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जिम्मेदार व निर्भीक पत्रकारिता के अग्रदूत थे संतराम बी.ए.

संतराम जी की पत्रकारिता की पड़ताल करने पर जो तथ्य सामने आते हैं, उनमें सबसे पहला है– बहुजन समाज के मुद्दों पर उनकी बिना लाग-लपेट के बेबाक राय। इस मामले में वह बडे़-से-बडे़ लोगों को भी आड़े हाथ लेने में नहीं झिझकते थे। बता रहे हैं डॉ. महेश प्रजापति

संतराम बी.ए. का जन्म 14 फरवरी, 1887 को पंजाब के होशियारपुर जिले के पुरानी बसी नामक गांव में हुआ था। जैसा कि तत्कालीन अनेक क्रांतिकारियों, स्वाधीनता सेनानियों और समाज सुधारकों की आरंभिक पाठशाला आर्यसमाज थी, संतराम जी का व्यक्तित्व भी आर्य समाज की छांव में ही पल-बढ़कर तैयार हुआ। शिक्षा-ग्रहण के दौरान उन्हें भी जाति व्यवस्था के वही कटु अनुभव हुए थे जो डॉ. आंबेडकर को झेलने पड़े थे। यही कारण था कि आर्यसमाज, जो उस समय पूरे देश, खासकर पंजाब में प्रगतिशील विचारों का वाहक और प्रचारक बना था उसकी ओर संतराम जी का अग्रसर होना स्वाभाविक था। आरंभिक दिनों में आजीविका के लिए वे विभिन्न स्थानों पर भटकते रहे और अंत में 1921 में लाहौर में जाकर बस गए। तत्पश्चात भारत विभाजन तक वहीं रहकर ‘जात-पात तोड़क मंडल’ के माध्यम से समाज-सुधार के कार्य करते रहे।

भारत विभाजन के बाद वे अपने गांव पुरानी बसी आ गये और स्वतंत्र लेखन करने लगे। साथ ही, वे विश्वेश्वरानंद वैदिक शोध संस्थान (साधु आश्रम) से निकलने वाली पत्रिका ‘विश्व ज्योति’ के संपादन से भी जुड़ गए। जीवन के अंतिम दिनों में वह अपनी एकमात्र संतान बेटी गार्गी देवी के पास दिल्ली चले गए, जहां 101 वर्ष की उम्र में 31 मई, 1988 को उनका निधन हुआ।

संतराम जी ने अपने इस सुदीर्घ जीवन में सौ से अधिक पुस्तकें लिखने, संपादित व अनुवादित करने के साथ-साथ आठ पत्रिकाओं का संपादन किया। इनमें ‘उषा’, ‘आर्य-मुसाफिर’, ‘भारती’, ‘दीपक’, ‘जात पात तोड़क’, ‘क्रांति’, ‘युगान्तर’ तथा ‘विश्वज्योति’ शामिल रहीं। इनमें से तीन पत्रिकाएं ही लंबे समय तक चलीं। शेष कुछ माह चलकर ही बंद हो गईं। उनके संपादन में निकलने वाली पहली हिंदी पत्रिका थी ‘उषा’, जिसे उन्होंने जनवरी, 1914 से अपने मित्र भगवानदास नागपाल के आग्रह पर लाहौर से निकाला था। लेकिन पंजाब में हिंदी का प्रचार बहुत कम होने के कारण इसके कुल 15 अंक प्रकाशित हुए तथा अप्रैल, 1915 में इसका प्रकाशन बंद हो गया।

जनवरी, 1920 से उन्होंने जालंधर कन्या महाविद्यालय की मासिक पत्रिका ‘भारती’ का संपादन आरंभ किया, जो आर्यसमाजी विचारधारा पर आधारित स्त्री-शिक्षा की पत्रिका थी। इसके संपादन के लिए उन्हें 100 रुपए मासिक वेतन के रूप में मिलता था, लेकिन पंजाब में पर्याप्त हिंदी प्रचार न होने के कारण संचालकों को यह पत्रिका भी बंद करनी पड़ी। इस बीच कुछ दिनों तक ‘आर्य मुसाफिर’ तथा ‘दीपक’ नामक पत्रिकाओं का भी उन्होंने संपादन किया।

