प्रबुद्ध लेखिका और कवि जसिंता केरकेट्टा ने अपने कहानी संग्रह ‘औरत का घर’ में आदिवासी समाज की ख़ूबसूरती के साथ-साथ उसके कुछ बदसूरत हिस्सों को भी चिह्नित करने की कोशिश की है। यह संग्रह आदिवासी समाज में समय के बढ़ते पहियों के साथ आए परिवर्तनों को तो बताता ही है, साथ ही सत्ता, बाज़ार और दिक्कू (ग़ैर-आदिवासी) समाजों के साथ उसके संबंधों को भी बारीकी से उकेरता है।
हालांकि ये संबंध बहुत मधुर दिखाई नहीं देते। यहां कई-कई संस्थाएं और पूरा ‘सिस्टम’ उभरकर सामने आता है, जो आदिवासी को ‘आदिवासी’ बने रहने नहीं देता। और ऐसे में जब आदिवासी स्त्री का ज़िक्र आए तो वह और ज़्यादा दोहरी और तिहरी मार की शिकार दिखाई देती हैं। चाहे वह शारिरिक हिंसा हो, चाहे वह मानसिक हिंसा हो, चाहे वह आर्थिक हिंसा हो। हर एक जगह वह अपने होने को ढूंढ़ रही होती है। उसका अपना क्या? वह तलाश रही होती है। दिक्कु तंत्र से जूझते हुए, सत्ता व व्यवस्था से जूझते हुए, सामाजिक संस्थाओं से जूझते हुए या फिर आदिवासी पितृसत्ता से जूझते हुए वह हासिल क्या करती है, इसे यह कहानी संग्रह बखूबी चिह्नित करती है। चाहे वह कहानी ‘रेशम’ हो, ‘अंतिम वार’, ‘फ़ीस’, ‘जईतबोरा’, ‘कहां रहती है सूरजमुखी’, ‘काली लड़की’, ‘औरत का घर’ या ‘बंधक जंगल’। ये सभी कहानियां आदिवासी स्त्री संघर्ष को बखूबी उठाती हैं। किसी में उसकी हत्या का आयोजन है; मात्र शक में कि वह दिक्कू के पास चली जाएगी। किसी में ना पढ़ने देने के लिए भूखे आदिवासी शिक्षक ही खड़े हैं। कहीं वह अपने गोतिया में ही ज़मीन क़ब्ज़ेदारी में बाधक है तो वह हिंसा की शिकार हो रही। तो कहीं जड़ी-बूटी का अच्छा ज्ञान है और प्रसव बहुत आसानी से करा लेती है, फिर भी डायन कहकर उसकी हत्या है। कहीं शादी के लिए काली, मोटी है; कहकर रिजेक्शन है। तो कहीं गैंग-रेप झेलती आदिवासी स्त्री दिखाई दे रही हैं। जसिंता ने कहीं कुछ ऐसा नहीं कहा है जो अकल्पनीय है। संग्रह की हर कहानी आए दिन हमारे आदिवासी समाज के साथ घटित कहानियों का प्रामाणिक ब्योरा प्रस्तुत करती है।
इस संग्रह का मुख्य फोकस आदिवासी महिलाओं के साथ हो रहे भेदभाव व अन्याय पर केंद्रित है। लेखिका ने कहानियों के माध्यम से कई अहम प्रश्न उठाए हैं। आदिवासी महिलाओं को समाज ने क्या दिया, इसकी बानगी इन कहानियों में दिखती है। आदिवासी समाज को आदिवासी महिलाओं ने क्या दिया, यह भी यहां बेख़ौफ़ रूप में चित्रित है।
