लोकायत केवल ईश्वर के नकार का नहीं, जीवन के सत्कार का संपूर्ण जीवन-दर्शन है। हमने इस तरह कभी सोचा नहीं, इसलिए गणतंत्र का जिक्र होता है तो हम बुद्धकालीन सोलह जनपदों का उल्लेख करके खुद को गणतांत्रिक प्रणाली का जनक होने का श्रेय लेने को उद्यत हो जाते हैं। लोकतंत्र को हम आयातित विचारधारा मानते हैं, जबकि प्राचीन भारत में न केवल लोक की सुस्पष्ट अवधारणा रही है, बल्कि लोकराज्य, यहां तक कि अराज्य (राज्य की अनुपस्थिति) अथवा अराजक (बिना राजा का राज्य, वैराज्य) की व्यावहारिक उपस्थिति भी आर्यों के आगमन से पहले भारत में मौजूद थी। आजीवकों को लोकायत कदाचित इसलिए भी कहा गया था, क्योंकि वे लोक-सर्वोपरि के विचार में निष्ठा रखते थे। मानते थे कि लोक अपनी चुनौतियों का सामना स्वयं कर सकता है। यदि राजा होना जरूरी है तो उसे भी लोक-समर्थित होना चाहिए – ‘लोकसिद्धो राजा भवेद्’ – यही उनका आदर्श था। निश्चित ही इसी से लोकराज्य की अवधारणा विकसित हुई होगी, जिसका आधार शक्ति तथा अधिकारों का पूर्णतः विकेंद्रीकरण था। समय के साथ केंद्रीभूत सत्ता के विस्तार तथा उसके साथ तालमेल न रख पाने के कारण वे लगातार उपेक्षित होते चले गए। बुद्ध के समय, कदाचित उनसे पहले ही वैराज्य, गणराज्य में बदलने लगे थे। बड़े राज्यों की चुनौती, बढ़ती उत्पादकता तथा व्यापारिक नियमन के लिये वे संभवतः अपरिहार्य हो चले थे। ब्राह्मण सत्ता के केंद्रीययकरण के समर्थक थे। जैन तथा बौद्ध धर्म के प्रवर्त्तक गणराज्यों से आए थे। दोनों धार्मिक चक्रवर्तित्व का सपना देखते थे। उनकी लक्ष्य-सिद्धि के रास्ते में केंद्राभिमुख सत्ता आवश्यक उपकरण जैसी थी। इसलिए समय के साथ-साथ वे भी सत्ता केंद्रों के आसपास सिमटने लगे थे।
गणतांत्रिक प्रणाली के अस्तित्व में आने से पहले, लोकायत देशज व्यवस्था का हिस्सा था। उसमें छोटे-छोटे आत्मनिर्भर और स्वायत्त गांव या गांवों के समूह शामिल थे, जो धर्म, धर्मसत्ता या राजसत्ता से नहीं, बल्कि लोकेच्छा से अनुशासित होते थे। इसे तय करने में ब्राह्मण या उनके धर्मों का कोई योगदान नहीं था। ‘महाभारत’ में घर-घर में राजा की बात भी आई है; जो सदैव अपने लोगों की हितसिद्धि में लगे रहते थे।[1] काशीप्रसाद जायसवाल लिखते हैं–
“‘अराजक’ अथवा ‘अराज’ एक आदर्श संवैधानिक व्यवस्था थी, जिसे बाद में हिंदू भारत में उपहास का पात्र बना दिया गया था। इस संविधान का आदर्श था कि विधान ही सर्वोपरि होगा, कोई मानवीय शासक नहीं होगा। इसमें नागरिकों के पारस्परिक सहमति अथवा सामाजिक अनुबंध को ही राज्य मान लिया जाता था। यह जनतंत्र की उच्चतम अवस्था थी।[2]
‘महाभारत’ इसकी संस्तुति करती है। युधिष्ठिर के यह पूछने पर कि राज्य तथा राजा की उत्पत्ति का आधार क्या है, भीष्म का उत्तर था– “पहले न कोई राज्य था, न ही राजा, न दंड था, न ही दांडिक। लोग ‘धर्म’ की मदद से एक-दूसरे की रक्षा करते थे। हे राजन! समस्त नागरिक धर्म के द्वारा ही पालित और पोषित होते थे।”[3] यहां धर्म को सहसम्मति कहना उचित होगा; क्योंकि ‘महाभारत’ में जो धर्म की अवधारणा है, उसमें नागरिकों की सहसम्मति अथवा सह-विवेक के लिए कोई स्थान नहीं होता। ऊपर काशीप्रसाद जायसवाल ने ‘अराजक’ अथवा ‘अराज’ को आदर्श संवैधानिक व्यवस्था कहा है, लेकिन वहीं पर फुटनोट के जरिए उन्होंने सावधान किया है कि “‘अराजक’ शब्द को ‘अनार्की’ (अराजकतावाद) नहीं समझा जाना चाहिए। ‘अनार्की’ के लिए भारतीय राजनीति में मात्स्य-न्याय जैसा विशिष्ट शब्द है।” इसे देखकर लगता है कि डॉ. जायसवाल ने आधुनिक अराजकतावाद का अध्ययन नहीं किया था; अथवा उनपर अराजकतावाद के विरोधियों का गहरा प्रभाव था, इसलिए वे उसकी तुलना ‘मात्स्य-न्याय’[4] से कर जाते हैं।

