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सरहुल पर्व : आदिवासी संस्कृति, प्रकृति पूजा और कृषि परंपरा का उत्सव

आज जब पूरी दुनिया ‘पेरिस समझौते’ और ‘कार्बन फुटप्रिंट’ जैसे तकनीकी शब्दों में उलझी है, सरहुल का दर्शन एक सरल लेकिन अचूक समाधान पेश करता है। ‘प्रकृति पूजा’ का अर्थ केवल पेड़ के आगे झुकना नहीं है, बल्कि यह स्वीकार करना है कि प्रकृति हमारी ‘स्वामी’ है। बता रहे हैं देवेंद्र कुमार नयन

भारत में जब विकास की चर्चा होती है, तब अक्सर जंगल, पहाड़ और नदियां केवल संसाधन के रूप में देखे जाते हैं। लेकिन आदिवासी समाज की दुनिया में प्रकृति सिर्फ संसाधन नहीं बल्कि रिश्तेदार होती है। इसी प्रकृति-केंद्रित जीवनदृष्टि में साल वृक्ष (जिसे स्थानीय भाषा में सखुआ या सरई भी कहा जाता है) का विशेष महत्व है, जो सरहुल पर्व का केंद्रीय वृक्ष माना जाता है। झारखंड के साथ-साथ छत्तीसगढ़, उड़ीसा और बिहार के अनेक आदिवासी समुदायों में मनाया जाने वाला सरहुल इसी जीवनदृष्टि का उत्सव है।

साल के फूलों के साथ मनाया जाने वाला यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि मनुष्य और प्रकृति के सहअस्तित्व की उस परंपरा का प्रतीक है, जिसे आदिवासी समाज सदियों से जीता आया है। आदिवासियों के लिए साल का वृक्ष ‘सिंगबोंगा’ या ‘धर्मेश’ का प्रतीक माना जाता है।

यह पर्व मुख्यतः मुंडा, उरांव, हो, कुडुख, संथाल और अन्य आदिवासी समुदायों द्वारा बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। ‘सरहुल’ शब्द की उत्पत्ति दो शब्दों के मेल से बना माना जाता है– ‘सर’ यानी ‘सरई फूल’ और ‘हुल’ यानी ‘क्रांति’ या ‘पुष्पण’। सरहुल का शाब्दिक अर्थ ही इस पर्व के मूल भाव को प्रकट करता है। सरहुल पर्व के अन्य नाम जिसे मुंडा समुदाय में ‘बा परब’ (फूलों का पर्व), उरांव में ‘खद्दी’ (फूल पत्ती) या खेखेल बेंजा और संथाल में ‘बाहा’ (फूल) कहते हैं वहीं खड़िया में ‘जांकोर’ नाम से प्रचलित है, जहां जांग का अर्थ है बीज और एकोर का अर्थ प्रक्रिया, अर्थात बीज बनने की प्रक्रिया।

यह पर्व साल के वृक्षों में नए फूल आने का उत्सव है। जब पूरी दुनिया नववर्ष मनाती है तब आदिवासी समुदाय इंतजार करते है उस वक्त का जब धरती खुद बता देती है कि नया साल आ गया। जब साल के पेड़ नए फूल पत्तों से सज जाते है तब आदिवासी समझते हैं कि हमारी प्रकृति ने नए शृंगार कर लिए हैं। आदिवासी वे लोग हैं जो कैलेंडर देखकर नहीं बल्कि प्रकृति को देखकर पर्व त्यौहार मनाते हैं।

दरअसल सरहुल प्रकृति के प्रति सम्मान, पर्यावरण संरक्षण और आदिवासी संस्कृति को जीवित रखने का भी एक उत्सव है। इसे सिर्फ मनाया ही नहीं जाता बल्कि प्रकृति के साथ जिया भी जाता है। यह पर्व आदिजीविता का वह दर्शन है, जो सदियों से चीख-चीख कर दुनिया को बता रहा है कि मनुष्य प्रकृति का स्वामी नहीं, बल्कि उसका एक छोटा-सा हिस्सा है।

मनुष्य प्रकृति को हर साल अपने उपयोग में लाता है, ऐसे में प्रकृति को आभार प्रकट करने और अच्छी फसल की कामना के लिए इस पर्व को मनाया जाता है। इस पर्व के दौरान हल चलाना वर्जित होता है। खेतों को विश्राम दिया जाता है। यह आधुनिक उपभोक्तावादी संस्कृति पर एक बड़ा प्रहार है, जो धरती को केवल संसाधन मानकर उसका दोहन करना जानती है। सरहुल सिखाता है कि खेती शुरू करने से पहले धरती की अनुमति और उसकी उर्वरता का सम्मान अनिवार्य है।

