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निकोलस मादुरो को हटाने से बोलीवियाई क्रांति ख़त्म नहीं होगी

निकोलस मादुरो, जिन्होंने अपनी जिंदगी की शुरुआत एक बस चालक के रूप में की थी, चावेज़ के उत्तराधिकारी बने। उनकी सरकार ने भी सेना, न्यायपालिका और कैबिनेट में महत्वपूर्ण पदों पर गैर-श्वेत नागरिकों को नियुक्ति का सिलसिला जारी रखा। ये पद पूर्व में उच्च वर्गों के लिए आरक्षित हुआ करते थे। मादुरो के विरोधियों को उनसे बहुत नफरत है और इस नफरत के पीछे वर्गीय और नस्लवादी कारक भी हैं। बता रहे हैं सत्य सागर

गत 3 जनवरी, 2026 को एक नाटकीय घटनाक्रम में अमरीकी सेना वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो का अपहरण कर उन्हें अमरीका ले गई। यह सिर्फ एक भू-राजनीतिक घटनाक्रम नहीं है, बल्कि जोर-ज़बरदस्ती से उस नस्लीय और सामाजिक पदक्रम की पुनर्स्थापना का प्रयास है, जो पिछली पांच सदियों से लातिनी अमरीका का अभिशाप रहा है। पश्चिमी देश और वहां का मीडिया अमरीका की कार्यवाही को ‘लोकतंत्र की जीत’ बताकर उसका जश्न मना रहे हैं। मगर काराकास (वेनेज़ुएला की राजधानी) के बारीओस (मोहल्लों) में इसे एकदम अलग ढंग से देखा जा रहा है।

देश के आर्थिक रूप से बर्बाद हो जाने के बावजूद दसियों लाख लोग मादुरो के प्रति वफादार क्यों बने रहे? उनका पद से हटना हाशियाकृत लोगों के लिए शोक और कुलीन वर्ग के लिए ख़ुशी का मौका क्यों बन गया है? इन दोनों प्रश्नों का उत्तर तानाशाही बनाम लोकतंत्र का आसान-सा फार्मूला नहीं दे सकता। इसके पीछे है दो वर्गों – मानतुआनोस (कुलीन श्वेत) और पारदोस (मिश्रित नस्ल के बहुसंख्यक) – के बीच गुजिश्ता 500 वर्षों से चला आ रहा संघर्ष और टकराव। और अमरीका ने जो किया है, वह श्वेत कुलीनों के हक़ में है।

वेनेज़ुएला का अतीत 

चाविस्ता आंदोलन के पीछे की सोच और भावना को समझने के लिए हमें वेनेज़ुएला के समाज के औपनिवेशिक अतीत में झांकना होगा। सोलहवीं सदी की शुरुआत में स्पेन द्वारा वेनेज़ुएला पर कब्जे के बाद से ही देश में त्वचा का रंग, सत्ता का पासपोर्ट और सामाजिक स्थिति का निर्धारक रहा है। औपनिवेशिक ढांचा काफी सख्त था। इसमें सबसे ऊपर थे पेनिनसुलारेस (स्पेन में जन्में कुलीन), जो सभी शीर्ष पदों पर काबिज़ थे। उनके नीचे थे अमरीका में जन्मे स्पेनिश क्रीयोलोस। सबसे नीचे थे पारदोस (मिश्रित नस्ल के बहुसंख्यक) जिनमें गुलाम अफ्रीकी और स्थानीय निवासी शामिल थे। वे देश का श्रमिक वर्ग थे, मगर उन्हें सुनियोजित तरीके से सत्ता से दूर रखा जाता था।

वेनेज़ुएला की त्रासदी यह रही है कि स्पेन से स्वाधीनता हासिल होने के बाद भी पुराने सामाजिक विभाजन समाप्त नहीं हुए – उन्हें केवल नए नाम मिल गए। स्वाधीनता संग्राम का नेतृत्व सिमोन बोलिवर, जो कि एक क्रीयोलोस कुलीन थे, ने किया था। मगर मैदान में लड़ने वाले अधिकांश पारदोस थे, जिनसे यह वायदा किया गया था कि युद्ध में जीत के बाद उन्हें मुक्त कर दिया जाएगा। मगर स्पेन का राज ख़त्म होने के बाद क्रीयोलोस भूस्वामी कुलीनों ने अपना राज कायम कर लिया। यद्यपि कानूनी दृष्टि से सभी नागरिक एक बराबर थे, मगर सामाजिक और राजनीतिक सत्ता श्वेत मेसटीज़ो कुलीन वर्ग की मुट्ठी में थी। अफ्रीकी मूल के नागरिकों और मूलनिवासी समुदायों की राजनीतिक हैसियत शून्य थी।

