सावित्रीबाई कब मुस्कुराएंगी?

सवित्रीबाई ने वंचित वर्गों को शिक्षा भी दी और आवाज भी। उनके स्कूल अछूतों की बस्तियों के ठीक बीच में खोले जाते थे ताकि भौतिक और भावनात्मक दूरी की बाधाएं रहें ही न। उनके अनुसार, शिक्षा से हममें सही और गलत, सत्य और असत्य के बीच चुनने की क्षमता का विकास होना चाहिए

सन् 1830 के दशक में भारत में शिक्षा की क्या स्थिति थी? महाराष्ट्र के सतारा जिले में, सहयाद्री पर्वतमाला की खंडाला की पहाडिय़ों की गोद में बसे नईगांव में, जहां नीरा नदी बहती थी और भीमा नदी भी पास ही थी, राष्ट्रीय आंदोलन 70 वर्ष दूर था, सन् 1854 के ‘वुड डिस्पेच’ और 1882 के ‘हंटर आयोग’ का कोई अता-पता नहीं था। तत्कालीन साम्राज्यवादी भारत में शिक्षा के मुद्दे पर बोलते हुए थामस बेबिंग्टन मेकाले ने कहा था :

मैं आप महानुभावों के विचारों से सहमत नहीं हूं, परंतु एक मुद्दे पर मैं आपसे इत्तेफाक रखता हूं। आपकी तरह मुझे भी ऐसा लगता है कि अपने सीमित संसाधनों के चलते, हमारे लिए सभी लोगों को शिक्षित करना असंभव है। अभी तो हमें अपना पूरा ध्यान एक ऐसे वर्ग के निर्माण पर केन्द्रित करना चाहिए जो हमारे और उन लाखों लोगों-जिन पर हम शासन करते हैं-के बीच संवाद कायम करने का काम कर सके।…उस वर्ग पर हम इस देश की भाषाओं को समृद्ध करने का काम छोड़ सकते हैं, उन्हें पश्चिमी वैज्ञानिक ज्ञान से उधार लिए गए शब्दों से समृद्ध करने का काम,  ताकि धीरे-धीरे ये भाषाएं आम जनता तक ज्ञान पहुंचाने का  माध्यम बन सकें।

अंग्रेजों ने 1800 से 1830 के बीच बंगाल, पंजाब और मद्रास प्रेसीडेन्सी में भारत की शिक्षा की स्थिति का अध्ययन करने के लिए कई सर्वेक्षण करवाए थे। इन सर्वेक्षणों में देशीय स्कूलों की संख्या, विद्यार्थियों की जाति, कितने विद्यार्थी हिन्दू हैं और कितने मुसलमान, कितनी लड़कियां हैं और कितने लड़के, आदि जैसी जानकारियां एकत्रित की गईं थीं। इन सर्वेक्षणों की रपटों के अस्तित्व के बारे में जानकारी पहली बार सन् 1931 में सामने आई और इनके बारे में विस्तृत जानकारी तो 1990 के दशक में ही मिल सकी।

इनमें से किसी रपट में नईगांव का जिक्र नहीं है, जहां 1831 में सावित्रीबाई फुले का जन्म हुआ था। जैसा कि उस समय रिवाज था, सन् 1840 में, नौ वर्ष की आयु में उनका विवाह 13 वर्षीय जोतिबा फुले से कर दिया गया। इसके एक साल बाद शुरू हुई उनकी ज्ञान यात्रा। वे उन आम लोगों में से थीं, जिन्हें सीधे शिक्षित करने का मैकाले का कोई इरादा नहीं था। और यहां तो एक शूद्र किशोर पति अपने से भी छोटी, अपनी शूद्र पत्नी को पढ़ा रहा था। बाम्बे गार्जियन के 22 नवंबर, 1851 के अंक में छपी एक खबर के अनुसार, सावित्रीबाई की आगे की पढ़ाई की जिम्मेदारी जोतिबा के मित्रों सखाराम यशवंत परांजपे व केशव शिवराम भावलकर (जोशी) ने ले ली। सावित्रीबाई ने अहमदनगर स्थित सुश्री फरार के संस्थान, सुश्री मिशेल के पुणे स्थित नार्मल स्कूल व बाम्बे विश्वविद्यालय के जे. विल्सन से शिक्षण-प्रशिक्षण प्राप्त किया। सावित्रीबाई संभवत: भारत की पहली महिला शिक्षक व प्रधानाध्यपिका थीं। घर की चहारदीवारी से बाहर निकलकर सावित्रीबाई का शिक्षक बनना, एक तरह से आधुनिक भारतीय महिलाओं के सार्वजनिक जीवन में भाग लेने की शुरुआत थी। ये विचार हरी नारके के हैं जो उन्होंने सन् 2008 में एनसीईआरटी द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए व्यक्त किए थे।

