पति की मृत्यु और पुनर्विवाह न होने की स्थिति में मीरा का यह पक्ष अधिक मुखरता से अभिव्यक्त हुआ है। उन्हें कुछ भी मानने से पहले स्त्री माना जाना चाहिए, जिसकी अपनी इच्छाएं हैं, जिनकी...
मौजूदा सामाजिक और राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में यह किताब और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती है। पसमांदा समाज के प्रतिनिधित्व की स्थिति आज भी लगभग वैसी ही बनी हुई है। आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी का...
मोहन मुक्त सांस्कृतिक वर्चस्व को सत्ता का सबसे चालाक रूप मानते हैं। वे कहते हैं कि मिथक, परंपरा, धर्म और भाषा के ज़रिए शोषण को पवित्र बना दिया है। उनकी कविताएं ‘संस्कृति’ के उस चेहरे...
कंवल भारती की कविताओं पर सरसरी नज़र दौड़ाने से यही पता चलता है कि उनके अंदर समता को लेकर बेचैनी है। वे महीन से महीन विभाजन और भेद भरे व्यवहारों-नीतियों की शिनाख़्त बहुत आसानी से...