वेनेजुएला की राजधानी काराकास में निकोलस मादुरो को सुपरमैन के रूप में प्रस्तुत करते उनके समर्थक

आधुनिक काल में सन् 1958 के ‘पुंटो फिजो समझौते’ के ज़रिए इस बहिष्करण को औपचारिक स्वरूप दिया गया। पश्चिमी देश इस समझौते को राजनीतिक स्थिरता की कायमी का आदर्श उपाय मानते हैं। मगर दरअसल प्रमुख पार्टियों के बीच हुए इस समझौते ने एक काकस को जन्म दिया, जिसने यह सुनिश्चित किया कि सत्ता श्वेत-मेसटीज़ो वर्ग की चेरी बनी रहे। बेशक मध्यम वर्ग का आकार बढ़ा, मगर देहातों में रहने वाली गरीब और अफ्रीकी मूल के नागरिक कच्चा तेल बेचने से देश में आ रहे अकूत धन में से कुछ न पा सके। अमरीका ‘लोकतंत्र की पुनर्स्थापना’ की बात कर रहा है, मगर बहुत से वेनेजुएलाई नागरिकों की दृष्टि में हालिया घटनाक्रम बहिष्करण पर आधारित उस पुराने समझौते की वापसी है। 

चाविस्ता और पहचान की राजनीति 

सन् 1998 में ह्यूगो चावेज़ के उदय के साथ ही देश में एक मनोवैज्ञानिक भूचाल शुरू हुआ, जिसने औपनिवेशक काल से चली आ रही सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था को तहस-नहस कर दिया। चावेज़ अफ्रीकी और मूलनिवासी मिश्रित नस्ल के पारदो थे और एक गरीब परिवार से ताल्लुक रखते थे। उन्होंने केवल चुनाव ही नहीं जीता, बल्कि देश के सामाजिक पिरामिड को उलट दिया। पहली बार बहुसंख्यकों (पूएब्लो) को लगा कि देश उनका है।

चाविस्ता आंदोलन पहचान की राजनीति का जबरदस्त हिमायती था। उसने नस्लीय लोकतंत्र के उस मिथक का पर्दाफाश किया जिसे वेनेज़ुएला लंबे समय से प्रचारित करता रहा था। उसने खुलकर संस्थागत नस्लवाद पर हमला किया और अफ़्रीकी-वेनेज़ुएलाई प्रतीकों को बढ़ावा दिया। सन् 1999 के संविधान में देश का नाम बदलकर बोलीवारियन रिपब्लिक ऑफ़ वेनेज़ुएला कर दिया गया और राज्य ने मूलनिवासियों के अधिकारों और उनकी विरासत को मान्यता दी।

मादुरो, जिन्होंने अपनी जिंदगी की शुरुआत एक बस चालक के रूप में की थी, चावेज़ के उत्तराधिकारी बने। उनकी सरकार ने भी सेना, न्यायपालिका और कैबिनेट में महत्वपूर्ण पदों पर गैर-श्वेत नागरिकों को नियुक्ति का सिलसिला जारी रखा। ये पद पूर्व में उच्च वर्गों के लिए आरक्षित हुआ करते थे। मादुरो के विरोधियों को उनसे बहुत नफरत है और इस नफरत के पीछे वर्गीय और नस्लवादी कारक भी हैं। उनके समर्थक यह मानते हैं कि अमरीका द्वारा उनका अपहरण कोई कानूनी गिरफ्तारी नहीं, बल्कि क्रीयोलोस के वंशजों द्वारा प्रतिशोध लेने के लिए रची गई प्रतिक्रांति है। इन लोगों को हमेशा लगता रहा कि एक बस चालक का शासक बन जाना प्राकृतिक व्यवस्था के अनुरूप नहीं है। 