भारत की स्वतंत्रता से लगभग एक शताब्दी पूर्व, सन् 1848 में, नए साल के पहले दिन, फुले दंपती ने लड़कियों, जिनमें अछूत लड़कियां शामिल थीं, के लिए पुणे में एक स्कूल खोला। युवा दंपती को समाज के लगभग हर तबके के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा। जब सावित्रीबाई अपने घर से स्कूल जाने के लिए निकलतीं थीं तो रास्ते में मर्द उन पर पत्थर, गोबर और कीचड़ फेंकते थे। सावित्रीबाई स्कूल जाते समय एक अतिरिक्त साड़ी अपने साथ रखती थीं। स्कूल पहुंचने के बाद, वे अपनी गंदगी से सनी साड़ी उतारकर, दूसरी साड़ी पहन लेतीं थीं। वापसी यात्रा में वे फिर अपनी गंदी साड़ी पहनकर जातीं थीं। अगले ही साल, फुले दंपती ने सभी जातियों के वयस्कों, विशेषकर शूद्रों व अतिशूद्रों (अछूतों), के लिए स्कूल खोला। समाज में उनकी बढ़ती आलोचना के चलते, सावित्रीबाई के ससुर ने फुले दंपती को बाहर का रास्ता दिखा दिया।

इस साहसिक कदम के डेढ़ सौ साल बाद, स्वतंत्र भारत में क्या स्थिति है ? क्या सावित्रीबाई फुले ने हर तरह की मुसीबतों का सामना करते हुए जो बड़ा कदम उठाया था-क्या वह कदम भारत में महिलाओं, दलितों, पिछड़ों व समाज के हाशिए पर पटक दिए वर्गों के लिए शिक्षा हासिल करने का प्रेरणास्रोत बन सका है ?

सावित्रीबाई के योगदान के संबंध में शिक्षा-संबंधी समकालीन साहित्य की चुप्पी, हमारी सोची-समझी अज्ञानता की प्रतीक है और इस चुप्पी को औचित्यपूर्ण सिद्ध करने के लिए हमारे पास कोई वाजिब तर्क नहीं है। उन्होंने वचिंत वर्गों की शिक्षा के लिए जो राह गढ़ी थी, वह भी ऐसे समय में जब हम न तो स्वतंत्र थे और न ही हमारा कोई संविधान था, इस तथ्य को रेखांकित करता है कि सन् 2002 के 86वें संवैधानिक संशोधन व शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009, जिसके अंतर्गत 6-14 आयु वर्ग के सभी बच्चों को मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा का कानूनी हक दिया गया है, के बावजूद, शिक्षा के सर्वव्यापीकरण का हमारा अभियान कितना कमजोर है।

 साक्षरता दर 2006 –

आयु वर्ग (वर्ष)हिन्दू सामान्यहिंदू-ओबीसीहिंदू अनु.जाति/जनजातिमुस्लिम
6-1390.280.874.774.6
14-1595.787.580.079.5
16-1795.085.278.675.5

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन 61वा दौर अनुसूची 10 (2004-05)-सच्चर समिति रपट 2006

अनुसूचित जाति व ओबीसी शिक्षक 

कुल शिक्षकों में अनुसूचित जनजातियों के शिक्षकों का प्रतिशतकुल शिक्षकों में ओबीसी शिक्षकों का प्रतिशत
2008-20099.46%34.23%
2009-20109.41%33.43%
2010-20119.35%32.45%

