जाल में न फंसते हुए अंग्रेजी भाषा पर अधिकार हासिल करे।”
कहां से खरीदें
थोक खरीदने के लिए fpbooks@forwardpress.in पर ईमेल करें या 7827427311 पर कार्यालय अवधि (सुबह 11 बजे से लेकर शाम सात बजे तक) फोन करें।
इसके अलावा यहां क्लिक कर इसे घर बैठे आसानी से खरीदा जा सकता है। डाक खर्च निशुल्क।
अमेजन पर भी उपलब्ध।
