अंबेडकर और मार्क्सवाद

वर्ग को श्रम विभाजन के संदर्भ में परिभाषित किया जाता है परंतु जैसा कि अंबेडकर कहते हैं, जाति प्रथा, श्रम विभाजन नहीं बल्कि श्रमिकों का विभाजन है, जहां कई जातियों को श्रम विभाजन की दृष्टि से एक ही श्रेणी में रखा जाता है। इससे वर्ग इतना विभाजित हो जाता है कि उसमें किसी प्रकार की एकता असंभव हो जाती है

आनंद तेलतुमड़े के हालिया लेख नॉट रेड वर्सिस ब्ल्यू (लाल के खिलाफ नीला नहीं) ने अनेक विवादों को जन्म दिया है। दलितों ने इस लेख पर तीखे हमले किये हैं। कुछ लोगों का मानना है कि अंबेडकरवादियों और वामपंथियों के बीच मध्यस्थता करने के प्रयास में लेखक एक जाल में फंस गए हैं और उन्होंने अंबेडकर को अर्द्ध-मार्क्सवादी बना दिया है।

सच यह है कि तेलतुमड़े ने अंबेडकर के विचारों को बड़ी सफाई से तोड़ा-मरोड़ा है। वे लिखते है, अंबेडकर भी वर्ग की राजनीति करते थे परंतु मार्क्सवादी संदर्भ में नहीं। वे अछूतों को भी एक वर्ग मानते थे। अपनी बात को साबित करने के लिए तेलतुमड़े, अंबेडकर के एक लेख का हवाला देते हैं जो कि उन्होंने सन् 1916 में एक सेमिनार में प्रस्तुत करने के लिए लिखा था। इस लेख का शीर्षक था भारत में जातियाँ : उनकी उत्पत्ति, तंत्र और विकास। अंबेडकर इस लेख की शुरूआत में जाति को एक बंद वर्ग बताते हैं। परंतु यह सिर्फ उनके लेख की शुरूआत है, उसका निष्कर्ष नहीं। अंबेडकर कहीं भी, जाति को वर्ग की मार्क्सवादी धारणा से पारिभाषित नहीं करते। अंबेडकर ने जाति व्यवस्था के तंत्र और उसके विकास का जो वर्णन किया है उससे यह स्पष्ट है कि वे जाति को वर्ग से अलग श्रेणी में रखते हैं। वर्ग का निर्धारण श्रम विभाजन से होता है जबकि अंबेडकर जाति को केवल एक सामान्य अर्थ में बंद वर्ग कहते हैं। किसी विशिष्ट आर्थिक संदर्भ में नहीं।

नि:संदेह, कहीं-कहीं अंबेडकर दलितों के लिए दमित वर्ग शब्द का इस्तेमाल करते हैं परंतु यह शब्द अंग्रेजों की प्रशासनिक शब्दावली से लिया गया है और इसका इस्तेमाल ब्रिटिश शासक, अछूतों के लिए करते थे। अंग्रेज इस शब्द को श्रेणी’ के अर्थ में इस्तेमाल करते थे, वर्ग की मार्क्सवादी धारणा के अर्थ में नहीं। अंबेडकर के शुरूआती लेखन से ही यह स्पष्ट है कि वे मार्क्सवाद के एक प्रभावी बुद्धिजीवी व विचारधारात्मक शक्ति होने के तथ्य से अनभिज्ञ नहीं थे पंरतु वे मार्क्सवादी सोच से अपने मतभेदों को छुपाते भी नहीं थे।

वे इस मार्क्सवादी धारणा से सहमत नहीं थे कि सामाजिक, सांस्कृतिक व धार्मिक कारक केवल अधिरचनात्मक विशिष्टताएं होती हैं और इन कारकों का कोई असली महत्व नहीं होता। सन् 1938 में जनता के लिए लिखे गये एक लेख में वे कहते हैं कि अगर सांस्कृतिक और धार्मिक कारक वह भवन है जो आर्थिक कारकों की नींव पर खड़ा हुआ है तो नींव को नष्ट करने के पहले भवन को गिराना होगा। इस प्रकार, वे मार्क्सवादी चिंतन के ठीक उलट, अत्यंत प्रभावी ढंग से यह तर्क रखते हैं कि सबसे पहले हमें धार्मिक और सांस्कृतिक कारकों से निपटना होगा। एक अन्य लेख में वे कहते हैं कि अगर लेनिन भारत में जन्मे होते तो वे सबसे पहले गुलामी की धार्मिक नींव पर हमला करते।