इसके बाद 1921 में संतराम जी लाहौर चले गए और अगले वर्ष यहीं ‘जात पात तोड़क मंडल’ नामक संस्था बनाकर जाति-विनाश का काम करने लगे। करीब 5 साल बाद 1927 में उन्होंने इसी नाम से एक पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ किया, लेकिन अगले ही वर्ष 1928 में इसका नाम बदलकर ‘क्रांति’ कर दिया गया। यह संतराम जी के जीवन की सबसे लंबी अवधि की पत्रिका थी, भारत विभाजन यानी 1947 तक छपती रही। सामाजिक न्याय हेतु अंतर्जातीय विवाहों के माध्यम से जाति विनाश का काम इस पत्रिका की मुख्य विषय वस्तु हुआ करती थी, जिससे उन्हें बहुत सम्मान मिला। लेकिन यह पत्रिका उर्दू में निकलती थी। इसलिए हिंदी के पाठक आज तक इसकी विषयवस्तु से पूरी तरह परिचित नहीं हैं।

संतराम बी.ए. की तस्वीर

‘क्रांति’ के अलावा जो पत्रिका सबसे दीर्घजीवी थी, वह ‘युगान्तर’ थी। यह पत्रिका भी उनके जात-पात तोड़क मंडल का मुखपत्र थी, जिसमें संतराम जी समाज सुधार के साथ समकालीन राजनीति और सामाजिक मुद्दों पर अपनी निर्भीक राय रखते थे। इस पत्रिका के संपादकीय व अन्य सामग्री देखकर देश और बहुजन समाज की दुर्दशा के प्रति उनकी पीड़ा तथा उसे दूर करने के लिए उनकी तत्परता का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

इस पत्रिका में प्रकाशित सामग्री के आधार पर संतराम जी की पत्रकारिता की पड़ताल करने पर जो तथ्य सामने आते हैं, उनमें सबसे पहला है– बहुजन समाज के मुद्दों पर उनकी बिना लाग-लपेट के बेबाक राय। इस मामले में वह बडे़-से-बडे़ लोगों को भी आड़े हाथ लेने में नहीं झिझकते थे। सन् 1932 में जब मदनमोहन मालवीय ने हिंदुओं को ध्रुवीकृत करने हेतु उन्हें मंत्र-दीक्षा के द्वारा पवित्र करने की शुरुआत की तब संतराम जी ने लिखा– 

“श्रीमान मालवीय जी इस कलिकाल में पतित पावन बने हैं। आप अछूतों को मंत्र दीक्षा देकर पवित्र कर रहे हैं। ब्राह्मण देवता के मुख से ‘नमो भगवते वासुदेवाय’ की गुनगुनाहट सुनकर ही हमारे अछूत भाइयों का उद्धार हो जाएगा। हम तो केवल भगवत को ही पतित-पावन सुनते आए हैं, पर अब मालूम हुआ कि कुछ मनुष्य भी अपने को पतित पावन कहाते हैं। मनुष्यता का कितना भारी अपमान है। इस साम्यवाद और प्रजातंत्र के युग में भी एक मनुष्य अपने को केवल जन्म के कारण इतना ऊंचा समझता है कि वह दूसरे मनुष्यों को नीच और पतित मानकर अपनी गुनगुनाहट से उनका उद्धार कर सकता है! ब्राह्मण की यह जन्म की उच्चता ही तो अछूतपन का मूल कारण है। और मंत्र दीक्षा का ढोंग रचकर भी उच्चता को और दृढ़ किया जा रहा है।”

सवर्ण हिंदू या फिर कांग्रेस नेताओं द्वारा किये गए किसी भी पाखंड और कपटपूर्ण कृत्य पर वह ‘युगान्तर’ में तीखी-से-तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करने से नहीं चूकते थे। छुआछूत के सवाल पर मार्च, 1935 के अंक में उन्होंने लिखा– “जात-पात ने हिंदुओं को मनुष्यता से भी गिरा रखा है। ऊपर से दया धर्म की दुंदुभी बजाते हुए भी यह भीतर से कसाई बन गए हैं। हमारे मित्र श्रीमान बाबू तीर्थराम जी ने हमें एक बार अपनी आंखों-देखी घटना सुनाई। शिकोहाबाद में उनका कारखाना था। उनके कहार नौकर को इन्फ्लूएंजा हो गया। वह बेचारा पानी के लिए तड़पने लगा। उसने बाबूजी के ब्राह्मण रसोईया को पुकारा कि मुझे पानी दो, परंतु उसने पानी देने से इनकार कर दिया। जब श्री तीर्थ राम जी को पता लगा तो उन्होंने ब्राह्मण से बीमार को पानी न देने का कारण पूछा। वह बोला ‘मैं उसे पानी कैसे दे सकता हूं? वह तो कहार है, उसका जूठा बर्तन कौन मांजेगा? ससुरा थूकता है, पखाना करता है, पानी के छींटे उड़ते हैं। कहार से कौन छुए।’ यह है दया धर्म की दुहाई देने वालों का नमूना! आप जहां भी देखेंगे प्याऊ पर पानी पिलाने वाले आपको सब कहीं ब्राह्मण ही मिलेंगे। कारण यह कि कहार के हाथ से ब्राह्मण और ठाकुर पानी नहीं पी सकते हैं। इतर जातियों के छींटे से भ्रष्ट न हो जाएं, इसलिए यह प्याऊ पर बैठने वाले ब्राह्मण देवता अपनी लुटिया को एक लंबा डंडा बांध रखते हैं और दूर से ही दया का पनाला बहाते हैं। यह पवित्रता के अवतार वास्तव में जन्मजात अभिमान के पुतले क्या ‘समता और भ्रातृभाव के असली प्रचारक इस्लाम’ के खर-स्रोत को रोक सकते हैं।”

