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एससी-एसटी अत्याचार अधिनियम के तीन दशक बाद कितने बदले हालात

यह कानून लागू होने के बाद जब गिरफ्तारियां होने लगीं तब तथाकथित उच्च जातियों, पिछड़े वर्ग की जातियों को इस कानून की ताकत का अंदाजा होने लगा। इसलिए क्रिया और प्रतिक्रिया के बीच उन्माद और बढ़ने लगे। सामूहिक नरसंहारों पर कुछ लगाम लगा, लेकिन प्रतिदिन होने वाले शोषण बढ़ने लगे। बता रहे हैं डॉ. संजीव कुमार

आज बहुत से लोग सोशल मीडिया तथा समाज में बयानबाजी करते फिरते हैं कि जब दलितों को हजारों साल पानी नहीं मिला तो वह जिंदा कैसे हैं। मेरी सलाह है कि उन्हें इतिहास के अधिक पन्ने पटलने की जरूरत नहीं है। वे बस गोलमेज सम्मेलन में शामिल तत्कालीन राजनीतिज्ञों को पढ़ें। यह वही गोलमेज सम्मेलन है जहां डॉ. आंबेडकर ने अस्पृश्यता के सवाल पर सब की बोलती बंद कर दी थी। आजाद भारत में समानता लाने के लिए बहुत सारे कानूनी प्रावधान किए गए, ताकि पिछड़े और शोषित समाज को मुख्य धारा में लाया जा सके। इन्हीं प्रावधानों की वजह से सामंतवादियों का वह जत्था जो शोषण करना, जुल्म करना और दूसरों पर अत्याचार करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझता था, उसे वही कानूनी प्रावधान नागवार गुजर रही थीं। उसे यह बर्दाश्त नहीं था कि जो समाज उसके आगे घुटने टेके हुए जिंदा गिड़गिड़ाया करता था, अब वह उनकी आंखों में आंखें मिलाकर बात करेगा। अब तक वे मजदूर जातियों को जैसे रखना चाहते थे वैसे रखने में कामयाब थे लेकिन आजाद भारत में संवैधानिक अधिकारों की वजह से उन्हें अपनी जमींदारी, सामंती, वर्णवादी व्यवस्था टूटती हुई दिखाई दे रही थी, जिसे वे आसानी से अपने हाथ से निकलता हुआ नहीं देख सकते थे।

कानून बनने के पहले

और फिर शुरू हुई जाति आधारित संघर्षों का सिलसिला। इसका एक बड़ा उदाहरण तमिलनाडु में 1968 का वह किलवेनमणि नरसंहार है, जिसने आजाद भारत की आत्मा को लहूलुहान कर दिया था। बात मात्र कुछ रुपए मजदूरी बढ़ाने की थी। लेकिन यह जमींदारों को इतना नागवार गुजरा कि उन्होंने दलितों के इस जुर्रत की ऐसी भयानक सजा देने की ठानी ताकि देश का कोई गरीब कभी भी किसी सामंती के खिलाफ आवाज ना उठा सके। करीब 200 बंदूकधारी लठैतों ने 25 दिसंबर, 1968 की आधी रात में पूरी बस्ती को घेर लिया और 42 लोगों को जिंदा जलाकर मार दिया।

इसी तरह का नरसंहार आपातकाल के बाद बिहार की राजधानी पटना जिले के बेलछी गांव में 27 मई, 1977 को अंजाम दिया गया। भूमि संबंधित विवाद के कारण गांव के सामंती लोगों ने 11 दलितों को हाथ-पैर बांधकर पुआल की आग में जिंदा जला दिया था। माना जाता है कि इसी घटना की वजह से इंदिरा गांधी फिर सत्ता में वापसी कर पाई थीं। इस घटना के 3 साल बाद 18 नवंबर, 1981 को उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले के दिहुली गांव में 24 से ज्यादा दलितों को डकैतों की एक टीम (जिसमें सभी उच्च वर्ग के लोग शामिल थे) ने अपने खिलाफ कुछ जाटवों के गवाही देने की वजह से दिनदहाड़े गोलियों से भून दिया था। फूलन देवी के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना भी इसी दौर में हुई थी और ओमप्रकाश वाल्मीकि की मशहूर कविता ‘ठाकुर का कुआं’ भी इसी दौर में लिखी गई थी।