एक मूल प्रश्न जसिंता ने उकेरने की कोशिश की है कि स्त्री ‘बिलॉन्ग’ कहां करती है (उनको अपनापन कहां महसूस होता है)? क्या उसका कोई अपना घर है? अगर है तो कहां है? क्या यह उसका मायका है या उसका ससुराल? कुछ आदिवासी समूहों में यह प्रथा है कि मृत संस्कारों में भी स्त्रियों को मायके के मुहाने पर लाकर छोड़ दिया जाता है। उनको घर-आंगन तक में ‘छाया भितराने’ (आत्मा वापस घर बुलाने की प्रकिया) के नाम पर भी जगह नहीं मिलती। ज़िंदगी भर श्रम कर उसे जो हासिल होता है, क्या उसमें उसकी पहचान और सम्मान शामिल होते हैं? हर किसी को गाय की तरह खटने वाली स्त्री तो चाहिए, पर अधिकार देने की बात पर सब न्याय और समता की बातें नदारद हो जाती हैं। और जो समाज के कुछ चिंतनशील पुरुष इन अधिकारों के साथ खड़े होते हैं, वे मात्र सत्ता की नज़र में नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवस्था में भी ‘अर्बन नक्सली’ की श्रेणी में आ जाते हैं।
आदिवासी स्त्री अगर पढ़ना चाहे, तो क्या उसके परिवार के लोग किसी भी परिस्थिति में उसे पढ़ने का मौक़ा दे पाते हैं? वह अन्य समाज की स्त्रियों से ज़्यादा स्वतंत्र ज़रूर दिखती है, पर क्या वास्तविक रूप से वह स्वतंत्र है? जीवन जीने के क्रम में कई उम्र के ऐसे पड़ाव और परिस्थितियां आते हैं, जहां एक स्त्री बस ‘एडजस्ट’ करके जीवन जी रही होती है।
कई बार यही जीवन उसके आस-पास के समाज के पुरुषों को हिंसा और डाह के लिए उकसाता है और उन्हें ‘डायन’ बताकर मौत के घाट उतार दिया जाता है। एक गोत्र में शादी करने पर उनका गांव-निकाला कर दिया जाता है। अगर किसी अन्य बाहरी समाज से विवाह किया, तो ज़मीन लूट के नाम पर उन्हें कभी गांव में प्रवेश का अधिकार नहीं मिलता। लेकिन धीरे-धीरे यह आदिवासी समाज की सहजता ही है कि वह सामने वाले की मंशा को साफ़ पाने पर, दिक्कू समाज का होने के बाद भी, उसे स्वीकार कर लेता है। यह जसिंता ने अपनी कहानियों में दर्शाया है।
इस कहानी-संग्रह से गुजरते हुए आपको कभी नहीं लगेगा कि यह आदिवासी घर-समाज की कहानियां नहीं हैं; वे उसमें पूरी तरह से उतर पाई हैं। यही कहानीकार की सार्थकता है। आदिवासी समाज इससे ख़ुद को जुड़ा हुआ पाएगा, जुदा बिल्कुल भी नहीं।
आदिवासी समाज में बढ़ती पितृसत्तात्मक सोच से कहानीकार वाक़िफ़ हैं और वह हर जगह इसे अपनी अनुभूतियों से बहुत ही गहरे तरीक़े से इन कहानियों में पिरो पाई हैं। तभी पढ़ने के लिए बेटी को पैसे की कमी में ‘ज़मीन बंधक’ देने पर भाई और पिता के प्रतिकार को मां झेलती है। जड़ी-बूटी का ज्ञान जिस महिला को गांव भर में है, उस दाई (प्रसव कराने वाली महिला) की हत्या ईर्ष्या और डाह के कारण डायन बताकर कर दी जाती है। उन्नत महिलाओं को जज्ब कर पाने का दम यहां भी आदिवासी समाज में आसानी से नहीं दिख पाता है।
