पिछड़ों की चुनौती के बावजूद ऊँची जातियों का दबदबा कायम

सभी समाजवादी छात्र संगठनों ने पिछड़ी जातियों के उम्मीदवार खड़े किए। सीआरजेडी (आरजेडी) ने एक उम्मीदवार अभिषेक गुप्ता (ओबीसी-बनिया) का अपहरण कर लिया और वह कोषाध्यक्ष के पद के लिए चुना गया।

12 दिसंबर एक ऐतिहासिक दिन, पटना विश्वविद्यालय में 28 सालों के अंतराल के बाद छात्रसंघ चुनाव हुए। इसके पहले आखिरी बार सन् 1984 में चुनाव हुए थे, जब आपातकाल-विरोधी आंदोलन की खुमारी छात्रों के दिमाग से शनै:-शनै: उतर रही थी। सन् 1970 के दशक में पटना विश्वविद्यालय छात्रसंघ ने सभी पार्टियों को नए युवा नेता दिए, जिनका आज भी बिहार की राजनीति में दबदबा बना हुआ है। इनमें शामिल हैं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, आरजेडी नेता लालू प्रसाद यादव, उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी व कई अन्य।

इस बार पटना विश्वविद्यालय छात्रसंघ के चुनाव लिंगदोह समिति द्वारा निर्धारित नियमों के अंतर्गत हुए थे। सभी राजनीतिक दलों के छात्र संगठनों ने इनमें हिस्सा लिया। विश्वविद्यालय के कुलपति शंभुनाथ सिंह के प्रतिबद्ध प्रयासों के चलते चुनाव शांतिपूर्वक निपट गए। यह कोई मामूली उपलब्धि नहीं थी, क्योंकि इन चुनावों के जरिए बिहार के बड़े नेता-जो कि स्वयं भी छात्र राजनीति से उभरे हैं-अपने प्रतियोगियों से हिसाब चुकता करना चाहते थे। दक्षिणपंथी अभाविप (भाजपा), वामपंथी एआईएसए (सीपीआई-एमएल), एआईएसएफ (सीपीआई) व एडीएसओ, मध्यमार्गी एनएसयूआई (भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस) व एनएसयू (एनसीपी), समाजवादी सीआरजेडी (आरजेडी), सीजेडी-यू (जेडीयू), सीएलजेपी (एलजेपी) आदि ने भाग लिया। ऑल इंडिया बेकवर्ड स्टूडेंटस फेडरेशन (एआईबीएसएफ) ने पहली बार पटना विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में प्रवेश किया। एआईबीएसएफ को सभी पार्टियां एक बड़े खतरे के रूप में देख रहीं थीं, इससे यह स्पष्ट है कि उसके संयोजक अवधेश लालू और प्रमुख कार्यकर्ता इम्तियाज पर कातिलाना हमले हुए। दोनों बड़ी मुश्किल से अपनी जान बचा सके और अब अपनी टूटी हुई पसलियों, जांघ की हडडी व सीने की हडडी का इलाज करवा रहे हैं।

चुनाव प्रचार करतीं एआईबीएसएफ की अध्यक्ष पद की प्रत्याशी

सभी प्रमुख छात्र संगठनों के उम्मीदवार ऊंची जातियों के थे, सिवाय एआईबीएसएफ (अति पिछड़ी जाति), सीआरजेडी (यादव) व सीएलजेपी (पसमांदा)। यद्यपि कुछ दक्षिणपंथी संगठनों ने दलित-बहुजन उम्मीदवार खड़े किए थे परंतु वे उनकी विजय सुनिश्चित नहीं करवा सके। अध्यक्ष पद पर अभाविप के आशीष सिंह (कायस्थ) विजयी रहे। दूसरे स्थान पर थीं एआईएसए की दिव्या गौतम (भूमिहार) व एनएसयू की प्रज्ञा राज शिवा (भूमिहार)। एआईबीएसएफ की उम्मीदवार उषा किरण (अति पिछड़ी जाति-निषाद) चौथे नंबर पर रहीं। एआईएसएफ के अंशुमन (भूमिहार) व अंशु कुमारी(भूमिहार) क्रमश: उपाध्यक्ष व महासचिव चुने गए।

सभी समाजवादी छात्र संगठनों ने पिछड़ी जातियों के उम्मीदवार खड़े किए। सीआरजेडी (आरजेडी) ने एक उम्मीदवार अभिषेक गुप्ता (ओबीसी-बनिया) का अपहरण कर लिया और वह कोषाध्यक्ष के पद के लिए चुना गया। केवल नीतीश कुमार के छात्र संगठन सीजेडी-यू का पिछड़े वर्ग का उम्मीदवार सफल हुआ। अनुप्रिया (ओबीसी-यादव) के सचिव पद पर विजय में एक आईबीएसएफ छात्राओं और दूसरे कारकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कार्यसमिति की 18 सीटों पर एआईएसएफ (6), एबीवीपी (2), आरजेडी (2), जेडीयू (2), एआईडीएसओ (2), एआईबीएसएफ (2) व स्वतंत्र (2) ने विजय प्राप्त की। दिलचस्प यह रहा कि एक आईएसए, जोकि सबसे सक्रिय छात्र संगठनों में से एक है, एक भी सीट नहीं जीत सका, जबकि एआईबीएसएफ जैसे मात्र 15 दिन पुराने संगठन ने कई कामयाबियां हासिल कीं।

यह साफ है कि लालू-राबड़ी के 15 साल और नीतीश के 7 सालों के शासन के बाद भी बिहार के उच्च शिक्षा संस्थानों के सामाजिक ताने-बाने में कोई फर्क नहीं आया है। सभी शैक्षणिक संस्थानों में ऊंची जातियों का दबदबा है और सामंती प्रवृत्ति का बोलबाला। बहरहाल, पटना विश्वविद्यालय में प्रजातंत्र की वापसी हो गई है और यह अपेक्षा है कि बिहार के अन्य विश्वविद्यालयों में भी छात्रसंघ चुनाव जल्द ही करवाए जाएंगे। इन विश्वविद्यालयों के छात्रों में दलितों, पिछड़ों व पसमांदाओं का कुल प्रतिशत 85 से भी अधिक है। क्या ये लोग बौद्धिक और विचारधारात्मक स्तरों पर आगे बढ़ेंगे ? क्या वे अपनी शक्ति और क्षमता को पहचानेंगे और वह कर सकेंगे जो लालू, नीतीश और रामविलास नहीं कर सके।

(फारवर्ड प्रेस के जनवरी, 2013 अंक में प्रकाशित)


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