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सुदर्शन ऋषि और डुमार (डोमार) समाज

पूरे भारत में डोमार जाति की जनसंख्या को लेकर एकमत नहीं है, क्योंकि जनगणना में भी उनकी जानकारी सही नहीं मिल पाती है। इसका कारण यह है कि डोमार जाति के लोग अपनी जाति कहीं कुछ तो कहीं कुछ और लिखवाते हैं। जैसे भंगी-मेहतर कहीं जमादार भी लिख देते हैं। बता रहे हैं संजीव खुदशाह

जब वाल्मीकि समाज के तर्ज पर कुछ लोगों ने सुदर्शन समाज का गठन सुदर्शन ऋषि के नाम पर किए जाने का बीड़ा उठाया तो उनके मन में सकारात्मक विचार ही थे। वे सोच रहे थे कि इस बहाने डोमार समाज के लोग गंदे नाम (मेहतर, भंगी, स्वीपर) से छुटकारा ले लेंगे। धर्म और कर्म के काम में लग जाएंगे। एक नई पहचान होगी। लोग संगठित होंगे और जिस प्रकार वाल्मीकि नाम से जाति प्रमाण पत्र बनता है, वैसे ही समाज में सुदर्शन नाम से जाति प्रमाण पत्र बनने लगेगा। इसके लिए उन्होंने सुदर्शन समाज के बैनर तले 27 समकक्ष जातियों को जोड़ने का प्रयास किया। हालांकि इस संगठन में न ही इन जातियों का प्रतिनिधित्व था और न ही जमीनी तौर पर 27 जातियों के लोग सुदर्शन से जुड़ना चाहते थे। इसीलिए सुदर्शन समाज और सुदर्शन ऋषि का प्रचार केवल डुमार या जिसे डोमार भी कहते हैं, उनके बीच ही रहा और प्रतिनिधित्व भी डोमार जाति को ही दिया गया।

पूरे भारत में डोमार जाति की जनसंख्या को लेकर एकमत नहीं है, क्योंकि जनगणना में भी उनकी जानकारी सही नहीं मिल पाती है। इसका कारण यह है कि डोमार जाति के लोग अपनी जाति कहीं कुछ तो कहीं कुछ और लिखवाते हैं। जैसे भंगी-मेहतर कहीं जमादार भी लिख देते हैं। इसलिए सही-सही इनकी संख्या की जानकारी नहीं मिल पाती है। महाराष्ट्र के नागपुर, उत्तर प्रदेश के कानपुर और मध्य प्रदेश जबलपुर में इस जाति के लोग बड़ी संख्या में निवास करते हैं। इनकी थोड़ी बहुत संख्या छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल और झारखंड में भी है।

मूल रूप से यह जाति बुंदेलखंड और बघेलखंड में निवास करती है या कहिए कि इनका यही मूल स्थान है। करीब 200 साल पहले अंग्रेजों के काल में जब उत्तर भारत में अकाल पड़ा तो ये जातियां खाने-कमाने के लिए बड़ी संख्या में शहर की तरफ आईं। उन जगहों में आकर बस गई, जहां पर रेलवे लाइन का काम चल रहा था। नए नगर बन रहे थे। इन जगहों में इन्हें जो काम मिला, वह उन्होंने किया। कहीं वह सफाईकर्मी बन गए, कहीं मैला उठाने लगे, तो कहीं पर अच्छे कामों में भी लगे। सूअर पालन और बैंड बजाने का इनका पुश्तैनी काम था। अपनी मूल स्थान पर वे कभी इन गंदे कामों में नहीं जुड़े थे। इनका मूल व्यवसाय खेती किसानी, बांस के समान, जचकी के लिए दाई का काम, बैंड बजाने का काम, मुखाग्नि देने का काम करते थे।

सन् 1947 में जैसे ही देश को आजादी मिली, समाज के मुखियाओं को यह समझ में आने लगा की यह गंदा पेशा, उनका अपना काम नहीं है, इससे मुक्त होना होगा। चूंकि ये जातियां वाल्मीकि बस्ती के आसपास ही बसाई गईं और इनकी एक जैसी ही संस्कृति बन गई। वाल्मीकि समाज जो कि वाल्मीकि ऋषि के नाम पर पहले से ही संगठित था, और संगठित होने लगा। डोमार लोगों ने उनसे प्रेरणा लेकर सुदर्शन समाज के नाम से संगठन बनाने का प्रयास किया। उन्होंने सफाईकर्म से जुड़ी ऐसी जातियों, जो वाल्मीकि नहीं हैं, को सुदर्शन ऋषि के नाम पर जोड़ने का प्रयास किया।