वहीं किसी ग़ैर-स्त्री से संबंध बनाते हुए आदिवासी पुरुष द्वारा व्यभिचार को वह स्वीकार भी करती है और बहुत ही अपनत्व के साथ उस दूसरी स्त्री और उसके बच्चे का लालन-पालन कर पाती है। यहां जलन-कुढ़न की जगह आदिवासी स्त्री के बीच के बहनापा को आप कई कहानियों में देख पाएंगे। ऐसे बहुतेरे प्रसंग उभरेंगे, जहां स्त्री-स्त्री संबंध प्रेम, स्नेह, सम्मान और एक-दूसरे के प्रति इंसानियत से भरपूर मिलेंगे। स्त्री-दुख एक आकार में जुड़कर उनके अस्तित्व को विस्तार देता है। वे अपने को पुरुष से प्रतियोगिता में नहीं पातीं, न उनसे आगे निकल जाने की होड़ में दिखती हैं। वे सह-अस्तित्व में यक़ीन करती हैं, लेकिन उनके द्वंद्व समाज की पुरुष-प्रधानता के कारण कहीं-न-कहीं दमित दिखाई पड़ते हैं।
यहां आदिवासी स्त्रियां मुक्त होना चाहती हैं। पर किससे? क्या आदिवासी पुरुष से? या आदिवासी समाज की मान्यताओं से? या अपने पुरखागणों से? वास्तविकता यह है कि वह मुक्त होना चाहती है अपनी उन पीड़ाओं से, जो शारीरिक हिंसा के नाम पर उसका पति, पिता या भाई या उसके सगे संबंधी देते आए हैं। वे मुक्त होना चाहती हैं उन बेड़ियों से, जो उनके सपनों को साकार करने से रोकती हैं।
कहानीकार एक महत्वपूर्ण बात हमारे सामने रखती हैं कि जिस तरह दूसरे समाज अपने धार्मिक ग्रंथों का हवाला देकर हर नियम और ‘प्रैक्टिस’ को सही ठहराने की कोशिश करते हैं, उसी तरह आदिवासी महिलाओं को अपने अधीन रखने के लिए यह धारणा आदिवासी समाज में भी लाई गई कि पुरखों ने ऐसा ही कहा था और ऐसा ही किया था। कहानी ‘अर्बन नक्सल’ के ‘मंगा’ नामक एक पात्र के माध्यम से जसिंता ने कहा है– “हां! व्यवस्था को बनाए रखने के लिए ही तो उच्च जाति के लोग भी ईश्वर-ईश्वर करते हैं। आदिवासी भी पुरखे–पुरखे करते हुए अपनी उसी पुरानी व्यवस्था को बनाए रखना चाहते हैं, जिसके केंद्र में पुरुष ही रहते हैं।”[1]
इस कथन के माध्यम से लेखिका यह दिखाने की कोशिश करती हैं कि किस तरह आदिवासी समाज में मौजूद पितृसत्तात्मक तत्व ‘दिक्कू’ समाज के साथ रहते हुए अपने फ़ायदे के लिए उन्हीं व्यवस्थाओं को आत्मसात करते जाते हैं।

जसिंता केरकेट्टा ने पूरी ईमानदारी के साथ अपने जीवन-अनुभव और तत्कालीन परिस्थितियों का चित्रांकन किया है। वे आदिवासी समाज के उन सभी हिस्सों पर सवाल खड़ा करती दिखाई देती हैं, जो आदिवासी स्त्रियों के साथ होने वाले अन्याय के भागीदार हैं। आदिवासी स्त्री के शोषण की वह दास्तान, जो कई कारकों के कारण उसके अपने आदिवासी पुरुष सहयोगियों के द्वारा भी सामने आती है, उसे भी उन्होंने इन कहानियों में बांधा है। आदिवासी समाज में प्रचलित नशाख़ोरी के अंश लगभग हर कहानी में उपस्थित हैं। और इसका कारण वे बताती हैं कि नौकरी के दौरान जो निम्न जाति का कहकर उनके साथ बुरा बर्ताव होता है तो वह घुटकर-घुटकर, धीरे-धीरे शराब के आदी हो जाते हैं। और यहीं से वे अपनी कुंठा अपनी औरतों पर समय-समय पर निकालते रहते हैं।
लेखिका कई विरोधाभासों को भी सामने लाती हैं। जैसे– ज़मीन को सामूहिक संपत्ति बताने वाला आदिवासी समाज आज इस वैश्विक युग में निजी संपत्ति की अवधारणा को जी रहा है। कहने के लिए यह कहा जाता है कि ज़मीन आज भी सामूहिक संपत्ति है। लेकिन यह सिर्फ़ एक अर्द्धसत्य ही है।
