गत 16 जनवरी, 2026 को हिंदी के बहुचर्चित और हस्तक्षेपकारी आलोचक वीरेंद्र यादव का लखनऊ के एक अस्पताल में हृदयाघात के कारण निधन हो गया। पचहत्तर वर्ष की आयु कोई कम नहीं होती, लेकिन वीरेंद्र यादव की रचनात्मक त्वरा, बौद्धिक सक्रियता और वैचारिक स्फूर्ति को देखते हुए उनका यूं अचानक चला जाना हिंदी समाज के लिए एक स्तब्ध कर देने वाली घटना है। संयोग ही है कि इसी समय राजेंद्र कुमार, ज्ञानरंजन और प्रसिद्ध आंबेडकरवादी लेखक बुद्धशरण हंस का भी निधन हुआ। ये सभी अपने-अपने क्षेत्र में अत्यंत चर्चित और प्रभावशाली लेखक रहे, किंतु वृद्धावस्था और उससे जुड़ी शारीरिक व्याधियों ने उन्हें धीरे-धीरे शिथिल कर दिया था।
इसके विपरीत, वीरेंद्र यादव पचहत्तर वर्ष की आयु के बाद भी जिस तरह सोशल मीडिया, पत्र-पत्रिकाओं और हिंदी आलोचना में सक्रिय थे, उसे देखते हुए यह सहज ही लगता है कि उनका समय अभी पूरा नहीं हुआ था। उनका सर्वश्रेष्ठ लेखन अभी आना शेष था। खासकर ऐसे दौर में, जब वर्णाश्रमी व्यवस्था और हिंदू फासीवाद का अंधकार लगातार भारत की बहुलतावादी, लोकतांत्रिक और समावेशी संस्कृति को निगलता जा रहा है, ऐसे समय में वीरेंद्र यादव जैसे आलोचक का न होना एक गहरी बौद्धिक क्षति है।
वीरेंद्र यादव हिंदी समाज की उन विरल शख्सियतों में थे, जिन्होंने इन प्रवृत्तियों का लगातार और निर्भीक प्रतिकार किया। वे प्रगतिशील परंपरा के भीतर रहकर भी उसकी जड़ताओं, सीमाओं और अंतर्विरोधों को प्रश्नांकित करते रहे। उन्होंने वाम-प्रगतिशील विचारधारा को केवल वर्गीय फ्रेम में सीमित न रखकर उसे जातिवाद, नस्लवाद, पितृसत्ता, औपनिवेशिक विरोध और फासीवाद-विरोधी संघर्ष की बहुस्तरीय जमीन प्रदान की।
उनका लेखन बहुआयामी है और उसके कई पक्षों का सम्यक मूल्यांकन अभी शेष है। उनका सबसे महत्वपूर्ण अवदान हिंदी उपन्यास आलोचना के क्षेत्र में माना जाता है। उनकी चर्चित पुस्तक ‘उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता’ ने हिंदी आलोचना में एक तरह से वैचारिक हलचल पैदा की। इसी पुस्तक के प्रकाशन के बाद वे अचानक हिंदी आलोचना के केंद्र में आ गए।

इस पुस्तक में उन्होंने हिंदी उपन्यासों की स्थापित पाठ-परंपरा का ऐसा पुनर्पाठ प्रस्तुत किया, जो अपने आप में ऐतिहासिक महत्व रखता है। यह पहली बार था जब हिंदी उपन्यासों के विश्लेषण में जाति और नस्ल के प्रश्न इतनी केंद्रीयता के साथ उभरकर सामने आये। ‘गोदान’ (प्रेमचंद), ‘झूठा सच’ (यशपाल), ‘मैला आंचल’ (फणीश्वरनाथ रेणु), ‘राग दरबारी’ (श्रीलाल शुक्ल) और ‘आधा गांव’ (राही मासूम रजा) जैसे बहुचर्चित उपन्यासों का जो पाठ वीरेंद्र यादव ने प्रस्तुत किया, वैसा पाठ उनसे पहले किसी आलोचक ने नहीं किया था।
