सारांश : फुले एवं बलिराजा प्रस्ताव

फुले, मार्क्स एवं आंबेडकर सभी का यही विचार था कि भारत को पटरियाँ बदल लेनी चाहिए … एक वैकल्पिक सांस्कृतिक सलाहकार के प्रति निष्ठावान बनने के द्वारा

समय का केंद्र, कार्य, योग्यता, शिक्षा, महिलाएँ, समुदाय की भावना, नैतिकता और विश्वदृष्टि और नागरिक बहुलतावाद के आठ सांस्कृतिक आयामों के द्वारा हमने प्रगति-उन्मुख तथा प्रगति-रोधक संस्कृतियों के विश्वदृष्टि मुद्दों पर गौर किया है। एलेन पेयरेफीत के विश्व ट्रेन स्टेशन की हॉन्टिंग (बार-बार याद आने वाली) नीतिकथा पर यहाँ विचार किया गया है कि किस प्रकार एक रेलगाड़ी, स्विट्जरलैंड, स्टेशन से निकल गई, जबकि एक दूसरी रेलगाड़ी, नेपाल, वहीं रुकी रही।

आठ आयामों को रेलगाडिय़ों के प्रतीक से जोडऩा विश्व ट्रेन स्टेशन के 500-वर्षीय इतिहास के सबक के लिहाज से महत्त्वपूर्ण है : अगर कोई संस्कृति पटरियाँ बदलने को तैयार है तो सांस्कृतिक रूपांतरण निश्चित तौर पर संभव है।

हम जानते हैं कि व्यक्ति पटरियाँ बदल सकते हैं। दक्षिण एशिया के लोगों ने आमतौर पर शिक्षा, विदेश प्रवास, तथा/या धर्मांतरण के जरिए से पटरियाँ बदली हैं। भारतीय लोग इसके स्पष्ट उदाहरण हैं। अपने आप पर छोड़ दिए गए और अपने आप से उठाए गए भारतीयों की बात करें तो इस अंतर के कई प्रमाण हमें नजर आते हैं – चाहे ऐतिहासिक रूप से आंबेडकरों और टाटाओं की बात हो या इस पीढ़ी में युगांडा से इंग्लैंड में आकर बसे भारतीय और भारतीय मूल का वैश्विक चावला परिवार हो।

जिस मुद्दे पर सवाल उठाए जाते हैं वह है कि क्या पूरी की पूरी संस्कृति इस तरह से पटरियाँ बदल सकती हैं। महात्मा फुले मानते थे कि संस्कृतियाँ पटरी बदल सकती हैं। बल्कि अपने बलिराजा प्रस्ताव में वह भारत के लिए विश्वदृष्टि पटरी बदलने का समर्थन करते थे।

फुले की अंतर्दृष्टि

हालाँकि फुले स्वयं कभी विदेश नहीं गए, लेकिन उन्होंने उन रुकावटों – विश्वदृष्टि रुकावटों – को साफ-साफ देखा जो केवल इसीलिए स्थाई और सतत बनी हुई हैं क्योंकि वे आमजन के मन-मस्तिष्क में गहरी पैठी हुई हैं। ”संस्कृति महत्त्वपूर्ण है”, इस विचारधारा के लोकप्रिय होने से सौ साल पहले ही फुले ने यह जान लिया था कि रुहानियत आधारित विश्वदृष्टियों के क्या मायने होंगे, अर्थात् ”उन शिक्षाओं के जो बचपन से ही मन में गहरी छाप डालने लगती हैं”।

हैरीसन, ग्रॉनडोना और अन्यों ने जिस बात का प्रस्ताव 21वीं सदी में रखा, फुले ने 19वीं सदी में ही उसकी सि$फारिश की थी,अर्थात् देशों के समाजशास्त्र और इतिहास का तुलनात्मक विश्लेषण। फुले का सुझाव था कि अलग-अलग समाज किस प्रकार उपासना, सोच-विचार और संबंध-निर्माण करते हैं, इस बात का वैश्विक सर्वेक्षण किया जाए। मैं इसे देशों और संस्कृतियों की उपासनादृष्टि, विश्वदृष्टि और विश्वस्थानिकी कहता हूँ।