चाविस्ता आंदोलन ने लोगों को क्या दिया

आलोचक कहते हैं कि वेनेजुएला की आर्थिक बर्बादी समाजवाद की असफलता का प्रतीक है। मगर अगर कोई गहराई से शोध करे तो उसे यह स्वीकार करना ही होगा कि प्रतिबंधों और कुप्रबंधन की जकड़ में आने से पहले चाविस्ता के अधीन देश की व्यापक और ठोस उन्नति हुई। 

बोलिवारियन क्रांति के प्रारंभिक सालों में ही सरकार ने कच्चा तेल बेचने से होने वाली आमदनी का इस्तेमाल कुलीन वर्ग की खुशहाली के लिए करना बंद कर दिया। इसकी जगह इस धन को मिसिओनेस पर खर्च किया गया। ये मिसिओनेस स्वास्थ्य, शिक्षा और आवास पर केंद्रित व्यापक समाज कल्याण कार्यक्रम थे। 

  • स्वास्थ्य एवं पोषण : सरकार ने बहिष्करण में विश्वास रखने वाली परंपरावादी अफसरशाही को दरकिनार कर झोपड़पट्टियों में स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करवानी शुरू कीं। आपूर्ति एवं उत्पादन की स्थानीय समितियों पर आधारित सीएलएपी (क्लेप) खाद्यान्न वितरण नेटवर्क गरीबों की जीवनरेखा बन गया। यह वेनेज़ुएला का एक सरकारी कार्यक्रम है, जिसके अंतर्गत खाद्य सामग्री के डिब्बे या थैले सीधे भोजन की कमी से जूझ रहे परिवारों तक पहुंचाए जाते हैं। इस योजना के ज़रिए तेल की बिक्री से होने वाली कमाई का एक हिस्सा अंततः श्रमिक वर्ग की भोजन की थाली तक पहुंचा।
  • शिक्षा एवं संस्कृति : निरक्षरता को समाप्त करने के लिए सघन प्रयास किए गए और उच्च शिक्षा के द्वार गरीबों के लिए खोल दिए गए। सांस्कृतिक मोर्चे पर आंदोलन ने लोगों को अपनी देशज और अफ्रीकी जड़ों पर गर्व करना सिखाया। इससे अतीत को यूरोपीय संस्कृति की नजर से देखने की प्रवृत्ति समाप्त हुई। 
  • राजनीतिक समावेशीकरण : सामुदायिक परिषदों के जरिए गरीबों को राजनीति के क्षेत्र में आवाज मिली। राज्य के संसाधनों तक उन्हें जो पहुंच मिली, वह पहले उन्हें कभी हासिल नहीं थी। इससे देश का वर्गीय ढांचा पूरी तरह बदल गया। 
निकोलस मादुरो के समर्थन में विरोध प्रदर्शन करते उनके समर्थक

वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था के पतन को 1980 और 1990 के दशक के घटनाक्रम से अलग करके नहीं देखा जा सकता। नवउदारवादी सुधारों और सरकार के खर्च में कमी लाने के अभियानों के नतीजे में सन् 1989 का ‘कैराकाजो’ हुआ। कैराकाजो गरीबों का सामूहिक विद्रोह था जिसे तत्कालीन सरकार ने निर्दयतापूर्वक कुचल दिया। इस कार्यवाही में सैंकड़ों लोग मारे गए। उस कत्लेआम की यादें आज मादुरो के वफादारों की ताकत है। उनके समर्थक जानते हैं कि पुराने कुलीन, जो आज मादुरो को पद से हटाए जाने का उत्सव मना रहे हैं, वे उसी राजनीतिक सोच के उत्तराधिकारी हैं, जिसने 1989 में गरीबों पर गोलियां चलवाई थीं

