भारतीय प्रेस की अप्रकाशित सत्यकथा

आखिरकार यही तो एक ऐसा औजार था जिसके जरिए वे बंगाल पर शासन करने वाले “सरकारी डाकुओं के गिरोह” का प्रतिरोध कर सकते थे। लेकिन, हमने प्रेस का समर्थन नहीं किया, क्योंकि भारतीय राजनीतिक परंपरा ने कभी भी शासकों पर स्वतंत्र संस्थागत नैतिक अवरोधों का विकास नहीं किया।

भारतीय प्रेस के इतिहास के सबसे विचित्र तथ्यों में से एक यह है कि सिरामपोर मिशनरियों को उनके योगदान के लिए उचित श्रद्धांजलि नहीं दी गई, जिन्होंने भारतीय पत्रकारिता की न केवल नींव रखी बल्कि उनके पर्चों ने उसके विकास के मापदंड भी स्थापित किए।

सुनिल के. चटर्जी
विलियम कैरी एंड सिरामपोर, 1984

औपनिवेशिक निरंकुशता और स्वतंत्र प्रेस

भारत में पहला समाचार पत्र, द बेंगॉल गैजेट, 1780 में जेम्स हिक्की ने स्थापित किया था। कई लोगों का मानना है कि “प्रेस की स्वतंत्रता” ब्रितानी जीवन का इतना सामान्य हिस्सा था कि अँग्रेजी भाषा के साथ उसे तो भारत में आना ही था, अँग्रेज लोगों की भाषा की तरह स्वभाविक रूप में। बेंगॉल गैजेट यूरोपीय समुदाय के लिए था, लेकिन उसका पाठकवर्ग भारत में इसलिए नहीं आया था कि वह यहाँ स्वतंत्रता की संस्थाओं को स्थापित करने के लिए संघर्ष करे। वे यहाँ केवल पैसा बनाने आए थे — जल्द से जल्द और ज्यादा से ज्यादा — तरीके चाहे सही हों या गलत। आजाद, खोजी प्रेस जो सार्वजनिक विवेक की सेवा में लगी हो, उससे औसत यूरोपीय के निजी मिशन को खतरा हो सकता था। और खतरा हो सकता था वॉरेन हेस्टिंग्स के शैतानी अभियानों को भी।

सच्चाई तो यह है कि 1780 के दशक में जब भारत में स्वतंत्र प्रेस की स्थापना की सबसे पहली कोशिश की जा रही थी हेस्टिंग्स ने ही उसका दम घोंट दिया था। होना तो यह चाहिए था कि भारतीय लोग स्वतंत्र प्रेस की रक्षा करने के लिए खड़े होते। आखिरकार यही तो एक ऐसा औजार था जिसके जरिए वे बंगाल पर शासन करने वाले “सरकारी डाकुओं के गिरोह” का प्रतिरोध कर सकते थे। लेकिन, हमने प्रेस का समर्थन नहीं किया, क्योंकि भारतीय राजनीतिक परंपरा ने कभी भी शासकों पर स्वतंत्र संस्थागत नैतिक अवरोधों का विकास नहीं किया। “दैवीय स्वीकृति” प्राप्त हिंदू सामाजिक व्यवस्था में, जहाँ वंशागत दार्शनिक और राजा (ब्राह्मण और क्षत्रिय) सामाजिक वर्गीकरण में सबसे ऊपर होते हैं, सोशल इंजीनियरिंग की दूसरी प्रणालियों से अलग नहीं था — अफलातून के रिपब्लिक से लेकर मार्क्स के कम्युनिज्म तक। कोई भी व्यवस्था या प्रणाली जो यह दावा करती है कि वह “आदर्श”, “यूटोपियन” या “प्रवीण” है वह साथ के साथ ऐसी संस्थाएँ विकसित नहीं कर सकती जिनका इरादा लगातार उनकी अप्रवीणता को उजागर करना हो। आधुनिक प्रेस और उसका पूर्वज, यहूदी नबी, इस पूर्वधारणा की उपज थे कि अगर पाप की निशानदेही न की जाए तो वह समस्त मानवीय प्रयासों को भ्रष्ट कर देता है। इसलिए हमारी संस्कृति के वे पहलू जो हमारे सार्वजनिक जीवन को सबसे अधिक प्रभावित करते हैं, मसलन सरकार, उन्हें सार्वजनिक तौर पर जवाबदेह होना चाहिए, प्रेस जैसी संस्थाओं के प्रति जो कि सरकार के नियंत्रण में न हों।

