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जाति एवं राजनीति : अन्ना हजारे के संदर्भ में

लोकपाल के विचार से यह साफ होता दिखता है कि यह अभिजात वर्ग, जो भारतीय प्रजातंत्र के इस सीमित — लेकिन बढ़ते — प्रारूप से ही थक चुका है, अब इससे बचना चाहता है और संसद से जाकर, अपने पुराने अविवादित शासन की ओर वापिस मुड़ना चाहता है। पढ़ें गेल ऑम्वेट का महत्वपूर्ण आलेख

अन्ना हजारे के “भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन” ने कई महीनों से राजनीति और मीडिया के ध्यान पर एकाधिकार जमाया हुआ है। अधिकांश दलित अपवाद रहे हैं लेकिन वाम के लोगों में यह प्रवृत्ति देखी गई है कि वह इस आंदोलन में प्रगतिशील चरित्र देख रहे हैं और उन्हें लगता है कि उन्हें भी इसमें भाग लेना चाहिए। लेकिन ठोस विश्लेषण की कमी बहुत अखर रही है।

अरुँधती राय का एक आलोचनात्मक लेख इसका अपवाद रहा है। लेकिन राय गलती से यह मान बैठीं हैं कि माओवादियों की तरह जनलोकपाल बिल राज्यसत्ता को पलट देना चाहता है, हालाँकि उन्होंने अनियंत्रित, “नागरिक समाज आधारित” लोकपाल द्वारा प्रजातंत्र को पैदा हुए खतरे की ओर खास ध्यान दिया है। हम कह सकते हैं कि यह ब्राह्मणवादी-पूँजीपति राज्यसत्ता को भारत में इस समय उभर रही प्रजातांत्रिक आकांक्षाओं से बचाना चाहता है। राय खास इशारा करती हैं कि इस आंदोलन को शुरू करने का समय महत्वपूर्ण है, यह विकीलीक्स के शर्मसार करने वाले खुलासों और कई घोटालों के उजागर होने के बाद शुरू हुआ है। वह इस आंदोलन को मिलने वाले उच्चस्तरीय कॉरपोरेट समर्थन और उसे उपलब्ध भारी-भरकम फंडों का भी परदाफाश करती हैं। और रणजीत होसकोटे की इस टिप्पणी को याद रखना चाहिए कि “अन्ना हजारे का आंदोलन प्रजातंत्र की नहीं बल्कि जनोत्तेजना की जीत है”।

 

इसे किस हद तक लोकप्रिय समर्थन मिला है इस बात पर भी सवाल उठाने की जरूरत है। हाल ही में महाराष्ट्र के स्थानीय चुनावों में इसका कोई प्रभाव देखने को नहीं मिला। ‘आऊटलुक’ पत्रिका के एक आवरण पर हजारे का चित्र था जहाँ वह हजारों नहीं बल्कि कुछ सौ लोगों के बीच बैठे थे, वह चित्र काफी कुछ बयान करने वाला था। ऐसा लगता है कि मीडिया ने हमेशा ही इसके समर्थन को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया है। दरअसल मीडिया का रोल ही इस आंदोलन के विचलित करने वाले पहलुओं में से एक रहा है।

लेकिन यह आंदोलन क्यों बढ़ता जा रहा है इसके विश्लेषण में एक बात लगातार छूटती जा रही है और वह है जाति। अरुँधती राय भी इस पहलू को नजरअंदाज कर देती हैं। यह लेख इसी बात की पड़ताल करेगा।

भारतीय प्रजातंत्र में आरक्षण की व्यवस्था है, जो वर्तमान में पिछड़ों को प्रदान की जा रही है — और इसकी माँग मुसलमानों और दलित ईसाईयों की ओर से भी उठती रही है। अन्ना हजारे के प्रमुख समर्थकों में से कई के लिए आरक्षण सबसे घृणास्पद मसला है। मिसाल के तौर पर, इसमें “क्रांतिकारी मनुवादी मोर्चा” नाम का संगठन भी शामिल है। संगठन के नेता, आर. के. भारद्वाज नाम के व्यक्ति ने कहा है, “आरक्षण हर प्रकार के भ्रष्टाचार की जड़ है। असली क्रांति मनु की योग्यता आधारित समाज की ओर लौटना ही है।” वह आगे दलील देते हैं, “आरक्षण पाने वाले लोग ही भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। सामान्य श्रेणी में आने वाले लोग इसके शिकार बनते हैं।” यह बहुत ही चौंका देने वाला वक्तव्य है। लेकिन यह आज के प्रजातांत्रिक आंदोलन के एक प्रमुख पहलू की ओर इशारा करता है, दलित और ओबीसी जन्म के आधार पर मिलने वाले पुराने विशेषाधिकारों के विरुद्ध कदम उठाने को लगातार तत्पर हो रहे हैं, और जिन्हें उन विशेषाधिकारों से फायदा होता है वे इस बात से नफरत करते हैं। अन्ना हजारे के आंदोलन के द्वारा इन पुरातन विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों को “भ्रष्टाचार” जैसे एकमात्र मुद्दे की ओर ध्यान बँटाने का मौका मिल रहा है, और इसमें उनका गुप्त अजेंडा यही है कि सारा दोष आरक्षण के मत्थे मढ़ दें!