फुले ने इस जिम्मेदारी और करुणा की उत्प्रेरक भावना का परिचय भी दिया। आज हम इसे सामाजिक और रुहानी उद्यमियों के लक्षण के रूप में देखते हैं अर्थात् कर्तव्य की भावना, वंचितों के लिए करुणा तथा उत्पीडि़तों की आवाज।

फुले ने लिखा था :

यदि हम दुुनिया के सब देशों के इतिहासों की परस्पर तुलना करें तो हम देखेंगे कि ईश्वर का भय मानने वाले भारत के शूद्र किसानों के हालात दूसरे देशों के दूसरे किसानों से निश्चित रूप से बुरे हैं। उनका स्तर तो जानवरों तक बल्कि उनसेे भी नीचे गिर चुका है।

फुले के लिखने का ढंग बहुत परिष्कृत नहीं था। लेकिन वह ईमानदार थे, अत्यधिक मेधावी और निश्चय ही अधिकांश या बहुजन भारत की रोजमर्रा की सच्चाईयों में जड़ पकड़े हुए थे। ‘किसान का कोड़ा’ नामक उनकी तुलनात्मक ऐतिहासिक आलोचना एक जमीनी, सीधा-सच्चा और लोकसमर्थक शोध है। इन्हीं वजहों से उन्हें भारत की सामाजिक क्रांति का जनक माना जाता है।

फुले-उत्प्रेरित प्रश्न

फुले की आलोचना और उनके बलिराजा प्रस्ताव के आलोक में कई सवाल खड़े होते हैं।

1. ”अधिकांश भारत में प्रगति-रोधकता के बने रहने के क्या कारण हैं?” या फिर यूँ कहें कि अधिकांश-यूरोप, अधिकांश-अमेरिका और अधिकांश-लातिन अमेरिका, अधिकांश-मध्यपूर्व एवं मध्य एशिया एवं अधिकांश-अफ्रीका के मध्य इतना अंतर क्यों है?

कौन से कारक हैं जो नेपाल को सतत रूप से प्रगति-रोधक राष्ट्र बनाते हैं? और कौन से ऐसे कारक हैं जो स्विट्जरलैंड को सतत प्रगति-उन्मुख राष्ट्र बनाते हैं? क्या जलवायु, भूगोल, मिट्टी की संरचना किसी देश की प्रगति या उसकी कमी का निर्धारण करते हैं? क्या राजनीति, अर्थव्यवस्था या समाजशास्त्र इसके पीछे हैं? या फिर भाग्य, उपनिवेशवाद, कर्म या फिर कोई लंबे समय तक चलने वाला श्राप?

अगर अधिकांश दक्षिण एशिया की जीवन परिस्थितियों के पीछे कोई कारण हैं तो वे कौन से कारण हैं? और इससे भी महत्त्वपूर्ण बात, क्या इसका कोई समाधान है?

2. ”क्या यह मुमकिन है कि किसी देश की प्रगति या प्रगति की कमी के केंद्र में वहाँ की संस्कृति हो?” फुले यही सोचते थे। और आज कई लोग यही मानते हैं। तो फिर इतिहास के 500-वर्षीय क्लासरूम से क्या सबक सीखा जा सकता है?

क्या कोई संस्कृति बदली भी जा सकती है? क्या कोई नेपाल एक स्विट्जरलैंड बन सकता है? क्या स्विट्जरलैंड कभी नेपाल था? किसी भी समाज के रोजमर्रा के जीवन पर वहाँ की उपासनादृष्टि का क्या असर पड़ता है? एक प्रगति-उन्मुख संस्कृति को ऊर्जावान बनाने वाली विश्वदृष्टि की रूपरेखा कैसी होती है? और उस विश्वदृष्टि की रूपरेखा कैसी होती है जिसका जिक्र हैरीसन, ग्रॉनडोना, बिष्ट और अन्यों ने किया था और जो प्रगति में अवरोध पैदा करती है, और एक समाज को सतत रूप से प्रगति रोधक बनाती है?

