“बचता क्या है? बस हम धक्के खाते रहते हैं।” चंद्रा लुहार (उम्र 50 वर्ष) के पास बचत के बारे में पूछे गए सवाल का यही जवाब है। उनकी झल्लाहट उनके चेहरे पर साफ तौर पर देखी जा सकती है। चंद्रा, गाड़िया लुहार हैं। गाड़िया लुहार अपनी घूमंतू जीवनशैली के लिए जाने जाते हैं। राजस्थान के सरकारी दस्तावेजों में इन्हें ‘गाड़िया लोहार’ कहा जाता है। अलग-अलग जगहों पर डेरा डालते हुए लुहारगीरी का काम करना ही इनकी आजीविका का प्रमुख स्रोत है। चंद्रा अपने परिवार समेत अभी राजस्थान के एक गांव की सीमा पर डेरा जमाए हुए हैं।
दिसंबर के महीने में राजस्थान के चूरू जिले के तारानगर ब्लॉक के साहवा गांव से थोड़ी दूरी पर दो सड़कों के तिराहे पर – सर्दी और आती-जाती गाड़ियों के शोर में रहना मुश्किल तो है, पर इनके लिए कुछ नया नहीं है। इस ठंड में डेरे का एक परिवार खुले में आग जलाकर बैठा है। यह आग चूल्हे के साथ-साथ बैठकी का भी काम करती है, जहां डेरे के लोग आपस में बैठकर बातें कर पाते हैं। रोटी सेंकने के लिए गोबर के सूखे कंडों का प्रबंध करना भी गाड़िया लुहार की महिलाओं के लिए चुनौती है। “हम लोग गांव में लोहे के सामान बेचते-बेचते कई महिलाओं से मांगती हैं, तब जाकर शाम की इस आग का इंतजाम हो पाता है।” पास में रोटियां पका रही मैना देवी का यह कथन जहां एक ओर गाड़िया लुहारों के जीवन की कठिनाईयों को प्रकट करता है, वहीं स्त्री-पुरुष के बीच के काम के बंटवारे को भी बताता है। पुरुषों का काम लोहे के औजार बनाना है। महिलाएं इन औजारों को गांवों में घर-घर जाकर बेचती हैं।
लुहार जाति की घुमंतू प्रवृत्ति को इतिहास से जोड़ते हुए पास में बैठे हुए नरसी (उम्र 26 वर्ष) बताते हैं कि “महाराणा प्रताप जब अकबर से हारकर चित्तौड़गढ़ से निकले तब हमारे पूर्वज भी उनके साथ थे। उन्होंने उसी दिन सौगंध खाई कि जब तक राजपाट वापिस नहीं मिलेगा अपने घरों को नहीं लौटेंगे। उस दिन उल्टी की गई चारपाई अब तक उल्टी है।” इस स्वाभिमान सम्मत मान्यता में वर्तमान में गहराते संकटों की छाया भी है। वे कहते हैं कि “अब कहां राजपाट और कहां राजा? देश तो कबका आजाद हो गया, पता नहीं हम अब तक ऐसे ही क्यों चल रहे है?” महज 26 साल की उम्र में ही दो बच्चों के पिता हो चुके नरसी की इस बात में भविष्य की चिंता झलकती है।
यह चिंता अकेले नरसी की नहीं, बल्कि लगभग सभी घूमंतू समुदायों की है। ‘खुले आसमान’ के मुहावरे का मतलब भले ही आजादी हो, पर इस गांव में रूके 15-16 परिवारों पर मौसम की मार भी पड़ती है। बिना छत मौसम की मार किसी आपदा से कम नहीं होती। मौसम की मार से बचने के लिए ये परिवार अपने बैलगाड़ियों पर एक तिरपाल का इंतजाम रखते हैं। यह तिरपाल इन्हें सर्दी, गर्मी और बारिश तीनों से बचाता हैं। मगर, इस बार चंद्रा को परिस्थितियों की दोहरी मार झेलनी पड़ी हैं। पुराना तिरपाल फट गया। चंद्रा को पंद्रह-बीस दिन पहले बुखार ने जकड़ लिया। न किसी सरकारी योजना की जानकारी, न आयुष्मान कार्ड और न ही स्वास्थ्य बीमा। परिमाण यह कि बुखार ठीक होते-होते चंद्रा ने कई अस्पताल देख लिए। हजारों का बिल बन गया। “जो कुछ जमा-पूंजी थी, सारी लग गई। उधार लिया, वह अलग से।” चंद्रा यह बताते हुए थोड़ा और उदास हो जाते हैं। आती सर्दियां और तिरपाल का संकट जितना शारीरिक रूप से कष्टकारी है, उतना ही अधिक मानसिक रूप से भी।
