आम्बेडकर : दुनिया बदलने वाले पूर्व छात्रों में महानतम-कोलंबिया विश्वविदयालय

दुनिया को 95 नोबेल पुरस्कार विजेता देने वाले कोलंबिया विवि ने डा. आम्बेडकर को अपने अनेक नोबेल विजेता विद्यार्थियों से अधिक तरजीह दी

इस वर्ष स्वाधीनता की 66वीं जयंती पर जब आउटलुक पत्रिका के सौजन्य से सीएनएन आइबीएन और हिस्ट्री 18 चैनल द्वारा दुनिया के 21 राज्यों में कराए गए सर्वेक्षण की रिपोर्ट सामने आई, आम्बेडकरवादी खुशी से झूम उठे, किन्तु उन्हें सर्वश्रेष्ठ भारतीय के रूप में चुना जाना बहुतों को रास नहीं आया, इसलिए कई कोनों से आपत्ति के स्वर भी उठे। बहरहाल, जिन्हें आम्बेडकर के सर्वश्रष्ठ भारतीय होने पर संदेह है उन्हें 2004 की उस घटना पर नजर डालनी चाहिए जब अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय ने अपनी स्थापना की 250वीं वर्षगांठ मनाई, तब स्कूल ऑफ इंटरनेशनल एंड पब्लिक अफेयर्स की ओर से कार्ड जारी किया गया, जिसमें विश्वविद्यालय के 250 सालों के इतिहास के 40 ऐसे महत्वपूर्ण लोगों के नाम थे जिन्होंने वहां अध्ययन किया तथा दुनिया को प्रभावशाली ढंग से बदलने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। ऐसे लोगों में डा. आम्बेडकर का नाम पहले स्थान पर था। काबिले गौर है कि इस विश्वविद्यालय को अब तक 95 नोबेल पुरस्कार विजेता देने का गौरव प्राप्त है। कोलंबिया विवि ने डा. आम्बेडकर को अपने अनेक नोबेल विजेता विद्यार्थियों से अधिक तरजीह दी। बहरहाल, यहां सवाल पैदा होता है कि क्या डा. आम्बेडकर दुनिया को बदलने वाले सिर्फ कोलंबिया विवि से संबद्ध लोगों में ही सर्वश्रेष्ठ थे या उससे बाहर भी।

दुनिया बदलने वालों की श्रेणी में उन महामानवों को शुमार किया जाता है, जिन्होंने ऐसे समाज, जिसमें लेशमात्र भी लूट-खसोट, शोषण, उत्पीडन नहीं किया होगा, जिसमें मानव-मानव समान होंगे तथा उनमें आर्थिक विषमता नहीं होगी, का न सिर्फ सपना देखा बल्कि उसे मूर्त रूप देने के लिए अपना सर्वस्व दांव पर लगा दिया। ऐसे लोगों में बुद्ध, मज्दक, अफलातून, सेनेका, हाब्स, लाक, रूसो, वाल्टेयर, टामस स्पेनसर, विलियम गाडविन, प्राउस्ट चाल्र्स हाएराबर्ट ऑवेन, मार्क्स, लिंकन, लेनिन, माओ, आम्बेडकर आदि की गिनती होती है। ऐसे महापुरुषों में बहुसंख्यक लोग कार्ल मार्क्स को ही सर्वोतम मानते हैं। ऐसे लोगों का दृढ़ विश्वास रहा है कि मार्क्स पहला व्यक्ति था जिसने विषमता की समस्या का हल निकालने का वैज्ञानिक ढंग निकाला। किन्तु को सर्वश्रेष्ठ विचारक माननेवालों ने प्राय: उनकी सीमा को परखने की कोशिश नहीं कीं। मार्क्स ने जिस गैर-बराबरी के खात्मे का वैज्ञानिक सूत्र दिया उसकी उत्पत्ति साइंस और टेक्नालोजी के कारणों से होती रही है। उन्होंने जन्मगत कारणों से उपजी शोषण और विषमता की समस्या को समझा ही नहीं, जबकि सचाई यह है कि मानव सभ्यता के विकास की शुरुआत से ही मुख्यत: जन्मगत कारणों से ही दुनिया के अनेक देशों में विषमता का साम्राज्य कायम रहा जो आज भी अटूट है। इस कारण ही सारी दुनिया में महिला अशक्तीकरण एवं नीग्रो जाति का पशुवत इस्तेमाल हुआ। इस कारण ही भारत के दलित, पिछड़े हजारों साल से शक्ति के स्रोतों-आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक से पूरी तरह शून्य रहे।