आंध्र प्रदेश के प्रकाशम जिले में करमचेडू नामक एक गांव है जिसमें दबंग जातियों और दलित जातियों के लोग समान रूप से रहते थे। इस गांव की भी सारी जमीनें यहां की दबंग जातियों, जिनमें मुख्य रूप से कम्मा जाति के लोग थे, का दबदबा था। मजदूरी और तालाब के पानी के लिए दोनों समुदायों में हमेशा संघर्ष होता रहता था। 17 जुलाई, 1985 को कम्मा जाति के कुछ युवक दलितों की बस्ती के नजदीक उस तालाब में अपनी भैंस धोने लगे जहां से जिसका पानी दलित पीते थे। जब इसका विरोध कुछ लड़कों और महिलाओं ने किया तो वे बुरा मान गए और रात में सुनियोजित तरीके से कई गांवों के लोगों ने मिलकर दलितों की बस्ती पर हमला किया, महिलाओं के साथ बलात्कार किया तथा दर्जनों लोगों की हत्या कर दी।[1]

जब बनाया गया विशेष कानून

संविधान निर्माताओं ने तो अनुच्छेद 17 का प्रावधान कर अस्पृश्यता को पूर्णतः देश में अपराध घोषित कर दिया था। लेकिन हजारों साल से जिनकी मानसिकता रूढ़िवादी बन चुकी थी, वे भला कहां सुधरने वाले थे। इसलिए इस तरह के नरसंहार देश में रूकने का नाम नहीं ले रहे थे। इसलिए ऐसे अपराधों को रोकने के लिए तत्कालीन केंद्र सरकार ने 11 सितंबर, 1989 को अनुसूचित जाति जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम बिल प्रस्तुत किया और 30 जनवरी, 1990 को यह कानून बना।

2 अप्रैल, 2018 को आहूत भारत बंद की एक तस्वीर

यह कानून लागू होने के बाद जब गिरफ्तारियां होने लगीं तब तथाकथित उच्च जातियों, पिछड़े वर्ग की जातियों को इस कानून की ताकत का अंदाजा होने लगा। इसलिए क्रिया और प्रतिक्रिया के बीच उन्माद और बढ़ने लगे। सामूहिक नरसंहारों पर कुछ लगाम लगा, लेकिन प्रतिदिन होने वाले शोषण बढ़ने लगे। मसलन, मंदिरों में जाना, मूंछ रखना, घोड़ी पर बैठना, राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए दावेदारी दलितों द्वारा करना उन्हें अखरने लगा। महाराष्ट्र में 2006 में खैरलांजी की घटना इसकी एक कड़ी थी। दूसरी तरफ इन तथाकथित उच्च जातियों और दलितों से अपने आप को बड़ा समझने वाली जातियों ने इस एक्ट के फर्जीवाड़े पर आरोप लगाना आरंभ कर दिया। वे तर्क देने लगे कि इस एक्ट का दलित समाज दुरुपयोग कर रहा है। दरअसल आज तक जितने भी इस एक्ट के तहत मामले दर्ज होते हैं, उनमें न्याय मिलने की दर एक चौथाई से भी कम रहा है। उसमें भी दशकों लग जाते हैं। मान लीजिए कि किसी गांव में किसी दलित के साथ कोई अभद्र व्यवहार करता है। मसलन उसकी बेटी की शादी में उत्पात मचाता है तो इससे परेशान होकर दलित थाने में रिपोर्ट लिखवा देता है। मामले पर कार्रवाई होती है, फिर मामले की छानबीन होती है और मुकदमा कायम किया जाता है। कुछ सालों तक यह प्रक्रिया चलती है और क्योंकि दोनों एक ही गांव के रहने वाले लोग हैं, इसलिए गांव के लोग दोनों पक्षकारों को समझाने-बुझाने का कार्य करते हैं।

एक यथार्थ यह भी

अनुसूचित जाति के लोगों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि उन्हें सामंतियों के खेतों में मजदूरी करनी पड़ती है, उन्ही के खेतों में अपनी बहन-बेटियों के बारात रखने पड़ते हैं। मजबूरी आने पर उन्ही से कर्ज लेना पड़ता है। इसलिए ज्यादा समय तक वह कानूनी प्रक्रिया सह नहीं पाते और अपने विपक्षी से कोर्ट के बाहर समझौता कर लेते हैं। ऐसे ही आंकड़ों को दिखाते हुए गैर-दलित समाज इस एक्ट के दुरुपयोग की बात उठाते हैं। इन्हीं आंकड़ों के दबाव में आकर 20 मार्च, 2018 को सुप्रीम कोर्ट के जज सुभाष महाजन की बेंच ने इस एक्ट में संशोधन करने की बात कही थी। जबकि इसी बीच ऊना कांड, रोहित वेमुला एवं पायल तड़वी आत्महत्या कांड भी हुए थे। इस संशोधन का प्रमुख उद्देश्य यह था कि अब इस एक्ट के तहत तुरंत गिरफ्तारियां नहीं होंगीं, जिसका देशभर के दलित संगठनों ने पुरजोर विरोध किया था, जिसकी अभिव्यक्ति 2 अप्रैल, 2018 के भारत बंद से हुई और सरकार को अपना फैसला बदलना पड़ा।

