परिवार में निर्णय लेना – जरूरत है भरोसे और सच्चाई की

भरोसे के साथ, दूसरा स्तंभ है सत्य या सच्चाई। हालाँकि दोनों पयार्यवाची लगते हैं लेकिन ऐसा है नहीं। भरोसा संबंधात्मक होता है और सच्चाई तथ्यात्मक।

हाल ही में हमारी नजर कुछ देर के लिए एक टीवी कार्यक्रम पर पड़ी। हालाँकि सभी धारावाहिक एक जैसे ही लगते हैं, जो दृश्य हमने देखा वह बड़ा दिलचस्प था।

एक पति और पत्नी में कुछ झगड़ा हो रहा था और एक तीसरा व्यक्ति, एक औरत, उन्हें देख रही थी — और उसकी आँखों से आँसू बह रह थे। गुस्से से भरी उस दूसरी औरत को देखती हुई पत्नी कह रही थी, “तुम्हें कुछ समझाने की जरूरत नहीं है। मैं सब जानती हूँ! मै मूर्ख नहीं हूँ।” पति अपनी पत्नी से कह रहा था कि वह औरत उसके दफ्तर में उसके एक सहकर्मी की मंगेतर है। और उस समय वह वहाँ सिर्फ एक दोस्त के नाते आई थी। लेकिन इस बात का कोई असर होता नहीं दिख रहा था। पत्नी ने अपना मन बना लिया था यह मानते हुए कि इस दृश्य के बारे में उसका नजरिया बिलकुल सही था। पूर्वधारणाओं और शक ने उसके सोचने की शक्ति को धुँधला कर दिया था और उसे बहुत ही आलोचनात्मक बना दिया था। उसे पूरा यकीन हो गया था कि वह धोखे की शिकार हो चुकी है।

तंग आकर उसके पति ने कहा कि जो कुछ वह जानने का दावा कर रही है उसे खुल कर कहे। जब पत्नी ने सारी बात विस्तार से बताई तो पति उसकी जानकारी पर हैरान हुए बिना नहीं रह सका — जानकारी जो पत्नी की नजर में तथ्यात्मक सच थी। हैरान और तंग होकर पति बस यही बुदबुदाया, “इससे ज्यादा गलत तुम हो ही नहीं सकती।” उसने फिर से अपने निर्दोष होने की दुहाई दी और उसे कहा कि जो वह कह रहा है वही वास्तविक सच्चाई है और उसे अपने पति पर भरोसा करना चाहिए। इस बात पर गुस्साई बीवी घर से बाहर यह चिल्लाते हुए निकल गई, “मैं तुम जैसे आदमी के साथ एक पल भी और नहीं रह सकती।”

निर्णय लिए जा चुके थे। निष्कर्ष निकाले जा चुके थे। नतीजा? आखिरकार दंड उनके आपसी संबंध को भुगतना पड़ा।

यह टीवी धारावाहिक इस बात का उदाहरण देता है कि किस प्रकार हमारे निर्णय और निष्कर्ष पूर्वाग्रहों से ग्रसित दृष्टिकोणों पर आधारित होते हैं। यह दृष्टिकोण हमारे समुदाय या परिवार में व्याप्त कल्पनाओं, पूर्वधारणाओं और सांस्कृतिक परंपराओ से उपजते हैं। तो क्या हम ताज्जुब कर सकते हैं कि इस प्रकार से लिए गए निर्णयों का अकसर बुरा ही नतीजा होता है?

हमारे संबंधों में दरारें आ जाने का एक कारण हमारा अपने परिवार या कामकाज की जगह पर लोगों से संबंध बनाने का तरीका भी है। संबंधों में दरारें आने का कारण है कि हम एक-दूसरे के साथ अपनी कल्पनाओं, पूर्वधारणाओं, पूर्वाग्रहों, व्यक्तित्वों और सांस्कृतिक आदतों के आधार पर मेल-मिलाप करते हैं। एक और बात जो हमारे संबंधों को प्रभावित करती है वह है इधर-उधर से सुनी बातें या फिर टीवी-फिल्मों, और खासतौर पर धारावाहिकों से सीखी बातें। हम सबको बनाने में हमारी संस्कृति, परंपरा, आसपास के परिवेश और विश्वदृष्टि का योगदान होता है।

इसका विकल्प क्या है?