बांस से दैनिक उपयोग की वस्तुएं बनातीं डोमार समाज की महिलाएं

ऐसा नहीं है कि डोमार समाज के लोग केवल सुदर्शन से ही जुड़े रहे। आजादी के पहले भी और आजादी के बाद भी ऐसे बहुत सारे उदाहरण मिलते हैं कि किस प्रकार इन्होंने अपना पंचायत डोमार समाज के नाम से बनाया और उत्थान के लिए बहुत सारे कार्य किया।

जबलपुर के कवि कालूराम मंझार ने 1961 में एक किताब का प्रकाशन किया, जिसका शीर्षक था– ‘कुरीति प्रक्षालन आदि डोम डुमार समाज’। इस किताब में उन्होंने जाति सुधार, जाति का नामकरण, शब्द पर विश्लेषण, हम चांडाल नहीं हैं, वंशावली, देवक डोम आदि के बारे में विस्तार से जिक्र किया है।

इसी प्रकार जबलपुर से ही ‘सामाजिक मार्गदर्शिका’ नाम से 29 मार्च, 1993 को एक पत्रिका का प्रकाशन किया गया। इसके संपादक मंडल में एस.के. वर्मा, एच.बी. तांबे, एच.एस. पाठक, आर.के. देवक और बी.पी. चमकेल थे। इस पत्रिका में उन्होंने 1885 के पहले के पूर्वज चौधरी, मुखिया, साखीदार आदि की जानकारी को संग्रहित किया है। 1901 से लेकर 1993 तक के संगठनों का विस्तार से विवरण दिया गया है। कई अखाड़ा, भजन मंडली, मित्र मंडली के नाम से बने संगठनों का विवरण मिलता है। इसी पत्रिका में यह भी जानकारी मिलती है कि 1972 में ‘मध्य प्रदेश डोम डुमार संघ’ का पहली बार रजिस्ट्रेशन किया गया, जिसके अध्यक्ष पूर्व विधायक मंगल पराग थे तथा महामंत्री श्री नारायण, कोषाध्यक्ष यूलीचंद मालिक और संगठन मंत्री मैनाराम बड़गैया थे। इसी दौरान डोमार समाज डॉ. आंबेडकर की विरासत से भी जुड़ रहा था। सन् 1973 में ‘डॉक्टर अंबेडकर साहित्य प्रचार मंडल’ का गठन किया गया। इसके संस्थापक थे इंद्रपाल गौतम, शिवनाथ चौधरी, श्रवण कुमार वर्मा और दुर्गा प्रसाद चुहटेल। इसी तरह 1982 में ‘सुदर्शन समाज एवं डोम डुमार प्रबंधक समिति’ का गठन हुआ, जिसके संस्थापक थे हरिप्रसाद भारतीय, मैनाराम बड़गैया, जालिम सिंह, प्रेमलाल ठाकुर, हरिशंकर पाठक, तुलाराम कर्सा, चंदन लाल पसेरीया, बाबूलाल मलिक और प्रसादी लाल बिरहा। सन् 1990 में ‘डोम डुमार एकता समिति बिलहरी’ का गठन हुआ। 1990 में ही ‘बाबा अंबेडकर जनहित कल्याण समिति’ का गठन हुआ। वहीं 1991 में ‘मध्य प्रदेश युवा डोमार महासंघ’ का गठन किया गया, जिसके अध्यक्ष रविंद्र चंदेल, महामंत्री दिलीप कुंडे और कोषाध्यक्ष राम प्रसाद ग्रावकर थे। इसी पत्रिका में जन्म से संबंधित छठी, मूल, बरहो आदि रीति-रिवाजों का जिक्र है। इसके अलावा सगाई, फलदान, लगन, सिंगार का सामान, चिकट, बारात का टीका, द्वारचार, बारात का भोज, समधौरा, पैर पूजन, भंवर, विदाई आदि का जिक्र किया गया है। इसी तरह इसमें मृत्यु से संबंधित रीति-रिवाजों का भी जिक्र है। जबलपुर में ही ‘मध्य प्रदेश डोम डुमार समाज महासंघ’ का गठन रामेश्वर गौतेल के द्वारा किया गया, लेकिन इनके क्रियाकलापों की जानकारी नहीं मिलती है।