3. ”क्या पटरियाँ बदलने से भारत को कोई लाभ होगा?” गाँधी को ऐसा नहीं लगता था। लेकिन मार्क्स और आंबेडकर की सोच इसके पक्ष में थी। और आंबेडकर और गांधी के गुरु फुले भी ऐसा ही मानते थे। फुले, मार्क्स एवं आंबेडकर तीनों का यही विचार था कि भारत को पटरियाँ बदल लेनी चाहिए … एक वैकल्पिक सांस्कृतिक सलाहकार के प्रति निष्ठावान बनने के द्वारा।

भारत की सौ-साला खिड़की की बात करें (1850-1950) तो जिन चार बदलाव समर्थकों पर विचार किया गया है उनमें से केवल गाँधी ही स्टेशन पर खड़े रहने की सलाह देतेे हैं। गाँधी कहते हैं कि मनु रेलवे स्टॉप पर हमें केवल नई कुरसियों की •ारूरत है। लेकिन भारत, गाँधी बार-बार कहते हैं, उन्हीं पटरियों पर चलता रहे जो हजारों सालों से बिछी हुई हैं।

”आओ, सब सवार हो जाओ” मार्क्स दिल दहला देने वाला नारा देते हैं और एक यूटोपिया नगरी का आवाहन करते हैं। लेकिन दु:ख की बात यह है कि इतिहास ने उन्हें केवल नरकीय स्थितियो में ले जाने वाले कंडक्टर के रूप में प्रदर्शित किया है, जिनका अंतिम गंतव्य स्थान कालापानी है।

आंबेडकर एक बात तो निश्चित तौर पर जानते थे – वह मनु रेलवे स्टॉप पर मरने वाले नहीं थे। नव-बौद्ध धर्म की ओर जाने वाली उनकी पटरी का इरादा तो नेक था लेकिन वह मोटे तौर पर प्रभावहीन ही रहा। उनका महानतम योगदान तो निश्चित तौर पर यह ही कि उन्होंने कानूनी ढाँचे का पुननिर्माण किया है अर्थात् नई सेकुलर पटरियों का जिन पर स्वतंत्र भारत की कोई भी मनु रेलगाड़ी दौडऩे को बाध्य होगी।

फुले का बलिराजा प्रस्ताव

लेकिन फुले का आवाहन अलग था। आंबेडकर के अलावा और उनसे पहले, किसी भी भारतीय विचारक ने भारत की दुविधा का इतना व्यापक विश्लेषण नहीं किया था, अर्थात् राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से। किसी ने भी उस बात को पहचाना या उच्चारा नहीं था जो फुले के लिए एकदम सा$फ और अत्यावश्यक था।

केवल फुले ने ही बलिराजा प्रस्ताव सामने रखा: पटरियाँ बदलने की फुले की सि$फारिश यही थी कि भारत को बलिराजा को चुनना चाहिए,
जो उन देशों के सलाहकार थे जो फुले की नजर  में रुहानी, सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक तौर पर प्रगति-उन्मुख थे।

उस समय यह एक क्रांतिकारी प्रस्ताव था। आज भी यह अत्यधिक चौंकाने वाला प्रस्ताव है। लेकिन फुले ने इतिहास का इंतजार नहीं किया। उन्होंने अपने विचारों, शब्दों और कार्यों के द्वारा दिखाया कि नए भारत में – बलिराजा की पटरी पर चलने वाले भारत में – जीवन कैसा होगा। स्वयं फुले व्यक्तिगत तौर पर बलिराजा शताब्दी एक्सप्रेस पर सवार हो कर उस स्टेशन से बाहर आए। खुद पटरियाँ बदलने के द्वारा महात्मा फुले ने निम्नलिखित के द्वारा ”फास्ट ट्रैक” कार्य आरंभ किया

  • सभी जातियों और दलितों की शिक्षा हेतु नई सामाजिक स्पेस
  • कन्याओं के लिए शिक्षा
  • लैंगिक समता
  • एक ही कुएँ से पानी पीना
  • एक ही मेज पर जाति भेद की परवाह किए बगैर भोजन करना
  • मूर्तिपूजा, पारंपरिक ब्राह्मण पुरोहितों, दक्षिणा और दहेज के बिना विवाह संपन्न करना

