फॉरवर्ड विचार : फरवरी 2013

एफपी ने अकसर खास दलितबहुजन परिप्रेक्ष्य से मुख्यधारा के मीडिया के विश्लेषण पेश किए है΄। इस अंक से शुरुआत करते हुए, एफपी ‘जन मीडिया’ शीर्षक से एक नियमित स्तंभ शुरू कर रहा है जिसे जाने-माने मीडिया शोधार्थी अनिल चमडिय़ा लिखेंगे। इस बार वह इस पर फोकस कर रहे  है΄ कि मीडिया नही΄ छापता, खासतौर पर दलितबहुजन और जनोन्मुख घटनाओं और आंदोलनो΄ के बाबत

सोलह दिसंबर, 2012 को दिल्ली मे΄ युवती के साथ सामूहिक बलात्कार और, प्रभावी रूप से, हत्या का खबरों΄ मे΄ आना अब भी जारी है। प्रेस में जाते समय बलात्कार और संबंधित यौन हिंसा पर आई जस्टिस जे. एस. वर्मा समीति रिपोर्ट और सिफारिशों का विश्लेषण हो रहा है। साल के आखिर मे΄ जब प्रदर्शन चरम पर  पहुँच रहे थे, एक संक्षिप्त बातचीत मे΄ एफपी के प्रबंध संपादक  प्रमोद रंजन ने मुझे प्रदर्शनों समेत इस पूरी परिघटना पर अपने अनूठे विश्लेषण से अवगत करवाया। उसके बाद मैंने निर्णय लिया कि फॉरवर्ड प्रेस की फरवरी की आवरण कथा इस घटना और परिघटना पर के΄द्रित होगी। तब से अब तक मैंने इस विषय पर चल रहे विस्तृत विमर्श को ध्यान से पढ़ा और सुना और मुझे उनका परिप्रेक्ष्य सुनना अभी बाकी है। और जब हम आवरण कथा तैयार कर रहे थे तो हमे΄ जेएनयू शोधार्थी मुख्तियार सिंह का एक दूसरा विश्लेषण प्राप्त हुआ। वह एक अनुपूरक लेख के रूप मे΄ था। तो इस बार एफपी आपको ”एक के दाम मे΄ दो” आवरण कथाएँ पेश कर रहा है, या फिर इसे हमारे समाज की वास्तविक मुक्ति के लिए दोनाली बंदूक के वार के रूप मे΄ देखें – जो फुले के प्राथमिकता क्रम मे΄, स्त्री, अति-शूद्र और शूद्र  के रूप मे΄ आती है।

भारत के सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों की सांस्कृतिक जड़ों पर एफपी के फोकस को आगे बढ़ाते हुए, हम डॉ. लेल्ला करुण्याकारा, महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा से आपका परिचय करवा रहे हैं। मुलायम सिंह यादव द्वारा दलित-बहुजन एकता को तोडऩे, पदोन्नति में एससी-एसटी आरक्षण का विरोध करने का विश्लेषण करते हुए, वह एक नई परिकल्पना और नया लेबल प्रस्तुत कर रहे हैं, ”धर्मनिरपेक्ष जातिवाद” – इस मामले में शूद्र खिंचाव वाला।

एफपी ने अक्सर खास दलित-बहुजन परिप्रेक्ष्य से मुख्यधारा के मीडिया के विश्लेषण पेश किए हैं। इस अंक से शुरुआत करते हुए, एफपी ‘जन मीडिया’ शीर्षक से एक नियमित स्तंभ शुरू कर रहा है, जिसे जाने-माने मीडिया शोधार्थी अनिल चमड़िया लिखेंगे। इस बार वह इस पर फोकस कर रहे  है΄ कि मीडिया नही΄ छापता, खासतौर पर दलित बहुजन और जनोन्मुख घटनाओं और आंदोलनों के बाबत।

हमारा ‘फोटो-फीचर’ आपको अक्सर वह दिखाता है, जो ब्राह्मण-बनिया मीडिया आपसे छिपाता है। जब हजारों-हजार लोग दिल्ली में बामसेफ – शायद कैडर-आधारित सबसे बड़ा दलित-बहुजन आंदोलन – की 25वी΄ वर्षगाँठ के मौके पर इकट्ठे हुए थे, तो मीडिया ने उसे पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया। अपनी परंपरानुसार, इस बार एफपी विशाल 29वें΄ वार्षिक सम्मेलन की रिपोर्ट आप तक ला रही है – तीनों समांतर समूहों की। दिसंबर 2009 को मुझे ऐसे ही एक सम्मेलन में वक्ता के रूप में चंडीगढ़ जाने का न्यौता मिला था। अगले दिसंबर मैंने गुलबर्गा, कर्नाटक मे΄ भाषण दिया। उसी साल  तीसरे अलग हुए समूह ने अहमदाबाद में अपना ”वार्षिक” सम्मेलन संपन्न किया। कांशीराम
के समय मे΄ ही बामसेफ समांतर आंदोलनों मे΄ टूटने लगा था। जब तक कोई भी बामसेफ कांशीराम के पथ पर निष्ठापूर्वक चलता रहेगा और फुले-आंबेडकर विचारधारा का प्रसार करता रहेगा, एफपी उनके साथ रहेगी।

इस अंक मे΄ दो अमेरिकी लेखक भी हैं, दोनों दिल्ली-वासी, दोनों दलित-बहुजन विकास से सरोकार रखने वाले। एक हमारे नियमित योगदानी संपादक डॉ. टॉम वुल्फ और दूसरे उनके युवा सहयोगी केविन ब्रिंकमन। पिछले ही अंक में डॉ. वुल्फ ने अपनी प्रगति-उन्मुख-प्रगति-रोधक श्रृंखला संपन्न की है, और इस बार ब्रिंकमन दिखा रहे है΄ कि किस प्रकार प्रगति-उन्मुख मूल्य आंबेडकर की छाप वाले संविधान की प्रस्तावना में नज़र आते हैं। जिस सवाल का जवाब ढूँढऩा अभी बाकी है, वह है कि हमारे संवैधानिक मूल्य किस हद तक हमारी संस्कृति और समाज में पैठे हैं। लेकिन इस सवाल के लिए शायद एक और एफपी श्रृंखला या कम से कम विमर्श की जरूरत होगी।

अगले महीने तक … सत्य मे΄ आपका …

(फारवर्ड प्रेस के फरवरी, 2013 अंक में प्रकाशित)


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