बदलते समय ने आज ज़मीन को बहुत कम ही जगह सामूहिक रख छोड़ा है। बात आदिवासी बेटी को उसके पिता की संपत्ति में हक़ देने की आती है तो आदिवासी समाज यही राग अलापने लगता है। इस समस्या पर लेखिका ने अपनी कहानी ‘अर्बन नक्सल’ के ‘चंदवा’ नामक पात्र के माध्यम से कहा है, “खेत पर अपना हक आदिवासी भी व्यक्तिगत रूप से ही देखते हैं, इसलिए स्त्रियों का जमीन पर कोई भी हक़ सुनिश्चित करने से डरते हैं। यह सामंतवाद का बहुत छोटा रूप है। स्त्रियां खेत में मज़दूरों की तरह बिना किसी मज़दूरी के खटती हुई ही अच्छी लगती हैं उन्हें। उनको किसी तरह से भी सशक्त करने से आदमी डरता है। मालिक क्यों चाहेगा कि ग़ुलाम को ज़मीन पर अधिकार मिले या वह शिक्षित हो। इसलिए देखो, आदिवासी समाज स्त्रियों के शिक्षित होने से भी डरा रहता है।”[2]
आदिवासी स्त्रियों के पिता की ‘प्रॉपर्टी’ में हक़ की मांग लंबे दशकों से देखी गई है। इस मांग को उठाने की कोशिश लेखिका ने भी की। उनकी पक्षधरता आदिवासी स्त्रियों के हक़ में खड़ी है। और वह अपने समाज के आदिवासी पुरुषों की इस चालाकी से वाक़िफ़ हैं कि उन्हें भी अपनी महिलाओं से ग़ुलामी करवाने में कोई बहुत झिझक नहीं है। यह बात उन लोगों को काफ़ी नागवार लग सकती है, जो आदिवासी समाज को एक ‘अजीबोगरीब’ समाज के तौर पर पेश करते हैं। उनको लगता है कि आदिवासी समाज एक अलग ही दुनिया है।
यह सच है कि आदिवासी समाज में जाति नहीं है और वहां के बहुत सारे लोक-व्यवहार आज भी बहुत हद तक लोकतांत्रिक हैं। मगर हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि सामाजिक सुधार की ज़रूरत आदिवासी समाज को भी है, ख़ासकर महिलाओं को उनकी पारंपरिक संपत्ति में अधिकार को लेकर। यह सवाल बहुत हद तक संवेदनशील बना दिया गया है। मगर लेखिका ने एक सर्जन की तरह अपने समाज पर चाकू चलाया है। यह चाकू किसी रोगी की जान लेने के लिए नहीं चला है, बल्कि उसमें सुधार करने के ग़रज़ से है। आज भले ही लेखिका के स्वर का विरोध आदिवासी समाज के पितृसत्तात्मक तत्व करें, मगर भविष्य लेखिका के पक्ष में खड़ा दिखेगा। विश्व भर में चल रहे स्त्री मुक्ति आंदोलन के स्वर आदिवासी महिलाओं की तरफ़ से उठ रहे हैं तथा आगे और भी ताक़त के साथ उठते रहेंगे।