इन उपन्यासों को उन्होंने जिस इतिहासबोध और समाजबोध के साथ अलगाया, उसमें वर्चस्व, सत्ता, जातीय संरचना और सांप्रदायिक अंतर्विरोधों की स्पष्ट पहचान दिखाई देती है। इस क्रम में उन्होंने ‘बड़े’ माने जाने वाले आलोचकों की सीमाओं की ओर भी बिना किसी संकोच के संकेत किया। चाहे वह रामविलास शर्मा हों, या नामवर सिंह, विश्वनाथ त्रिपाठी हों, या पुरुषोत्तम अग्रवाल, इन सभी दिग्गजों से उनकी टकराहट जगजाहिर है।
इसी तरह देश-विभाजन पर केंद्रित हिंदी-उर्दू उपन्यासों का जो आलोचनात्मक पाठ उन्होंने तैयार किया, वह भी अभूतपूर्व था। विभाजन के उस सर्वथा अदीठ पक्ष – जहां जाति, मजहब और सत्ता के अंतर्संबंध काम कर रहे थे – को उन्होंने आलोचना के केंद्र में ला खड़ा किया। बदीउज्जमा के उपन्यास ‘छाको की वापसी’ पर उनका पाठ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यह भी वीरेंद्र यादव ही थे, जिन्होंने पहली बार हिंदू और मुस्लिम लेखकों के विभाजन संबंधी लेखन में निहित केंद्रीय वैचारिक अंतरों को रेखांकित किया और मुस्लिम लेखकों की ‘पाक-अवधारणा’ से जुड़े प्रश्नों को आलोचनात्मक निगाह से देखा।
बड़ी रचनाओं को दरकिनार करने की प्रवृत्ति हो या आस्वादपरक, एकांगी लेखन को ‘प्रगतिशील’ आलोचना द्वारा तिल का ताड़ बनाने की रणनीतियां, इन सब को वीरेंद्र यादव ने लगातार बेनकाब किया। विनोद कुमार शुक्ल और निर्मल वर्मा जैसे लेखकों के लेखन को जिस तरह प्रगतिशील आलोचना ने महिमामंडित किया, उसके भीतर छिपी एकांगिता और हिंदुत्व-व्यामोह को वीरेंद्र यादव ने ठोस तर्कों के साथ उद्घाटित किया।
इसी तरह केदारनाथ अग्रवाल के लगभग गुमनाम उपन्यास ‘पतिया’ की आज के अस्मितावादी विमर्शों के आलोक में की गई उनकी व्याख्या उनकी आलोचनात्मक गहराई और वैचारिक विस्तार का प्रमाण है। लोकप्रचलित और उपेक्षित – दोनों तरह के उपन्यासों पर उनकी पैनी दृष्टि रहती थी। जब प्रगतिशील आलोचना ने दूधनाथ सिंह के उपन्यास ‘आखिरी कलाम’ को लगभग भुला दिया, तब वीरेंद्र यादव ने उसे अपने समय का एक महत्वपूर्ण और जोखिमपूर्ण लेखन घोषित किया।
वीरेंद्र यादव का लेखन विपुल और बहुआयामी था। वे प्रगतिशील आंदोलन की उपज थे, लेकिन बहुजन लोकेशन से आने के कारण उन्होंने जातीय और वर्गीय गैर-बराबरी को जिस व्यापकता और जटिलता में चिह्नित किया, वैसा किसी सवर्ण आलोचक ने नहीं किया। अपने बाद के लेखन में उन्होंने फासीवाद और जातिवाद को जिस स्पष्टता और आक्रामकता से निशाने पर लिया, उसका उदाहरण उनका लेख ‘जनतंत्र, जातितंत्र और हिंदी मानस’ है।
उन्होंने 1857 की लड़ाई के भीतर मौजूद जाति, मजहब और सामंती अवशेषों के दोमुंहेपन को भी प्रश्नांकित किया। हिंदी क्षेत्र के लेखन और राजनीतिक चिंतन में व्याप्त सांप्रदायिकता तथा जातिगत संरचनाओं को उन्होंने बहुस्तरीय ढंग से परखा। भारतेंदु हरिश्चंद्र और मैथिलीशरण गुप्त के लेखन में व्याप्त यथास्थिति और अंतर्विरोध से लेकर समाजवादी नेताओं – नरेंद्र देव, नेहरू – और यहां तक कि रवींद्रनाथ टैगोर के शांति निकेतन में व्याप्त जातिभेद तक, इन सभी संदर्भों को वे आलोचना के दायरे में ले आए।