ठीक इसी प्रकार बिलासपुर में बापू नगर में डुमार समाज के नाम पर संगठन बने। आज से 20 साल पहले यह संगठन जाति पंचायत की तरह काम करता था। लेकिन अब यह संगठन शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर भी काम कर रहा है। बिलासपुर में ही कर्बला और दूसरे मोहल्ले में रहने वाले लोग सुदर्शन के नाम पर संगठन बनाकर काम करते थे। और अभी भी कर रहे हैं। डॉ. आंबेडकर को लेकर भी कई संगठन बनाए गए हैं। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में 2010 में दलित मूवमेंट‌ एसोशिएशन नाम की संस्था का पंजीयन कराया गया और आंबेडकर जयंती के दिन बड़े सामाजिक कार्यक्रम कराए जाते थे। इस संगठन ने एक पत्रिका का प्रकाशन किया, जिसका नाम ‘दलित उत्थान’ था। करीब 3 साल से छत्तीसगढ़ डोमार समाज का गठन किया गया है जिसके सदस्य और पदाधिकारी हर जिले में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। इसी प्रकार खड़कपुर और नागपुर में भी लोग कहीं पर सुदर्शन के नाम पर तो कहीं पर मेहतर-भंगी के नाम पर संगठन बनाकर काम करते हैं। लेकिन डूमार समाज में जो बड़े सम्मेलन हुए और जो बड़े कार्यक्रम किए गए, वे अखिल भारतीय सुदर्शन समाज के बैनर तले किए गए।

अखिल भारतीय सुदर्शन समाज के सबसे पहले अध्यक्ष राम सिंह खरे, इलाहाबाद और सचिव मकरंद लाल भारतीय कानपुर से थे। इन्हें सुदर्शन समाज का फाउंडर भी माना जाता है। चूंकि ये दोनों डोमार समाज के थे। इसलिए डोमार समाज के लोग बड़ी संख्या में इस संगठन से जुड़े और काम किया। खड़कपुर में इसी संस्था के बैनर तले एक स्कूल का भी संचालन किया गया, जिसमें गोपाल दास बाघमार शिक्षक थे। आगे चलकर गोपाल दास बाघमार इसी संस्था के अध्यक्ष बन गए। गोपाल दास बाघमार ने 1999 में एक पत्रिका ‘प्रतिवेदन’ का प्रकाशन किया, जिसमें समाज से संबंधित जानकारी को प्राथमिकता दी गई। इसी पत्रिका के अंक दो में मकरंद लाल भारतीय का एक लेख ‘हमारे पूर्वज महर्षि सुदर्शन जी’ प्रकाशित हुआ था। इसी लेख में पहली बार यह दावा किया गया कि डोम, डुमार, बसोर, मांग, महार, बल्हार, धानुक, हेला, चूड़ा, लालबेगी, रावत, धरकार, मेहतर, सुदर्शन, मेस्तर, नगाड़ची, वाल्मीकि, तुरहिया, भंगी, बातदार, हाड़ी, दुसाध, वंशफोड़ आदि लोग सुदर्शन ऋषि को मानते हैं। इस पत्रिका के अंक दो में गोपाल दास बाघमार और दुर्गा प्रसाद धानुक लखनऊ का भी एक लेख प्रकाशित है, जिसमें वे सफाई कामगारों के उत्थान के और उनकी समस्याओं पर बात करते हैं।

इसी समय जबलपुर से ‘दलित डोम दर्पण’ नाम से एक साप्ताहिक का प्रकाशन 2000 में किया गया। इसके संपादक घनश्याम दास चमन लाल चमकेल हैं। इस अंक में दीनदयाल बड़गैया को रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय से डोम डूमार समाज के ऊपर पीएचडी की उपाधि मिलने का भी समाचार प्रकाशित हुआ है। इसी प्रकार भोपाल से एक पत्रिका प्रकाशित होती थी– ‘सुदर्शन संदेश’ के नाम से इसके प्रधान संपादक थे बालचंद हवेलियां। वे सुदर्शन ऋषि और सुदर्शन समाज के पैरोकार थे और काफी सक्रिय थे।

कानपुर के सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक देव कुमार बताते हैं कि शुरू में जब सुदर्शन समाज की बैठकें हुईं तो उसके संस्थापक लक्ष्मण भगत थे। उन्होंने ही कानपुर में इसका प्रचार किया। वे मकरंद लाल भारतीय के ससुर भी थे। बातचीत के दौरान देव कुमार कहते हैं कि कानपुर में डुमारो की संख्या करीब डेढ़ लाख है और ज्यादातर लोग बस्तियों में रहते हैं। इनका प्रमाण पत्र वाल्मीकि जाति के नाम से या फिर बसोर के नाम से बनता है। आज भी कानपुर में डेढ़ लाख की संख्या होने के बावजूद डुमार या डोमार नाम से कोई संस्था नहीं है। न ही जाति पंचायत है। जाति पंचायत है भी तो स्वच्छकार नाम से है।

महाराष्ट्र पुलिस विभाग में पुलिस अधीक्षक रह चुके के.एम. बेरिया जी बताते हैं कि नागपुर में लोग सुदर्शन समाज से जुड़े हुए हैं, जिसमें हेला, मखियार, डुमार जाति के लोग भी है। इन जातियों का अपना कोई संगठन जाति नाम से नहीं है। ये सुदर्शन समाज नाम से ही पहचाने जाते हैं। लेकिन इन सभी जातियों का जाति प्रमाण पत्र भंगी या मेहतर के नाम से बनता है।