जो इलाके हमारे अपने महाराजाओं के अधिकार में थे वहाँ भी प्रेस जैसी कोई चीज नहीं थी। बेंगॉल गैजेट के बंद होने के 36 साल बाद तक ब्रिटिश इंडिया में जो भी पत्र-पत्रिकाएँ छपीं वह मुख्यत: व्यापारिक पर्चे ही थे जिनका उद्देश्य बस यूरोपीय जहाजों और खेप के आने की खबर भर देना था। इनमें से कुछ पत्र “घर” की संक्षिप्त खबरें भी लाते थे।

मिशन और प्रेस के लिए जुनून

साल 1818 में सिरामपोर मिशन में हम आधुनिक भारतीय प्रेस की शुरुआत होते देख सकते हैं, जब अँग्रेजी में फ्रेंड ऑफ इंडिया, बंगाली में समाचार दर्पण और थोड़े समय चले हिंदी के दिग्दर्शन की शरुआत हुई। यह तीन पत्र जॉशुआ मार्शमैन के सामान्य संपादन में शुरू हुए। मार्शमैन विलियम कैरी के सहकर्मी थे और पूरी तरह से इस मसीही पूर्वधारणा से प्रेरित थे कि स्वतंत्र करने वाली शक्ति बंदूक की नली से नहीं बल्कि सत्य से आती है। इस तरह, भारत में स्वतंत्र प्रेस का जन्म गैर-आधिकारिक एवं गैर-व्यापारिक पहल के द्वारा हुआ।

इस काम की शुरुआत के लिए समय बिलकुल उचित नहीं था। साल 1813 में विलबरफोर्स को संसद का इस बात के लिए समर्थन मिल गया था कि ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारपत्र (चार्टर) का मानवीकरण किया जाए। इससे चार्ल्स ग्रांट को भी प्रोत्साहन मिला कि कंपनी के मुख्यालय में ईंजीलवादी प्रभाव को सुदृढ़ किया जाए। मिशनरी-मिजाज रखने वाली ब्रितानी कलीसियाओं (चर्च) में कैरी का नाम किंवदंती बन रहा था और इन कलीसियाओं ने विलबरफोर्स के प्रस्ताव के पक्ष में वोट डालने के लिए संसद पर दबाव डाला — कि कंपनी के व्यापारिक हितों के समानांतर इस मसीही आह्वान पर भी जोर दिया जाना चाहिए कि अपने पड़ोसी की सेवा करो। इसलिए उस दौर में हेस्टिंग्स समेत किसी के लिए भी बहुत मुश्किल था कि वह ऐसे किसी समाचार पत्र का विरोध करे जिसका न केवल नाम फ्रेंड ऑफ इंडिया था बल्कि भारत और इंग्लैंड दोनों जगह उसे स्वभाविक और व्यापक तौर पर यही माना भी जाता था — भारत का मित्र। भारत के दूसरे हिस्सों में भी मिशनरियों ने सिरामपोर की पहल का अनुसरण करना शुरू किया। मिसाल के तौर पर कलकत्ता में, द बेंगॉल ऑक्सिलिएरी मिशनरी सोसाइटी ने दिसंबर 1819 में एक द्विभाषी (बंगाली और हिंदी) मासिक द गॉस्पल मैगजीन शुरू किया। बाद में अलेक्जैंडर डफ ने कैलकटा क्रिश्चियन ऑब्जरवर शुरू किया।

भारतीय बुद्धिजीवी इस परिघटना को कौतुहल से देख रहे थे किस प्रकार गैर-सरकारी लोगों का एक समूह प्रेस के माध्यम से एक शक्तिशाली सरकार की आलोचना कर रहा है, और सरकार इससे आहत महसूस करने की बजाय आलोचना को वास्तव में सुन रही है। मिसाल के तौर पर, जब विलियम बैंटिक के सुधारों ने सेना भत्ते को कम किया जो उनकी खुली निंदा की गई। उस समय का कानून बैंटिक को यह अधिकार प्रदान करता था कि वह आलोचनात्मक प्रेस का दमन करें, लेकिन बैंटिक — जिनके दादा हांस बैंटिक ने इंग्लैड में प्रेस की स्वतंत्रता को मजबूत करने में विलियम तृतीय की मदद की थी — ने 6 सितंबर 1830 को अपने एक मिनट में लिखा है (जिसने बाद में लॉर्ड मेटकाल्फ पर भी असर डाला): “मेरी राय अब भी वही है जो पहले थी कि देश में सुशासन को बढ़ावा देने के लिए प्रेस सबसे उपयोगी इंजन है …”