इस कहानी-संग्रह में कोई कहानी ऐसी नहीं दिखेगी, जो आदिवासी घरों की हक़ीक़त बयान न करती हो। पितृसत्ता, शासन की बंदूक, राजनीतिक हिंसा, धार्मिक उन्माद – इन सब पर बातें की गई हैं। इतना ही नहीं, मॉब लिंचिंग, घरेलू हिंसा, शराबखोरी, विकास के नाम पर प्रकृति की लूट और जनजीवन पर हमला, अवामी विरोध को दबाने के लिए पुलिसिया दमन, आदिवासियों का मानसिक उत्पीड़न – सब कुछ उनकी कहानियों में उपस्थित है। एक बात लेखिका ने साफ़ तौर पर रेखांकित की है कि आदिवासियों के ख़िलाफ़ शोषण कोई दुर्घटना नहीं है, बल्कि यह सब कुछ प्रायोजित है। इन बातों को ‘चंदवा’ पात्र के माध्यम से लेखिका पाठकों के सामने लाती हैं। ‘चंदवा’ के इस डायलॉग पर ज़रा नज़र डालिए– “यह दूसरी तरह की बंदूक़ है रे। गांव के लोगों को असली बंदूक़ से मारा जाएगा। शेष को नैरेटिव से मारा जाएगा। यह भी हथियार ही है… गांव जाएंगे तो नक्सल कहकर मारे जाएंगे। शहर में रहेंगे तो अर्बन नक्सल कहकर मारे जाएंगे। हम कहां जाएं?”[3]
सत्ता के लिए आदिवासी सवाल करता है या संघर्ष करता है, तो उसे अपने रास्ते से साफ़ करने के लिए आसान शब्दावली बनती है– ‘नक्सली’ या ‘अर्बन नक्सली’। वह हर जगह पिसने को मजबूर है। चाहे वह अपने जल, जंगल, ज़मीन को बचाने के लिए जूझ रहा हो या शहरों में अपने होने का दावा कर रहा हो, हर जगह उसके अस्तित्व और निशान को इन्हीं परिघटनओं से चिह्नित करवाया जाता रहा है।
लेखिका ने ‘अर्बन नक्सल’ कहानी के माध्यम से आदिवासी समाज के अंदर ‘हिंदूकरण’ की प्रक्रिया पर भी बात रखी है। इस कहानी को पढ़ने से यह बात सामने आती है कि आदिवासी समाज पर न सिर्फ़ आर्थिक हमला किया जा रहा है, बल्कि उनकी संस्कृति और पूजा-पद्धति के प्रति ‘हीन भावना’ डाली जा रही है। मिसाल के तौर पर आदिवासी प्रकृति की पूजा करते हैं और उनका हिंदू धर्म के देवी-देवताओं और वैदिक ग्रंथों से कोई लेना-देना नहीं है। मगर समाज में जिस तरह से मीडिया और सांस्कृतिक मंचों से बहुसंख्यक धर्म के रीति-रिवाज़ को देश के रीति-रिवाज़ के तौर पर प्रस्तुत किया जा रहा है, उसका असर आदिवासी समाज के ज़ेहन पर भी पड़ रहा है। मिसाल के तौर पर आदिवासियों के अंदर कुछ ऐसे लोग उभरकर आए हैं, जो यह समझते हैं कि आदिवासी पूजा-पद्धति और अपने पुरखों को याद रखना काफ़ी नहीं है। इसलिए वे ब्राह्मणवादी और हिंदूवादी पूजा-पद्धतियों की तरफ़ भी बढ़ रहे हैं। मिसाल के तौर पर आदिवासी समाज के कुछ लोग अपने शासकों की देखा-देखी में उनके ईश्वरों के प्रति आकर्षित हो रहे हैं। जो आदिवासी कभी तुलसी में पानी डालना नहीं जानता था, वह भी ऐसा सब कुछ कर रहा है। इतना ही नहीं, वह ब्राह्मणों के देवी-देवताओं को अपने ईश्वर के तौर पर अपने घरों में बिठा रहा है। कई जगहों पर देखा गया है कि आदिवासी घरों में हिंदू देवी-देवताओं की प्रतिमा, मूर्ति और मंदिर बन रहे हैं और हिंदुओं की देखा-देखी और बाबाओं के प्रवचन से प्रभावित होकर महिलाएं मंदिरों में जल चढ़ाने और गायत्री मंत्रों का उच्चारण करने को अपना सामाजिक स्वीकरण का ज़रिया मान रही हैं।