नोबेल पुरस्कार से पश्चिम की पसंद जाहिर 

सन् 2025 का नोबेल शांति पुरस्कार वेनेज़ुएला की विपक्ष की नेता मारिया कोरिना मचादो को दिया जाना पश्चिमी देशों के असली इरादों को साफ़ कर देता है। नार्वे के ओस्लो में बैठी नोबेल पुरस्कार की चयन समिति ने ‘लोकतांत्रिक अधिकारों को स्थापित करने के लिए मचादो के अथक संघर्ष’ की सराहना की। मगर उनके जीवन और नीतियों से यह जाहिर है कि वे समृद्ध और शक्तिशाली देशों की पसंद क्यों हैं। मचादो जनसामान्य की नेता नहीं हैं। वे एक बड़े स्टील व्यवसाई की बेटी हैं और उन्होंने अंद्रेस बेलिओ कैथोलिक यूनिवर्सिटी जैसी महंगी निजी शैक्षणिक संस्थानों से तालीम हासिल की है। अपने जीवन में जिन सुविधाओं का वे उपभोग हासिल करती आईं हैं, वे वेनेज़ुएला के अधिकांश नागरिकों के लिए सपना हैं। वे गोरी त्वचा और यूरोपीय सोच वाले सीफ्रीनो कुलीन वर्ग से हैं। यही वह वर्ग है, जिसे चविस्मो सत्ता से बेदखल करना चाहते हैं।

उन्हें नोबेल पुरस्कार से नवाज़ा जाना, शांति स्थापित करने के उनकी प्रयासों की सराहना नहीं बल्कि व्यापारियों के प्रति मित्रवत व्यवहार करने वाली सरकार की स्थापना को हरी झंडी थी। मचादो देश की आर्थिकी को किस दिशा में ले जाना चाहती हैं यह उन्होंने कभी छुपाया नहीं है। वे राज्य की संपत्ति के पारदर्शक तरीके से बड़े पैमाने पर निजीकरण की हामी हैं। यहां तक कि वे सरकारी तेल कंपनी पीडीवीएसए के निजीकरण की भी पक्षधर हैं ताकि वेनेज़ुएला को ऐसा ‘एनर्जी हब’ बनाया जा सके, जो विदेशी पूंजी का गर्मजोशी से स्वागत करने को तत्पर है। पश्चिमी देशों के लिए ‘शांति’ का मतलब है श्रमिक वर्ग के प्रतिरोध का दमन और वेनेज़ुएला के कच्चे तेल के विशाल खजाने को एक्सानमोबिल और शेवरॉन जैसी कंपनियों के लिए खोल देना। उन्हें नोबेल सम्मान से नवाजकर पश्चिम ने यह साफ़ कर दिया है कि वह मानतुआनोस की वापसी चाहता है और उसके लिए लोकतंत्र का मतलब है एक ऐसा देश जो अपनी राष्ट्रीय संपदा को सबसे ऊंची बोली लगाने वाले को बेचने को तैयार हो।

लातिनी अमरीका का विघटन का इतिहास 

लातिनी अमरीका का आधुनिक इतिहास, नस्ल के धुरी पर घूमता रहा है। पिछली सदी में दुनिया का यह हिस्सा यूरोप-समर्थक और यूरोप-समर्थित कुलीनतंत्र के हाथों से सत्ता छीनने के लिए लंबे और पीड़ादायक संघर्ष का गवाह रहा है। वेनेज़ुएला में चावेज़ और मादुरो की तरह ही बोलीविया में ईवो मोरालिस और पेरू में पेड्रो कैसटीजो जैसे नेता श्वेत-मेसटीज़ो के बोलबाले वाले शहरी केंद्रों के बरक्स देशज और देहाती जनता का प्रतिनिधित्व करते थे।

इस इलाके में अमरीकी हस्तक्षेप को मानवाधिकारों की रक्षा की कवायद के रूप में नहीं देखा जा रहा है, बल्कि इसे एक नव-औपनिवेशिक पुलिसिया कार्यवाही माना जा रहा है। इस हस्तक्षेप के ज़रिए दिया जा रहा संदेश साफ़ है : मेसटीज़ो और मूलनिवासी दोनों को वोट देने का हक़ होगा मगर वे सत्ता में तभी रह सकेंगे अगर उनकी नीतियां समृद्ध और शक्तिशाली देशों के रणनीतिक हितों के लिए खतरा न हों और स्थानीय मानतुआनोस को उनसे कोई तकलीफ न हो। मादुरो की सत्ता से बेदखली, श्वेत/ मेसटीज़ो कुलीन वर्ग का वर्चस्व की पुनर्स्थापना की राह में एक बाधा दूर करना है।

जाति का लेंस 

वेनेज़ुएला के घटनाक्रम को समझने के लिए हम भारतीयों को उसे लोकतंत्र बनाम तानाशाही के संदर्भ में नहीं, बल्कि जाति के लेंस से देखना होगा।