जब भारतीयों को यह एहसास हुआ कि हालाँकि उनके पास सैन्य शक्ति नहीं है, लेकिन फिर भी वह नैतिक रूप से वापिस लड़ सकते हैं और ऐसी सरकार की माँग कर सकते हैं जो आज तक की सभी सरकारों से बेहतर हो तो यह एक अद्भुत खोज साबित हुई। लेकिन सुधार की जरूरत केवल सरकार नाम की संस्था को ही नहीं थी। फ्रेंड ऑफ इंडिया के पहले ही अंक में भारत में विधवाओं का मुद्दा उठाया गया। कैरी द्वारा गवर्नर जनरल लॉर्ड वैल्सली को सफलतापूर्वक यह यकीन दिलाए हुए कि भारतीय समाज से विधवाओं को जलाने (सती) की कुप्रथा को दूर करने की जरूरत है, एक दशक से अधिक हो चुका था।

उस समय मिशन गतिविधियों पर यह बोझ नहीं था जो आज की मान्यताएँ लाद रही हैं कि कोई संस्कृति कितनी भ्रष्ट क्यों न हो, उसकी आलोचना नहीं करनी चाहिए। इसके विपरीत, उपयोगवादी मानवतावादी जो वैसे तो भारतीयों की “प्रसन्नता” बढ़ाने का प्रयास कर रहे थे, उन्होंने भारत में स्वतंत्र प्रेस का विरोध किया क्योंकि सोशल इंजीनियरिंग की उनकी “वैज्ञानिक” प्रणाली (सभी प्रणालियों की तरह) बदलाव लाने के लिए विचारों की शक्ति की बजाय राजनैतिक सत्ता पर निर्भर करती थी। उनका तर्क था कि स्वतंत्र प्रेस उस राजनैतिक प्राधिकार को कमजोर करेगी जो सामाजिक बदलाव लाने के लिए जरूरी है। उपयोगवादी स्वतंत्र प्रेस का समर्थन नहीं कर सकते थे क्योंकि उनमें मसीही आत्मविश्वास नहीं होता कि सत्य में वह शक्ति है जो उत्पीडि़तों को मुक्त करेगी। और समझ में आता है कि उपयोगवादियों और मिल, मुनरो, मैलकम और एलिफनस्टोन जैसे दूसरे उदार मानववादियों के पास प्रेस की स्वतंत्रता के लिए यही एक सामान्य दलील थी। सर थॉमस मुनरो, जो 1820—24 के दौरान मद्रास के उत्कृष्ट गर्वनर थे, ने सबसे पहले 12 अप्रैल 1822 को भारत में स्वतंत्र प्रेस के खिलाफ एक लंबा-चौड़ा मिनट लिखा।

मद्रास में मुनरो द्वारा स्वतंत्र प्रेस के विरोध का असर 1820 के दशक में तबतक जारी रहा जबतक विलियम कैरी जैसे मसीही स्वतंत्र प्रेस के समर्थन में खड़े नहीं हो गए। साल 1830 में लॉर्ड बैंटिक द्वारा सती प्रथा पर प्रतिबंध लगाने के बाद कैरी ने जल्द ही फ्रेंड ऑफ इंडिया में स्वतंत्र प्रेस के बचाव में एक लंबा-चौड़ा अज्ञात संपादकीय लिखा। इस संपादकीय का एक त्वरित परिणाम यह हुआ कि अंतत: मद्रास में प्रेस की शुरुआत हुई। इतिहासकार माइकल एडवर्ड्स लिखते हैं : “दक्षिण भारत में 1831 में मिशनरियों द्वारा एक तमिल मासिक पत्रिका की शुरुआत की गई। 1858 में दक्षिण भारत में मौजूद अधिकांश समाचार पत्र और पत्रिकाएँ, दरअसल मिशनरियों द्वारा शुरू किए गए थे।”

प्रेस — सुधारकों का औजार

भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग को यह समझने में देर न लगी कि प्रेस में भारतीय समाज और अँग्रेज सरकार को सुधारने का संभाव्य है। यह माना जाता था कि भारतीय प्रेस से औपनिवेशिक सरकार को सुधारने की आशा तबतक नहीं की जा सकती जबतक उसे भारतीय समाज में व्याप्त बुराइयों के खिलाफ धर्मयुद्ध करते हुए न देखा जाए। इसलिए दिसंबर 1821 में जब राजा राममोहन राय ने अपना समाचारपत्र संवाद कौमुदी शुरू किया तो उनके लिए सती एक महत्वपूर्ण मुद्दा था। सती के खिलाफ माहौल बनाने में जब उन्होंने अपने समाचार पत्र का इस्तेमाल शुरू किया तो उनके एक हिंदू सहकर्मी इतने नाराज हुए कि उन्होंने एक प्रतिद्वंद्वी समाचार पत्र शुरू किया। प्रतिद्वंद्वी समाचार पत्र समाचार चंद्रिका की सफलता से राय का अखबार 1822 में एक पूरे साल के लिए बंद हो गया। लेकिन एक न रुकने वाला चेन रिएक्शन शुरू हो चुका था।