वर्ग को श्रम विभाजन के संदर्भ में परिभाषित किया जाता है परंतु जैसा कि अंबेडकर कहते हैं, जाति प्रथा, श्रम विभाजन नहीं बल्कि श्रमिकों का विभाजन है, जहां कई जातियों को श्रम विभाजन की दृष्टि से एक ही श्रेणी में रखा जाता है। इससे वर्ग इतना विभाजित हो जाता है कि उसमें किसी प्रकार की एकता असंभव हो जाती है।

तेलतुमड़े के लेख से यह साफ है कि अंबेडकर को मार्क्सवाद से व्यवहारिक स्तर पर कई समस्याएं थीं। कम्युनिस्टों  ने सबसे पहले कपड़ा मिल मजदूरों को संगठित किया। परंतु यहां भी जातिगत भेदभाव था। कपड़ा मिलों के बुनाई विभाग में जब धागा टूट जाता था तब श्रमिक उसे अपने दांतों के बीच पकड़ते थे। उच्च जातियों के हिन्दुओं को यह स्वीकार्य नहीं था कि दलित यह कार्य करें। और इसलिए दलित मजदूरों को कताई विभाग में काम दिया जाता था। कम्यूनिस्ट इस भेदभाव को लंबे समय तक नजरअंदाज करते रहे। तेलतुमड़े का तर्क है कि जब अंबेडकरने सन् 1928 की हड़ताल को तोडऩे की धमकी दी तब जाकर कम्युनिस्टों ने इस भेदभाव को खत्म किया। परंतु इसका कोई पुख्ता सबूत नहीं है कि कम्युनिस्टों ने ऐसा कुछ किया था। कपड़ा मिलों के सभी विभागों में दलितों को भर्ती करवाने के लिए कोई प्रभावशाली अभियान नहीं चलाया गया गया और यह भेदभाव जारी रहा।

अंबेडकर इसे अंशत: शुरूआती दौर के कम्युनिस्टों के ब्राह्मणवादी चरित्र का परिणाम बताते हैं परंतु वे यह भी मानते हैं कि इसका एक कारण था मार्क्सवाद की जाति जैसे गैर आर्थिक कारकों को नजरअंदाज करने की प्रवृत्ति। अंबेडकर के लिए जाति आर्थिक यथार्थ तो थी ही वह सामाजिक यथार्थ भी थी। जाति से दलित-बहुजनों की आर्थिक स्थिति का निर्धारण होता था और उन्हें सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था में निचले पायदानों पर ही जगह दी जाती थी। यह व्यवस्था भारतीय समाज का एक अविभाज्य हिस्सा थी और इसका संबंध समाज की धार्मिक व सांस्कृतिक नींव से था। इसके विपरीत, मार्क्स, यद्यपि जाति को मानव विकास कीराह में बाधक मानते थे तथापि उनकी मान्यता थी कि औद्योगिक विकास से यह समस्या स्वयं समाप्त हो जायेगी। अंबेडकर भी मार्क्सवादियों से इस मामले में सहमत थे कि  औद्योगिक विकास से ही गरीबी का उन्मूलन हो सकता है परंतु उनका मानना था कि केवल औद्योगिक विकास से जातिगत भेदभाव और शोषण का अंत नहीं होगा।

अपनी पुस्क  भारतीय इतिहास में क्रांति और प्रतिक्रांति” में अंबेडकर ने भारत के इतिहास को ब्राह्मणवादी और बौद्ध चिंतन के बीच जीवन और मृत्यु का संघर्ष निरूपित किया है। जब वे यह कहते हैं तो स्पष्टत: वे इस मार्क्सवादी सिंद्धात का समर्थन करते हैं कि मानव इतिहास, वर्ग संघर्ष का इतिहास है। पंरतु उनका तर्क यह था कि भारत में परिस्थितियां भिन्न हैं और यहां संघर्ष, सांस्कृतिक व आध्यात्मिक भी हैं।