यह विचलन आगे चलकर महाभारतकार के दृष्टिकोण में भी देखा जा सकता है। उसने छोटे राज्यों की जमकर आलोचना की है। बिना राजा वाले राज्यों की तो और भी ज्यादा। उन्हें कमजोर तथा अधर्मी बताया है। उसके अनुसार सुख, शांति, कुव्यवस्था आदि से निपटने के लिए राजा की उपस्थिति अपरिहार्य है। अतएव, जो लोग आत्मानुशासित जीवन जीने के अभ्यस्त थे, अ-राज, वैराज्य या स्वराज्य में प्रसन्नचित्त रहकर अधिकतम स्वतंत्रता का भोग करते थे, उनके लिए भीष्म के मुंह से सलाह दिलवायी गई है–
“राष्ट्रवासियों का प्रधान कर्तव्य है कि वे पहले योग्य राजा का अभिषेक करें…क्योंकि जिन देशों में कोई राजा नहीं होता, वहां धर्म भी नहीं टिक पाता।”[5]
ब्राह्मणों की भांति जैन भी अराजकता (बिना राजा वाले राज्य की अवधारणा) को त्याज्य मानते थे। जैन ग्रंथ ‘आचरांगसूत्र’ [2.3.1.10] में भिक्षुओं को निर्देश दिया गया है कि वे बिना राजा वाले अराजक राज्य (अरायाणि), दो राजाओं वाले राज्य (दोरज्जाणि) की यात्रा न करें। ‘रामायण’ में मजबूत राजतंत्र को दिखाया गया है, लेकिन उस समय भी लोक सम्मति की उपेक्षा संभव न थी। राम के युवराज के रूप में मनोनयन के समय दरबार में लोकसम्मत राजा (राजानो लोकसमंताः – अयोध्याकांड 1.49) भी उपस्थित थे। गुजरात में यदुओं का बहुत पुराना गणतंत्र था, जिसे वे स्वराज्य (अपना राज्य) या स्वैराट कहते थे। आधुनिक सौराष्ट्र तथा सूरत उसी की निष्पत्तियां हैं।[6] ऐसे राज्य जो संख्या में बहुत-से थे – ब्राह्मण परंपरा से बाहर थे। ‘महाभारत’ में इन्हें पाषण्ड कहा गया है।
एक स्वाभाविक प्रश्न हो सकता है कि स्वशासन, स्वराष्ट्र, अराज या वैराज्य में जहां लोग मिल-जुलकर शासन-प्रशासन की जिम्मेदारी संभालते थे, कोई राजा न था, वहां बाहरी आक्रमणों से सुरक्षा कैसे होती होगी? सरसरी तौर पर हम कह सकते हैं कि जब तक समाज का बड़ा हिस्सा स्वशासन या अराज पद्धति के अंतर्गत रहा होगा, तब तक वैराज्यों को बहुत बड़ी सेना की जरूरत नहीं पड़ती होगी। आपातकाल में वे स्वयं हथियार उठा लेते होंगे अथवा सैनिकों के सहकारी संगठनों की मदद लेते होंगे। कौटिल्य के समय ऐसे संगठन, विशेष रूप से दक्षिणी भारत में, बड़ी संख्या में मौजूद थे। रमेश मजुमदार ने वैलईक्कार्स की एक सैन्य श्रेणी का उल्लेख किया है जो चोल शासकों को अपनी सेवाएं उपलब्ध कराती थी। उस संगठन के सैनिक श्रीलंकाई राजाओं को अपनी सेवाएं उपलब्ध कराने के लिये वहां जा बसे थे। लाट प्रदेश (दक्षिणी गुजरात का अनार्य क्षेत्र) में बुनकरों की ऐसी श्रेणी का पता चलता है जिसके सदस्यों ने हथियार उठाकर युद्धक्षेत्र में बहादुरी का प्रदर्शन किया था।[7] वर्णाश्रमी समाज में ऐसा संभव नहीं था। ‘अथर्ववेद’ में वैतहव्य वंश के हजारों बिना राजा वाले राज्यों का उल्लेख है, जिनके बारे में बताया गया है कि इस वंश के हजारों ‘अराजन्न’ ब्राह्मण की ‘गाय’ (शाप!) के कारण नष्ट हो गए थे।[8] रमेशचंद्र मजूमदार ने इन्हें लोकशासित राज्य का दर्जा दिया है।[9] ‘ऐतरेय ब्राह्मण’ (8.14) में साम्राज्यवादी, स्वराज्यवादी, भोज्य तथा वैराज्य – चार प्रकार के राज्यों का उल्लेख मिलता है।[10] रमेश मजुमदार ने वैराज्य को राजा-विहीन राज्य कहा है।