राय के हिंदू कॉलेज के कुछ छात्रों ने द रिफॉर्मर शुरू किया। तब से आज तक भारत के हर प्रमुख सामाजिक और राजनैतिक सुधारक ने या तो खुद अखबार चलाया है या किसी अखबार के साथ जुड़ा रहा है। जी सुब्रह्मण्यम अय्यर ने द हिंदू शरू किया, बाल गंगाधर तिलन ने केसरी और मराठा का संपादन किया, सुरेंद्रनाथ बैनर्जी ने बेंगॉली निकाला, शिशिर कुमार घोष और मोतीलाल घोष ने अमृता बाजार पत्रिका चलाया, जी. के. गोखले के पास सुधारक, एन. एन. सेन के पास इंडियन मिरर और दादाभाई नौरोजी के पास वॉयस ऑफ इंडिया था। फेहरिस्त आगे भी जाती, खैर बात बिलकुल सीधी है। भारत में जितने भी सामाजिक-राजनैतिक विमर्श और सुधार हुए हैं वे सब प्रेस के माध्यम से हुए, जबतक कि 1917 के मॉन्टेग्यू प्रस्ताव ने राजनैतिक दलों के लिए अनिवार्य कर दिया कि वे जनसभाओं, आंदोलनों और प्रदर्शनों द्वारा प्रजातंत्र के लिए तैयार हों।

स्वतंत्र प्रेस का ब्रिटिश विरोध

प्रेस के अधिकार और स्वतंत्रता के साथ समझौता करने वाले अकसर पत्रकार और संपादक खुद ही होते थे। 1820 के दशक के दौरान वे अकसर स्वतंत्रता और स्वच्छंदता के बीच की सीमारेखा को बार-बार लांघते रहे, जिसके कारण शासकों ने ऐसे कानून बनाए जो अगर प्रेस सीमित नहीं करते थे तो कम से कम ऐसा करने की धमकी जरूर देते थे।

राजा राममोहन राय की कुछ हिंदुओं ने अँग्रेजों का पिट्ठु कह कर निंदा की लेकिन वह पहले भारतीय थे जिन्होंने अँग्रेजों द्वारा प्रेस की स्वतंत्रता को सीमित करने के लिए उनका विरोध किया। 1824 में उन्होंने सर्वोच्च न्यायलय में एक विज्ञप्ति देते हुए यह दलील दी कि हर अच्छा शासक चाहेगा कि हर संभव माध्यम से हर व्यक्ति को बताया जाए कि उसके हस्तक्षेप की कहाँ जरूरत है। इस जरूरी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए एकमात्र प्रभावशाली तरीका है प्रकाशन की असीमित स्वतंत्रता।

लेकिन शासकों ने अगले एक दशक तक प्रेस को कड़े नियंत्रण में रखने की नीति को बरकरार रखा। जैसा कि ऊपर कहा गया है, लॉर्ड विलियम बैंटिक ने भी अपने सुधारवादी शासनकाल (1828—35) में सीमित करने और धमकाने वाले कानूनों का उन्मूलन नहीं किया। उन्होंने यह तो सुनिश्चित किया कि उन कानूनों का इस्तेमाल न हो, लेकिन कानून की किताबों को संपादकों और मुद्रकों के सिरों पर लटकाए रखा। बैंटिक की आलोचना करने वाली एक विशालकाय हस्ती और कोई नहीं बल्कि एल्फिनस्टोन थे, जिन्होंने मुनरो के मिनट को आधार बनाया। मुनरो ने देख लिया था कि स्वतंत्र प्रेस चाहे तुरंत ही कोई नाटकीय प्रभाव न छोड़े लेकिन वह अंतत: भारत को विदेशी शासन के खिलाफ खड़े होने के लिए तैयार करेगी। विकल्प साफ थे : सीमित प्रेस या स्वतंत्र प्रेस। पहली का अर्थ था औपनिवेशिक राज का बरकरार रहना और दूसरी का अर्थ, स्वतंत्र भारत। इससे भी अधिक गहराई में जाएँ तो चुनाव करना था इंग्लैंड के राजनैतिक हित और मसीही नैतिकता के बीच।

