‘शेष प्रश्न’ की कमल

शेष प्रश्न पर रूढ बंगाली भद्रलोक ने पाबंदी लगा दी थी। लड़कियों को यह उपन्यास पढने से मना किया गया, क्योंकि कमल एक अदभुत विद्रोही पात्र की तरह उभरी थी। ऐसा लगता है इस पात्र द्वारा शरतचंद्र अपनी ही परंपरा से छलांग लगा कर रवीन्द्रनाथ टैगोर की परंपरा में शामिल हो जाते हैं

उम्र के इस पड़ाव पर किसी एक उपन्यास, किसी एक कहानी या किसी एक पात्र का चयन करना मुश्किल होता है। जब मैं तरुणाई में था और गोर्की का उपन्यास मदर पढा था तब उसका नायक पावेल वर्षों तक दिल-दिमाग पर हावी रहा। ऐसी बात नहीं कि आज मदर या पावेल का प्रभाव मन पर नहीं है लेकिन जब आप सैकड़ों-हजारों उपन्यासों से गुजर चुके होते हैं तब यह तय करना कठिन होता है कि आप किनसे कितना प्रभावित हैं। अनेक उपन्यास और कहानियां हैं जिनके संवादों और पात्रों के चरित्र ने हमें उमंग-उल्लास से भरा है या फिर रुलाया है। आलोचक रामविलास शर्मा का मानना है कि महत्वपूर्ण वे रचनाएं होती हैं जो हमें सोचने के लिए विवश करती हैं। संयोग से मेरी अपनी पसंद की रचनाएं भी इसी प्रकार की हैं। मैं यहां शरतचंद्र के उपन्यास शेष प्रश्न के केंद्रीय पात्र कमल को अपनी पसंद के पात्रों में रखना चाहूंगा। बांग्ला उपन्यासकार शरतचंद्र नारी मन के चितेरे कहे जाते हैं। रामविलास शर्मा का तो कहना है कि उन्हें पढकर हम पंद्रह मिनट रोते हैं व पांच मिनट सोचते हैं। मतलब यह कि शरतचंद्र भावना का उद्रेक करते हैं। विचारों का नहीं।

लेकिन उनका उपन्यास शेष प्रश्न ऐसा उपन्यास है जिसे पढकर हम सोचते ही नहीं, सोचते रह जाते हैं। इसी उपन्यास की मुख्य पात्र है कमल जो एक विदेशी पिता और हिन्दुस्तानी माता की संतान है। बला की खूबसूरत और प्रखर बौद्धिक। समाज से भरपूर तिरस्कृत। जाति और वर्ण वाले भारतीय समाज में किसी खांचे में फिट नहीं बैठती। लेकिन विचारों से ऐसी कि आज 21वीं सदी में वह उपन्यास पढना हमें उमंग और उत्साह से भर सकता है। कमल आज भी हमारे संस्कारों को झकझोर सकती है। विचारों से इतनी सशक्त, सुबुद्ध और प्रज्ञावान है कि विषम स्थितियों में भी उत्तेजित नहीं होती। वह जानती है कि पूरा समाज उसके लिए घृणा पालता है। बावजूद इसके उसी समाज से प्रेम करती है। लगभग लंपट प्रवृत्ति के संगीत शिक्षक शिवनाथ से उन्होंने विवाह किया है, जिसके कारण समाज की कुछ ज्यादा ही नजर उन पर है। उस आशु बाबू के यहां उनका आना-जाना आरंभ होता है जो बांग्ला नवजागरण से गहरे प्रभावित हैं और जिनका घर विभिन्न प्रकार के बुद्धिजीवियों का केंद्र बना हुआ है।

