सावित्रीबाई व ताराबाई शिंदे चुप्पी की साजिश के खिलाफ

सावित्रीबाई फुले के कार्यों से आज पूरी दुनिया अच्छी तरह से अवगत है। सावित्रीबाई ने उस समय घर से बाहर निकलकर दलित व गैर-दलित बालिकाओं को पढ़ाना शुरू किया जब औरत का घर से बाहर निकलना अपराध माना जाता था

19वीं सदी की दो महान विभूतियों को संसार कभी नहीं भूलेगा। पहली सावित्रीबाई फुले और दूसरी ताराबाई शिंदे। सावित्रीबाई फुले भारत की पहली शिक्षिका, पहली प्रधानाध्यापिका, संवेदनशील कवयित्री व प्रसिद्ध समाज सुधारक के रुप में विख्यात हैं तथा दूसरी ताराबाई शिंदे
स्त्री-पुरुष तुलना शीर्षक से 1882 में प्रकाशित लेख की प्रखर लेखिका के रूप में, जो अपने बेहद तर्कपूर्ण वैचारिक बाणों से हिन्दू धर्म, उसके ग्रंथों, धार्मिक अंधविश्वासों व उनके माध्यम से परोसी गई पितृसत्ता का समूल नाश करने की अपनी कलम से मुहिम चलाती हैं। उन्नीसवीं सदी की दोनों नायिकाएं बहुजन वर्ग से आती थीं तथा दोनों एक साथ और एक ही समय पर काम कर रही थीं। आज दोनों महान विभूतियां अपने तार्किक विचारों और कामों के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने तत्कालीन समाज से निर्भीकता से लोहा लेकर उसे बदलने की कोशिश की।

खुशी की बात है कि पिछले कुछ सालों से बहुजन समाज के लोग अपनी इन दोनों नायिकाओं के प्रति कृतज्ञ होते हुए उनके बताए रास्ते पर चलने का प्रयास कर रहे हैं। आज बहुजन समाज के लोग हर साल सावित्रीबाई फुले के जन्मदिन को बालिका शिक्षा दिवस और सर्वशिक्षा दिवस के रूप में धूमधाम से मनाते हैं। यही नहीं पिछले कुछ वर्षों से सावित्रीबाई फुले के परिनिर्वाण दिवस 10 मार्च को ही बहुजन सामाजिक व महिला संगठन भारतीय महिला दिवस के रूप में मनाते हैं। वे 8 मार्च की बजाय 10 मार्च को महिला दिवस मनाते हैं। अलग से भारतीय महिला दिवस मनाने का कारण है आठ मार्च को मनाए जाने वाले अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर धनाढय और अंग्रेजी शिक्षित वर्ग और उच्च वर्ण की महिलाओं का कब्जा। इस कब्जे के कारण इनके आदर्श भी भारत से बाहर की विचारक और उनकी विचारधारा रही है। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर दलित-शोषित व वंचित समाज की स्त्रियों की समस्याओं व मुददों को पूरी तरह अनदेखा कर दिया जाता है। इसी अनदेखी के कारण इस समाज की नायिकाएं जैसे सावित्रीबाई फुले व ताराबाई शिंदे के प्रति भी इनके मन में ना तो कोई सम्मान है और ना ही उन्हें महिला आंदोलन की अगुआ मानने की कोई उत्सुकता। सावित्रीबाई फुले ने लगभग 60 वर्षों तक समाज में महिला शिक्षा को बढावा देने के लिए और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ काम किया परंतु वर्तमान महिला आंदोलन उनके योगदान को स्वीकार करने को तैयार नहीं है। कभी आपको मौका मिले तो पूरे भारत में जगह-जगह विभिन्न महिला संगठनों व राजनीतिक दलों की महिला शाखाओं के कार्यालयों में घूमकर देख आइए। सभी जगह लगभग समान रूप से विदेशी महिला विचारकों की तस्वीरें, उनकी सूक्तियां आदि देखने को मिलेंगी। पर भारत की महिलाओं की मुक्ति को दिशा देने वाली और उसके लिए लडऩे वाली नायिकाओं की एक भी तस्वीर नहीं मिलेगी। भारतीय महिला आंदोलन की यह विदेशपरस्ती सर्वत्र दिखाई देती है।

सावित्रीबाई फुले के कार्यों से आज पूरी दुनिया अच्छी तरह से अवगत है। सावित्रीबाई ने उस समय घर से बाहर निकलकर दलित व गैर-दलित बालिकाओं को पढ़ाना शुरू किया जब औरत का घर से बाहर निकलना अपराध माना जाता था। जब वे घर से बाहर लड़कियों को पढ़ाने निकलती थीं तो उन पर गोबर-पत्थर फेंके जाते थे। उन्हें रास्ते में रोककर उच्च जाति के गुंडों द्वारा भद्दी-भद्दी गालियां दी जाती थीं तथा उन्हें जान से मारने की धमकियां दी जाती थीं।

ताराबाई शिंदे

सावित्रीबाई फुले ने लड़कियों के लिए 1848 में बुधवार पेठ, पूना में पहला स्कूल खोलकर भारतीय स्त्रियों के जीवन में शिक्षा द्वारा आमूल-चूल परिवर्तन लाने का प्रयास किया तथा स्त्री शिक्षा के द्वार खोल दिए। यह कदम एक शूद्र स्त्री द्वारा दलित व गैर-दलित स्त्रियों के लिए शिक्षा के क्षेत्र में उठाया गया अभूतपूर्व कदम था। सावित्रीबाई फुले ने 1849 में पूना में ही उस्मान शेख के घर पर मुस्लिम स्त्री, बच्चों के लिए प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र खोला। 1849 में ही पूना, सतारा व अहमदनगर जिलों में पाठशालाएं खोलीं। स्त्रियों की दशा सुधारने के लिए 1852 में सावित्रीबाई फुले ने महिला मंडल का गठन किया।

