h n

संघर्ष के साथी का वियोग नहीं सह पाईं रूपी सोरेन

रूपी सोरेन अपनी सास सोनामणी और शिबू के बड़े भाई राजाराम की पत्नी के साथ मिलकर अपना घर संभालती और पुलिस की दबिश होती या महाजनों की धमकी, तो उसका मुकाबला करती और इसके अलावा सूनी आंखों से पति के लौटने की प्रतीक्षा करती इस भरोसे के साथ कि वह लौट कर जरूर आएंगे। बता रहे हैं विनोद कुमार

दिशोम गुरु शिबू सोरेन की जीवनसंगिनी रूपी सोरेन नहीं रहीं। कल 7 अक्टूबर, 2026 को उनका देहांत हो गया। बहुत कम उम्र में उनका विवाह शिबू सोरेन से हुआ था और उनकी युवावस्था का बड़ा हिस्सा गुरुजी की प्रतीक्षा में ही गुजरा, क्योंकि गुरुजी महाजनी शोषण के खिलाफ चली लंबी लड़ाई के दौरान गांव-गांव, जंगल-जंगल भागते फिरते थे। उनका विवाह गुरुजी से 1962 में हुआ था और 8 वर्ष बाद उनकी पहली संतान दुर्गा सोरेन का जन्म हुआ था। वह महाजनी शोषण के खिलाफ चले संघर्ष के चरम दिन थे। उन्हीं दिनों उन्होंने धनबाद जिले के आदिवासी बहुल प्रखंड टुंडी क्षेत्र में आना जाना शुरू किया था और वहां विख्यात पोखड़िया आरम बनाया था, जो आंदोलन और कई तरह के रचनात्मक कार्यक्रमों का केंद्र बना।

टुंडी के पहले तो गुरुजी का जीवन और अस्त-व्यस्त था। वे किशोर युवक से एक युवा के रूप में उनके निर्माण का दिन था। धनकटनी आंदोलन उनका अभिनव प्रयोग। वह यह कि आदिवासियों से छल प्रपंच या कर्ज वसूली के नाम पर जमीन छीन कर उस पर महाजन खेती करे तो करने दो, लेकिन उसकी खड़ी फसल काट लेनी है और उसे सार्वजनिक गोले में रखना है जिस पर पहला हक जमीन के मूल मालिक का और एक हिस्सा भविष्य के लिए तथा शेष आंदोलनकारी साथियों के खाने पीने पर खर्च हो। पिता सोबरन मांझी की हत्या के वक्त गुरुजी 15-16 वर्ष के थे। शुरुआती कुछ दिनों तक वे नेमरा के जंगलों से लकड़ी काट कर झालदा तुलीन तक ले जाते और उसे बेचते थे। लेकिन फिर वे पूरी तरह आंदोलन को समर्पित हो गए।

लेकिन उस आंदोलन के दौरान उत्तरी छोटानागपुर के दर्जनों थानों में उन पर और उनके साथियों पर हत्या, लूट और अगजनी का मुकदमा दर्ज हो गया और उनका समय पुलिस से बचने के क्रम में यहां-वहां भागते बीतता। एक पुरानी नार्टन मोटर साईकिल पर। आप कहेंगे कि इतनी भूमिका किस बात के लिए, तो यह इसलिए कि आप समझ पाएं कि एक छोटी-सी लड़की से युवा स्त्री में बदलती रूपी सोरेन का जीवन कैसा रहा होगा। वह अपनी सास सोनामणी और शिबू के बड़े भाई राजाराम की पत्नी के साथ मिलकर अपना घर संभालती और पुलिस की दबिश होती या महाजनों की धमकी, तो उसका मुकाबला करती और इसके अलावा सूनी आंखों से पति के लौटने की प्रतीक्षा करती इस भरोसे के साथ कि वह लौट कर जरूर आएंगे।