राष्ट्र सामान्यतः मनुष्यों के ऐसे समूह को कहा जाता हैं जो साझा इतिहास, संस्कृति, भाषा और मूल्यों के आधार पर एक सामूहिक पहचान को अपना लेते हैं। धर्म उसकी अनिवार्यता नहीं है। एक राज्य में कई-कई धर्म हो सकते हैं; बिना धर्म का राज्य भी हो सकता है। यह उन लोगों की आत्म-चेतना और एकता की भावना है जो खुद को विशिष्ट समुदाय का हिस्सा माने रहते हैं। इसे किसी भौगोलिक सीमा में नहीं बांधा जा सकता है। महाभारतकार की राष्ट्र की अवधारणा ब्राह्मण धर्म से जुड़ी थी। उसकी नजर में ऐसा राज्य आदर्श था, जहां चातुर्वर्ण्य व्यवस्था कायम हो। शूद्र सेवा कार्य करते हों। वैश्य व्यापार संभालते हों। क्षत्रिय रक्षा को समर्पित हों तथा ब्राह्मण शिखर पर विराजमान होकर मार्गदर्शन का दायित्व संभालते हों। इससे आगे बढ़ते हुए कौटिल्य ने ‘अर्थशास्त्र’(6.1) में ‘अराजबीजी’ शब्द का प्रयोग किया है, जिसका आशय गैर-अभिजात्य कुल के राजा से है। कहा है कि शत्रुगण अराजबीजी राजा को पसंद करते हैं, क्योंकि उसे आसानी से जीता जा सकता है। कौटिल्य के समय ऐसे अराजबीजी राज्यों की संख्या काफी थी, इसलिए वह शक्तिशाली केंद्र का समर्थक था। ‘महाभारत’ के धर्मयुद्ध का उद्देश्य भी ऐसे अराजबीजी, लोकशासित राज्यों का उन्मूलन कर ‘धर्मराज्य’ की आड़ में ब्राह्मण राज्य कायम करना था।
ब्राह्मण ग्रंथों में सर्वसत्तावादी तंत्र की जमकर प्रशंसा की गई है। आश्चर्य की बात यह है कि इसके लिए कई जगह लोकायत के आदि सिद्धांतकार कहे जाने वाले बृहस्पति को माध्यम बनाया गया है। ‘बृहस्पतिसूत्र’ में उन्होंने कहा था कि राजा को लोक सम्मत होना चाहिए, यहां तक कि धर्म भी कहे, तो भी राजा को लोक-विरुद्ध आचरण नहीं करना चाहिए।[11] ऐसे लोक-सर्वोपरि के सिद्धांत में विश्वास रखने वाले बृहस्पति के मुख से राजदंड का महिमामंडन करने के लिए महाभारतकार कोशल नरेश राजा वसुमना को ले आता है। विचित्र बात देखिए कि वसुमना खुद वैनयिक हैं। कहा गया है वे विनय-शास्त्र के पंडित थे तथा विनय द्वारा लोगों के कल्याण को सदैव तत्पर रहते थे।[12] पाठकों को याद दिला दें कि वैनयिक आजीवक दर्शन की ही एक शाखा थी। वैनयिक वसुमना के समक्ष बृहस्पति के मुख से कहलवाया है कि श्रेष्ठ राजा कठोर दंड द्वारा समस्त अधार्मिक पुरुषों पर नियंत्रण कर, सन्मार्ग पर ले आता है।[13] यह विनयवाद के विपरीत कथन था। कह सकते हैं कि लोकायत दर्शन को बदनाम करने के लिए, ब्राह्मण उन्हीं के प्रमुख चरित्र नायकों का इस्तेमाल कर रहे थे।
ब्राह्मण ग्रंथों में राजा को पृथ्वी का दंडाधिकारी माना जाता है। कहा जाता है कि राजदंड के भय से ही लोग अपने-अपने धर्म के पालन में निरत रहते हैं।[14] राजा को भीषण दंड द्वारा प्रजा को अपने अधीन रखने की छूट दी गई है।[15] यह राज्य के गठन की मूल अवधारणा के विपरीत है। राज्य का गठन किसी राजा ने नहीं किया था, बल्कि वह लोगों का अपना वरण था। इसका उद्देश्य व्यक्तिमात्र को अधिकतम सुख, सुरक्षा तथा स्वतंत्रता प्रदान करना था। धीरे-धीरे वह वर्चस्वकारी शक्तियों के अधिकार में चला गया। आगे चलकर राज्य साम्राज्यों में बदले, जिनमें प्रजा की स्थिति बाड़े में बंद भेड़ों जैसी बनती गई। ब्राह्मण ग्रंथ ऐसे ही सर्वसत्तावादी राज्य की महिमा गाते आए हैं। लोग विरोध न करें, इसलिए राजा को देवता घोषित कर दिया जाता था। रूसो की पुस्तक ‘सोशल कांट्रेक्ट’ (1762) की पहली पंक्ति है– “मनुष्य आजाद जन्मता है, लेकिन हर जगह बेड़ियों में रहता है।” ‘महाभारत’ के एक पुराख्यान की मदद से कहें तो दूसरों की बातों में आकर, बेड़ियों की कीमत भी वह स्वयं चुकाता है–