(बाएं एवं बीच में) भारत की प्रथम महिला शिक्षक सावित्रीबाई फुले, लड़कियों की एक कक्षा में (दायें) ताराबाई शिंदे

हिन्दू स्त्री के विधवा होने पर उसका सिर मूंड दिया जाता था। इस कुरीति के खिलाफ लडऩे के लिए सावित्रीबाई फुले ने नाईयों से विधवाओं के बाल न काटने का अनुरोध करते हुए आंदोलन चलाया, जिसमें काफी संख्या में नाईयों ने भाग लिया तथा विधवाओं के बाल न काटने की प्रतिज्ञा ली। भारत क्या पूरे विश्व में ऐसा सशक्त आंदोलन नहीं मिलता, जिसमें औरतों पर होने वाले शारीरिक और मानसिक अत्याचार के खिलाफ स्त्रियों के साथ पुरुष जाति प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हो। नाईयों के कई संगठन सावित्रीबाई फुले द्वारा गठित महिला मंडल के साथ जुड़े। सावित्रीबाई फुले और महिला मंडल के साथियों ने ऐसे ही अनेक आंदोलन वर्षों तक चलाए व उनमें अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की। भारतीय समाज में स्त्री के विधवा होने पर उसके परिवार के पुरुष सदस्यों जैसे देवर, जेठ, ससुर व अन्य संबंधियों द्वारा उसका दैहिक शोषण किया जाता था, जिसके कारण वह कई बार मां बन जाती थी। बदनामी से बचने के लिए विधवा या तो आत्महत्या कर लेती थी या फिर अपने अवैध बच्चे को मार डालती थी। अपने अवैध बच्चे के कारण वह खुद आत्महत्या न करे तथा अपने अजन्मे बच्चे को भी ना मारे इस उद्देश्य से सावित्रीबाई फुले ने भारत का पहला बाल हत्या प्रतिबंधक गृह खोला तथा निराश्रित, असहाय महिलाओं के लिए अनाथाश्रम खोला। स्वयं सावित्रीबाई फुले ने आदर्श सामाजिक कार्यकर्ता का जीवन अपनाते हुए एक विधवा के बच्चे को गोद लिया तथा उसे पढ़ा-लिखाकर योग्य डाक्टर भी बनाया। ऐसे क्रांतिकारी कार्य करने वाली तथा समाज की धारा के विपरीत जाकर काम करने वाली सावित्रीबाई फुले का नाम इतिहास से गायब करने में सरासर षडयंत्र की बू नजर आती है। सावित्रीबाई फुले ने अपने जैसे अनेक कार्यकर्ता तैयार किए, जिनमें ताराबाई शिंदे, फातिमा शेख, सावित्रीबाई रोडे, मुक्ता व अन्य शामिल थीं। इनका नाम आज भी भारतीय महिला आंदोलन में अमर है। अपना पूरा जीवन अर्पण करने वाली सावित्रीबाई फुले के योगदान को नकारना क्या भारतीय नारी मुक्ति आंदोलन का अपमान नहीं है। सवर्णवादी मानसिकता से ग्रस्त महिला संगठन और उससे जुड़ी महिलाएं दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग की महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर जुबान नहीं खोलतीं। दूसरी तरफ महिला आरक्षण के मुद्दे पर दलित, आदिवासी, ओबीसी महिलाओं की हिस्सेदारी के सवालों पर एकदम बिदककर दूर खड़ी हो जाती हैं और उनके सवालों को महिला आंदोलन को तोडऩे, बांटने और बिखेरने वाला कहकर जातिवादी ठहराने लगती हैं।

जहां सावित्रीबाई फुले ने सभी जातियों की लड़कियों के लिए शिक्षा के रास्ते खोल उनके जीवन में उजाला भरा, उसी प्रकार ताराबाई शिंदे ने अपनी सशक्त लेखनी के माध्यम से स्त्री के समर्थन में हिन्दू धर्म और उसके धर्मग्रंथों के खिलाफ तथा उसमें रचे-बसे ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के पाखंडों पर खुलकर प्रहार किया। स्त्री अधिकारों की लड़ाई की प्रतिभाशाली योद्धा ताराबाई शिंदे आज के दौर में और भी महत्वपूर्ण हो गई हैं, क्योंकि आज शिक्षित लोग तक धर्म और उसके पाखंड के मकडज़ाल में फंस रहे हैं। उस मकडज़ाल को तोडऩे के लिए
ताराबाई शिंदे की किताब स्त्री-पुरुष तुलना स्कूल कालेजों में जरूर पढ़ाई जानी चाहिए।

इस तरह सावित्रीबाई फुले और ताराबाई शिंदे दोनों ने उन्नीसवीं सदी में अपने कार्यों से, अपनी लेखनी से और अपनी क्रांतिकारी विचारधारा से अपने आसपास की दुनिया को प्रभावित किया। उसके बावजूद महिला आंदोलन व यहां के वर्चस्ववादी इतिहास में दोनों विभूतियों को शामिल न करना यही दर्शाता है कि भारत में सवर्ण मानसिकता और ब्राह्मणवाद की जड़ें बहुत गहरी हैं। परंतु जड़ें कितनी ही गहरी क्यों न हों, उन्हें खोदकर फेंकने का समय आ गया है।

(फारवर्ड प्रेस के मार्च 2013 अंक में प्रकाशित)


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