बस एक बार उनका विश्वास तब डोला था जब शिबू सोरेन के आंदोलन के साथी वसंत पाठक की छूरे और अन्य घातक हथियारों से गोद-गोद कर पुलिस ने मार डाला था। उस रोती रूपी को सोनामणि ने कलेजे से लगा कर समझाया था– तुम्हारे पति को कुछ नहीं होगा।

स्मृति शेष : शिबू सोरेन के साथ रूपी सोरेन

इसके बाद से वे हमेशा भरोसे से शिबू सोरेन का इंतजार करती थीं। लेकिन पिछले वर्ष 4 अगस्त, 2025 को गुरुजी के निधन के बाद यह भरोसा खत्म हो गया और शायद वियोग सह नहीं पाईं। वैसे, डाक्टरी जुबान में उनकी मृत्यु हृदयगति के रुक जाने की वजह से हुई।

मैं 1989 से 2003 तक पत्रकार के रूप में बोकारो में रहा और उस दौरान गुरुजी के सेक्टर वन स्थिति आवास पर अक्सर जाता। उनसे मुलाकात होती। शांत सौम्य एक आदिवासी महिला। घर-परिवार को संभालतीं। पहली बार 1980 में गुरुजी सांसद बने थे, और शायद उसी के बाद उन्होंने दुमका में अपना घर बनाया। लेकिन इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए चुनाव में वे दुमका से चुनाव हार गए। उसके बाद उन्होंने बोकारो में ही अपना ठिकाना बनाया और वहीं से पूरे झारखंड, खासकर रांची, बोकारो, धनबाद से लेकर दुमका तक की यात्रा करते रहते। रुपी सोरेन एक बार लोकसभा का चुनाव भी लड़ीं। वजह यह रही कि 1998 में गुरुजी राज्यसभा के लिए निर्वाचित हो गए थे। इसलिए दुमका सीट से रूपी सोरेन झामुमो की उम्मीदवार बनीं और उनके सामने थे भाजपा के टिकट पर कद्दावर नेता बाबूलाल। रुपी सोरेन महज लगभग 4000 वोटों के अंतर से चुनाव हार गईं। उसके बाद उन्होंने चुनावी राजनीति में आने का फिर प्रयास नहीं किया। वे गृहणी की अपनी भूमिका से संतुष्ट थीं।

उनके बड़े बेटे दुर्गा सोरेन का जन्म 1970 में हुआ था। उस वक्त तक गुरुजी संथाल परगना नहीं गए थे। न उनकी मुलाकात सदानों के कद्दावर नेता और अधिवक्ता बिनोद बिहारी महतो से हुई थी और न ए.के. राय से वे मिले थे। इन तीनों ने मिल कर ही झारखंड मुक्ति मोर्चा का गठन किया था। 

रूपी सोरेन के निधन के बाद रांची के मोरहाबादी मैदान के पास स्थित आवास के बाहर लगा एक पोस्टर

उस समय तक गुरुजी एक बड़े व्यक्तित्व बन चुके थे। धनकटनी जैसे आंदोलन के एक सुविख्यात नायक और ‘दिनमान’, ‘धर्मयुग’ जैसी पत्रिकाओं में उस आंदोलन की खबरें छपने लगी थीं। लेकिन उसके पहले वे बस एक बागी थे जिनके ऊपर दर्जनों थानों में मुकदमा दर्ज था और जिन्हें देखते ही गोली मार देने का आदेश। वह शिबू जब एक बार भागते हुए नेमरा पहुंचे तो उन्हें जानकारी मिली की उन्हे पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई है। उस प्रसंग को मैंने अपने उपन्यास ‘समर शेष में’ में कुछ इस तरह उकेरा है–

“नेमरा में अपेक्षाकृत शांति है। चारों तरफ से पहाड़ों से घिरे बीच के विस्तृत भूखंड में दूर-दूर तक धान की हरी-भरी फसल लहरा रही है। नदी, नाले, पोखर में पहाड़ से उतरा पानी छलछला रहा है। हरियाली पशुओं और मनुष्यों के बदन पर भी छा गई है मानो। नंग-धड़ंग बच्चे गढ़े-तलैए में खिलवाड़ कर रहे हैं। शिबू के मोटर साइकिल की आवाज दूर से ही सुनकर एक बच्चा भागा-भागा सोनामणि को यह खबर दे आता है।