आयु वर्ग के अनुसार, साक्षरता दर के वर्तमान आंकड़े, स्वतंत्र भारत में शिक्षा के क्षेत्र में किए गए प्रयासों की असलियत बयान करते हैं। भारत में साक्षर कहलाने के लिए व्यक्ति को बहुत कम सीखना होता है परंतु उस निम्न मानक के अनुसार भी, स्कूल जाने की आयु (6-14 वर्ष) के बच्चों में समुदाय के आधार पर बहुत अंतर हैं। सामान्य वर्ग के बच्चों की साक्षरता दर सबसे अधिक है। उसके बाद आते हैं ओबीसी बच्चे, फिर अनुसूचित जातियों/जनजातियों के बच्चे और अंत में मुसलमानों के बच्चे।

वंचित वर्गों के खिलाफ भेदभाव की गहरी जड़ों के प्रकाश में एससी-एसटी व ओबीसी समुदायों के अध्यापकों की उपस्थिति से बच्चों के आत्मविश्वास में काफी वृद्धि होती है। परंतु कुल शिक्षकों में एसटी व ओबीसी अध्यापकों के अनुपात में हल्का सा नकारात्मक रूझान देखा जा सकता है (देखें तालिका)।

स्कूलों में प्रवेश लेने वाली लडकियाँ  (%)

 अजा.अजजा.ओबीसीमुस्लिम
भारत200920102011200920102011200920102011200920102011
आंध्रप्रदेश48.3148.4548.5048.0148.3348.4348.2248.4248.5248.9348.9649.06
गुजरात49.6349.5349.1847.7247.7447.8649.5549.3748.9649.7149.1849.72

इस संदर्भ में एक परेशानी यह है कि अध्यापकों को अस्थायी, संविदा आधार पर नियुक्त करने का चलन बढ़ता ही जा रहा है, यद्यपि अखिल भारतीय स्तर पर इस प्रवृत्ति में कुछ कमी परिलक्षित हो रही है। तथाकथित ‘संविदा शिक्षक’ अधिकतर कम योग्यताधारी होते हैं और इससे स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है।

शिक्षा का अधिकार अधिनियम के वावजूद लड़कियों की भर्ती दर में कमी आई है। स्कूलों में भर्ती होने वाले विद्यार्थियों का लैंगिक अनुपात, सन् 2008 से 2011 तक, किसी जिद्दी बच्चे की तरह 0.94 पर टिका हुआ है। उच्च प्राथमिक स्तर पर यह सन् 2008 में 0.91 से बढ़कर 0.94 हो गया है परंतु ये दोनों ही आंकड़े आदर्श 1.0 से बहुत कम हैं। प्राथमिक स्कूलों में प्रवेश लेने वाले एससी-एसटी व ओबीसी विद्यार्थियों में इन समुदायों की लड़कियों का प्रतिशत, अखिल भारतीय स्तर पर तो कुछ बढ़ा है परंतु कुछ राज्यों में थोड़ा कम भी हुआ है।

सन् 2009-10 में 7.13 प्रतिशत लड़कों और 6.37 प्रतिशत लड़कियों ने बीच में ही पढ़ाई छोड़ दी। यह महत्वपूर्ण है कि पढ़ाई जारी रखने वाले बच्चों की दर (कक्षा 1-5) सन् 2008 से 2011 के बीच लगातार गिरती रही है। जिन राज्यों में एससी-एसटी या/और ओबीसी समुदायों की बड़ी आबादी है वहां के आधे से लेकर दो तिहाई तक बच्चे प्राथमिक शिक्षा पूरी नहीं करते।