कई कहानियों में आदिवासी के धार्मिक खींचतान और उस पर आधारित राजनीतिक और सांस्कृतिक हमलों को भी कहानीकार ने बहुत बेबाक़ी से उठाया है। चाहे वह चर्च से जुड़ी हुई घटना हो, चाहे वह सरना समाज द्वारा हिंदूकरण की प्रक्रिया में फंसने वाली बात हो, धर्म और पितृसत्ता के गठजोड़ को वह कई कहानियों में लेकर आती हैं। धर्म कितना आवश्यक है, कितना नहीं, इस चिंतन पर भी विचार किया है। हालांकि ‘अर्बन नक्सल’ कहानी का पात्र ‘मंगा’ हिंदूकरण की प्रक्रिया को चिह्नित करते हुए वह आदिवासियत पर ज़ोर देता है और कहता है– “आदिवासी हिंदू हो, ईसाई हो, बौद्ध हो, वह कोई भी धर्म क्यों न मानता हो पर वह रहेगा तो आदिवासी ही।”[4] यह पात्र अपने संविधान के प्रति आस्था रखता है, वह बाबा साहेब आंबेडकर को अपने क़रीब पता है। उनके दिए गए नारों – संगठित बनो, शिक्षित बनो, और संघर्ष करो – पर यक़ीन करता है। मगर उसका यह संवाद इस सामाजिक प्रक्रिया की तरफ़ इशारा करता है कि आदिवासी समाज के ऊपर बड़े संगठित धर्मों का दबाव बढ़ता ही जा रहा है। सिर्फ़ हिंदूकरण की प्रक्रिया ही नहीं, बल्कि अन्य धर्मों का दबाव भी यह समाज उठा रहा है।
जसिंता केरकेट्टा की इन कहानियों का कथ्य झारखंड के आदिवासी गांव और शहर की परिस्थितियों का सटीक वर्णन करते हैं। भाव-संवेदना के स्तर पर वे कोमलतम और रूढ़, दोनों प्रतीत होती हैं। कहानीकार ने अपने इस संग्रह में एक अनूठा प्रयोग किया है। ‘भाषा’ नामक कहानी के माध्यम से। इस कहानी में पहाड़ और जंगल का मानवीकरण कर उनके जायज़ सरोकार को वह जिस तरह स्थापित कर पाई हैं, वह अन्यतम, अनूठा और खूबसूरत होने के साथ-साथ हृदयविदारक भी है। पहाड़ और जंगल का शहर तक आना, मंत्रीगणों से अपने हालात को डिस्कस करने के लिए रुकना, पर भाषा न जानने के कारण पूरी प्रक्रिया का निरर्थक हो जाना, उन्हें आतंकवादी, देशद्रोही, नक्सली आदि कहना और अंततः बात-संवाद न होने की स्थिति में इंसान द्वारा पुनः जंगल-पहाड़ को नुक़सान पहुंचाना, जिससे समुद्र और नदियां उस शहर को निस्तोनाबूद करती हैं – ये तमाम प्रसंग आंखों के सामने चलने वाले चलचित्र प्रतीत होते हैं। यह एक विहंगम दृश्य उपस्थित करता है। मानवीकरण का प्रयोग यहां बहुत सुंदर उकेरा गया है।
पृथ्वी की चिंता, पर्यावरण के प्रति सजगता, आदिवासी मस्तिष्कों में लंबे समय से सहेजने की प्रक्रिया का हिस्सा है। वास्तव में आदिवासी समाज ने हर चल-अचल, जीव और वस्तु-जगत को अपने दर्शन में सह-अस्तित्वकामी पाया है। यह कहानी उसी विचार की प्रतिकृति है। पृथ्वी में उपस्थित हर एक चीज़ का हमारे जीवन में प्रभाव है। इसे ही स्थापित करती यह कहानी ग्लोबल और ग्लोब से बाहर की दुनिया को दुलारती महसूस होती है। वह विकास के पैमाने प्रकृति के साथ ही देखती है। वह यूरेनियम और बॉक्साइट की भूखी नहीं है। कुल मिलाकर कहें तो जब इंसान ने किसी तरह की ऊँच-नीच की भावना से प्रकृति को देखा है, तो विनाश ही उसके हिस्से आया है। और यह बात दुनिया के हर आदिवासी समूह को पता है। तभी वह पैसों की दुनिया के बनिस्पत नदी, पहाड़, ज़मीन, पेड़-पौधों और हर जीव-जगत को अपने अस्तित्व के साथ जोड़कर महत्वपूर्ण बताता आया है। उसे किसी ‘पृथ्वी दिवस’, ‘जल दिवस’, ‘पर्यावरण दिवस’ की आवश्यकता नहीं है।