“ब्रह्मा ने मनु से राजा बनने को कहा। मनु ने यह कहकर कि बहुत जिम्मेदारी का काम है, राजा बनने से इंकार कर दिया। तब प्रजावर्ग ने एकजुट होकर मनु से राजा बनने की प्रार्थना की– आप डरें नहीं। पाप तो उन्हीं को लगेगा जो करेंगे। हम लोग आपके कोष की वृद्धि के लिए प्रति पचास पशुओं पर एक पशु आपको दिया करेंगे। इसी प्रकार सुवर्ण का पचासवां भाग देते रहेंगे। अनाज की उपज का दसवां हिस्सा आपको देंगे। जब हमारी बहुत-सी कन्याएं विवाह के लिए उद्यत होंगी, उस समय उनमें जो सबसे सुंदर कन्या होगी, हम उसे शुल्क के रूप में राजा को भेंट कर देंगे।”[16]
‘महाभारत’ आदि ग्रंथों में जिस तरह बिना राजा वाले राज्य की आलोचना की गई है, और इसके लिए जिस तरह धर्म को कसौटी बनाया गया है, उससे स्पष्ट है कि ऐसे राज्य ब्राह्मणवाद की परिधि से बाहर थे। वहां के निवासी न केवल अपना स्वतंत्र प्रशासन संभालते थे, बल्कि धार्मिक दृष्टि से भी स्वतंत्र थे। हम उन्हें भारत के प्रथम लोकशासित क्षेत्र कह सकते हैं। ब्राह्मण ग्रंथों में उनका तीव्र विरोध है। भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा था, “जहां कोई राजा न हो, उन देशों में निवास नहीं करना चाहिए। बिना राजा के राज्य में अर्पित किये गये हविष्य को अग्निदेव वहन नहीं करते।”[17]
अराजकता का इतिहास बहुत पुराना है। भारत के अलावा प्राचीन ग्रीस और चीन में भी अराजकतावाद के समर्थक थे। उन्नीसवीं शताब्दी में इसे आदर्श समाजवादी दर्शन के रूप में चिह्नित किया गया है। उन दिनों मानव-स्वातंत्र्य के मुद्दे ने जोर पकड़ा हुआ था, ऐसे राज्य पर विमर्श जारी था, जो मनुष्य के अधिकतम अधिकारों का अधिकतम संरक्षण कर सके; और जहां के नागरिक अधिकतम स्वाधीनता का अनुभव करते हों। पियरे जोसेफ प्रुधों ने अराजकतावाद ऐसा राजदर्शन बताया था, जिसमें सभी सत्ताओं का लोप हो जाता है। अराजकतावादियों के अनुसार कानूनों को लागू करने वाली संगठित सरकारों के बजाय, लोगों को अपनी इच्छानुसार स्वेच्छा से संगठित होने और सहयोग करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। सत्ताएं श्रमजीवी आजीवक समाज के शोषण-उत्पीड़न के लिए जिस तरह धर्म तथा ईश्वर का इस्तेमाल करती हैं, इसपर उन्नीसवीं शताब्दी के प्रखर चिंतक और मार्क्स के साथी मिखाइल बकुनिन ने अपनी पुस्तक ‘गॉड एंड स्टेट’ में बड़ी यथार्थपरक टिप्पणी की थी–
“मनुष्यता के पूरे इतिहास में सरकारों ने धर्म (और ईश्वर) का इस्तेमाल, मानव समाज को अज्ञानता के दलदल में डुबोए रखने तथा उनके दुख और निराशा से जन्मे आक्रोश को दबाने के लिए, ‘सेफ्टी-वॉल्व’ के रूप में किया है। उनके लिए, धर्म का वास्तविक अर्थ, ईश्वर के महिमामंडन हेतु इंसानियत का गला घोंट देना है। हकीकत की दुनिया में ईश्वर सर्वेसर्वा है, मनुष्य कुछ भी नहीं है। ईश्वर को अच्छाई, सच्चाई, न्याय, शक्ति, सौंदर्य और जीवन का प्रतीक माना गया है; दूसरी ओर मनुष्य को झूठ, नाइंसाफी, बुराई, बदसूरती, नामर्दी और नश्वरता का शिकार बताकर लांछित किया जाता रहा है। ईश्वर स्वामी है, मनुष्य गुलाम। इसके मायने हैं कि केवल राज्य नहीं, धर्म भी मनुष्य की स्वतंत्रता के विचार का दुश्मन है। इसलिए यदि ईश्वर सचमुच है तो उसे खत्म करना जरूरी है।”[18]
