झारखंड : नौकरशाह कर रहे कुर्मी जाति से छल

कुर्मियों की आबादी छोटानागपुर यानी झारखंड के लगभग सभी जिलों में निवास करती है। अब जब उत्तरी शब्द को छोटानागपुर में जोड़ दिया गया है तो सिर्फ कुर्मियों की आधी आबादी ही शामिल होगी, तब दक्षिणी छोटानागपुर में निवास कर रहे कुर्मियों का क्या होगा?

झारखंड में कुर्मी जाति द्वारा उन्हें अनुसूचित जनजाति में शामिल करने के लिए समय-समय पर आंदोलन होता रहा है। हाल के दिनों में झारखंड कैबिनेट ने छोटानागपुर के कुर्मियों को अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में शामिल करने का प्रस्ताव पारित कर दिया है। प्रस्ताव के कैबिनेट से पारित होने के बाद अब बारी आती है नौकरशाहों द्वारा केंद्र को पत्र भेजने का। लिहाजा एक नौकरशाह ने पत्र के द्वारा केंद्र को झारखंड कैबिनेट की अनुशंसा भेजी तो पत्र में लिख दिया कि उत्तरी छोटानागपुर के कुर्मियों को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने की अनुशंसा की गई है। जाहिर है कि पत्र में छोटानागपुर के पहले उत्तरी शब्द लगा देने से दक्षिणी छोटानागपुर में निवास कर रहे कुर्मियों को अनुसूचित जनजाति में शामिल नहीं किया जाएगा। जबकि झारखंड कैबिनेट की अनुशंसा थी कि छोटानागपुर के कुर्मियों को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने की।

उल्लेखनीय है कि बिहार के दक्षिणी हिस्से में छोटानागपुर के नाम से जो भूभाग है वही ऐतिहासिक झारखंड का बड़ा हिस्सा है जिसके साथ भागलपुर प्रमंडल का एक जिला संथाल परगना, जिसका जिला मुख्यालय दुमका है, को जोड़कर वर्तमान झारखंड राज्य बना है। 1961 की जनगणना के अनुसार धनबाद, रांची, हजारीबाग, पलामू व सिंहभूम ये पांच जिलों को मिलाकर जो भू-भाग है उसे ही छोटानागपुर कहा जाता था। 1981 की जनगणना में हजारीबाग जिले से कटकर जिला बना गिरिडीह को भी शामिल किया गया, अत: अब जो भूभाग बचा है, कुछ को छोड़कर जो छोटानागपुर है उसे ही झारखंड राज्य कहते हैं। कुर्मियों की आबादी छोटानागपुर यानी झारखंड के लगभग सभी जिलों में निवास करती है। अब जब उत्तरी शब्द को छोटानागपुर में जोड़ दिया गया है तो सिर्फ कुर्मियों की आधी आबादी ही शामिल होगी, तब दक्षिणी छोटानागपुर में निवास कर रहे कुर्मियों का क्या होगा?

गौरतलब है कि कुछ वर्ष पहले झारखंड सरकार द्वारा केंद्र को एक पत्र भेजा गया था, उस पत्र में भी एक नौकरशाह ने कुर्मियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने की बात लिख भेजी थी, जबकि कुर्मी जाति के लोग अनुसूचित जनजाति में शामिल किए जाने के लिए आंदोलनरत रहे हैं। प्रश्न उठता है कि कैबिनेट की अनुशंसा के साथ बार-बार नौकरशाहों द्वारा ये कैसा मजाक किया जा रहा है। बार-बार ऐसा करना जान-बूझकर की गई गलती है। सरकार को ऐसी गंभीर घटना पर स्वत: संज्ञान लेना चाहिए और इसकी जांच करनी चाहिए तथा जांचोपरांत दोषी को सजा देनी चाहिए, अन्यथा भविष्य में भी कैबिनेट द्वारा पारित प्रस्ताव का यूं ही मजाक उड़ाया जाता रहेगा जिससे राज्य की छवि खराब होती रहेगी।

(फारवर्ड प्रेस के जनवरी, 2013 अंक में प्रकाशित)


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