यह पर्व धरती और सिंगबोंगा (सूर्य) के विवाह का भी प्रतीक है। यह प्रतीकात्मक विवाह दरअसल सृजन की प्रक्रिया का सम्मान है। सरहुल पर्व से पहले जंगलों में शिकार करना मना होता है। यहां तक कि आदिवासी जंगल के पेड़ों के फल भी नहीं खाते। मान्यता है कि बहुत सारे जानवरों का इस समय जंगल में प्रजनन का समय होता है। इस समय शिकार पर रोक दरअसल प्रकृति के प्रजनन चक्र के प्रति आदिवासी समाज की गहरी संवेदनशीलता को दर्शाती है, जब अनेक जीव-जंतु अपने वंश को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया में होते हैं, ऐसे में जीवन के इस विस्तार को बाधित करना सृजन के मूल भाव के विरुद्ध माना जाता है।

सरना धर्म और सरहुल

सरहुल का संबंध आदिवासी समुदाय के पारंपरिक धार्मिक विश्वासों से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। झारखंड और आसपास के क्षेत्रों में आदिवासी धर्म को अक्सर सरना धर्म के नाम से जाना जाता है। इसमें प्रकृति को सर्वोच्च शक्ति माना जाता है और जंगल के भीतर स्थित पवित्र स्थान होता है जिसे ‘सरना स्थल’ कहा जाता है। यह पूजा का केंद्र होता है। आजकल यह स्थल हरेक गांव और शहरों-कस्बों में देखने को मिलता है।

सरहुल के अवसर पर गांव का पुजारी, जिसे पाहन कहा जाता है, सरना स्थल पर जाकर साल के फूलों और अन्य प्राकृतिक प्रतीकों के साथ पूजा करता है। इस धार्मिक दायित्व के निर्वहन के बदले आदिवासी समुदाय द्वारा पाहन को कुछ जमीन दान स्वरूप दिया जाता है, जिसे ‘पहनई जमीन’ कहा जाता है। यह भूमि उसके पारिश्रमिक का एक पारंपरिक रूप होता है, जो व्यक्तिगत संपत्ति न होकर उसके पद से जुड़ी होती है और सामान्यतः गैर-हस्तांतरणीय मानी जाती है, यानी पहनई जमीन को बेचा नहीं जा सकता।

पाहन द्वारा की जाने वाली पूजा में गांव की समृद्धि, वर्षा की कृपा और समुदाय की सुरक्षा के लिए प्रार्थना की जाती है। इसके साथ ही यह भी माना जाता है कि इस पूजा के बाद ही गांव में नए कृषि कार्यों की शुरुआत करना लाभकारी माना जाता है।

सरहुल के मौके पर साल (सखुआ) की पूजा करते आदिवासी

साल वृक्ष का सांस्कृतिक महत्व

सरहुल में साल वृक्ष की विशेष भूमिका होती है। साल का वृक्ष मुख्य रूप से झारखंड और छत्तीसगढ़ का राजकीय वृक्ष भी है। आदिवासी समाज में साल वृक्ष को केवल एक पेड़ नहीं बल्कि जीवन का प्रतीक माना जाता है। लोक कथाओं के अनुसार, जब मानव समाज पूरी तरह संगठित नहीं हुआ था और आदिवासियों के पूर्वज खानाबदोश की तरह जंगलों में विचरण करते थे, तब उनका जीवन पूरी तरह प्रकृति की दया पर निर्भर था। वे कंद-मूल और शिकार के सहारे जीवित रहते थे और जहां सांझ ढलती, वहीं अपना डेरा डाल लेते थे।

​इसी क्रम में, एक बार उनके पूर्वजों का सामना साल (सखुआ) के विशाल वृक्षों से हुआ। इस वृक्ष का तना इतना मोटा और मजबूत था कि वह हिंसक जंगली जानवरों से सुरक्षा प्रदान करने में सक्षम था। इसके घने पत्तों और टहनियों ने न केवल शरण दी, बल्कि सुरक्षा का एक ऐसा अहसास कराया जो अन्य वृक्षों की तुलना में कहीं अधिक गहरा था। उनके पूर्वजों ने महसूस किया कि यह वृक्ष केवल वनस्पति नहीं, बल्कि उनका ‘अभिभावक’ है। इस पेड़ के लकड़ी से लेकर पत्ते और बीज सबकुछ उनके लिए उपयोगी था। इसी कृतज्ञता के भाव से ‘साल वृक्ष’ को पवित्र माना जाने लगा। यही कारण है कि आज भी हर सरना स्थल पर साल का वृक्ष अनिवार्य रूप से मौजूद रहता है।