“कर्जा लें भी तो किससे? हमारे यहां तो सारे यही काम करते हैं।” मैना (उम्र 55 वर्ष) का कहा घूमंतू समुदायों की असल हालत समझाने के लिए काफी है। देश के मिडिल क्लास की ब्याज दरों और टैक्स-स्लैब की चिंता के बीच हाशिए पर जी रहे लोगों को कर्ज के लिए भी कोई ठौर नहीं मिलना, इस देश के गहराते विरोधाभास को समझने के लिए काफी है।

गाड़िया लुहारों का रहन-सहन भी कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं पैदा करता है। सार्वजनिक शौचालयों का अभाव या उनसे दूरी, इन्हें खुले में शौच के लिए मजबूर करता है। महिलाओं के लिए खुले में शौच जाना कठिन चुनौती है। पेयजल के लिए ये लोग पूरी तरह उस गांव की सार्वजनिक जल व्यवस्था पर निर्भर रहते हैं, जहां ये ठहरते हैं। कई बार स्वच्छ पेयजल का अभाव बच्चों तथा अन्य बड़ों के पाचन एवं पेट संबंधी रोगों का वाहक होता है। गर्भवती महिलाओ को सबसे ज्यादा परेशानी होती है। एक तो नियमित जांच व टीकाकरण का अभाव और ऊपर से लगातार एक जगह से दूसरे जगह जाना, उनके लिए गंभीर स्थितियां पैदा करता है। “जो लोग गांवों में रहते हैं, उनके यहां डिलीवरी के सवा महीने तक बच्चे और मां को बाहर नहीं निकालते हैं। हमारे यहां ऐसा कैसे हो सकता है? अगर दस दिन का बच्चा है और एक जगह से दूसरी जगह जाना है तो बस जाना है।” मैना के कहने से लगता हैं कि जैसे राज्य और केंद्र सरकार के मातृत्व स्वास्थ्य के अभियानों का इनसे कोई सरोकार ही नहीं, जबकि इन समुदायों को इन लाभों की सर्वाधिक आवश्यकता है।
अपनी बैलगाड़ियों पर चारपाई, औजार और रसोई का कुछ सामान लेकर चलने वाले इन गाड़िया लुहारों का कोई स्थायी पता तो होगा ही? इस सवाल का जवाब पाने के लिए जब एक नौजवान का आधार कार्ड देखा तो – हरियाणा के एक गांव का नाम मिला। “इस गांव में न हमारा मकान है और न ज़मीन। बस मई-सितंबर के बीच हम वहां रहते हैं।” नरसी आगे बताता है कि “कहने को हमारे वोट वहां हैं। चुनाव से पहले प्रत्याशी संपर्क करते हैं। मगर हमें अब तक कोई सरकारी लाभ नहीं मिला।” भले ही ये परिवार साल में पांच-छह महीने उस गांव में गुजारते हैं, मगर न तो उनके पास वहां खुद की जमीन और न ही रहने को घर। ऐसे में आधार कार्ड पर लिखा यह पता महज खानापूर्ति है। हरियाणा में भले ही केंद्रीय चुनाव आयोग द्वारा विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया शुरू नही हुई है, मगर बातचीत से पता चलता है कि इनके वोटर बने बहुत ज्यादा साल नहीं बीते हैं। ऐसे में संभव है कि एसआईआर की प्रक्रिया में इनके मताधिकार पर भी संकट आए।