नीति विरुद्ध व अन्यायपूर्ण बात पर संतराम जी किसी भी बडे़ व्यक्ति से भिड़ जाते थे। उनकी पत्रकारिता की दूसरी विशेषता थी– निष्पक्षता। यद्यपि उनकी विचारधारा आर्यसमाज की छत्रछाया में फलीफूली थी और हिंदू समाज की ओर उनका झुकाव स्वाभाविक था, लेकिन पक्षपात उन्हें तनिक भी बर्दाश्त न था। वह अनुचित ढंग से कभी इस्लाम या ईसाइयत की आलोचना नहीं करते थे। इस मामले में वह आजीवन हिंदू धर्म की आंतरिक बुराइयों पर चोट करते रहे। रुढ़िवादी आर्यसमाजियों के शुद्धि आंदोलन के कपटपूर्ण व्यवहार पर उनका कहना था– “उनको मेरी बातें चुभने का कारण यह था कि वह अछूत आधार और जात-पात मिटाने जैसी बातें हिंदू ही या अधिक से अधिक राष्ट्रहित की दृष्टि से करना चाहते थे।… इसके विपरीत मेरा भाव बदल चुका था। मैं यह दोनों काम मानवता श्रेय की दृष्टि से करना चाहता था।… अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए हम अछूतों को शुद्ध कर लें और ईसाई या मुसलमान न बनने दें, यह बात मुझे स्वार्थपरता लगने लगी थी। मैं चाहता था कि व्यक्ति को मानवता के अधिकार प्राप्त हों। मजहब (धर्म) से वह चाहें हिंदू, मुसलमान या ईसाई रहे। धर्म मनुष्य के हितार्थ होना चाहिए, नीच स्वार्थसिद्धि के लिए नहीं। अछूत को यदि दास, शूद्र या नीच ही रहना है तो स्वराज उसके लिए विदेशी राज्य से कुछ भी अच्छा नहीं।”

इसी तरह अनेक जगहों पर उन्होंने समानता, अस्पृश्यता व भ्रातृभाव जैसे गुणों के लिए इस्लाम की प्रशंसा की है। धर्म को लेकर उनका मत बहुत स्पष्ट था। अपनी आत्मकथा में एक जगह वह लिखते हैं– “मैं न तो हिंदू धर्म, ईसाई धर्म या मुस्लिम धर्म नाम के कोई अलग-अलग धर्म मानता हूं और न भारतीय संस्कृति या पाश्चात्य संस्कृति नाम की कोई अलग-अलग संस्कृतियां। मैं केवल एक मानव धर्म और केवल एक मानव संस्कृति को मानता हूं। मेरी समझ में धर्म उन विषयों का नाम है, जो मानव समाज में सुख शांति बनाए रखने में सहायता देते हैं। संस्कृति भी मानवी व्यवहार को सुखद बनाने वाली बातें ही हैं। विभिन्न कालों और विभिन्न देशों में मानव समाज के दुखद दुर्गुणों को दूर करके उसे सुखी बनाने के जो प्रयत्न मनुष्यों द्वारा हुए हैं, वही धर्म नाम से अभी हुए हैं।”

