पलायन व मानव तस्करी से त्रस्त झारखंड

फर्जी प्लेसमेंट एजेंटों द्वारा राज्य की महिलाओं व बच्चों को दिल्ली, मुंबई, कोलकाता में नौकरी दिलाने के नाम पर ले जाकर बेच दिया जाता है जहां उनका शारीरिक व मानसिक शोषण होता है। सबसे आश्चर्य की बात यह है कि सरकार और प्रशासन की सोच यह है कि सिर्फ कानून बना देने से ही समस्याएं खत्म हो जाएंगी परंतु ऐसी समस्या सिर्फ कानून से हल होने वाली नहीं है

झारखंड में पलायन व मानव तस्करी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। पलायन व मानव तस्करी विकास सेे जुड़े कई विरोधाभासी मुददों में से एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। झारखंड के कुल दलित और आदिवासी आबादी की 35 प्रतिशत यानी एक तिहाई जनसंख्या पलायन को मजबूर है, जिसमें 55 प्रतिशत महिलाएं, 30 प्रतिशत पुरुष और 15 प्रतिशत बच्चे शामिल हैं। पलायन के दौरान भयंकर बीमारियां जैसे एड्स, यौन संबंधी संक्रमित रोगों का ये शिकार हो जाते हैं, जिनमें बच्चे और महिलाएं सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। ऐसी स्थिति में सरकार की विकास नीति पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है और मनरेगा या अन्य संबंधित योजनाएं व्यर्थ व बेकार प्रतीत होने लगती हैं। केंद्र व राज्य सरकार पलायन व मानव तस्करी राकने के लिए कई योजनाएं चला रही हैं, परंतु धरातल पर योजनाओं का क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा है।

राज्य में नवंबर, 2012 तक लगभग 40 हजार पासपोर्ट जारी किए जा चुके हैं तथा लगभग 10 हजार ई-पासपोर्ट जारी किए गए हैं। झारखंड के मजदूर सस्ती दरों में उपलब्ध होने के कारण मजदूरों का पलायन खाड़ी देशों में भी लगातार हो रहा है। देश के भीतर भी मजदूरों का सर्वाधिक पलायन झारखंड से ही हो रहा है।

गत 10 दिसंबर, 2012 को एक ऐसा ही मामला गिरिडीह जिला में उजागर हुआ कि 18 से 20 वर्ष के 19 आदिवासी मजदूर जम्मू व कश्मीर के लुबरा जिले के हुडर स्थित फैक्ट्री में बतौर बंधुआ मजदूर कार्यरत हैं जहां भारी सुरक्षा-व्यवस्था के बीच इन मजदूरों से जबरन काम लिया जाता है। विरोध करने पर प्रबंधन मजदूरों को शारीरिक व मानसिक रूप से प्रताडि़त कर रहा है। गिरिडीह जिला के बिरनी प्रखंड का बलगो ग्राम निवासी झूपर महतो व श्रीखन महतो उक्त भोले-भाले युवकों को दिल्ली में काम दिलाने के नाम पर अपने साथ कश्मीर ले गया और लुबरा जिले में एक पत्थर तोडऩे वाली फैक्ट्री को सौंप दिया। गिरिडीह के उपायुक्त दीप्रवा लकड़ा मजदूरों की सकुशल वापसी के लिए कश्मीर से संपर्क किए हुए हैं लेकिन अभी तक सफलता नहीं मिली है।

ऐसी ही एक घटना 3 अक्टूबर, 2012 को रांची में घटी जब रांची रेलवे स्टेशन व बस स्टैंड पर छापा मारकर लगभग 500 मजदूरों को मुक्त कराया गया था। एक मजदूर गुही उरांव ने कहा कि पिछले वर्ष वह त्रिपुरा गया था इसलिए इस वर्ष भी दो वक्त की रोटी जुटाने के लिए गया था, जब मुझे और मेरे परिवार को प्रशासन ने रोक दिया। सरकार न तो हमें काम दे रही है और न राज्य से बाहर जाने दे रही है। संभवत: गरीबी और भूखमरी का दंश झेलते मजदूर दलालों का नाम बताकर कानूनी पचड़े में पडऩा नहीं चाहते, परंतु उनके साथ जा रहा पूरा परिवार इस बात को साबित करता है कि इन्हें परिवार सहित पलायन करवाने वाला पर्दे के पीछे कोई और है।

25 दिसंबर, 2012 की रात सीआईडी, झारखंड ने दिल्ली में सात प्लेसमेंट एजेंसियों से 84 लड़के-लड़कियों को मुक्त कराने में सफलता प्राप्त की, जिसमें 78 लड़कियां हैैं और मात्र 20 बालिग हैं। मुक्त कराए गए 64 नाबालिग लड़के-लड़कियों में झारखंड की 23 लड़कियां और 6 लड़के शामिल हैं। सीआईडी आइजी संपत्त मीणा ने बताया कि काफी दिनों से शिकायत मिल रही थी कि प्लेसमेंट एजेंसियों के नाम पर नाबालिग बच्चों को दिल्ली व अन्य महानगरों में ले जाने का खेल चल रहा है। इन एजेंसियों के नाम व पते भी सीआईडी को मिले थे, इन्हीं शिकायतों पर सीआईडी ने जांच शुरू की तो कई एजेंसियां फर्जी मिले। इसके बाद विभिन्न पुलिस अधिकारियों के सहयोग से मानव तस्करी के शिकार बच्चों को मुक्त कराने के काम में लगाया गया और इसमें सफलता मिली।

उल्लेखनीय है कि फर्जी प्लेसमेंट एजेंटों द्वारा राज्य की महिलाओं व बच्चों को दिल्ली, मुंबई, कोलकाता में नौकरी दिलाने के नाम पर ले जाकर बेच दिया जाता है जहां उनका शारीरिक व मानसिक शोषण होता है। सबसे आश्चर्य की बात यह है कि सरकार और प्रशासन की सोच यह है कि सिर्फ कानून बना देने से ही समस्याएं खत्म हो जाएंगी परंतु ऐसी समस्या सिर्फ कानून से हल होने वाली नहीं है। इसके मूल में है गरीबी, जहां भूख से लोग मरने के कगार पर आ जाएं तो कानून का होना और न होना उनके लिए कोई मायने नहीं रखता है। सरकार हालांकि हर बार की तरह इस बार भी पलायन और मानव तस्करी रोकने के दावे कर रही है लेकिन अगर सरकार काम मुहैया कराती है तभी वे लोग अपने राज्य में रहेंगे अन्यथा उनका पलायन बदस्तूर जारी रहेगा।

(फारवर्ड प्रेस के फरवरी, 2013 अंक में प्रकाशित)


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