हमारा मानना है कि सभी संबंधों का सबसे अनिवार्य स्तंभ है भरोसा। बदकिस्मती से यह आजकल कम ही पाया जाता है। जब हमने यह बात अपने मित्र से कही तो उन्होंने तुरंत कहा, “आजकल लोगों को यह यकीन हो चला है कि ईमानदारी, भरोसा, सच्चाई और विश्वसनीयता पुराने जमाने के लक्षण हैं। आजकल केवल भ्रष्टाचार ही चलता है। भ्रष्ट हुए बिना कोई काम नहीं किया जा सकता।”

भरोसे के साथ, दूसरा स्तंभ है सत्य या सच्चाई। हालाँकि दोनों पयार्यवाची लगते हैं लेकिन ऐसा है नहीं। भरोसा संबंधात्मक होता है और सच्चाई तथ्यात्मक।

भरोसा, चूंकि संबंधात्मक होता है, दूसरों से उसकी माँग और आशा अधिक की जाती है। लेकिन भरोसे को एकजुट और जीवंत बनाए रखने के लिए बहुत मेहनत, जोखिम उठाने और सच बोलने की जरूरत होती है। यह उन संबंधों में खासतौर पर जरूरी है जो हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण हैं। इनमें से कुछ महत्वपूर्ण संबंध ये माने जा सकते हैं — पति-पत्नी, माता-पिता और बच्चे, भाई-बहन, दोस्त, सहकर्मी और पड़ोसी। अपने पिछले लेख में हमने इसके कुछ पक्षों पर चर्चा की थी।

हम कोशिश करेंगे कि इस बात पर भी ध्यान दिया जाए कि सच्चाई का मतलब क्या होता है और हमारे परिवारों के संदर्भ में निर्णय लेने में इसकी क्या भूमिका होती है।

बेशक यह सवाल बना रहता है कि हम अपने संबंधों को दरारों से बचाने के लिए क्या कर सकते हैं।

शुरू में तो खुद से और अपने नजदीकी संबंधियों से इस बात की वकालत करें कि वह सच और सच बोलने की दृढ़ भावना जागृत करें। यहाँ हम यह भी जोड़ना चाहते हैं कि सच बोलना खरी-खरी बोलने का मसला नहीं है। सच बोलना उससे कहीं अधिक है। बेशक, सच बोलेने में खरी बात बोलनी पड़ेगी। लेकिन इसमें परिपक्वता की जरूरत भी होती है — सच बोलने के अलावा हम सच किस ढंग से बोलते हैं इस पर भी गौर करना होगा। इस तरह, सच बोलना हमारे संबंधों से ही उपजता है। सच बोलना जरूरी होता है लेकिन इसमें सुरक्षा की एक भावना भी होनी चाहिए। इसका उद्देश्य होता है कि यह दूसरे की आध्यात्मिक उन्नति में सहायक हो, उसकी प्रतिष्ठा की रक्षा करे और इसके अलावा जो लोग इस मामले में शामिल हैं सबका सम्मान और सत्यनिष्ठता बनाए रखे।

सच और भरोसा मूल्य, नैतिकता, और सही एवं गलत की पहचान के भाव को आपस में जोड़ते हैं।

इसके अतिरिक्त, किसी भी संबंध में दरार पड़ने से रोकने के लिए जरूरी है कि सही शब्दों का इस्तेमाल करते हुए, सही लहजे में सही सवाल पूछे जाएँ। सच बोलने का अर्थ है “प्रेममय रीति से सवाल पूछना”। हम हर कीमत पर ऐसे आक्षेप लगाने से बचना चाहेंगे जिनसे संदेह और भरोसे की कमी का आभास होता हो।

जब सवाल पूछे जाते हैं तो वे खुले सिरे वाले (ओपन एंडिड) होने चाहिएँ। सवाल ऐसे पूछे जाने चाहिएँ कि अगर जानकारी की कोई कमी है तो उसे पूरा किया जाए। सवाल ऐसे पूछे जाने चाहिएँ कि उससे हमें निर्णय लेने के लिए जो सूचना चाहिए वह मिल सके बजाय इसके हम पहले से ही मन बना लें या पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो कर सवाल पूछें। अगर हमने पहले से ही मन बना लिया है तो फिर सवाल पूछना निरर्थक होगा।

हमारे सवाल पूछने से यह बात भी पता चलनी चाहिए कि सवाल पूछने वाला व्यक्ति खुद भी सुनने के लिए तैयार है। हमारा उद्देश्य यह होना चाहिए कि मुद्दे की अच्छे से जाँच पड़ताल करने के बाद ही निर्णय लिए जाएँ।

अगर हम इस पद्धति को अपनाएँगे तो जिस व्यक्ति से सवाल-जवाब किया जा रहा है उसे भी यह मौका मिलेगा कि वह संदेह या दुर्भावना को दूर कर सके। इससे गलतफहमियों, खारिज किए जाने के डर और हर उस पूर्वाग्रह से बचा जा सकता है जो कहता है “तुम्हें गलत समझा जा रहा है या फिर तुम्हें कभी ठीक से नहीं समझा जाएगा।” बजाय इसके भरोसा और सच बोलना हमें सुरक्षा और स्वीकार्यता का भाव प्रदान करते हैं।

जब हम अपने संबंधों में इस प्रकार का परिवेश का निर्माण करते हैं तो निर्णय लेना न केवल एक जिम्मेवारी बल्कि एक विशेषाधिकार, सम्मान की बात हो जाती है। इससे हमें मौका मिलता है कि जिन लोगों से हम अत्यधिक प्रेम करते हैं उन पर अपना प्रेम प्रत्यक्ष रूप से जाहिर कर सकें।

समाप्त

(फारवर्ड प्रेस के फरवरी 2012 अंक में प्रकाशित)


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