सोनामणि आजकल सुस्त रहती है। राजाराम नौकरी छोड़ कर वापस गांव आ गए हैं। शंकर और रामू के साथ मिलकर खेती-बाड़ी संभालते हैं। लालू (शिबू सोरेन के सबसे छोटे भाई लालू सोरेन) कभी जैनामोड़ तो कभी बोकारो में। घर में पहले से शांति है। दोनों बहुएं घर का काम-काज संभाल लेती हैं। सोनामणि के लिए कुछ खास काम-काज नहीं। वह अधिकतर समय शिबू की चिंता में बिता देती है। उसकी घरवाली की उदासी उसे रह-रह कर व्यथित करती रहती है। लेकिन उपाय क्या है? अभी तो शिबू का कोई ठौर-ठिकाना नहीं। कहां जाएगी उसके पास। अब अचानक शिबू के आने की खबर से खाट से उठ बैठती है। बेटे के स्वागत के लिए घर के चौखट पर आकर खड़ी हो जाती है। दोनों बहुएं सास के पीछे खड़ी हैं।

शिबू गली में मोटर साइकिल खड़ा कर रहे हैं। मलिन कपड़े, बढ़ी हुई दाढ़ी और बाल। पहले से कृशकाय, इसलिए लंबे दिख रहे हैं। शिबू दरवाजे पर आकर रुक जाते हैं। सोनामणि हटे तो भीतर जाएं। सोनामणि चौखट से हटती है। शिबू सर झुका कर भीतर घुसते है। आंगन के दूसरी तरफ के बरामदे में रखी खटोली पर बैठ जाते हैं।

सोनामणि करीब आकर कहती है– ‘कहां-कहां मारा-मारा फिरता है। तुझे हम लोगों की कोई फिकर नहीं? अब की जहां भी जाएगा, अपनी बहू को साथ ले जा।’

शिबू मां की बात अनसुनी कर देते हैं।

‘भैया कहां हैं? गांव में घुसते ही सुना वे नौकरी छोड़ कर वापस चले आए हैं। क्यों?’

उसे वहां मन नहीं लगता था। गांव जब भी आता यहीं महीनों रह जाता। अंत में नौकरी छोड़कर वापस आ गया।’

‘लेकिन दिख नहीं रहे?’

‘हेडबरगा गया है। आज हाट का दिन है न?’

शिबू खाट पर लेट गए। सोनामणि गांव-घर की खबर सुनाती रही। फिर पूछ लिया– ‘इस बार तू अकेला आया शिबू, वसंत कहां है?’

शिबू को धक्का लगा। वसंत की बात वे भूल चुके थे। कई वर्षों से अभिन्न रहे वसंत को वे टुंडी के जद्दोजहद में भूल चुके थे, लेकिन नेमरा की स्मृति में, सोनामणि की स्मृति में वह जिंदा था। कुछ पल खामोश रहे, फिर ठंडी आवाज में बोले– ‘वसंत नहीं रहा मां। कुछ गुंडों ने उसे मार डाला। रात में वे उसके घर में चोर की तरह घुसे और नींद में ही उसे चाकू-छुरे से बींध डाला।’

सोनामणि कांप उठी। शिबू की घरवाली सिसक पड़ी। सोनामणि ने अपना हाथ शिबू के सर पर रखा और कोठरी के बाहर खड़ी बहू की तरफ देखते हुए बोली– ‘तू क्यों रोने लगी। तेरे मरद को कुछ नहीं होगा।’