आधुनिक भारत में अराजक दर्शन हमेशा आलोचना के दायरे में रहा है। जैसे बुद्ध को बुद्धू के रूप में विरूपित किया गया था, वैसे ही अराजकता को यहां तोड़-फोड़, अनुशासनहीनता और अशांत राज्य के रूप में परिभाषित किया जाता रहा है। कौटिल्य तो मजबूत केंद्रीय व्यवस्था के पक्ष में था ही। फिर भी प्राचीन ग्रंथों में जिस तरह से लोक-सर्वोपरि का नारा सुनाई पड़ता है, उससे साफ है कि आजीवक आदि प्राचीन भौतिकवादी, अराजकतावाद का ही समर्थन करते थे। इसी से लोकायत का विचार फलीभूत हुआ, जिसे आगे चलकर, धर्मकेंद्रित राज्यों के दौर में भौतिकवाद तक सीमित कर दिया गया। ब्राह्मण ग्रंथों में आजीवकों और लोकायतियों जैसे मुक्त चिंतकों को राक्षस, पाषण्ड आदि कहकर नकारा गया है। पाप-पुण्य, स्वर्ग-नर्क, वर्णभेद, निजी-स्वामित्व आदि पदानुक्रम वाली किसी भी व्यवस्था में विश्वास न करने वाले लोकायत ऐसी ही व्यवस्था के समर्थक रहे होंगे। ब्राह्मण ग्रंथों में उसकी जगह-जगह आलोचना मिलती है। हस्तिनापुर के सिंहासन के लिए वृद्धावस्था में भी आमरण युद्ध कर, राज्यभक्ति का आदर्श उदाहरण पेश करने वाले भीष्म अराजकता को घोर पाप बताते थे। अ-राजक राज्य के नागरिकों को वे राष्ट्रद्रोह की सलाह देने से भी नहीं चूकते–
“यदि राज्य का लोभी कोई शक्तिशाली राजा, बिना राजा के दुर्बल देशों पर आक्रमण करे तो वहां के निवासियों के लिए सर्वोत्तम सलाह यही हो सकती है कि वे आगे बढ़कर उसका स्वागत करें। क्योंकि पापपूर्ण अराजकता से बढ़कर दूसरा कोई पाप नहीं है।”[19]
वैराज्यों के प्रति उनकी ईर्ष्या की एकमात्र वजह उनका ब्राह्मणवाद के प्रभाव से बाहर होना था। लोकायत दर्शन को विभिन्न दर्शनों के बीच हालांकि हेय माना जाता है, लेकिन एक समय था जब केवल वही दर्शन रूप में पहचाना जाता था। विभिन्न सभ्यताओं-संस्कृतियों के अध्ययन से यह बात सामने आ चुकी है कि दर्शन का आरंभ प्रकृतिवादी चिंतन से हुआ है। आरंभ में लोगों ने सूरज, जल, वायु, पृथ्वी आदि को जीवन के लिए जरूरी मानकर पूजना शुरू किया था, देवता का दर्जा बाद में; जब इन शक्तियों में सबसे शक्तिशाली कौन है की बहस चली, तब जाकर मिला। इसलिए विभिन्न संस्कृतियों में मूलभूत शक्तियां वही हैं, उन्हें धर्म के कलेवर में ढालने वाली, छोटा-बड़ा सिद्ध करने वाली पुराकथाएं और उनके आसपास पनपे पुरोहिततंत्र अलग-अलग हैं।
ब्राह्मण ग्रंथों में भौतिकवाद के प्रवक्ता का श्रेय बृहस्पति को दिया जाता है। यह भी कहा गया है कि बृहस्पति के पिता का नाम ‘लोक’ था।[20] ‘संस्कृत वाङ्मय’ में बृहस्पति के बारे में गढ़ी गईं कहानियां काफी गड्ड-मड्ड हैं। कहीं वे देवताओं के गुरु हैं तो कहीं भौतिकवाद के आचार्य। यह भी हो सकता है कि भौतिकवादियों के बीच बृहस्पति की प्रतिष्ठा देख उसे ब्राह्मण ग्रंथों में वैसे ही अपना लिया हो; जैसे शिव को महादेव के रूप में अपनाया गया था। डॉ. राघवेंद्र वाजपेयी के अनुसार बृहस्पति, “प्राच्य आर्यों के प्रथम राज्य-चिंतक थे, जिन्होंने राजनीति को धर्म से पृथक करके, विद्या की स्वतंत्र शाखा का स्वरूप प्रदान किया था… बृहस्पति ने प्रशासन में धर्म का स्थान गौण करके वार्ता तथा दंडनीति को ही विशेष महत्व प्रदान किया था। उनके अनुयायी के रूप में औशनसों ने दंडनीति को ही एकमात्र विद्या घोषित किया था। बाद के युग में धर्म को अपदस्थ करने के कारण बृहस्पति को लोकायत-चार्वाक मान लिया गया।”[21]