कल्पना कीजिए कि एक भारत की जिसमें सदियों से प्रधानमंत्री, कैबिनेट के सदस्य और सुप्रीम कोर्ट के जज केवल ऊंची जातियों के लोग बनते रहे हों, आर्थिक तंत्र पर भी उनका कब्ज़ा हो और नैरेटिव भी वे गढ़ते हों और बहुसंख्यक बहुजन (दलित, ओबीसी और आदिवासी) केवल श्रमबल हों। उनका काम केवल सेवा तक सीमित हो तब ऐसे भारत में अचानक बहुजन पृष्ठभूमि का कोई नेता उभरता है और प्रधानमंत्री बन जाता है। वह पहले सफाई कर्मी था या शायद बस चलाता था। वह देश के ढांचे में आमूल-चूल बदलाव लाता है। वह ऊंची जातियों पर टैक्स लगाता है और उस धन से निम्न जातियों को शैक्षणिक और स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध करवाता है। उसके राज में ओबीसी सेना के जनरल बनते हैं और जज की कुर्सी पर दलित बैठते हैं। ऊंची जातियां आगबबूला हैं। वे उस नेता को गंवार और तानाशाह बताती हैं।

ऐसे में कोई विदेशी शक्ति इस बहुजन प्रधानमंत्री का अपहरण कर लेती है और उसकी जगह किसी ऐसे नेता को बैठा देती है जो ऊंची जातियों के पुराने कुलीन वर्ग को स्वीकार्य है। ऐसे में ऊंची जातियां इस घटनाक्रम को योग्यता की वापसी बताकर उसका उत्सव मना सकती हैं। मगर बहुसंख्यक बहुजन तो इसे मनुवादी ऊंच-नीच की पुनर्स्थापना बतौर ही देखेंगे। वेनेज़ुएला में ठीक यही हो रहा है। 

मगर अमरीकी साम्राज्यवाद की अपार शक्ति और अकूत संसाधनों के बाद भी बस चालक को हटाकर पेनिनसुलारेस का राज फिर से कायम करना इतना आसान नहीं होगा। वेनेज़ुएला और अमरीका – दोनों देशों के कुलीनों और अमरीका को युद्धोन्मादियों को जल्द ही यह समझ में आ जाएगा कि वेनेज़ुएला के आमलोग अपनी जान पर खेल कर भी उस सब को बचाएंगे जो उन्होंने ह्यूगो चावेज़ की बोलिवारियन क्रांति से हासिल किया है।

उनके लिए यह केवल सत्ता और संसाधनों तक पहुंच का सवाल नहीं है। उनके लिए यह सम्मान और गरिमा का सवाल भी है जिससे वे सदियों तक वंचित रहे हैं।

(यह आलेख पूर्व में अंग्रेजी में वेब पत्रिका ‘काउंटर करेंट्स’ द्वारा प्रकाशित है। यहां इसका हिंदी अनुवाद लेखक की सहमति से प्रकाशित किया जा रहा है।)

(अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल/अनिल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, संस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

लेखक के बारे में

सत्य सागर

सत्य सागर को प्रिंट और ब्रॉडकास्ट पत्रकार व स्वास्थ्य संप्रेषक के रूप में विश्व के विभिन्न देशों, मुख्यतः दक्षिण व दक्षिण-पूर्व एशिया, में 30 वर्ष से अधिक से काम करने का अनुभव है। उन्होंने अपने पत्रकारीय जीवन की शुरुआत द इंडियन एक्सप्रेस व इकनोमिक टाइम्स से की थी.. वे सन 1992 से लेकर 2004 तक थाईलैंड में रहे, जहाँ उन्होंने न्यू डेल्ही टेलीविज़न (द वर्ल्ड दिस वीक कार्यक्रम) के विशेष संवाददाता व एशिया टाइम्स के बैंकाक ब्यूरो चीफ, इंटर प्रेस सर्विस के थाईलैंड संवाददाता व यूनाइटेड नेशनस इकोनोमिक एंड सोशल कमीशन फॉर एशिया एंड द पेसिफिक के कम्युनिकेशन्स व सोशल डेवलपमेंट ऑफिसर बतौर काम किया।

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