सरहुल के उत्सव में साल के फूलों को पवित्र माना जाता है। पाहन इन फूलों को सरना स्थल से लाकर गांव के लोगों को देता है और लोग उन्हें अपने घरों में सम्मान के साथ रखते हैं। यह प्रतीकात्मक रूप से प्रकृति की कृपा और समृद्धि का संकेत माना जाता है।

सरहुल की पूजा-पद्धति और अनुष्ठान

सरहुल का मुख्य उत्सव सामान्यतः तीन दिनों तक मनाया जाता है। रांची और आसपास के शहरी क्षेत्रों में यह पर्व प्रायः चैत महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है, जिस दिन राजकीय अवकाश भी रहता है। हालांकि, झारखंड के विभिन्न ग्रामीण इलाकों में सरहुल की तिथि एक समान नहीं होती है। सरहुल और कृषि-चक्र का संबंध झारखंड के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग रूपों में दिखाई देता है। यह भिन्नता केवल धार्मिक परंपरा का परिणाम नहीं बल्कि स्थानीय भौगोलिक अवस्था और मौसम के सूक्ष्म अंतर से भी जुड़ी हुई है।

झारखंड के दक्षिणी पठारी क्षेत्रों जैसे रांची और आसपास में प्री-मानसून गतिविधियां अपेक्षाकृत जल्दी सक्रिय हो जाती हैं। इस कारण यहां साल वृक्षों में फूल चैत महीने में ही आ जाते हैं और खेती की प्रारंभिक तैयारी का समय भी बन जाता है। इसलिए इस क्षेत्र में सरहुल चैत में मनाया जाता है और इसे ‘फूल सरहुल’ कहा जाता है।

इसके विपरीत, उत्तरी क्षेत्रों में मौसमी बदलाव और कृषि की तैयारी कुछ देर से होती है। यहां साल वृक्षों में फल वैशाख तक आते हैं और उसी समय सरहुल मनाया जाता है, जिसे ‘फल सरहुल’ के रूप में जाना जाता है।

इस प्रकार सरहुल का समय किसी एक निश्चित तिथि पर आधारित न होकर प्रकृति और कृषि-चक्र के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि यह पर्व झारखंड के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग समय पर मनाया जाता है और कई स्थानों पर यह उत्सव पूरे एक महीने तक चलता है।

सामान्य तौर पर इस पूजा का प्रथम दिन उपवास का दिन होता है, इस दिन गांव के लड़के मछली और केकड़ा पकड़ने के लिए निकल जाते हैं। मान्यता है कि केकड़ा और मछली, पृथ्वी के पूर्वज हैं और आदिवासी समाज इसे शुभ का प्रतीक मानते हैं। इसलिए सरहुल के दिन पूर्वजों के साथ-साथ केकड़ा की भी पूजा की जाती है। आदिवासी समाज स्थानीय जलाशयों से इसे पकड़कर अरवा धागा में बांधकर घर के चूल्हे के ऊपर लटका दिया जाता है ताकि हल्की सेंक से अच्छी तरह से सुख जाए। कुछ महीने बाद जब खेती के लिए बीज को बोया जाता है तब वही केकड़ा को पीसकर पानी के साथ बीज को धोया जाता है, कहीं कहीं बीजों में ही इस केकड़ा के चूर्ण को मिश्रित करके बो दिया जाता है, क्योंकि केकड़ा एक साथ बहुत संख्या में अंडे देता है तो मान्यता है फसल भी बड़ी संख्या में आएंगे और अच्छी पैदावार होगी। घरों में मछली के अभिषेक किए हुए जल को भी छिड़का जाता है।

इसी दिन पाहन सरना स्थल पर तालाब या कुएं से जल भरकर दो नए घड़ों को विधिपूर्वक स्थापित करते हैं।

सरहुल के दूसरे दिन पुरुषों के द्वारा पाहन को उसके घर से कंधे पर बैठाकर सरना स्थल तक लाया जाता है एवं पाहन का जलाभिषेक किया जाता है। पाहन इस अवसर पर साल के फूल, चावल, हड़िया (चावल से बनी पारंपरिक पेय) जैसी पारंपरिक सामग्रियों के साथ पूजा करते हैं। साथ ही तीन रंग के मुर्गों (लाल ग्राम देवता के लिए, सफेद सिंगबोंगा सूर्य के लिए और काला या चितकबरा पूर्वजों के लिए) की बलि दी जाती है तथा अरवा चावल और बलि दिया हुआ मुर्गा का मांस मिलाकर खिचड़ी बनाकर प्रसाद स्वरूप ग्रहण किया जाता है, जिसे ‘सुड़ी भात’ कहा जाता है। पूजा के दौरान मां सरना, सूर्य (सिंगबोंगा), ग्राम देवता और पूर्वजों का संस्मरण किया जाता है।