दरअसल पूंजीवादी व्यवस्था में जहां मुटठीभर धनपति शोषक की भूमिका में उभरते हैं, वहीं जाति और नस्लभेद व्यवस्था में एक पूरा का पूरा समाज शोषक तो दूसरा शोषित के रूप में नजऱ आते हैं। भारत में ऐसे शोषकों की संख्या 15 प्रतिशत और शोषितों की 85 प्रतिशत रही है, जबकि अमेरिका में लगभग पूरा का पूरा गोरा समाज ही जिसकी संख्या 70 प्रतिशत से कुछ अधिक रही है, अश्वेतों के खिलाफ शोषक की भूमिका में क्रियाशील रहा है।

जन्मगत आधार पर शोषण से उपजी विषमता के खात्मे का जो सूत्र मार्क्स न दे सके, इतिहास ने वह बोझ डा. आम्बेडकर के कंधों पर डाल दिया, जिसका उन्होंने नायकोचित अंदाज़ में निर्वहन किया।

मार्क्स  के सर्वहारा सिर्फ आर्थिक दृष्टि से विपन्न थे पर राजनीतिक, आर्थिक और धार्मिक क्रियाकलाप उनके लिए मुक्त थे। उनके विपरीत भारत के दलित सर्वस्वहारा थे, जिनके लिए आर्थिक, राजनीतिक के साथ ही धार्मिक और शैक्षणिक गतिविधियां भी धर्मादेशों से पूरी तरह निषिद्ध रहीं। यही नहीं लोग उनकी छाया तक से दूर रहते थे। ऐसी स्थिति दुनिया में किसी भी मानव समुदाय की कभी नहीं रही। डा. आम्बेडकर ने किस तरह तमाम विपरीत परिस्थितियों से जूझते हुए दलित मुक्ति का स्वर्णिम अध्याय रचा वह एक इतिहास है।

डा. आम्बेडकर ने दुनिया को बदलने के लिए क्या किया।

उन्होंने सालों से बरकरार अलिखित हिंदू आरक्षण के तहत सदियों से शक्ति के सभी स्रोतों से वहिष्कृत किए गए मानवेतरों के लिए संविधान में आरक्षण के सहारे शक्ति के कुछ स्रोतोंं, अर्थ-राजनीति में संख्यानुपात में हिस्सेदारी सुनिश्चित कराई। परिणाम चमत्कारिक रहा। जिन दलितों के लिए कल्पना करना दुष्कर था वे बड़ी संख्या में एमएलए, एमपी, आईएएस, पीसीएस, डाक्टर, इंजीनियर आदि बनकर राष्ट्र की मुख्यधारा से जुडऩे लगे। दलितों की तरह ही दुनिया के दूसरे जन्मजात सर्वस्वहाराओं, अश्वेतों, महिलाओं आदि को जबरन शक्ति के स्रोतों से दूर रखा गया। भारत में आम्बेडकरी आरक्षण के आंशिक रूप से ही सही, सफल प्रयोग ने दूसरे देशों के सर्वहाराओं के लिए मुक्ति के द्वार खोल दिए। आम्बेडकरी प्रतिनिधित्व, आरक्षण का प्रयोग, अमेरिका, इंग्लैंड, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, मलेशिया, आयरलैंड ने अपने देश के जन्मजात वंचितों को शक्ति के स्रोतों में उनको वाजिब हिस्सेदारी देने के लिए कार्य किया। इस आरक्षण ने तो दक्षिण अफ्रीका में क्रांति ही ला दी। वहां जिन 9.10 प्रतिशत गोरों का शक्ति के 80.90 प्रतिशत क्षेत्रों पर कब्ज़ा था, वे अब अपने संख्यानुपात पर सिमट रहे हैं। वहीं सदियों के वंचित मंडेला के लोग अब हर क्षेत्र में अपने संख्यानुपात में भागीदारी पाने लगे हैं। इसी आरक्षण के सहारे सारी दुनिया में महिलाओं का राजनीति इत्यादि में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित कराने का अभियान जारी है। यह सही है कि अनेक देशों में आरक्षण ने जन्मजात सर्वस्वहाराओं के जीवन में भारी बदलाव लाया है पर अभी भी इस दिशा में बहुत कुछ करना बाकी है। अभी भी शक्ति के सभी स्रोतों में मुक्कमल ढंग से प्रतिनिधित्व का सिद्धांत लागू नहीं हुआ है। यहां तक कि अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका में भी नहीं, और जब ऐसा हो जाएगा तब फिर इस सवाल पर माथापच्ची नहीं करनी पड़ेगी कि दुनिया को सबसे प्रभावशाली तरीके से बदलने वाला कौन है।

(फारवर्ड प्रेस के जनवरी, 2013 अंक में प्रकाशित)


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