अब संसद चूंकि जाति आधारित जनगणना की ओर वापस जाने की सोच रही है तो इससे भी मनुवादियों को भारी परेशानी हो रही है। यह दशकों पुरानी उस नीति के खिलाफ एक महत्वपूर्ण कदम होगा जो यह भ्रम पैदा करती है कि जाति तो है ही नहीं और जो है वह अपने आप समाप्त हो रही है। लेकिन अगर जाति को समाप्त करना है तो पहले हमें यह मानना होगा कि वह वास्तव में हैं और फिर उसे दूर करने के लिए नीतियाँ बनानी होंगी।

हजारे नागरिक समाज या “सिविल सोसाइटी” की बात करते हैं। लेकिन मार्क्सवादी शब्दों में “सिविल सोसाइटी” का विचार कई जातियों, वर्गों और लिंगों को घेरता है। अभिजात वर्ग की सिविल सोसाइटी मेहनतकश लोगों की सिविल सोसाइटी से बहुत अलग होती है। और लोकपाल के विचार से यह साफ होता दिखता है कि यह अभिजात वर्ग, जो भारतीय प्रजातंत्र के इस सीमित — लेकिन बढ़ते — प्रारूप से ही थक चुका है, अब इससे बचना चाहता है और संसद से जाकर, अपने पुराने अविवादित शासन की ओर वापिस मुड़ना चाहता है। लोकपाल बिल दरअसल बहुत निरंकुश है जो उच्च वर्ग एवं जाति वाले गैर-निर्वाचित लोगों को निवार्चित अधिकारियों और सरकारी अफसरशाहों के ऊपर बैठा देता है (लेकिन, जैसा कि लोगों ने कहा है, व्यावसायिक कंपनियों के ऊपर नहीं)। “पाल” का अर्थ है “पालनकर्ता”, और इससे अफलातून (प्लेटो) के पालनकर्ताओं का ध्यान आता है — दार्शनिक-राजा जो राज्यसत्ता संभालेंगे। अफलातून वर्णव्यवस्था जैसी ही चीज में आस्था रखता था — लोगों में कुछ विशेष “गुण” होते हैं, शासकों में सोना, योद्धाओं में चाँदी, श्रमिकों और किसानों में ताँबा और लोहा। अन्ना हजारे भी कुछ ऐसा ही मानते लगते हैं।

अगर हम अन्ना हजारे की वास्तविकता में और गहराई से देखें तो यह नजर आता है। हजारे के गाँव रालेगण सिद्धी में मुकुल शर्मा द्वारा किए एक अध्ययन से यह पता चलता है। हजारे अपने गाँव को एक सैनिक तानाशाह की तरह चलाते हैं (उनकी पृष्ठभूमि सेना की है)। “शराबियों” को चाबुक लगाए जाने चाहिए। (और हजारे ने एक इंटरव्यू में कहा है कि राष्ट्रीय स्तर पर भी वह ऐसा होते देखना चाहेंगे)। दलितों का खयाल रखना चाहिए लेकिन उन्हें अपनी “जगह” पर रहना होगा। और हजारे ने खुद कहा है, “महात्मा गाँधी का यह दर्शन था कि हर गाँव में एक चमार, एक सुनार, एक कुम्हार, आदि हो। उन सबको अपनी भूमिका और व्यवसाय के अनुसार काम करना चाहिए और इस प्रकार एक गाँव स्वावलंबी बनेगा। रालेगण सिद्धी में हम यही कर रहे हैं।”

कई लोग हजारे के गाँधीवाद पर सवाल उठाते हैं लेकिन स्वावलंबी, स्थिर गाँवों को आदर्श मानने में दोनों स्पष्टत: एक ही सोच रखते हैं।

एशियाई निरंकुशता का स्वावलंबी गाँव

इस समय कुछ सैद्धांतिक चर्चा की जाए। भारतीय समाज के लिए “स्वावलंबी गाँव” की क्या महत्ता थी? हम याद कर सकते हैं कि मार्क्स ने इस बिंदु पर काफी खुल कर बात की थी। 1853 में एक पत्रिका में लिखे लेख में उन्होंने कहा था,