इन निराशाजनक आंकड़ों के पीछे क्या कारण हैं? कक्षाओं में वंचित समूहों के बच्चों को तानाकशी का सामना करना पड़ता है। अध्यापक उनकी ओर ध्यान नहीं देते। एससी बच्चों के लिए स्कूल की दूरी एक बड़ी समस्या है, क्योंकि अक्सर वे गांवों के बाहरी हिस्से में रहते हैं। इस भौतिक दूरी के अतिरिक्त, ‘सामाजिक दूरी’ भी उनके रास्ते में बाधक है। एससी समुदायों के बच्चे कई बार इसलिए भी स्कूल नहीं जा पाते, क्योंकि स्कूलों के भवन प्रभुत्वशाली जातियों के घरों के नजदीक होते हैं। ऐसी स्थिति में यदि स्कूल की भौतिक दूरी एक किलोमीटर से कम भी हो तब भी जातिगत ऊंच-नीच स्कूल के रास्ते को और लंबा बना देते हैं।

स्कूलों तक पहुंच की समस्या को और बढ़ाती है अध्यापकों की मानसिकता। भारत में अधिकांश शिक्षक ऊंची जातियों के होते हैं और वे अपने साथ लाते हैं ऊंच-नीच का अपना गणित और ढ़ेर सारे पूर्वाग्रह। कक्षा में इस मानसिकता और पूर्वाग्रहों के चलते, छोटे-छोटे एससी-एसटी व ओबीसी बच्चों को भावनात्मक, मनोवैज्ञानिक और शारीरिक कष्ट भोगने पड़ते हैं। जिन स्कूलों में मुख्यत: एससी-एसटी बच्चे पढते हैं उनमें से अधिकांश एक या दो अध्यापकों वाले स्कूल हैं। इनमें संसाधनों की भारी कमी रहती है और अध्यापक अक्सर स्कूल से गायब रहते हैं। कई अध्ययनों और ग्रामीण क्षेत्रों के निवासियों के अनुभव के आधार पर यह कहा जाता है कि ग्रामीण स्कूलों में अध्यापक अगर स्कूल आते भी हैं तो वे दो घंटे से अधिक वहां नहीं रुकते।

एससी बच्चों को अन्य बच्चों से अलग बैठाया जाता है और एससी-एसटी बच्चों को क्लासरूम को बुहारने का काम भी करना पड़ता है। हम अपने बच्चों को नहला-धुला कर, साफ कपड़े पहनाकर स्कूल भेजते हैं और वहां अध्यापक उनसे भी ऊंची झाड़ू पकड़ाकर उनसे स्कूल की सफाई करवाते हैं, और फिर शिकायत करते हैं कि हमारे बच्चे धूल से सने और गंदे रहते हैं। नई दिल्ली के आरके पुरम में रहने वाली अनुसूचित जाति की एक मां कहती हैं-उत्तरप्रदेश, बिहार, आंध्रप्रदेश और कई अन्य राज्यों के वंचित वर्गों के लोगों की भी यही शिकायत है।

कम से कम एक तिहाई बच्चे इसलिए स्कूल नहीं जाते, क्योंकि वे अपनी तथाकथित ‘मुफ्त शिक्षा’ का खर्च नहीं उठा सकते। जो लड़के कभी स्कूल नहीं गए, उनमें से एक तिहाई का कहना है कि उन्हें पढऩे-लिखने में कोई रुचि नहीं है। अगर हम इसमें उन बच्चों को भी शामिल कर लें जिन्होंने स्कूल में प्रवेश तो लिया परंतु बाद में उसे छोड़ दिया, तो शिक्षा में अरुचि के कारण पढ़ाई न करने वाले विद्यार्थियों का अनुपात बढ़कर 2:5 हो जाता है। यह कारण उन लड़कों के संबंध में तो स्वीकार्य हो सकता है जो कि कभी स्कूल न जाने के कारण शिक्षा के बारे में कुछ नहीं जानते परंतु उन बच्चों का क्या जो प्राथमिक स्कूली शिक्षा के अनुभव से गुजरे और इस नतीजे पर पहुंचे कि उसमें उनकी रुचि का कुछ भी नहीं है। लड़कियों के मामले में शिक्षा को अप्रसांगिक मानने वालों का अनुपात और अधिक है। यह प्रवृत्ति इस बात की द्योतक है कि हम जो शिक्षा अपने बच्चों को दे रहे हैं वह उन्हें प्रासंगिक या उपयोगी नहीं लगती। लड़कियों का एक बड़ा तबका घर के काम में मदद करने की अनिवार्यता के चलते या तो स्कूल जाता ही नहीं है और या फिर बीच में ही पढ़ाई छोड़ देता है। यदि सावित्रीबाई आज होतीं और उन्हें ऐसी ही या इनसे भी कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ता, तो वे क्या करतीं? यह समझने की आवश्यकता है कि किसी व्यक्ति का अपने बच्चों को स्कूल भेजने या न भेजने के निर्णय को स्कूली शिक्षा के संदर्भ में वंचित वर्गों की अधिकारविहीनता व उनकी राय को कोई महत्व न दिए जाने से जोड़कर देखा जाना चाहिए।