पाखंड से उन्हें बहुत घृणा थी। उन्होंने अपना पूरा जीवन निश्छलता और सादगी से जीया था। इसका पालन उन्होंने पत्रकारिता में भी भरपूर किया। कथनी और करनी में वह इतना एकमेक थे कि अनेक बार उनकी भिड़ंत अपने समय की दिग्गज हस्तियों से भी हो जाती थी। ऐसी ही एक घटना लाहौर में हुई जब महात्मा गांधी से जाति और वर्ण-व्यवस्था को लेकर उनका संवाद हुआ। इस घटना का जिक्र संतराम जी ने स्वयं किया है–

“सन् 1933 या 34 की बात है। महात्मा गांधी लाहौर आए और लाजपत राय भवन में ठहरे। हमारे जात-पात तोड़क मंडल का एक प्रतिनिधिमंडल उनसे मिलने गया। उनके सचिव ने मंडल के प्रतिनिधियों को महात्मा जी से मिलने के लिए केवल 15 मिनट का समय दिया। महात्मा जी भवन के ऊपर के चौबारे में ठहरे थे। जिस समय हम उनके पास पहुंचे, उस समय उनकी धर्मपत्नी कस्तूरबा और सेठ जमनालाल बजाज उनके निकट ही बैठे थे। उन दिनों महात्मा गांधी जात-पात में विश्वास रखते थे। उन्होंने कदाचित गुजराती में ‘धर्म-मंथन’ नामक पुस्तक में इसका समर्थन भी किया था। मेरे प्रश्न करने पर भी बोले– “जात-पात में एक बड़ा लाभ यह है कि व्यवसायों में प्रतियोगिता बहुत कम हो जाती है। आज एक लड़का मैट्रिक पास करता है फिर वह सोचता है कि मैं अध्यापक बनूं, पटवारी बनूं, क्लर्क बनूं, वकील बनूं, इंजीनियर बनूं या मिलिट्री में जाऊं? सब जगह उसे कठोर प्रतियोगिता का सामना करना पड़ता है। परंतु जात-पात प्रणाली में इस प्रकार की कोई कठिनाई नहीं आती। जो व्यवसाय पिता करता है, पुत्र चुपचाप वही काम करने लगता है। बढ़ई का बेटा बढ़ई बन जाता है और सुनार का बेटा सुनार का काम करने लगता है। व्यवसाय चुनने में कोई कठिनाई नहीं होती।” इस पर मैंने आपत्ति करते हुए कहा–

“यह ठीक है कि इस व्यवस्था में ब्राह्मण के लड़के को आयोग्य होने पर भी पठन-पाठन या मंदिर में पूजा-पाठ का काम मिल जाएगा। क्षत्रिय का लड़का कायर होने पर भी सेना में सिपाही या मेजर बन जाएगा। बनिए का लड़का भी दुकान या व्यापार करके धन कमा लेगा। परंतु एक भंगी, जिसके दादा-परदादा आठ आना मासिक पर टट्टी उठाते हैं, विद्वान बनने की योग्यता रहते भी टट्टी उठा रहा है और उसके पर पोते-पड़पोते भी टट्टी उठाते रहेंगे। यह कहां का न्याय है?”

क्षणभर रुक कर मैंने फिर तनिक आवेश से कहा– “महात्मा जी, आप जाति से बनिया हैं। बनिए का काम नमक-तेल बेचना है, फिर आप हमें उपदेश क्यों देते हैं? जाइए, कहीं जाकर दाल-आटे की दुकान खोल लीजिए।”

महात्मा जी में वाणी का संयम पराकाष्ठा को पहुंचा हुआ था। बड़ी से बड़ी उकसाहट होने पर भी आपे से बाहर नहीं होते थे। वह मेरी बात सुनकर खिलखिला कर हंस दिए और बोले– “मैं आपका ही काम कर रहा हूं, परंतु प्रत्यक्ष रूप से मैं यह काम नहीं कर सकता।”

मैंने पूछा– “आप प्रत्यक्ष रूप से क्यों नहीं कर सकते?”

वे बोले– “आप ही बताइए मैं क्यों नहीं कर सकता?”