भाषाई दृष्टि से ‘सादरी भाषा’ का प्रयोग कहानीकार ने किया है। यह झारखंड में विभिन्न आदिवासी समुदाय और ग़ैर-आदिवासी समाज से संपर्क भाषा के रूप में विस्तार पाती है। यह हिंदी भाषा परिवार की ही इकाई है, अतः इसका प्रयोग यहां किया गया है। आदिवासी भाषाओं को स्कूल, यूनिवर्सिटी, बाज़ार और मीडिया ने ख़त्म करने की कोशिश की है। अतः यही भाषा आज मुंडारी भाषियों के बीच भी देखने को मिलती है और कुरुख़ भाषी या खड़िया आदिवासियों के बीच भी मिलती है। ‘संथाली’ और ‘हो’ आदिवासी आज भी अपनी भाषाओं को मज़बूती से पकड़े हुए हैं। लेकिन मुंडा, उरांव आदि गांवों में इसी सादरी का प्रयोग बहुतायत में देखने को मिलेगा, सो कहानियों में इसका प्रयोग कथाकार ने भी किया है।
भाषा की सहजता और उसमें कविताई का भान बिलकुल महसूस कर सकेंगे, क्योंकि लेखिका अब तक कवि रूप में स्थापित रही हैं। बोधगम्यता कहानियों की सहज और सरल है। कहीं जटिलता नहीं आती हैं। कहानी में कोई लुका-छिपी नहीं दिखाई पड़ती, न ही यह ‘अब क्या – अब क्या’ वाली उत्सुकता और न ही किसी प्रकार की उत्तेजना से लिपटी दिखाई देती है। कहीं कोई बनावटीपन दिखता नहीं। कहानियां सहज रूप में आगे बढ़ती हैं। कहानियों के अंत में कई सवाल उपजते हैं, जो भविष्यकामी चेतना को दर्शाते हैं। भाषा में प्रवाह है। कथ्य बहुत नया न होकर भी नया-सा है। वर्तमान के आदिवासी समाज की तमाम चुनौतियां इन कहानियों में उपस्थित हैं।
किताब के शीर्षक के साथ न्याय पूर्णतः है कि ‘स्त्री का घर आख़िर कहां!’ यह कई कहानियों में मूल प्रश्न बनकर उभरा है। अतः कहा जा सकता है कि यह एक संग्रहणीय कहानी-संग्रह साबित होगा। आदिवासी पृष्ठभूमि से हूं, तो इससे जुड़ा हुआ महसूस कर पाई। हर कहानी में ख़ुद को, अपने आसपास के आदिवासी जन को इन कहानियों में देख पाई। हिंदी कथा साहित्य जगत में यह पन्ने ज़रूरी बहसों को जन्म देंगे और समाज इस पर संवाद स्थापित करने की पूरी कोशिश करेगा, ऐसी उम्मीद तो की ही जा सकती है।
समीक्षित पुस्तक : औरत का घर (कहानी संग्रह)
कहानीकार : जसिंता केरकेट्टा
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन, दिल्ली
मूल्य : 299 रुपए
संदर्भ :
[1] जसिंता केरकेट्टा, औरत का घर, पृष्ठ 164
[2] वही, पृष्ठ 164-165
[3] वही, पृष्ठ 168
[4] वही, पृष्ठ 165
(संपादन : नवल/अनिल)
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