उनके लेखन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित सामयिक टिप्पणियों के रूप में भी सामने आया। इनमें देश-विदेश के उन लेखकों की चिंताएं प्रमुख रहीं, जो सांप्रदायिक फासीवाद, नस्लवाद, जातिवाद और पितृसत्ता से संघर्षरत रहे हैं। सलमान रुश्दी, तसलीमा नसरीन, पेरूमल मुरुगन, गौरी लंकेश, अरुंधति राय, नरेंद्र दाभोलकर और सौवेंद्र शेखर हांसदा जैसे लेखकों ने अपने समय में वर्णाश्रमी-फासीवादी प्रवृत्तियों के विरुद्ध लिखने की जो कीमत चुकाई, वीरेंद्र यादव ने उस लेखन की ताप से पाठकों की चेतना का आयतन व्यापक किया।
प्रेमचंद वीरेंद्र यादव के पसंदीदा लेखक थे। जब दलित लेखकों ने प्रेमचंद के लेखन को प्रश्नांकित किया तो उन्होने प्रेमचंद की ढाल बनकर वकालत की। प्रेमचंद उनकी कमजोरी थे, जिनकी एक भी आलोचना उन्हें बर्दाश्त नहीं थी। एक आलोचक के रूप में यह उनकी बड़ी सीमा थी, खासकर गांधी और आंबेडकरवाद के परिप्रेक्ष्य में प्रेमचंद का जिस यथास्थितिवादी गांधीवाद के पैरोकार थे, उनका कोई तर्कसंगत पक्ष उनके पास नहीं थे।
वीरेंद्र यादव की अभी तक 5 पुस्तकें प्रकाशित हैं। इनमें शामिल हैं– ‘उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता’, ‘उपन्यास और देस’, ‘प्रगतिशीलता के पक्ष में’, ‘विवाद नहीं हस्तक्षेप’ और ‘विमर्श और व्यक्तित्व’। 1990 के दशक में उन्होंने लखनऊ से ‘प्रयोजन’ पत्रिका का संपादन किया। हिंदी में बहुत कम ऐसे आलोचक हुए हैं जिनकी लिखी भूमिकाएं भी स्वतंत्र रूप से चर्चित हुई हों। ‘मार्कण्डेय की संपूर्ण कहानियां’ और यशपाल के ‘विप्लव’ पर लिखी उनकी भूमिकाएं इसी श्रेणी में आती हैं। उन्होंने जॉन हर्सी की चर्चित पुस्तक ‘हिरोशिमा’ का हिंदी अनुवाद भी किया।
हिंदी आलोचना में इतने बड़े अवदान के बाद भी एकाध अपवाद को छोड़कर उनके ऊपर आज तक कोई विशेषांक नहीं निकला। यह हिंदी लेखन में जारी द्विज भेदभाव का सबसे वीभत्स रूप है, जिसके शिकार बहुजन समाज से आने वाले लेखक खासतौर से होते रहे हैं। वीरेंद्र यादव के साथ भी यह उपेक्षा इरादतन बरती गई। हालांकि उन्हें देवीशंकर अवस्थी आलोचना सम्मान, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का साहित्यभूषण सम्मान, गुलाब राय सम्मान, शमशेर सम्मान और मुद्राराक्षस सम्मान से सम्मानित भी किया गया।
हिंदी आलोचना में उनका जाना केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि परिवर्तनकामी आलोचना की एक सशक्त परंपरा का अवसान है।
(संपादन : नवल/अनिल)
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