गंभीर मसलों का महत्व समझे हिंदी सिनेमा

साहित्य या कला की यह मजबूरी है कि वह अपने समाज के विविध पहलुओं को नजरंदाज कर अपनी ताजगी लंबे समय तक बरकरार नहीं रख सकता

पिछले 15-16 सालों में हिंदी सिनेमा का जिस तरह विकास हुआ है उसने उसे फार्म के स्तर पर तो थोड़ा-बहुत समृ़द्ध किया है लेकिन उसकी चौहद्दी को इतना संकरा कर दिया है कि हिन्दुस्तान जैसे व्यापक और विविधतापूर्ण देश के अधिकांश मसले उससे बाहर हो गए। मध्यवर्ग, उसका जीवन, उसका सपना, उसका रोमांस और उसकी सफलता के मायावी किस्सों ने हैरतअंगेज कथा-रूप में हिंदी सिनेमा के कंटेट पर लगभग एकाधिकार-सा कर लिया। जाहिर है विषय-वस्तु के स्तर पर बहुत से मसले उसके लिए अछूत-से हो गए। लेकिन साहित्य या कला की यह मजबूरी है कि वह अपने समाज के विविध पहलुओं को नजरंदाज कर अपनी ताजगी लंबे समय तक बरकरार नहीं रख सकता। यही बात सिनेमा के संदर्भ में भी कही जा सकती है।

बीते एक साल के सिनेमा पर हम गौर करें तो पाते हैं कि यह करवट बदलकर उस तरफ अपना मुंह मोड़ रहा है जहां से थोड़ी दूरी से ही, थोड़ा धुंधला और बदले हुए रूप में ही सही, लेकिन हिन्दुस्तानी समाज दिखता है।

शुरुआत तिग्मांशु धूलिया निर्देशित ‘पान सिंह तोमर’ से होती है और बरास्ते युवा निर्देशक दिवाकर बनर्जी की ‘शंघाई’ की गलियों की भूलभूलैया में खोते-भटकते प्रकाश झा के ‘चक्रव्यूह’ में फंसते-निकलते हुए मनोरंजक अंदाज में विशाल भारद्वाज के मटरू के मनडोला गांव में बिजली गिराती है। ‘पान सिंह तोमर’, ‘शंघाई’, ‘चक्रव्यूह’ और ‘मटरू की बिजली का मनडोला’ सभी फिल्मेें एक स्तर पर जमीन अधिग्रहण के खिलाफ हैं। हिन्दुस्तान में जमीन का सवाल जाति के सवाल के बिना इकहरा और अधूरा है। जमीन बचाने की लड़ाई लड़ रहीं इन फिल्मों से छूटे जाति के अहम सवाल को उठाती है संजीव जायसवाल की ‘शूद्र’ जो बाबा साहब आम्बेडकर को समर्पित है। कुछ वर्ष पहले तक इसकी कल्पना करना भी मुश्किल थी।

पिछले साल सबसे पहले लड़ाका धावक पान सिंह तोमर अपनी जमीन और जमीर बचाने के लिए बंदूक उठाता है और बीहड़ चला जाता है। जमीन पा लेने के बाद सरेंडर कर आराम से जीवन जीने के विकल्प को वह चुन सकता था लेकिन उसे मालूम है कि सरेंडर चाहे अपने से ताकतवर लोगों के सामने करें या सरकार के सामने, जाता वह ‘जमीर’ ही खोना है जिसे प्रेमचंद ने ‘मरजाद’ कहा था। ‘शंघाई’ तक आते-आते आजाद भारत की लोकतांत्रिक सरकार खुद जमीन हड़पने वाली पार्टी बन गई। पर चूंकि लोकतंत्र है जिसका अर्थ लोगों ने भेड़ की स्वेच्छा से भेडिय़ों के हाथों शिकार होने को माना है सो पहले वह ‘विकास’ के लॉलीपॉप को दिखाकर छोटे कृषकों को खुद से जमीन देने के लिए तैयार करता है। किसानों की जमीन छीनने का यह सबसे पुराना नुस्खा है। पहले उसे कर्ज में फंसाओ, फिर विकास का झांसा दो, इसमें आ जाए तो ठीक नहीं तो दूसरे तरीके तो हैं ही। भूमि अधिग्रहण की पहली फिल्म 1946 में ख्वाजा अहमद अब्बास ने कृष्ण चंदर की कहानी पर ‘धरती के लाल’ नाम से बनाई थी। तब से लेकर ‘दो बीघा जमीन’, ‘शंघाई’, ‘चक्रव्यूह’ और ‘मटरू की… मनडोला’ तक यह हो रहा है। विकास का जो सपना ‘शंघाई’, ‘चक्रव्यूह’ और ‘मटरू…’ में राजनेता दिखाते हैं वह आजादी के तुरंत बाद विमल रॉय के ‘दो बीघा जमीन’ में जमींदार ठाकुर हरनाम सिंह के शंभू महतो को दिखाए गए सड़क-बिजली के सपने का ही परिष्कृत रूप है। पर शंभू महतो ने ‘जमीन तो किसान की मां होती है हुजूर, मां को कैसे बेच दूं’ कहकर साफ मना कर दिया था। उस वक्त जमींदार ने उसकी राजनीतिक हत्या नहीं कराई, लेकिन अपने ऋण दुष्चक्र में फंसाकर हड़प लिया। लेकिन अब वैसा नहीं है। अब तो कुछ लोग और कुछ आंदोलन यदि इसमें आड़े आते हैं तो राजनीतिक हत्याएं तक की और कराई जाती हैं (शंघाई)।


इस क्रम में ‘चक्रव्यूह’ में नक्सलवाद का खुला शंखनाद है तो ‘मटरू…’ में उसकी उथली, लेकिन काफी हद तक मनोरंजक प्रतिछाया। विशाल भारद्वाज ‘मटरू…’ तक फार्म के एक खास उत्कर्ष को पा चुके हैं लेकिन उनका कंटेंट उनके फार्म के साथ तालमेल नहीं बिठा पाता। वैसे ही जैसे इमरान खान और अनुष्का शर्मा पंकज कपूर और शबाना आजमी के अभिनय के साथ कदमताल नहीं बिठाकर एक विक्षोभ प्रस्तुत करते हैं। उनका फार्म और उनका कंटेंट एक दूसरे को कोऑपरेट नहीं कर कंट्राडिक्ट करता है। सिनेमा मनोरंजन का माध्यम है। इसलिए गंभीर कंटेंट को मनोरंजक बनाना फिल्मकार की मजबूरी है, लेकिन ऐसा वहीं तक किया जाना चाहिए जहां तक आपकी फिल्म का प्रीमाइस इजाजत देता हो। उसके आगे यदि आप बढ़े तो फिल्म में हास्य नहीं रहता, फिल्म हास्यास्पद हो जाती है, खासकर तब जब आप चीजों को ‘जाने भी दो यारो’ की तरह ब्लैक कॉमेडी से अभिव्यक्त नहीं कर रहे हैं। मटरू के साथ भी यही हुआ है।

(फारवर्ड प्रेस के फरवरी, 2013 अंक में प्रकाशित)


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