वर्षकुल मामलेऔसत/दिन
202045,995125.7
202146,000126.0
202252,866144.8
202353,372146.2
202448,669133.2

(स्रोत : पीआईबी, 30 जुलाई 2026; एनसीआरबी, क्राइम इन इंडिया, द्वारा उपलब्ध कराए गए विवरण पर आधारित)

लेकिन शोषण, उत्पीड़न और अत्याचार जारी रहे। 14 सितंबर, 2020 को उत्तर प्रदेश के हाथरस में वाल्मीकि समाज की एक लड़की के साथ बलात्कार करके अपराधी फेंक देते हैं जिसका अस्पतालों में इलाज के दौरान 15 दिन बाद मौत हो गई। इस बलात्कार की घटना ने सरकार को हिला दिया था जिससे उत्तर प्रदेश की सरकार इतने दबाव में आ गई कि उसने पीड़िता की लाश तक घरवालों को नहीं सौंपी और प्रशासन ने यूं ही उस लड़की के शव को सरेआम सड़क पर जला दिया। 13 अगस्त, 2022 को राजस्थान के एक स्कूल में इंद्र कुमार मेघवाल नामक 9 वर्ष के बच्चे को एक शिक्षक अपने मटके में रखे पानी को छूने पर इतनी बुरी तरह पीटता है कि वह कुछ दिनों बाद मर जाता है। इस घटना के अगले ही महीने इस राजस्थान में राजेंद्र मेघवाल नामक एक दलित नवयुवक को कुछ सरफिरे सिर्फ इसलिए मार देते हैं कि उन्हें उसका मूंछ रखना पसंद नहीं था।

निष्कर्ष

क्या यह सब घटनाएं एक विकसित भारत की पहचान हो सकती हैं? देश में आज भी हर दस मिनट में एक दलित का शोषण किया जाता है। हर वर्ष 57000 से ज्यादा दलित अपराध से जुड़े मामले थानों में दर्ज होते हैं। इससे तीन गुना ऐसे मामले हैं जो थाने तक पहुंचते ही नहीं पाते। जेन जी को यह एससी-एसटी एक्ट असमानता का प्रतीक लग सकता है, लेकिन उन्हें यह सब समझने के लिए देश का इतिहास समझना होगा। देश में आज भी हो रहे हर ऐसे अत्याचार की पृष्ठभूमि पर सवाल उठाना होगा।

संदर्भ :

[1] मनोज मित्ता, ‘ए न्यू थ्रेसहोल्ड ऑफ क्रूएलिटी’, दी कारवां, 1 जुलई 2023

[2] रमाकांत चंदन, ‘जब हाथी पर बैठकर बेलछी पहुंची थी इंदिरा… आखिर वह कौन सी थी घटना, जिससे कांग्रेस को मिली संजीवनी’, नवभारत टाइम्स, 19 नवंबर, 2022

[3] ‘देहुली मैसेकर : यूपी कोर्ट गिव्स डेथ पेनाल्टी टू 3 मेन फॉर किलिंग 24 दलित्स इन 1981’, दी टाइम्स ऑफ इंडिया, 18 मार्च, 2025

[4] कदि पद्मा राव, ‘हिस्ट्री ऑफ करमचेडु एंड व्हाट एक्चुअली हैपेंड’, राऊंड टेबुल इंडिया, 20 मार्च, 2023

[6] अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम संशोधन की वैधता, पृथ्वी राज चौहान बनाम भारत संघ, सुप्रीम कोर्ट ऑब्जर्वर

[7] रिंकु यादव, बहुजनों द्वारा सामूहिक प्रतिरोध की मिसाल है 2 अप्रैल, 2018 का भारत बंद, 2 अप्रैल, 2021

[8] गौरव गुलमोहर, यूपी: हाथरस का दलित परिवार छह साल बाद भी चौबीसों घंटे सुरक्षा घेरे में, परिवार की क्या है मांगें?, 14 सितंबर 2026

[1] हिस्ट्री ऑफ करमचेडु एंड व्हाट एक्चुअली हैपेंड, के. पद्म राव https://www.roundtableindia.co.in/history-of-karamchedu-and-what-actually-happened/

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

संजीव कुमार

दलित पत्रकारिता को केंद्र रखकर पीएचडी करने वाले डॉ. संजीव कुमार नियमित रूप से लेखन करते हैं। संप्रति एक निजी विश्वविद्यालय में बतौर सहायक प्रोफेसर कार्यरत हैं।

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