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ये काव्यात्मक ग्रामीण बस्तियाँ, चाहे कितनी भी निरापद लगें, हमेशा ही ओरिएंटल डिस्पॉटिजम (पूरब के निरंकुशतावाद) की मजबूत बुनियाद रही हैं, उन्होंने मानव मस्तिष्क को सूक्ष्मतम घेरे में सीमित करके रखा है, और इस प्रकार उसे अँधविश्वास का निर्विरोध औजार बनाए रखा, पारंपरिक नियम सिद्धांतों के अधीन उसे गुलाम रखा और हर प्रकार के वैभव और ऐतिहासिक ऊर्जा से वंचित रखा … हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ये छोटी-छोटी बस्तियाँ जाति और गुलामी के भेदभावों से दूषित रही हैं, उन्होंने मनुष्य को बाहरी परिस्थितियों के अधीन किए रखा बजाय इसके कि मनुष्य जोकि परिस्थितियों का बादशाह है उसे ऊँचा उठाया जाए, उन्होंने स्वविकासशील सामाजिक राज्य को कभी न बदलने वाली स्वाभाविक नियति में रूपांतरित कर दिया, और इस प्रकार प्रकृति की उपासना की नींव डाली, और इसका परिणाम इस रूप में देखने को मिला कि मनुष्य जो प्रकृति का बादशाह है वह अपने घुटनों के बल गिरा और हनुमान नाम के बंदर और सबला नाम की गाय की उपासना करने लगा।

“स्वावलंबी गाँव” ने निरंकुश शासन की नींव रखी। और इसी स्वावलंबी गाँव को हजारे पुनर्जीवित करना चाहते हैं। उन्होंने रालेगण सिद्धी में ऐसे ही समाज का निर्माण किया है। वह स्वयं उसके “तानाशाह” हैं, जिसने टीवी और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तक लोगों की पहुँच को सीमित किया है, वह लोगों की पूज्य प्रतिमा हैं, उनके झगड़े निपटाने वाले बिचौलिए। और जैसा कि रिपोर्टों में बताया गया है, वह खुद अनशन करते हैं और “लोगों” की ओर से बोलते हैं। (मुकुल शर्मा ने गौर किया है कि जब कोई और हजारे के तौर-तरीके के खिलाफ अनशन करता है तो पुलिस को बुलाया जाता है — जब दिल्ली में कांग्रेस ने हजारे की गिरफ्तारी का ठीक ऐसा ही इंतजाम किया था तो इस बात की खूब निंदा की गई थी।)

“जाति के भेदभावों से दूषित …” अन्ना हजारे ने खुलेआम स्वावलंबी गाँव के अपने दर्शन को पारंपरिक जाति आधारित कर्तव्यों के साथ जोड़ा है, और गाँव में किए जाने वाले कामों को बयान करने के लिए जातिसूचक नामों का खुलेआम इस्तेमाल किया गया। हजारे के आंदोलन को खुद उससे चाहे कितना भी फायदा मिला हो लेकिन रालेगण सिद्धी में आधुनिक मीडिया तक लोगों की पहुँच को सीमित करने के कारण वहाँ के ग्रामीण गतिहीनता और परंपरावाद में धँसते जा रहे हैं। और चूंकि यही वहाँ की वास्तविकता है इससे इस बात की बुनियाद रखी जा सकती है कि दुनिया का कामकाज चलाते रहने के लिए “महान लोगों” पर भरोसा करना होगा। मार्क्स बिलकुल सही थे जब उन्होंने पारंपरिक “स्थिरता” या गतिहीनता तथा बाहर से लादे गए निरंकुश शासक के शासन के बीच संबंध स्थापित किया।

भारत के राजनैतिक फलक पर हजारे शायद एक प्रमुख हस्ती हैं जिनका जनाधार इस प्रकार के पारंपरिक रूप से चलाए जा रहे गाँव में है। यह उनकी राजनीति का अंदरूनी रहस्य है — और यह जातिगत श्रेणीबद्धता को बरकरार रखने पर टिका है। इसलिए यह दुर्घटनावश नहीं कि दलित (और कई ओबीसी) लोकपाल के पूरी तरह से खिलाफ हैं। जिस प्रकार हजारे अपने गाँव के “पालनकर्ता” या निरंकुश शासक हैं उसी प्रकार “लोकपाल” भी भारत के आम लोगों को निर्वाचित अधिकारियों के भ्रष्टाचार से बचाएगा!