शिबू को एक तंद्रा घेरने लगी थी। वे कुछ देर के लिए सब कुछ भूल जाना चाहते थे। वसंत की मौत। उसको देखते ही गोली मार देने का आदेश। टुंडी में भड़कने वाली दावाग्नि … सब कुछ। और वे इसमें कामयाब भी हो गए। अचानक उन्हें अपनी छाती पर किसी कोमल स्पर्श, थोड़ा भार महसूस हुआ। आंख खुल गई। उनकी छाती पर एक नवजात शिशु पड़ा था।

सोनामणि समीप ही ममत्व से हंस रही थी। अकचका कर उठे शिबू। बच्चे को संभाल कर गोद में ले लिया।

‘किसका बच्चा है।’

हंस पड़ी सोनामणि… ‘तुम्हारा बच्चा है और किसका।’

शिबू का मन बच्चे और उसकी मां के लिए आह्लाद से भर उठा। कोठरी की तरफ देखा। बच्चे की मां उसी तरह दरवाजे पर खड़ी उनकी तरफ लाज से देख रही थी। हां… अब वह रो नहीं रही थी। बल्कि मां बनने के गौरव से उसका चेहरा दमक रहा था।

शिबू का मन पहली बार उसके लिए अफसोस से भर उठा। मां बनने की पीड़ा के घनीभूत क्षणों में, जब शायद एक पत्नी को अपने पति की सबसे ज्यादा जरूरत रहती है, वे उससे दूर रहे थे। उन्हें तो बेटे के जन्म का पता तक नहीं था। उन्होंने क्षमायाचना वाली दृष्टि से उसकी तरफ देखा। उसने अपने पति को क्षमा कर दिया था।

‘बच्चे का नाम क्या रखा?’

‘नाम तो तुम्हें रखना है।’

शिबू ने निर्निमेष शिशु की तरफ देखते हुए कहा– इसका नाम दुरुगा होगा… दुरुगा।”

तो वही रूपी अब नहीं रही। हां, अपने परिजनों की स्मृतियों और मेरे उपन्यास में वे जीवित रहेंगीं। 

(संपादन : नवल/अनिल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, संस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

लेखक के बारे में

विनोद कुमार

झारखंड के वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता विनोद कुमार का जुड़ाव ‘प्रभात खबर’ से रहा। बाद में वे रांची से प्रकाशित मासिक पत्रिका ‘देशज स्वर’ के संपादक रहे। पत्रकारिता के साथ उन्होंने कहानियों व उपन्यासों की रचना भी की है। ‘समर शेष है’ और ‘मिशन झारखंड’ उनके प्रकाशित उपन्यास हैं।

संबंधित आलेख

सबको दुखी कर गया राम बिलास भारती का अचानक चले जाना
बीते 26 सितंबर, 2026 को डॉ. राम बिलास भारती का हृदयगति रुकने के कारण दिल्ली में निधन हो गया। वे महज 52 वर्ष के...
पीली रोशनी में ओबीसी एकता की चमक और मजबूत इरादे पर जोर
दिल्ली के कंस्टीट्यूशन क्लब सभागार में आयोजित ओबीसी महासभा की बैठक में अधिकांश हिंदी-भाषी प्रदेशों से विभिन्न जातियों और पसमांदा के प्रतिनिधियों के अलावा...
एससी-एसटी अत्याचार अधिनियम के तीन दशक बाद कितने बदले हालात
यह कानून लागू होने के बाद जब गिरफ्तारियां होने लगीं तब तथाकथित उच्च जातियों, पिछड़े वर्ग की जातियों को इस कानून की ताकत का...
‘अप्पन समाचार’ की ग्रामीण महिला पत्रकारों के प्रयासों को मिली सराहना
संगोष्ठी में मुख्य वक्ता अनिल चमड़िया ने कहा कि हिंदी मीडिया को मुख्यधारा की मीडिया कहना कहीं से भी संगत नहीं है। इसे मीडिया...
हैदराबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव : आदिवासी उम्मीदवार को दी जा रही है धमकी
विश्वविद्यालय किसी छात्र के लिए सिर्फ डिग्री लेने की जगह नहीं होते। खासकर उन छात्रों के लिए जो हाशिए के समाज से आते हैं।...