मैंने कहा– “आप बुरा तो नहीं मानेंगे? देखिए महात्मा जी, इस समय आप अंग्रेजों के विरुद्ध प्रचार कर रहे हैं तो न केवल हिंदू वरन मुसलमान, ईसाई भी आपके साथ हैं। जब आप जात-पात के विरुद्ध मोर्चा लगाने लगेंगे तो जो मारवाड़ी सेठ आज आपको लाखों रुपए दान दे रहे हैं, वह आपको एक थोथी कौड़ी भी नहीं देंगे।” बात इसी प्रकार चलती रही। भेंट करने के लिए हमें केवल 15 मिनट मिले थे। अब आधा घंटा हो चुका था। महात्मा जी ने कहा– “जिस स्पष्टवादिता से आपने काम लिया उससे आप लोगों के साथ बातचीत करने में मुझे बहुत आनंद आया है।”

पाखंड का पर्दाफाश करना संतराम जी को बहुत प्रिय था। ‘युगान्तर’ में वह ‘फुलवाड़ी’ शीर्षक से एक स्तंभ नियमित रूप से छापते थे, जिसमें समकालीन अन्य पत्रिकाओं – ‘सुधा’, ‘हंस’, ‘जागरण’, ‘माधुरी’, ‘प्रताप’ – आदि से लेकर इसी तरह की सामग्री रहती थी। उन्होंने अपनी आत्मकथा में भी ऐसी घटनाओं का जिक्र किया है। बहुजनों, स्त्रियों और कमजोरों का उन्होंने हमेशा पक्ष लिया। ‘युगान्तर’ में ऐसी सामग्री की प्रधानता रहती थी। अछूतों पर होने वाले अत्याचार के बारे में एक जगह वह लिखते हैं–

“द्विज लोग जब अपने जैसे परमात्मा के दूसरे अमृत पुत्रों को शूद्र, अछूत और अंत्यज आदि अपशब्दों से पुकारते हैं तब वह अनुभव ही नहीं करते कि हम किसी का अपमान कर रहे हैं। वह इस दुर्व्यवहार को अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं। परंतु जब डॉक्टर आंबेडकर या कोई दूसरा हरिजन उनके विरुद्ध एक साधारण-सा भी शब्द कह देता है तो यह एकदम सीखपा होकर उसकी जबान खींच डालना चाहते हैं। यह लोग अपने उन अमानुषिक अत्याचारों को भूल जाते हैं जो यह शताब्दियों नहीं, वरन् सहस्राब्दियों से शूद्रों और अछूतों पर करते आ रहे हैं।”

स्त्रियों को पढ़ाने-लिखाने और अधिकार संपन्न बनाने के लिए भी उन्होंने अथक प्रयास किया। ‘युगान्तर’ में तो ‘नारी जगत’ नाम से हर माह एक नियमित स्तंभ छपता था, जिसमें उन्हें शिक्षित व जागरुक करने वाली सामग्रियां छपती थीं। यद्यपि स्त्रियों की शिक्षा के मामले में वह सहशिक्षा के पक्षधर नहीं थे, लेकिन उनके सुशिक्षित, समझदार और बराबरी का दर्जा देने में वह अपने समय से बहुत आगे थे। एक और बात जिसकी ओर संतराम जी के पाठकों का ध्यान बहुत कम जाता है, वह है स्त्री-विमर्श। आज स्त्री-विमर्श में जिस चरमसुख (ऑर्गेज्म) की बात की जाती है, संतराम जी ने बीसवीं सदी के तीसरे चौथे दशक में इस पर बहुत विस्तार से लिखा है। स्त्री- पुरुष संबंधों पर उनकी ‘दम्पति मित्र’, ‘रति विज्ञान’, ‘सुखी जीवन का रहस्य’ आदि पुस्तकें बहुत उपयोगी हैं।