डॉ. वाजपेयी के कथन से साफ है कि लोकायत पुरानी चिंतन शैली थी, जिसके अनुयायी राजनीति को धर्म से स्वतंत्र विषय मानते थे। जो भी हो, आजीवकों/लोकायतियों के लिए बृहस्पति वहीं तक स्वीकार्य हैं, जहां तक वे लोक-नीति का समर्थन करते हैं। ‘नीतिवाक्यमृत’ में कहा गया है कि मूर्ख राजा से बिना राजा का होना बेहतर है (वरमराजकं भुवनं न तु मूर्खो राजा। 5.36)। बृहस्पति अराजक राष्ट्र को वरीयता देते थे। ‘नीतिवाक्यमृत’ के टीकाकार ने वैराज्य के समर्थन में उन्हीं को उद्धृत किया है–
“संसार में जिन देशों के राजा नहीं होते, वहां के नागरिक परस्पर एक-दूसरे की रक्षा करते हैं, किंतु जिन राज्यों (राजतंत्रों) में मूर्ख राजा होता है, उनका क्षय बहुत जल्दी हो जाता है।”[22]
बिना राजा वाले राज्य को ‘महाभारत’ में अधर्मी बताया गया है। कहा गया है कि वहां के लोग एक-दूसरे की संपत्ति को हड़पने में लगे रहते हैं। अराजक देश को धिक्कार है।”[23] महाभारतकार की पीड़ा को समझा जा सकता है। उनकी निगाह में ऐसा हर व्यक्ति अधर्मी है, जो उनके शिखरत्व को चुनौती देता है। उनके द्वारा गढ़ी गई वर्णभेदकारी व्यवस्था को मानने से इंकार करता है। इस तरह का सोच रखने वाले वे अकेले नहीं थे। सुकरात के समय ग्रीक में सोफिस्ट भी ऐसे ही थे। मध्यकाल में चर्च भी राजनीति पर अपना वर्चस्व रखना चाहती थी। राज्य को उसके चंगुल से मुक्त कराने के लिए वहां लंबे सुधारवादी आंदोलन चले। धीरे-धीरे लोग यह समझने लगे कि राज्य कोई दैवी व्यवस्था नहीं है। वह मनुष्य का अपना चयन है। उस समय का चयन है जब धर्म नाम की चिड़िया जन्मी तक न थी। यह नागरिकों का वह भावबोध है जो उनमें एकल पहचान की अनुभूति जगाता है। यह नागरिकों पर निर्भर करता है कि अपने समाज को सुख-शांतिमय तथा विकासशील बनाए रखने के लिए वे किस शासन प्रणाली को श्रेष्ठतर मानते हैं। किसी शासक की अधीनता में अपना कल्याण समझते हैं अथवा बिना शासक के स्वयं शासित संगठनों की मदद से देश और समाज को व्यवस्थित-सुरक्षित करना चाहते हैं। इसके लिए उनकी शासन प्रणाली की आलोचना तो ठीक है, किंतु उनके चयन के अधिकार को चुनौती नहीं दी जा सकती। राज्य चूंकि दैवीय व्यवस्था नहीं है, इसलिए धर्म उसकी श्रेष्ठता की कसौटी नहीं बन सकता।
इसके बावजूद महाभारतकार एकल-शासित राज्य के औचित्य के लिए, बार-बार धर्म की आड़ लेता है। ‘अ-राज’, ‘ना-राज’ आदि भिन्न-भिन्न नामों से वह जिस तरह वैराज्य की आलोचना करता है, वह ‘महाभारत’ पूर्व समाजों में वैराज्यों की बड़ी संख्या में उपस्थिति का संकेतक है। इसके लिए जिस तरह धर्म को बीच में लाया जाता है, उससे साफ हो जाता है कि ‘महाभारत’ के लेखक का उद्देश्य लोगों की समस्याओं का समाधान न होकर, धार्मिक पूर्वाग्रह लादना था।
लोक में देशज यानी जमीन से जुड़े परिश्रमी लोग आते हैं। ऐसे लोग जो कुलीनता और अभिजनत्व के नकली संस्करों से दूर रहते हैं। प्राचीन वाङ्मय में इसके कई प्रमाण हैं कि बुद्ध के समय, सम्भवतः उनसे बहुत पहले से ही भारत के गैर-ब्राह्मण समुदाय आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टि से आत्मनिर्भर थे। वे संगठित जीवन पर विश्वास करते थे। हर पेशेवर समुदाय सहयोगी भावना से काम करता था। संगठित व्यापार की प्रेरणा उन्हें अपने पूर्वजों से मिली थी। ऐसे लगभग तीस प्रकार के सहयोगाधारित उद्यमी-व्यापारी संगठनों की सूचना, प्राचीन वाङ्मय में मिलती है। आश्रमवासी ब्राह्मणों ने उसी को लोक कहा था, उनकी जीवन-शैली को लोकायत नाम दिया था। उसका आशय था जीवन की बहुआयामी व्यवस्था। जनसाधारण से अपेक्षा की जाती थी कि वह लोक की उपेक्षा न करे।[24]