यह संयोगवश नहीं कि वे अँग्रेज, और उस सोच के लोग, जिन्होंने 1813 में ईसाई मिशनों के आने का विरोध किया था,  वही अब 20 साल बाद स्वतंत्र प्रेस की मुखालफत कर रहे थे। प्रेस की स्वतंत्रता के विरोधी मानते थे कि यूरोपीय ईसाई भारतीयों को क्लेशकारी स्वतंत्र प्रेस के पक्ष में “उकसा” रहे थे।

यह बहस एक महत्वपूर्ण बिंदु पर तब पहुँची जब टी.बी. मैकॉले (बाद में “लॉर्ड” मैकॉले ) भारत पहुँचे। उन्होंने दोनो पक्षों की गवाहियों और मिनटों पर गौर किया और फिर 16 अप्रैल 1853 को अपने खुद के मिनट सर चार्ल्स मेटकाल्फ के सामने प्रस्तुत किए। इसमें उनका निष्कर्ष था : यह माना जाता है कि दरअसल आजादी एक आम नियम है, और होना भी चाहिए, तथा रोक दुर्लभ और अस्थाई अपवाद है। इसलिए रूप और वास्तविकता एक समान क्यों न हों?

सर चार्ल्स मेटकाल्फ, जो उस समय गवर्नर जनरल थे, ने अपने मिनट के द्वारा बहस को समाप्त किया जिसमें उन्होंने मैकॉले के तर्क से पूरी सहमति जताई। 1835 की एक्ट संख्या 11 के द्वारा सर चार्ल्स मेटकाल्फ की सरकार ने प्रेस पर से रोक हटा ली और यूरोपीय तथा भारतीय दोनों प्रकार की भारतीय प्रेस की आजादी को संस्थागत रूप दिया।

बगावत के परिणामस्वरूप 18 अगस्त 1857 को, विधान परिषद ने “जनता के यूरोपीय और देशी दोनों हिस्सों के लिए प्रेस की स्वतंत्रता को सीमित करने के लिए” 1857 की एक्ट संख्या 15 पारित की।

इस ब्रितानी अधिनियम का विरोध किसने किया और इसके लिए किसे सजा मिली? न किसी हिंदू अखबार ने, न किसी मानववादी अखबार ने बल्कि सिरामपोर के फ्रेंड ऑफ इंडिया ने। अखबार के खिलाफ आरोप और संपादक का प्रत्युत्तर आँखें खोलने वाला है। यहाँ यह कहना काफी है कि इस घटना से पता चलता है कि प्रेस की स्वतंत्रता मसीही अवधारणा है, और यह भारत में सुसमाचार (इंजील या गॉस्पल) के साथ आई।

पूर्वाग्रह के कारण लोग जाहिर-बातें भी देखने से चूक जाते हैं : भारत का सच में मित्र होने का अर्थ था कि ब्रितानी शासकों और भारतीय समाज दोनों के पापमय कामों का साथ-साथ विरोध किया जाए। अधिकांश लोगों को यह याद ही नहीं कि लगभग पूरी 19वीं सदी में, भारतीय किसान की एकमात्र आवाज ईसाई प्रेस ही था। कलकत्ता के रवींद्र भारती विश्वविद्यालय में रीडर प्रोफैसर तृप्ति चौधरी के अनुसार–

उन्नीसवीं सदी में जब ब्रितानी पूंजीवादियों और बागान मालिकों के हितों के “पर्याप्त प्रतिनिधित्व” के लिए इंडिगो प्लांटर्स असोसिएशन थी और ब्रिटिश इंडियन असोसिएशन “जमींदारों के कल्याण पर का खास खयाल रखती थी”, उस समय “जमीन जोतने वालों” का अपना कोई पत्र नहीं था जो उनका इतिहास और उनके नजरिए को सामने रख सके। अँग्रेज अधिकारी और व्यापारिक समूह उनकी बुरी हालत के प्रति पूरी तरह उदासीन थे और उभरता बंगाली बुद्धिजीवी वर्ग, कुछेक अपवादों को छोड़ कर, औपनिवेशिक माहौल में संघर्ष कर रहा था कि शिक्षा और प्रशासन के क्षेत्र में उसे कुछ मान्यता मिले। इस पृष्ठभूमि में केवल बंगाल के प्रोटैस्टेंट मिशनरी ही थे जो उन्नीसवीं सदी में इस दरिद्र” वर्ग की कराहटों को आवाज देने आगे आए। इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं अगर कहा जाए कि कुत्सित जमीन प्रणाली में रैयत की एकमात्र आवाज थे।

(फारवर्ड प्रेस के जनवरी 2012 अंक में प्रकाशित)


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