तो फिर भ्रष्टाचार की समस्या का क्या हल हो सकता है? सच तो यह है कि आधुनिकीकरण की प्रक्रिया से गुजर रहे सभी समाज, अमेरिका समेत, अत्यधिक भ्रष्टाचार के दौर से भी गुजरते हैं। प्रजातांत्रिक व्यवहार को लोगों में गहरे पैठ जाने में और सहज रूप से समावेशित होने में समय लगता है। 19वीं सदी में भ्रष्टाचार अमेरिकी राजनीति में अत्यधिक फैला हुआ था लेकिन अब उसे बहुत हद तक सीमित कर दिया गया है — इस संदर्भ में इलिनॉइया के एक पूर्व गवर्नर को हाल ही में बहुत लंबी जेल हुई है। ब्रिटेन और यूरोपीयाई समाज में भ्रष्टाचार चुनावों पर अब कोई असर नहीं डालता। रूस में अब प्रजातंत्र की शुरुआत हो रही है और वहाँ भी चुनावों में भारी भ्रष्टाचार देखा जाता है। लेकिन इस प्रकार के कारकों को किसी वैधानिक पालनकर्ता के द्वारा नहीं बल्कि लोगों की जागरूकता और लोगों की कार्यवाही के द्वारा समाप्त किया जाता है। भ्रष्टाचार से लड़ने वाले “लोकपाल” समाज के आधारभूत स्तर पर उठने चाहिएँ। एक लोकपाल नहीं जो संसद से ऊपर हो और उससे बाहर हो बल्कि लाखों लोकपाल, ऐसे लोग जो अगर जरूरी हो तो सड़कों पर उतर आएँ। ऐसे काम हो भी रहे हैं। पढ़ने में आता है कि लोग भ्रष्ट अधिकारियों के दफ्तरों के में साँप छोड़ रहे हैं। ऐसे कदम भ्रष्टाचार के कम होने के सूचक हैं — न कि कोई पालनकर्ता, न ही कोई स्वावलंबी गाँव (जिसे भ्रष्टाचार की जरूरत ही नहीं क्योंकि वह बाजार-पूर्व, गैर-वाणिज्यिक और पारंपरिक है)।

याद रहे कि मार्क्स अपने लेख को यह कहते हुए समाप्त करते हैं कि अँग्रेजी राज्य के अपराध और क्रूरताएँ चाहे जो भी रही हों, उसका औचित्य इसी में था कि उसने ऐसे समाज को तोड़ कर रख दिया।

यह सच है कि इंग्लैंड ने हिंदोस्तान में जो सामाजिक क्रांति शुरू की उसके पीछे दुष्टतम हित थे और उन्हें लागू करने में उसने निरी मूर्खता बरती। लेकिन सवाल यह नहीं है। सवाल यह है कि क्या मानवजाति एशिया की सामाजिक व्यवस्था में बुनियादी क्रांति किए बगैर अपनी नियति पूरी कर सकती है? अगर नहीं तो इंग्लैंड के अपराध चाहे कैसे भी हों वह उस क्रांति को पेशतर करने में इतिहास का अवचेतन औजार बना।

जरूरत लोकपाल या “एशियाई निरंकुश” नहीं बल्कि जाति और पूँजीवाद के खिलाफ क्रांति की शुरुआत करने की है।

(फारवर्ड प्रेस के फरवरी 2012 अंक में प्रकाशित)


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लेखक के बारे में

गेल ऑम्वेट

गेल ऑम्वेट (2 अगस्त, 1941 – 25 अगस्त, 2021) समाजशास्त्री, लेखिका व कार्यकर्ता रहीं। अपने जीवन में इन्होंने बहुजनों के विमर्श को केंद्र में रख विपुल लेखन किया। इनकी प्रकाशित किताबों में शामिल हैं– 'कल्चरल रिवोल्ट इन अ कोलोनियल सोसायटी : दी ननब्राह्मण मूवमेंट इन महाराष्ट्र' (1976), 'वी विल स्मैश दिस प्रिज़न : इंडियन वुमेन इन स्ट्रगल' (1980), 'आंबेडकर : टूवार्ड्स ऐन एनलाटेंड इंडिया' (2005), 'सिकिंग बेगमपुरा : दी सोशल विजन ऑफ एंटीकास्ट इंटलैक्चुअल्स' (2009), 'अंडरस्टैंडिंग कास्ट : फ्रॉम बुद्धा टू आंबेडकर एंड बियांड' (2011) आदि शामिल हैं। ईपीडब्ल्यू के सितंबर, 1971 के अंक में 'जोतीराव फुले एंड दी आइडियोलॉजी ऑफ सोशल रिवॉल्यूशन इन इंडिया' शीर्षक आलेख इनके महत्वपूर्ण आलेखों में एक है।

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