सन् 1938 में मनमाड़ में दलित रेलवे श्रमिकों की एक बैठक को संबोधित करते हुए, अंबेडकर ने अपना वह प्रसिद्ध वाक्य कहा था कि हमारे दो शत्रु हैं- ब्राह्मणवादी और पूंजीवाद। पूंजीवाद को शत्रु बताकर अंबेडकर ने एक तरह से कम्युनिस्टों से अपने गठजोड़ को रेखांकित किया परंतु प्रश्न यह था कि क्या ब्राह्मणवादी के विरूद्ध संघर्ष को कम्युनिस्टों द्वारा केवल मुहजबानी समर्थन देने से काम चलने वाला था? इस प्रश्न का उत्तर आसान नहीं है।

तथ्य यह है कि यद्यपि अंबेडकर समाजवादी थे तथापि (जैसा कि तेलतुमड़े अच्छी तरह जानते हैं) वे कम्युनिस्ट नहीं थे। वे प्रजातांत्रिक
समाजवादी थे। तेलतुमड़े अंबेडकर को फेबियन बताते है अपनी पुस्तक स्टेट्स एण्ड माइनोरिटीज (राज्य व अल्पसंख्यक) में अंबेडकर ने
समाजवादी राज्य को आर्थिक शोषण की समस्या का इलाज बताया है। परंतु बाद में इस संबंध में उनके विचार बदल गये। मार्क्सवादी उनकी पुस्तक स्टेट्स एण्ड माइनोरिटीज का बार-बार हवाला देते हैं परंतु वे इस तथ्य को नजरअंदाज कर देते हैं कि अनुसूचित जाति महासंघ के चुनावी घोषणापत्र में उन्होंने राज्य समाजवाद की जगह डीवियन प्रेगमेटिज्म पर अधिक जोर दिया है। उनका तर्क है कि जहां त्वरित औद्योगिक विकास के लिए राज्य नियंत्रण आवश्यक हो, वहां इसका इस्तेमाल किया जाना चाहिए परंतु यदि उद्योगों के निजी स्वामित्व से त्वरित विकास होता है तो इसे स्वीकार करने में भी कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। इस अर्थ में अंबेडकर फेबियन कम और व्यवहारवादी अधिक नजर आते हैं।

अपने जीवन के अंत में अंबेडकर बौद्ध धर्म की ओर आकर्षित हुए। वे स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के संघर्ष में बौद्ध धर्म को मार्क्सवाद का विकल्प मानने लगे थे। अपने एक लेख में वे कहते हैं कि यद्यपि मार्क्सवाद समानता ला सकता है तथापि वह स्वतंत्रता सुनिश्चित नहीं कर सकता और इस संदर्भ में बौद्ध धर्म, मार्क्सवाद से श्रेष्ठ है। उन्हें यह मान्यता स्वीकार नहीं थी कि गरीबी बढऩे से क्रांति की राह प्रशस्त होती है। वे वर्ग संघर्ष की भूमिका समझना है वहीं धम्म का लक्ष्य दुनिया का पुनर्निर्माण है। मार्क्सवादियों की तरह, वे भी सामाजिक परिवर्तन के हामी थे परंतु वर्ग संघर्ष में निहित हिंसा और हर चीज को केवल आर्थिक चश्मे से देखना उन्हें मंजूर नहीं था।

तेलतुमड़े चाहते हैं कि दलित-बहुजन व वामपंथी ताकतें एक हो जाएं। यह असंभव है। दोनों के बीच मतभेद बहुत गहरे हैं। वामपंथी
अपनी विचारधारा के मूल तत्वों में तनिक भी परिवर्तन करने के लिए तैयार नहीं हैं। यह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी जैसे संसदीय कम्युनिस्टों के लिए तो सही है ही, क्रांतिकारी माओवादियों के बारे में भी सच है। इस अर्थ में पारंपरिक
वामपंथियों की सोच में एक प्रकार की कट्टरता है। परंतु हां, बहुजनों और कम्युनिस्टों का गठजोड़ अवश्य बन सकता है। अंबेडकर यह चाहते भी थे परंतु आज भी यह गठजोड़ केवल एक आशा, एक सपना बना हुआ है।

 

(फारवर्ड प्रेस के नवम्बर, 2012 अंक में प्रकाशित) 


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