सवित्रीबाई ने वंचित वर्गों को शिक्षा भी दी और आवाज भी। उनके स्कूल अछूतों की बस्तियों के ठीक बीच में खोले जाते थे ताकि भौतिक और भावनात्मक दूरी की बाधाएं रहें ही न। उनके अनुसार, शिक्षा से हममें सही और गलत, सत्य और असत्य के बीच चुनने की क्षमता का विकास होना चाहिए।

‘जाओ, जाकर पढ़ो-लिखो,
बनो आत्मनिर्भर, बनो मेहनती,
काम करो-ज्ञान और धन इकटठा करो,
ज्ञान के बिना सब खो जाता है,
ज्ञान के बिना हम जानवर बन जाते हैं,
इसलिए, खाली न बैठो, जाओ, जाकर शिक्षा लो,
दमितों और त्याग दिए गयों के दु:खों का अंत करो,
तुम्हारे पास सीखने का सुनहरा मौका है,
इसलिए सीखो और जाति के बंधन तोड़ दो,
ब्राहम्णों के ग्रंथ जल्दी से जल्दी फेंक दो,

क्या इस तरह की शिक्षा में कोई दिलचस्पी न ले, ऐसा संभव है ? इस कविता के आगे स्कूल चलें हम कितना लचर सा दिखता है।
सवित्रीबाई ने लड़कियों को स्कूल की ओर आकर्षित करने में सफलता पाईं। आज का भारत भी यह नहीं कर पा रहा है। पूना आब्जर्वर के 29 मई, 1852 के अंक में छपे एक लेख में कहा गया था, जोतिराव के स्कूल में पढऩे वाली लड़कियों की संख्या, सरकारी स्कूलों में पढऩे वाले लड़कों से दस गुना ज्यादा है। इसका कारण यह है कि जोतिराव के स्कूल में लड़कियों को पढ़ाने का तरीका, सरकारी स्कूलों में लड़कों को पढ़ाने के तरीके से बहुत बेहतर है। अगर ऐसा चलता रहा तो जोतिराव के स्कूल से पढ़कर निकलने वाली लड़कियां, सरकारी स्कूलों के लड़कों से कहीं अधिक होशियार और बेहतर होंगी। जोतिराव को ऐसा लगता है कि वे जल्द ही यह बड़ी सफलता प्राप्त कर लेंगे। अगर शासकीय शिक्षा बोर्ड इस मामले में कुछ नहीं करता तो पुरुषों को मात देने वाली इन महिलाओं को देखकर हमारे सिर शर्म से झुक जाएंगे।

अंग्रेजी और अन्य विषयों के अलावा, जोतिराव और सावित्रीबाई का जोर लड़कियों और लड़कों को रोजगारमूलक शिक्षा देने पर था ताकि उनके छात्र आत्मनिर्भर बन सकें, वे दमित श्रमिक न रहें बल्कि स्वतंत्र सोच वाले नागरिक बनें। सन् 1852 में जोतिराव और सावित्रीबाई ने लिखा, ‘हर स्कूल से जुड़ा हुआ एक उद्योग विभाग होना चाहिए, जहां बच्चे कोई हुनर हासिल कर सकें ताकि स्कूल छोडऩे के बाद वे स्वतंत्रतापूर्वक सुखी जीवन बिता सकें। फुले दंपती ने बिल्कुल ठीक अंदाजा लगाया था कि गरीबी के कारण बच्चे स्कूल नहीं आते। इसलिए उन्होंने विद्यार्थियों के लिए प्रतीकात्मक वेतन की व्यवस्था की और ऐसा पाठ्यक्रम तैयार किया जो लड़कियों और लड़कों की रुचियों के अनुरूप था और उनकी रचनात्मकता को बढ़ावा देता था। उनके स्कूल की एक छोटी सी लड़की जब अपना इनाम लेने मंच पर पहुंची तो उसने मुख्य अतिथि से कहा, श्रीमान, मुझे खिलौने या कोई और उपहार नहीं चाहिए। मुझे हमारे स्कूल के लिए एक लाईब्रेरी चाहिए।