देश की सामाजिक व राष्ट्रीय एकता के बारे में संतराम जी का अपना मौलिक चिंतन था, जो उन्हें उनके समकालीनों से अलग करता है। उन्होंने हिंदू धर्म की आंतरिक सड़ांध को साफ करने के लिए निर्दय होकर चीरफाड़ की। वेद-पुराण, उपनिषद, स्मृतियों और प्राचीन संस्कृत साहित्य से ऐसे-ऐसे तर्क प्रस्तुत किये कि बडे़-बडे़ पंडितों की बोलती बंद हो गई। ‘युगान्तर’ के जुलाई, 1933 अंक की एक संपादकीय टिप्पणी में रुढ़िवादी सनातनियों को फटकारते हुए अंतर्जातीय विवाह (वह भी प्रतिलोम विवाह, जिसमें कन्या उच्च जाति की तथा वर निम्न जाति का होता है) के महत्व पर लिखते हैं– “क्या इन सनातन धर्म के रक्षकों को मालूम नहीं कि प्राचीन काल में भी ऐसे ही प्रतिलोम विवाह होते रहे हैं। देखिए राजा प्रियव्रत क्षत्रिय ने विश्वकर्मा ब्राह्मण की पुत्री बहिर्ष्मती से और राजा ययाति क्षत्रिय ने शुक्र ब्राह्मण की पुत्री देवयानी से विवाह किया था। ब्राह्मण दीर्घतमा और शूद्र कन्या के संबंध से कक्षीवान उत्पन्न हुए थे और कक्षीवान ने क्षत्रिय राजा की पुत्री से विवाह किया था। प्रमत्ता ब्राह्मणी का विवाह एक नाई के साथ हुआ था। महामुनि वशिष्ठ वेश्या के पुत्र थे। उनका विवाह कर्दम क्षत्रिय की कन्या अरुंधति से हुआ था। इस संबंध से शक्ति नामक पुत्र उत्पन्न हुआ था, जिसका विवाह चांडाल कन्या अदृश्यन्ती से हुआ। इस संबंध से पराशर मुनि की उत्पत्ति हुई। उसी पराशर मुनि से ब्राह्मणों का पराशर नामक गोत्र चलता है। क्या पुणे के सनातनी ब्राह्मण शुक्राचार्य, वशिष्ठ और पराशर से भी बड़े हैं।”

संतराम जी ने हिंदुओं की दुर्दशा के लिए उनके जातिभेद, ऊंच-नीच और छुआछूत जैसी बुराइयों को ही जिम्मेदार ठहराया। ऐसा करते हुए कभी मुसलमानों पर दोषारोपण नहीं किया। उन्हें जहां भी अवसर मिला, मुसलमानों के समानता और भ्रातृभाव जैसे गुणों की प्रशंसा करने से वह नहीं चूके। ‘युगान्तर’ के अगस्त, 1932 के अंक में ‘भंगिन नहीं, मुसलमान है’ शीर्षक से वह एक घटना को लिखते हैं–

“”उस दिन नजीर भाई ने बताया कि राजगढ़ की माझी भंगिन ने कल कलमा पढ़ लिया और भुजंग के एक मुसलमान हलवाई के साथ विवाह कर लिया। माझी हमारे यहां भी दो-एक बार टट्टी उठाने आई थी। यह पूछने पर कि क्या मुसलमान लोग हलवाई के साथ रोटी-बेटी का संबंध छोड़ तो नहीं देंगे? तेरह-चौदह वर्ष के बिल्कुल अशिक्षित लड़के नजीर ने झट उत्तर दिया– जी, अब माझी भंगिन नहीं। अब तो वह मुसलमान है। वह कलमा पढ़ चुकी है। मुसलमान उसके साथ क्यों न खाए पिएंगे? नजीर के इन शब्दों से हिंदुओं की आंखें खुलनी चाहिए। भंगिन के साथ विवाह करना तो दूर यह किसी अच्छे घर की मुसलमान लड़की को भी आत्मसात नहीं कर सकते। सदा उस पर उंगली उठती रहती हैं। जिन लोगों को शुद्ध भी किया जाता है उनको भी नाम मात्र को ही हिंदू बनाया जाता है। रक्त के पवित्र और संतान के वर्ण-संकर हो जाने के डर से उनके साथ रोटी-बेटी का संबंध नहीं किया जाता। सच तो यह है कि जिन हिंदुओं को जात-पात तोड़कर अपने में ही विवाह करने का साहस नहीं, वे इस्लाम जैसे सर्वग्राही मत का कौर बनने से कैसे बच सकते हैं।”

अपनी तीखी संपादकीय टिप्पणियों से संतराम जी हिंदू धर्म की बुराइयों पर चोट करते हुए अपने पत्रकारिता धर्म का पालन करते रहे।

पत्रकारिता करते हुए सत्ता की नजदीकी हासिल करना तो दूर उन्होंने कभी उस तरफ झांककर भी नहीं देखा। प्रखर बौद्धिकता के धनी 1913 में ग्रेजुएट होकर और इतने दीर्घ पत्रकारिता-अनुभव के बाद वह चाहते तो किसी भी अखबार में संपादक बनने की क्षमता रखते थे, लेकिन स्वतंत्र पत्रकारिता के माध्यम से जाति-पाति तथा ऊंच-नीच के भेदभाव को दूर करने हेतु उन्होंने अपना सारा जीवन उत्सर्ग कर दिया।

(संपादन : नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

महेश प्रजापति

लेखक संतराम बी.ए. फाऊंडेशन, शाहजहांपुर, उत्तर प्रदेश के संस्थापक हैं

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