आशु बाबू की बेटी नीलिमा कमल को चरित्रहीन मानती है और अपने पिता से कहती है कि ऐसे लोगों को अपने यहां न आने दें। लेकिन वही नीलिमा कालांतर में शिवनाथ के साथ भाग जाती है और इसके कारण आशु बाबू कमल के सामने लज्जित हैं। लेकिन कमल को तो कोई चिंता ही नहीं है। हर विषय की उसकी अपनी व्याख्या है। उसे न शिवनाथ पर रंज है न नीलिमा पर। कमल विवाह-व्यवस्था पर भी प्रश्न खड़े करती है और बताती है कि जिस विवाह में स्थायी भाव हो उसमें सौंदर्य का अभाव होता है क्योंकि सुंदर चीजें स्थायी नहीं हुआ करतीं। खूबसूरत फूल अंतत: झड़ जाते हैं। स्थायित्व पत्थर होना होता है।

शेष प्रश्न 1930 के लगभग लिखा गया था। जब बांग्ला नवजागरण एक नया मोड़ ले रहा था। 20वीं सदी के आरंभ में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने गीताजंलि और घर-बाइरे लिखकर राष्ट्रीय आंदोलन पर प्रश्नचिन्ह खड़े किए थे। शरत बाबू इन दिनों देवदास और चरित्रहीन के द्वंद्व में उलझे थे। इसी बीच उनका उपन्यास पाथेरदावी भी आया, जिसे व्याकुल राष्ट्रवादियों ने अपना कंठहार बना लिया। कहते हैं सुभाषचंद्र बोस को यह उपन्यास बहुत प्रिय था। भारतीय जनसंघ, वर्तमान भाजपा के पूर्व अवतार के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी के प्रेस से यह उपन्यास प्रकाशित हुआ था और अंग्रेजी सरकार ने इसकी प्रतियां प्रेस से उठवा ली थीं। शरतचंद्र भी कुछ समय के लिए व्याकुल राष्ट्रवादियों के अंदाज में आ गए थे। उन्होंने पत्र लिखकर रवीन्द्रनाथ टैगोर से हस्तक्षेप करने का आग्रह किया लेकिन टैगोर ने पत्र द्वारा ही शरतचंद्र को झिड़की दी। इस पत्र-व्यवहार ने दोनों बड़े लेखकों के संबंधों में खटास ला दी थी। किन्तु 5 वर्षों के बाद यही शरत शेष प्रश्न लिखते हैं और व्याकुल राष्ट्रवादियों की जमात से बाहर निकल जाते हैं।

शेष प्रश्न पर रूढ बंगाली भद्रलोक ने पाबंदी लगा दी थी। लड़कियों को यह उपन्यास पढने से मना किया गया, क्योंकि कमल एक अदभुत विद्रोही पात्र की तरह उभरी थी। ऐसा लगता है इस पात्र द्वारा शरतचंद्र अपनी ही परंपरा से छलांग लगा कर रवीन्द्रनाथ टैगोर की परंपरा में शामिल हो जाते हैं। कमल जैसे चरित्र को रोकने के लिए जिस बंगाली भद्रलोक ने सामाजिक पाबंदी लगायी थी, बाद के दिनों में ऐसी ही लड़कियों से पूरा बंगाली समाज भर गया। बांग्ला नवजागरण के फूल की तरह कमल का चरित्र हमारे सामने आता है। बंगाल के अनुशीलन समाज ने जिस राष्ट्रीयता की व्याख्या की थी कमल उसकी सारगर्भित आलोचना करती है। इस उपन्यास के प्रकाशन का समय भगत सिंह की शहादत का समय भी है। पूरा देश शहादत के सम्मान में झुका था। गांधी और दूसरे सारे राष्ट्रीय नेता हाशिए पर डाले जा चुके थे तब शेष प्रश्न के पृष्ठों पर कमल ऐसे ही एक पात्र हरेन्द्र की शहादत पर टिप्प्णी करती है। मूर्खता का अंत ऐसे ही होता है।

(फारवर्ड प्रेस के फरवरी, 2013 अंक में प्रकाशित)


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