इस डेरे में बच्चों के पास स्मार्टफोन तो हैं, मगर हाथ में स्लेट नहीं। बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के बारे में पूछने पर धोली (उम्र 25 वर्ष) ने बताया कि “हम लोग इधर-उधर जाते रहते हैं। बच्चे कैसे स्कूल जाएं? जब एक गांव में लंबे टाइम रहते तो जाते हैं। मगर पूरे साल नहीं।” औपचारिक शिक्षा के इस युग में बच्चों का स्कूली शिक्षा का हिस्सा नहीं होना भविष्य में अंधेरा भरता है। स्मार्ट फोन का शोर भले ही बच्चों को कुछ दिन बहला ले, मगर चुनौतीभरा जीवन उनका इंतजार कर रहा है, जिसे बिना नियमित शिक्षा के ढंग से जीना असंभव है।
अब गाड़िया लुहारों का परंपरागत व्यवसाय अधिक फायदे का सौदा नहीं रहा है। कृषि कार्यों की मशीनों पर बढ़ती निर्भरता ने गाड़िया लुहारों के हस्तनिर्मित औजारों की मांग को कम कर दिया है। दूसरी ओर, बढ़ती महंगाई ने जीवनयापन और भी कठिन बना दिया है। ऐसे में गाड़िया लुहारों का स्थायी रूप से बस जाना अति आवश्यक हैं। “अब बहुत सारे लोगों ने खाट सीधी कर ली है। हम ही लोग हैं, जिनकी अब भी उल्टी है।” कहते हुए नरसी बताते हैं कि खाट का सीधा या उल्टा होना लोक में प्रचलित मुहावरा है। खाट सीधा कर लेना यानी स्थायी रूप से बस जाना। नरसी आगे जोड़ते हैं कि “अब मन तो है बसने का। सरकार कुछ करे तो बने। सरपंच ने पांच महीने पहले एक फार्म भरवाया था। उसका कोई अपडेट नहीं है।” यह अकेले नरसी की परेशानी नहीं है। शिक्षा का अभाव, योजनाओं की जानकारी ना होना, अत्याधिक डिजिटलीकरण आदि ने इस समुदाय के लिए सामाजिक कल्याण की योजनाओं तक पहुंच को लगभग नामुमकिन ही बना दिया है। स्थानीय राजनीति और इनका एक जगह स्थायी ना रहना, इस नामुमकिन को और अधिक नामुमकिन बना देता है।
गाडियां लुहारों के इस डेरे के लोगों से बातचीत से पता चलता है कि इस समुदाय के लोग लोककल्याणकारी राज्य के नागरिक होते हुए भी लोक-कल्याण से वंचित हैं। जवाहरलाल नेहरू ने 1955 में इस समुदाय की प्रतिज्ञा को मान देते हुए प्रतीकात्मक विजय के तौर पर साढ़े चार हजार गाड़िया लुहारों के साथ चितौड़गढ़ की परिक्रमा की थी। कुछ गाड़िया लुहारों को वहां बसाया भी गया था। मगर दीर्घकालीन जागृति अभियानों और योजनाओं का अभाव ही रहा। पिछले कुछ वर्षों में कई राज्यों मसलन – राजस्थान की पिछली अशोक गहलोत सरकार ने गाड़िया लुहारों को स्थायी रूप से बसाने के लिए ‘महाराणा प्रताप स्थायी निवास योजना’ की शुरुआत की। मगर अधिकारियों की बेरूखी के कारण यह ठंडे बस्ते में ही रही। कच्चे माल के लिए दस हजार रुपए के अनुदान की स्कीम भी धरातल पर नहीं दिखती।
अब जब इन डेरों में भले ही 5-जी का नेटवर्क मिलता हो, मगर पहचान और जीविकापार्जन का संकट दिनों-दिन गहराता जा रहा है। ‘महाराणा प्रताप और मानसिंह के बीच हुए हल्दीघाटी युद्ध’ का विवाद घर-घर पहुंचाने वाली सरकार को महाराणा प्रताप के स्वाभिमानी साथियों के वंशजों की सुध लेनी चाहिए। गाड़िया लुहारों और अन्य घूमंतू समुदायों के स्थायी रहवास के लिए केंद्र सरकार को गंभीर अभियान चलाना चाहिए। स्थायी रहवास ही इन समुदायों के समक्ष उपस्थित शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल और पहचान के संकट से उबार सकता है।
(संपादन : नवल/अनिल)
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