लोकायत में ईश्वर तथा आत्मा के लिए कोई जगह नहीं थी। लोक-सिद्ध (लोकसम्मत) राजा ही ईश्वर है, ऐसा माना जाता था।[25] आगे उनका कहना था कि यदि लोक और धर्म में से किसी को चुनना हो तो लोक को ही चुनना चाहिए। कहने की आवश्यकता नहीं कि यही दृष्टिकोण प्रकारांतर में लोकस्वराज्य अथवा राजाविहीन राज्य की प्रेरणा बना था।
‘तैत्तिरीय ब्राह्मण’ के अनुसार ‘वैराज्य’ (बिना राजा वाला राज्य) उत्तर के कुछ राज्यों का राष्ट्रीय संविधान था। उसके एक मंत्र में स्वशासन शब्द आया है।[26] इसकी पुष्टि ‘यजुर्वेद’ से भी होती है।[27] ये राज्य हिमालय की बगल में थे।[28] उन्हीं दिनों दक्षिण में भी ऐसे राज्य थे जहां ‘वैराज्य’ प्रणाली लागू थी। इसकी पुष्टि ‘ऐतरेय ब्राह्मण’ से भी होती है। कह सकते हैं कि भारत लोकराज्य की अवधारणा, जिसके आजीवक समर्थक थे, कभी अनजान न था, बल्कि उत्तर से लेकर दक्षिण तक ऐसे राज्य थे।[29]
भूतवादी परलोक की मौजूदगी को नकारते हुए कहते थे कि मृत्यु के बाद कुछ भी शेष नहीं बचता। अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी सब अपने मूल स्वरूप में लौट जाते हैं। मनुष्य के सभी कर्म, और कर्मफल यहीं नष्ट हो जाते हैं। साथ कुछ नहीं जाता। इसलिए मनुष्य को एक-दूसरे मनुष्य के हितों का ध्यान रखते हुए कुछ भी ऐसा काम नहीं करना चाहिए, जिससे सामाजिक जीवन में विक्षोभ उत्पन्न हो। यदि धर्म और लोक में किसी एक का अनुसरण करने की चुनौती आ पड़े तो धर्म को ताक पर रखकर भी लोक के अनुदेशों का पालन करना चाहिए।[30]
धर्म ने सबसे पहला प्रहार इसी सोच पर किया था। परिवार और समाज दोनों का आधार संबंध हैं। मनुस्मृतिकार यह लिखकर कि मनुष्य के मर जाने पर उसके परिजन लकड़ी और मिट्टी के ढेले के समान फेंक कर चले आते हैं, केवल धर्म उसके साथ जाता है, उसकी मदद से मनुष्य अपने दुस्तर अंधकार को भी पार कर लेता है[31] – उन्हीं को संदिग्ध बना देता है। आश्चर्यजनक रूप से इसके लिए महाभारतकार ने बृहस्पति को ही माध्यम बनाया है। ‘महाभारत’ के ‘अनुशासन पर्व’ के अनुसार एक बार युधिष्ठिर ने भीष्म से पूछा कि जब परिजन मृत देह को लकड़ी और मिट्टी के ढेले की तरह छोड़कर चले जाते हैं, उसके बाद क्या होता है? अचानक बृहस्पति वहां पहुंच गए। पूछने पर बृहस्पति का उत्तर वही था, जो मनुस्मृतिकार का था।[32] जाहिर है, ये बृहस्पति वे नहीं हो सकते जिन्हें भूतवाद का प्रणेता माना गया है। हम चाहें तो ब्राह्मण-बृहस्पति से अंतर करने के लिए, लोक और लोकराज्य को वरीयता देने वाले बृहस्पति को लोक-बृहस्पति भी कह सकते हैं।
सारतः, लोकायत केवल दार्शनिक मत तक सीमित नहीं था, बल्कि जनसाधारण के सोच तथा संकल्प से निकला बहुसम्मत जीवनदर्शन था, जिसमें समाज, अध्यात्म, राजनीति, अर्थनीति सभी कुछ समाहित था। इसकी सबसे बड़ी विशेषता थी– लोकसम्मत होना; ताकि मनुष्य उसमें पूर्ण शांति, सुख, सुरक्षा तथा स्वतंत्रता का अनुभव कर सके।
[1]. गृहे गृहे हि राजानः स्वस्य स्वस्य प्रियङ्कराः। महाभारत, सभापर्व [1983, 15.2]
[2]. काशीप्रसाद जायसवाल, हिन्दू पॉलिटी, [1943 : 86]
[3]. न वै राज्यं न राजाऽऽसीन्न न दण्डो न दाण्डिकः, धर्मेणैव प्रजाः सर्वा रक्षन्ति स्म परस्परम्ः।
पाल्यमानास्थतान्योन्यं नरा धर्मेण भारत। शान्तिपर्व [1996, 59.14-15]
[4]. अप्रणीतो हि मात्य-न्यायमुद्भावयति। बलीयानबलं हि ग्रसते दण्डधराभावे। अर्थशास्त्र [1.4.16-17]
[5]. राष्ट्रस्यैतत् कृत्यतमं राज्ञ एवाभिषेचनम्
