क्या आंबेडकरवादी साहित्य केवल दलितों का साहित्य है?

महिलाओं की दुर्दशा का कारण धर्म और जाति है। इसी सपने को डा. आंबेडकर ने विस्तार और गहराई दी थी। जोतीराव फुले का आंदोलन डा. आंबेडकर का स्पर्श पाकर अखिल भारतीय आंदोलन बन गया

उन्नीसवीं सदी के महान चिंतक और समाज सुधारक महात्मा जोतीराव फुले ने जब बहुजन समाज की बात की तो उनका उद्देश्य केवल अपनी जाति को सत्ता दिलाना नहीं था, बल्कि इस देश के सभी वंचितों को उनके मानव अधिकारों को हासिल कराना था। उनका लक्ष्य स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे पर आधारित समाज का पुनर्निर्माण करना था। इसके लिए उन्होंने पूरे समाज को ब्राह्मण और ब्राह्मणेत्तर समाज में बांटकर देखा। ब्राह्मण समाज, वह समाज जो सारे धार्मिक, आर्थिक राजनीतिक कर्म का केंद्र था। सब कुछ उसके हित में निर्धारित होता था, शेष सभी उसकी सेवा के लिए थे। उनके हित वहीं तक सुरक्षित थे जहां तक वे ब्राह्मणों के हितों से न टकराएं। इसे लागू करने के लिए उन्होंने अछूतों के लिए स्कूल खोले। महिलाओं के लिए स्कूल खोले, उनके अनुसार जो बिल्कुल सही है।

महिलाओं की दुर्दशा का कारण धर्म और जाति हैं। इसी सपने को डा. आंबेडकर ने विस्तार और गहराई दी थी थी। जोतीराव फुले का आंदोलन डा. आंबेडकर का स्पर्श पाकर अखिल भारतीय आंदोलन बन गया। इस आंदोलन ने जहां एक तरह गैर-सवर्ण जातियों को उद्वेलित किया, वहीं महिलाओं और देह-व्यापार में फंसी महिलाओं को भी जागृत किया। यह किसी जन्म, जाति, अस्मिता पर आधारित आंदोलन नहीं था, बल्कि श्रमजीवी वर्गों के मानवाधिकारों का आंदोलन था। इसीलिए डा. आंबेडकर ने कहा, मेरे खयाल में ऐसे दो शत्रु हैं जिनसे इस देश के मजदूरों को निपटना ही होगा। वे दो शत्रु हैं-ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद। इस स्वप्न को साकार क रने के लिए डा. आंबेडकर ने एक ओर भारतीय मजदूर दल और भारतीय रिपब्लिकन पार्टी की स्थापना की तो दूसरी ओर बौद्ध धर्म मेंं सामूहिक प्रवेश किया। उन्होंने इसे धर्मांतरण कहने का इस आधार पर विरोध किया कि दलित का यही धर्म था, वे कभी हिंदू थे ही नहीं, इसलिए धर्मांतरण किस बात का। इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए दलित पैंथर आंदोलन का जन्म हुआ। इसी आंदोलन ने आगे जाकर दलित साहित्य को जन्म दिया। दलित साहित्य जो बुद्ध-फुले-आंबेडकर की विचारधारा से प्रेरित साहित्य है। बाद में दलित पैंथर आंदोलन में मार्क्सवादी नजरिए के पक्ष-विपक्ष में विवाद बढ़ा और अंतत: यह आंदोलन बिखर गया।

हिंदी में मराठी के दलित साहित्य की प्रेरणा से दलित साहित्य का आंदोलन उपजा। हिंदी में दलित साहित्य की शुरुआत जोर-शोर से हुई पर न जाने क्यों आगे चलक र इस आंदोलन में बुद्ध-फुले-आंबेडकर की विचारधारा पृष्ठभूमि में चली गई और उसके स्थान पर अपनी-अपनी जातियों को मजबूत करने की विचारधारा साहित्य में भी प्रवेश कर गई। डा. आम्बेडकर का सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक जागरण का आंदोलन हिंदी क्षेत्र में केवल राजनीतिक आंदोलन बनकर रह गया। इसका असर लेखकों के एक समूह पर काफी गहराई से पड़ा, जिस तरह राजनीति में अपनी-अपनी जाति के आधार पर सीटों की मांग तुरंत नतीजे देती है, इसी तरह हिंदी के जातिवादी-रूपवादी साहित्य जगत में भी जातिवादी मांग को तुरंत प्रसिद्धि मिलने लगी। इसने नए उभरते लेखकों में भ्रम पैदा किया। इस भ्रम को फैलाने में पूंजीवादी व्यवस्था की बड़ी गहरी भूमिका रही है।