यह पूजा प्रकृति की शक्तियों को सम्मान देने और समुदाय की समृद्धि के लिए आशीर्वाद प्राप्त करने की प्रक्रिया होती है।

पूजा के पश्चात पाहन दोनों घड़ों के पानी का बारीकी से निरीक्षण करता है, और भविष्यवाणी करता है कि इस साल वर्षा किस तरह होगी। जिस दिशा में घड़ा का पानी रिसता है उस दिशा से वर्षा होने का अनुमान लगाया जाता है। साथ ही यह भी देखा जाता है कि अगर घड़े के जलस्तर में आंशिक रूप से कमी हुई है तो उत्तम वर्षा का संकेत माना जाता है, जबकि अगर घड़े का पानी आधे से ज्यादा कम हो जाए तो सूखा या अकाल पड़ने की आशंका व्यक्त की जाती है। यह अंधविश्वास नहीं, बल्कि हजारों वर्षों का वह ज्ञान है जो आदिवासियों ने प्रकृति के साथ रहकर सीखा है।

जब पाहन ‘सरना स्थल’ पर मुख्य पूजा संपन्न कर लेते हैं, उसके बाद दोपहर या शाम के समय पूरा समाज पारंपरिक वेशभूषा में सड़कों पर उतरकर जुलूस निकालते हैं। जुलूस में लोग मांदर, नगाड़ा और ढोल की थाप पर पारंपरिक झूमर नृत्य करते हुए निकलते हैं। झारखंड में, खास तौर पर रांची में, यह जुलूस अलग-अलग टोलों से निकलकर मुख्य सरना स्थल ‘सिरम टोली’ तक जाता है।

सरहुल के तीसरे दिन सूर्य और पृथ्वी के प्रतीकात्मक विवाह की रस्म निभाई जाती है, जिसे उरांव भाषा में ‘खेखेल बेंजा’ कहा जाता है। इस अनुष्ठान में पाहन और उसकी पत्नी (पहनाइन) क्रमशः सूर्य और पृथ्वी का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह विवाह अच्छी फसल और सृजन-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। इसके पीछे यह धारणा निहित है कि सूर्य के प्रकाश और ऊर्जा के बिना पृथ्वी पर अन्न का उत्पादन संभव नहीं है, इसलिए इस पर्व में सूर्य और पृथ्वी के मिलन को विशेष रूप से अभिव्यक्त किया जाता है।

‘खेखेल बेंजा’ अर्थात पृथ्वी-विवाह के संपन्न होने के बाद पाहन सूप में साल यानी सरई फूल लेकर पूरे गांव और कस्बे में घर-घर जाकर ‘फूलखोंसी’ की रस्म निभाते हैं। उनके साथ गांव के लोग भी नाचते-गाते हुए इस अनुष्ठान में शामिल होते हैं। प्रत्येक घर में पाहन का आदरपूर्वक स्वागत किया जाता है, उन्हें चटाई पर बैठाकर उनके चरण धोए जाते हैं और उस पवित्र जल को घर की छतों पर छिड़क दिया जाता है।

इसके पश्चात पाहन घर के द्वार पर साल के फूल से ‘फूलखोंसी’ करते हैं। घर के सदस्य भी इन फूलों को अपने कानों में खोंसकर शृंगार करते हैं, जो शृंगार के साथ-साथ सुख-शांति और पूर्वजों के आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है।

सरहुल के गीत-नृत्य और शोभायात्रा की शुरुआत

केंद्रीय सरना समिति के अनुसार सरहुल शोभायात्रा की शुरुआत 1967 ई. में कार्तिक उरांव के नेतृत्व में हुई थी। यह जुलूस रांची कॉलेज स्थित हातमा सरना स्थल से पूजा के उपरांत गाजे बाजे, पारंपरिक वाद्य यंत्र के साथ निकाला जाता है और सिरम टोली स्थित सरना स्थल तक जाता है। सबसे पहले आदिवासी जमीन की रक्षा के उद्देश्य से शोभायात्रा निकाली गई थी। इस शोभायात्रा के जरिए आदिवासी समाज के लोग अपनी संस्कृति-परंपरा और जीवन शैली को दिखाते हैं।