गौरतलब है कि अखिल भारतीय सुदर्शन समाज पुरानी संस्था तो पहले से थी, लेकिन बाद में इसके दो टुकड़े हो गए। कुछ लोगों ने नागपुर में भारतीय सुदर्शन समाज का गठन किया था। इन दोनों संगठनों को फिर मिलाकर एक नया संगठन बनाया गया– भारतीय सुदर्शन समाज महासंघ, जिसके राष्ट्रीय अध्यक्ष नागपुर के दिलीप हाथीबेड हैं। वे पहले सुदर्शन वाल्मीकि मखियार नाम से संगठन चलते थे।

जैसा की विदित है मेहतर, भंगी, स्वीपर नाम से कोई भी जाति मौजूद नहीं है। इनकी जाति का अपना नाम कुछ और है। जो जातियां सफाईकर्म से जुड़ी रहीं, उन्हें इन गंदे नाम से पुकारा जाने लगा और इन्हीं नाम से उनका सर्टिफिकेट भी बनने लगा। उनकी वास्तविक जाति की पहचान, उनकी गरिमा, उनका सम्मान सब ध्वस्त हो गया। सुदर्शन समाज का गठन जिस मकसद के लिए किया गया था, वह कहीं और खो गया। आजादी के इतने सालों बाद भी सुदर्शन के नाम से जाति प्रमाण पत्र बनने की कोई प्रक्रिया या समाधान नहीं है। मूल जाति नाम से लोग इतने दूर हो गए हैं कि केवल शादी-विवाह में इसकी पूछ-परख होती है। बहुत कम ही ऐसे लोग हैं जिनका डोम या डुमार या डोमार या हेला नाम से जाति प्रमाण पत्र बनता है।

वैसे हेला जाति केंद्रीय अनुसूची, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में मुस्लिम पिछड़ा वर्ग में शामिल है। महाराष्ट्र की किसी सूची में हेला नाम दर्ज नहीं है। उत्तर प्रदेश में हेला अनुसूचित जाति में ही आते हैं। लेकिन महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में जिनका जाति प्रमाण पत्र मेहतर नाम से बन रहा है, वे अनुसूचित जाति का लाभ ले रहे हैं। इसी प्रकार मखियार जाति का नाम जाति की सूची में है ही नहीं। न केंद्र में है और न राज्य की सूची में। लेकिन यह जाति, जाति के रूप में मौजूद है। इनका भी जाति प्रमाण पत्र मेहतर या भंगी या वाल्मीकि के नाम से बनता है। डोमार, डुमार जाति का नाम उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ के अनुसूचित जाति की सूची में मौजूद है।

बहरहाल यह मूल्यांकन करना पड़ेगा कि इस बीच इन जातियों ने क्या खोया और क्या पाया है? सुदर्शन समाज से 27 जाति जोड़ने का दावा जमीनी स्तर पर खरा नहीं उतरता है। उत्तर प्रदेश में हेला जाति के संगठन तो बहुत मिलते हैं। बहुत सारी जातियां भी ऐसी हैं जो कि सुदर्शन से जुड़ना नहीं चाहती हैं और विरोध करती हैं। वे इसे सिर्फ डुमारो का संगठन कहती हैं।

वास्तविकता यह है कि सुदर्शन के नाम से सबसे ज्यादा नुकसान डोमारो को हुआ है। जिन जातियों को इस नाम से नुकसान होने अंदेशा लगा वह पहले ही दूर हो गई हैं। सुदर्शन समाज के नाम पर जो संगठन बने हुए हैं, और जो इनके पदाधिकारी हैं, वह पीछे लौटना नहीं चाहते, क्योंकि इससे उनका व्यक्तिगत नुकसान भी है। साथ ही पहचान का भी प्रश्न है। इस समाज के जो लोग नेतागिरी कर रहे हैं, उनका अंतिम लक्ष्य सफाई कामगार आयोग में प्रवेश पाना है। इससे ऊपर वह उठना नहीं चाहते हैं। इन सब कारणों से यह समाज आंबेडकरवादी आंदोलन से भी काफी दूर है तथा शिक्षा और नौकरियों में इसकी भागीदारी कम है।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

संजीव खुदशाह

संजीव खुदशाह दलित लेखकों में शुमार किए जाते हैं। इनकी रचनाओं में "सफाई कामगार समुदाय", "आधुनिक भारत में पिछड़ा वर्ग" एवं "दलित चेतना और कुछ जरुरी सवाल" चर्चित हैं

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