क्या दलितों की लड़ाई केवल दलित लड़ेंगे या दलितों के नेतृत्व में समाज की मुक्ति की लड़ाई लड़ी जाएगी। नेतृत्व इसलिए कि वे सबसे ज्यादा पीडि़त हैं और दुहरे शोषण के शिकार हैं, आर्थिक भी और सामाजिक भी। इस धर्म या विचारधारा को सभी वंचित तबकों का एक साझा मंच बनना होगा। इससे छुटकारा पाने का एक ही रास्ता है कि समाज का गठन इस तरीके से करना होगा कि मनुष्य का आर्थिक उद्यम उसकी स्वाभाविक प्रकृति और प्रेम करने की उसकी इच्छा और क्षमता के अनुकूल हो, उससे मेल खाता हुआ हो उसके विरुद्ध न हो। अच्छी बात यही है कि एक बड़ी संख्या में लेखकों ने खुद का आत्ममंथन किया और वापस बुद्ध-फुले-आंबेडकर की विचारधारा की तरफ लौटने लगे। इसी को अपेक्षा ने आम्बेडकरवादी साहित्य कहा। तेज सिंह अपने लेखन में बार-बार जोर देते हैं कि साहित्य को विचारधारा पर आधारित होना चाहिए।


जातिप्रथा का विनाश आम्बेडकरवादी चिंतन की धुरी है। जातिप्रथा भारतीय समाज की ऐसी सच्चाई है जिससे असहमत होते हुए भी मुंह मोड़ पाना संभव नहीं है। इसलिए सबसे पहले जाति की प्रकृति को समझना जरूरी है। जातिवादी शोषण के वैचारिक अस्त्रागार में कई अस्त्र रहे हैं जिसके जरिए उन्होंने निम्न जातियों का निर्मम शोषण किया है। जाति के संबंध में एक महत्वपूर्ण बात यह याद रखने की है कि यह केवल एक सामाजिक परिघटना नहीं है, बल्कि आर्थिक परिघटना भी है। यह शूद्र और अतिशूद्र कही जाने वाली जातियों के श्रम की लूट है और अगर माक्र्सवादी शब्दावली में कहें तो यह उनके द्वारा पैदा अतिरिक्त मूल्य पर कब्जा करने का एक वैचारिक शब्दजाल है। भारत के विकास को रोकने में इसकी अहम भूमिका इसीलिए है कि इसने उत्पादन की शक्तियों के विकास को भरसक रोका और भारतीय समाज को लगभग ठहरे हुए समाज में बदल डाला।

जो भी साहित्य जाति के विनाश को अपने चिंतन का आधार बनाता है, उसके लिए यह कैसे संभव है कि वह साथ में अपनी जाति को मजबूत करने की मांग भी करे। अपनी जाति को मजबूत करने की मांग अनिवार्य रूप से जातिवाद को प्रासंगिक करार देती है, उसे औचित्य प्रदान करती है। यह प्रकारांतर से ब्राह्मणवादी शक्तियों को मजबूती प्रदान करती है। यह मांग बहुजन आंदोलन का वैचारिक आत्म समर्पण है। इसलिए चाहे वह दलित साहित्य हो या ओबीसी साहित्य, जन्मजात अस्मिता से निर्धारित होने के कारण और अपने वैचारिक लक्ष्य से दूर हट जाने के कारण दीर्घजीवी नहीं हो सकता। अगर ओबीसी साहित्य बुद्ध-फुले-आंबेडकर की जाति के विनाश की विचारधारा पर नहीं खड़ा है, तो वह दलितों, ओबीसी के राजनीतिक आंदोलन की तरह इसी व्यवस्था में अपने मुट्ठीभर परिवार वालों, मित्रों के लिए कुछ सुविधाएं जुटाने तक ही सिमटकर रह जाएगा और देर-सबेर दूसरी अधिक पिछड़ी जातियां इन जातियों के खिलाफ गोलबंद होने लगेंगी। जैसाकि अब राजनीति में दिखाई भी पडऩे लगा है। इसलिए मेरा मानना है कि हमें एकजुट होकर आम्बेडकरवादी साहित्य आंदोलन चलाना चाहिए। ऐसा साहित्य जो बुद्ध-फुले-आम्बेडकर के जाति का विनाश के विचार पर आधारित हो, जिसमें अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अन्य पिछड़ा वर्ग, महिलाओं और अल्पसंख्यक वर्गों के वे लेखक शामिल हों, जिनके लिए जाति का विनाश ही मुख्य उद्देश्य हो।

(फारवर्ड प्रेस के अप्रैल 2013 अंक में प्रकाशित)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

About The Author

Reply