सरहुल के अवसर पर नृत्य और संगीत का विशेष महत्व होता है। आदिवासी समाज में नृत्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि सामूहिक स्मृति और सांस्कृतिक परंपराओं को जीवित रखने का माध्यम है। इस पर्व के दौरान युवक-युवतियां पारंपरिक वेशभूषा में मांदर, ढोल और नगाड़ों की मधुर धुन पर सरहुल गीत गाते हुए अखड़ा में नृत्य करते हैं। आदिवासी महिलाएं पारंपरिक आभूषणों के साथ सफेद और लाल किनारी वाली साड़ियां पहनती हैं और बालों में साल के फूल सजाती हैं। वहीं आदिवासी युवक पारंपरिक धोती, कुर्ता और सिर पर पगड़ी धारण कर उत्सव में शामिल होते हैं।

सरहुल के गीतों में प्रकृति, प्रेम, समुदाय और जीवन के उत्सव का वर्णन मिलता है। इन गीतों में जंगल, नदी, पहाड़ और धरती के साथ मनुष्य के संबंध को काव्यात्मक रूप में व्यक्त किया जाता है। सांस्कृतिक दृष्टि से यह गीत और नृत्य समुदाय की सामूहिक पहचान को मजबूत करने का कार्य करते हैं। वे पीढ़ी दर पीढ़ी सांस्कृतिक ज्ञान को आगे बढ़ाने का माध्यम भी बनते हैं।

कृषि चक्र और सरहुल

सरहुल का संबंध केवल धार्मिक विश्वासों से नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के उस महत्वपूर्ण मोड़ से है जिसे इतिहास में ‘नवपाषाण काल’ कहा जाता है। यही वह काल था जब मनुष्य ने खानाबदोश जीवन त्याग कर स्थायी कृषि की शुरुआत की थी। यह धारणा बनाना तर्कसंगत होगा कि सरहुल जैसे प्रकृति उत्सवों की नींव भी इसी काल में पड़ी होगी, जब आदि-मानव ने बीज की शक्ति और ऋतुओं के चक्र को पहचाना होगा।

सरहुल का वैश्विक संदेश

आज जब पूरी दुनिया ‘पेरिस समझौते’ और ‘कार्बन फुटप्रिंट’ जैसे तकनीकी शब्दों में उलझी है, सरहुल का दर्शन एक सरल लेकिन अचूक समाधान पेश करता है। ‘प्रकृति पूजा’ का अर्थ केवल पेड़ के आगे झुकना नहीं है, बल्कि यह स्वीकार करना है कि प्रकृति हमारी ‘स्वामी’ है। सरहुल के दौरान हल न चलाने की परंपरा और नए फल-फूलों का सेवन करने से पहले प्रकृति को अर्पित करना, दरअसल सतत विकास का ही आदिम रूप है। यह सरहुल पर्व हमें सिखाता है कि प्रकृति से उतना ही लें जितना अनिवार्य हो, और बदले में उसे फलने-फूलने का समय भी दें।

अंततः इस लेख के इस पड़ाव पर हमें उन कड़वी सच्चाइयों का भी उल्लेख करना होगा, जो सरहुल की चमक के पीछे छिपी हुई हैं। जिस ‘साल वृक्ष’ और ‘सरना स्थल’ की हम पूजा करते हैं, वे आज औद्योगिक परियोजनाओं की भेंट चढ़ रहे हैं। विस्थापन केवल लोगों का ही नहीं हो रहा, बल्कि उस ‘सांस्कृतिक भूगोल’ का भी हो रहा है, जहां सरहुल जैसी परंपराएं फलती-फूलती थीं।

इसका एक समकालीन उदाहरण रांची के सिरम टोली स्थित सरना स्थल के आसपास फ्लाईओवर निर्माण को लेकर हुए विरोध में देखा जा सकता है, जहां आदिवासी समुदाय ने इसे अपनी आस्था, पहचान और सांस्कृतिक अधिकारों पर अतिक्रमण के रूप में देखा। यह संघर्ष इस बात की ओर संकेत करता है कि विकास की वर्तमान अवधारणा अक्सर उन पवित्र स्थलों और परंपराओं को ही हाशिए पर डाल देती है, जो आदिवासी जीवन के केंद्र में रहे हैं।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

देवेंद्र कुमार नयन

देवघर (झारखंड) के निवासी देवेंद्र कुमार नयन पेशे से सिविल इंजीनियर व स्वतंत्र लेखक हैं।

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