फुले की बलिराजा शताब्दी 19वीं सदी में एक नमूना पेश करती थी कि किस प्रकार बलिराजा प्रस्ताव के द्वारा भारत में जीवन पर पुनर्विचार और उसकी पुनर्संरचना की जा सकती है।

जो सवाल फुले आज भी भारत के सामने और सभी मनु-पालक संस्कृतियों के समक्ष रखते हैं वह हैच का ”सुधार संबंधी” सवाल है, वह सवाल जो वैश्विक रूप से अलग-अलग जगहों पर पाए जाने वाले ”असफल” समाजों को संबोधित करता है: ”क्या पटरियाँ बदलने के द्वारा समाज के अलग-अलग वर्गों को दीर्घकालीन लाभ होंगे?” दूसरे शब्दों में, अगर भारत अपनी विश्वदृष्टि पटरियाँ बदलता है तो क्या उसका दक्षिण एशियाई जनमानस दुनिया के दूसरे राष्ट्रों के साथ जीवन के एक नए क्षेत्र में जुड़ पाएगा? क्या भारत 500-वर्षीय इतिहास के सबक के स्कूल में नया प्रवेशार्थी बन पाएगा?

और अगर वह एक वैकल्पिक सांस्कृतिक सलाहकार चुनता है तो जीवनों में क्या बदलाव आएँगे और उसके लोगों को क्या लाभ प्राप्त होंगे? क्या बलिराजा की सलाहकारी भारत और दूसरे दक्षिण एशियाई समाजों को दूसरे राष्ट्रों से जोड़ेगी की वे सब मिल कर प्रगति-उन्मुख राज्य बनें? क्या हो सकता है कि फुले का बलिराजा प्रस्ताव सदियों पुरानी प्रगति-रोधक विश्वदृष्टि रुकावटों का विकल्प भी प्रदान करे?

अंत में: ”अगर भारत में ऐसे बुद्धिजीवी,अगुवे और कार्यकत्र्ता हैं जो महात्मा फुले के बलिराजा प्रस्ताव के लाभ को देख पाते हैं, तो इस विषय पर एक वैश्विक बातचीत को आगे बढ़ाने के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए?”

जाहिर है कि एक विदेशी होने के नाते मैं यह निर्णय नहीं ले सकता कि वे कदम कौन से और कैसे होंगे। लेकिन मैं कह सकता हूँ कि पूरी दुनिया में भारत के मित्र हैं जो भारत की भलाई चाहते हैं और जो ऐसी बातचीत में भागीदार बनने में रुचि रखते हैं।

विश्वदृष्टि मुद्दे ऐसे ही होते हैं – मुद्दे जो प्रगति-उन्मुख और प्रगति-रोधक संस्कृतियों की बीच के फासले के बीचों बीच पाए जाते हैं। निश्चित तौर पर वर्मा इसी केंद्र की बात करते हैं:

21वीं सदी में भारत के उदय का निर्धारण करने वाला मुख्य मुद्दा होगा कि क्या भारत के लोगों के पास यह काबलियत है कि वे ऐसी प्रगति और विकास पर एक राष्ट्रीय सहमति बना पाएँगे जिसमें सभी भारतीयों की भागीदारी हो।

और 88 प्रतिशत भारत – दूसरा भारत, बहुजन भारत – पुकार रहा है कि यह बातचीत आगे बढ़ाई जाए। महात्मा फुले ”आने वाले समय” की ओर ताक रहे थे जब भारत बलिराजा प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार करे।

मेरा सवाल सीधा है, लेकिन संजीदा भी: क्या यह वह आने वाले समय की पीढ़ी हो सकती है जिसकी प्रत्याशा फुले कर रहे थे? वह पीढ़ी जिसमें भारत भरपूरी से फले-फूले, वह पीढ़ी जो महात्मा फुले के नारे ”आओ, सब सवार हो जाओ” का जवाब दे सके और पटरियाँ बदले?

 

(फारवर्ड प्रेस के जनवरी, 2013 अंक में प्रकाशित)


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