अनिन्द्रमबलं राष्ट्रं…दस्यवोऽभिभवन्त्युत। शान्तिपर्व [1996, 67. 2-3]
[6] काशीप्रसाद जायसवास, दि मॉडर्न रिव्यू, अंक 13 [1913 : 538]
[7]. डॉ रमेश चन्द्र मजुमदार, कॉरपोरेट लाइफ इन एन्शीएंट इण्डिया [1922 : 31-32]
[8]. ये सहस्रम् अराजन्नासन् दशशता उत,
ते ब्राह्मणस्य गां जग्ध्वा वैतहव्याः पराभवन्। अथर्ववेद 5.18.10
[9]. डॉ रमेश चन्द्र मजुमदार, कॉरपोरेट लाइफ इन एन्शीएंट इण्डिया [1922 : 220]
[10] ये के च प्राच्यानां राजानः साम्राज्यायैव तेऽभिषिच्यन्ते।
एतस्यां दक्षिणस्यां दिशि ये के च सत्त्वतां राजानो भौज्यायैव तेऽभिषिच्यन्ते।
एतस्यां प्रतीच्यां दिशि ये के च नीच्यानां राजानो येऽपाच्यानां स्वाराज्यायैव तेऽभिषिच्यन्ते।
ये के च परेण हिमवन्तं जनपदा उत्तरकुरव उत्तरमद्रा इति वैराज्यायैव तेऽभिषिच्यन्ते। ऐतरैय ब्राह्मण
[11]. धर्मापि लोकविक्रुष्टं न कुर्यातः। बृहस्पतिसूत्र 1.4
[12]. सर्वे वैनयिकं कृत्वा विनयज्ञो…। शान्तिपर्व [1996, 68.04]
[13] यदा त्वधार्मिककान् सर्वोस्तीक्ष्णैर्दण्डैर्नियच्छति। शान्तिपर्व [1996, 68.45]
[14]. राजदंडभयाल्लोकः स्वस्वधर्मपरो भवेत्। शुक्रनीतिः [1968, 1.23]
[15]. सुदण्डैर्धर्मनिरताः प्रजाः कुर्यान्महाभयैः, नृपः स्वधर्मनिरतो भूत्वा तेजःक्षयोन्यथा। शुक्रनीतिः[1968, 1.25]
[16]. तमब्रुवन् प्रजा मा भैः कृतनेनो गमिष्यति, पशूनामधिपञ्चाशद्धिरण्यस्य तथैव च।
धान्यस्य दशमं भागम् दास्यामः कोशवर्धनम्, कन्यां शुल्के चारुरूपां विवाहेषूद्यतासु च। शान्तिपर्वम् [1996, 67.23-24]]
[17]. नाराजकेषु राष्ट्रेषु वस्तव्यमिति रोचये
नाराजकेषु राष्ट्रेषु हव्यमग्निर्वहत्युत। शान्तिपर्व 67.5
[18]. मिखाइल बकुनिन, गॉड एण्ड स्टेट, अनुवाद पॉल एवरिच [1970 : vi भूमिका]
[19]. न हि पापात् परतरमस्ति किञ्चिदराजकात्। शान्तिपर्व 67.7
[20]. डेल रीप, दि नेचुरलिस्टिक ट्रेडीशन इन इण्डियन थॉट्स [1964 : 59]
[21]. डॉ राघवेन्द्र वाजपेयी, बार्हस्पत्य राज्य-व्यवस्था [1966 : 23 (आमुख)]
[22] अराजकानि राष्ट्राणि रक्षन्तीह परस्परम्,
मूर्खो येषां भवेद्येषां तानि गच्छन्ति संक्षयम्। नीतिवाक्यामृते [1922 : 56]
[23] अराजकेषु राष्ट्रेषु धर्मो न व्यवतिष्ठते,
परस्परं च खादन्ति सर्वथा धिगराजकम्। शान्तिपर्व [1996, 67.3]
[24]. लोकविरुद्धं ना चरेत्। बार्हस्पत्य सूत्र 5.16
[25]. लोकसिद्धो राजा परमेश्वर। सर्वदर्शन संग्रह 1.10
[26]. य एवं विद्वान वाजपेयेन यजति। गच्छीत स्वराज्यम। अग्रं समानानां पर्येति। तिष्ठन्तेऽस्मै ज्येष्ठ्याय। तैत्तिरीय ब्राह्मणम् 1.3.2.3
[27]. स्वराडस्युदाची दिङ़मरुतस्ते देवा अधिपतयः। यजुर्वेद 15.13
[28] काशीप्रसाद जायसवाल, हिन्दू पॉलिटी [1943 : 81]
[29] विराडसि दक्षिणा दिग्रुद्रास्ते देवा अधिपतय…आदि। यजुर्वेद 15.11 तथा तेन च तृचेनैतेन त यजुषैताभिश्च व्याहृतिभिर्वैराज्याय तस्मादेतस्यामुदीच्यां दिशि ये के च परेण हिमवन्तं जनपदा उत्तरकुरव उत्तरमद्रा इत वैराज्यायैवतेऽभिषिच्यन्ते। विराडित्येनानभिषिक्तानाचक्षत…। ऐतरेय ब्राह्मण 8.14
[30]. धर्मापि लोकविक्रुष्टं न कुर्यातः। बृहस्पतिसूत्र 1.4.
[31] मृतं शरीरमुत्सृज्य काष्ठलोष्ठ समं क्षितौ, विमुखा बान्धवा यान्ति धर्मस्तमनुगच्छति। मनुस्मृति 4.241
[32]. तैस्तच्छरीरमुत्सृष्टं धर्मं एकोऽनुगच्छति,
तस्माद् धर्मः सहायश्च सेवितव्यः सदा नृभिः। अनुशासनपर्व 1996, 111.14
(संपादन : नवल/अनिल)
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