क्या सावित्रीबाई मुस्कुराएंगी ? शायद। बशर्तें हम सामूहिक रूप से उनके बताए सही पथ पर चलने की समझदारी दिखाएं। उन्होंने हमें सिखाया था कि शिक्षा सर्वव्यापी है। अर्थात, जिन लोगों की चर्चा पाठ्यक्रमों में नहीं है, उनके इतिहास और अनुभव भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं, यह समझने के लिए कि बराबरी और शक्ति समीकरणों के संबंध में आज जो स्थिति है, वह क्यों और कैसे बनी। उन्होंने विद्यार्थियों, उनके अभिभावकों और शिक्षकों को भेदभाव से लडऩे का हथियार दिया। उनके हथियार : हम क्लासरूम की दीवारों पर किनकी तस्वीरें लगाते हैं ? किस तरह के त्योहार मनाए जाते हैं ? नियम क्या हैं और विद्यार्थियों से क्या अपेक्षाएं हैं ? किस तरह का व्यवहार स्वीकार्य है? किस तरह की बातचीत को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए? बच्चों को क्लासरूमों में किस तरह बिठाया जाना चाहिए।

सावित्रीबाई ने इस तथ्य को वांछित महत्व दिया कि प्रभुत्वशाली संस्कृति मात्र कई संस्कृतियों में से एक है। वह हमारी एकमात्र संस्कृति नहीं है। परंतु उस संस्कृति को दूसरी या अलग संस्कृति नहीं कहा जाता। उसे मानक या असली संस्कृति का दर्जा दे दिया जाता है। यदि हमारी शिक्षा व्यवस्था को भेदभाव से मुक्त किया जाना है तो इस सोच को परे हटाकर हमें सभी सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्यों के लिए जगह बनानी होगी।

सावित्रीबाई का शिक्षा के क्षेत्र में क्या योगदान था, यह समझने की शुरुआत भी करने के पहले हमारे नीति निर्माताओं, नागरिक समाज, शिक्षाविदों, स्कूली शिक्षकों व अभिभावकों को बिना किसी लाग-लपेट के यह स्वीकार करना होगा कि हमारी शिक्षा व्यवस्था और दुनिया को देखने के नजरिए में सांस्कृतिक पूर्वाग्रह घुले हुए हैं। उन्हें यह समझना होगा कि प्रभुत्वशाली संस्कृतियों और उनके पूर्वाग्रहों का असर समाज के कमजोर, वांछित या हाशिए पर रह रहे समुदायों के प्रति उनके दृष्टिकोण पर पड़ रहा है। उन्हें यह भी समझना होगा कि जिस सोच को वे सार्वभौमिक समझते हैं दरअसल वह सीमित है। असली सार्वभौमिक सोच अपनाने के पहले उन्हें पहले सीखे गए सबक भुलाने होंगे और नए सिरे से चीजों को पढऩा-समझना होगा। उन्हें हाशिए पर पटक दिए गए स्वर-विहीन समुदायों से विनम्रतापूर्वक सीखना होगा। अगर वे ऐसा नहीं करेंगे तो वे हमेशा अधूरे और पुरातनपंथी बने रहेंगे।

तो, सावित्रीबाई कब मुस्कुराएंगी ? तब हम बदलाव के लिए अपनी कमर कस लेंगे।

(फारवर्ड प्रेस के जनवरी, 2013 अंक में प्रकाशित)


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