स्वागतयोग्य है बहुजन साहित्य

जहां तक दलित की बात है तो शब्द के भाषिक अर्थ की दृष्टि से दलित भी जातिसूचक शब्द नहीं है और आज के समाज में विशाल बहुमत की जिंदगी दमन, शोषण और उत्पीडऩ का शिकार है

दरअसल, बहुजन शब्द महात्मा बुद्ध की देन है जिसका प्रयोग उन्होंने सर्वप्रथम बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय के संदर्भ में किया था। इस संबंध में मेरी स्पष्ट समझ है कि महात्मा बुद्ध की दृष्टि से और भाषा की समझ की दृष्टि से भी बहुजन शब्द जातिसूचक नहीं है। बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय में एक वर्गीय, वर्ग संबंधी दृष्टिकोण है और मुझे ये देखकर बेहद ख़ुशी हुई कि महात्मा बुद्ध दुनिया के पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने वर्गीय दृष्टि से समाज को देखा। उस समय वर्ग या वर्गीय शब्द नहीं था, इसलिए उन्होंने बहुजन शब्द का प्रयोग किया। विचारणीय है कि वे कौन लोग थे, जिन्होंने बहुजन का साथ छोड़ दिया या वे कौन लोग थे जो बहुजन को सताते थे। आज भी बहुजन का वही अर्थ लिया जाना चाहिए, इसलिए बहुजन के हित में या पक्ष में लिखा गया साहित्य हमेशा स्वागतयोग्य है। मैं यह समझता हूं कि इस दृष्टि से बहुजन का साहित्य ही साहित्य की मुख्यधारा है।

जहां तक दलित की बात है तो शब्द के भाषिक अर्थ की दृष्टि से दलित भी जातिसूचक शब्द नहीं है और आज के समाज में विशाल बहुमत की जिंदगी दमन, शोषण और उत्पीडऩ का शिकार है। साहित्य में स्वीकृत मनुष्यता कहती है कि ऐसी जिंदगी के दर्द को बेपर्द करना चाहिए और उसे मुक्ति के रास्ते पर लाना चाहिए लेकिन हम ये जानते हैं कि आज दलित शब्द का इस्तेमाल अछूत के समानार्थक के रूप में किया जा रहा है। जबकि समाज के किसी भी तबके को अछूत समझना और मानना अमानुषिक है। ऐसे तबके के पक्ष में तब से लिखा जा रहा है जब से हिन्दी साहित्य का उद्भव हुआ। मध्यकाल के भक्तिकाल में भी रैदास और कबीर जैसे संत पूरे समाज में प्रतिष्ठित और सम्मानित हुए। आधुनिक युग में प्रेमचंद ने उनके दर्द को वाणी दी, बल्कि उनके लिए संघर्ष भी किया। मराठी में उभरे दलित आंदोलन के एक नायक एवं प्रसिद्ध कवि नारायण सुर्वे, जिनका कि कुछ समय पहले ही निधन हुआ है, ने कई साल पहले एक भेंटवार्ता में कहा था कि हिंदी में दलित लेखन की आवाज एक आंदोलन के रूप में नहीं उठी, क्योंकि प्रगतिशील आंदोलन हिन्दी में वही काम कर रहा था जो मराठी में दलित आंदोलन ने किया।

ध्यान देने योग्य बात यह है कि प्रेमचंद, निराला, अमृतलाल नागर, नागार्जुन आदि ने दलितों के पक्ष में तब लिखा जब जन्म से दलित लेखक बहुत कम थे या नहीं के बराबर थे। इन उपर्युक्त लेखकों ने दलितों के पक्ष में ऐतिहासिक कार्य किया। यह कहना कि दलितों के बारे में सिर्फ दलित ही लिखें, लेखकीय संवेदना और अनुभव क्षेत्र को सीमित कर देना है। इसके पीछे एक सिद्धांत है कि भोगा हुआ यथार्थ ही लिखा जाना चाहिए। महाकवि वाल्मीकि ने पक्षी की पीड़ा को अभिव्यक्ति दी और वही हमारा पहला आदि काव्य माना जाता है। वाल्मीकि ने आदिकाव्य में जिस यथार्थ को बिम्बित किया है, वह उनका भोगा हुआ यथार्थ नहीं है, क्योंकि वे पक्षी नहीं थे और बन भी नहीं सकते थे। साहित्य मूलत: दूसरों  के दर्द को महसूस करके इस संवेदनशीलता के साथ व्यक्त करने की कला है कि पाठक भी उसे अपना दर्द समझने लगें। प्रेमचंद ने किसानों की पीड़ा को भी चित्रित किया है। वे किसान नहीं थे। उन्होंने किसानों की पीड़ा को चित्रित करने के लिए जमींदारों के द्वारा किया जाने वाला शोषण एवं दमन का चित्रण भी किया, जिसके बिना किसानों की पीड़ा व्यक्त हो नहीं सकती थी। प्रेमचंद जमींदार भी नहीं थे।

दलित लेखकों ने अपने भोगे हुए यथार्थ के आधार पर आत्मकथा लिखी है, जो बाप-दादाओं की कहानी से लेकर अपने बचपन से लेकर युवा अवस्था तक की कथा है। यह आत्मकथा उनकी सीमा है। इसके बाद वे क्या लिखेंगे या लिखते हैं हिन्दी पाठकों को इसका इंतजार है। इस प्रसंग में मुझे याद आ रहा है कि मैंने अभय मौर्य से कहा कि अब दलित लेखकों को दलित चेतना को उस स्तर पर ले जाना चाहिए जहां से वे दलितत्व से मुक्ति का रास्ता दिखाने में समर्थ हो सकें। अभय मौर्य मेरी इस बात से प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा कि अब वह इसी दिशा में प्रयत्न करेंगे।

साहित्य में मान्यता प्राप्त करने के लिए पिछड़ा वर्गवाद अथवा अस्पृश्यता को मानदंड की तरह प्रस्तुत करना कतई श्रेयस्कर नहीं है। इस मानदंड के आधार पर उन्हीं का सर्जनात्मक एवं कलात्मक विकास अवरुद्ध हो जाएगा। जन्मना पिछड़े और दलित लेखक के सामने यह रचनात्मक चुनौती है कि वे अपनी मेधा से उच्चस्तर का संवेदनशील साहित्य रचने में समर्थ हों। ऐसा संभव है, क्योंकि ऐसा करके रैदास व कबीर दिखा चुके हैं। आखिर क्या बात थी कि राणा संग्राम सिंह की पुत्रवधू ने रैदास को अपना गुरु बनाया। साहित्य में प्रतिष्ठा और ख्याति पाने के लिए कोई शार्टकट नहीं है। मैं तो यह देख रहा हूं कि दलित और पिछड़े ही नहीं बल्कि गैर-दलित और गैर-पिछड़े नए लेखक भी साहित्य में क्रिकेट में शतक मारने वाले खिलाड़ी की तरह मैदान में उतरने के साथ ही सितारे की तरह चमकना चाहते हैं। क्रिकेट की चमक क्षणभंगुर होती है। साहित्य में साधना से प्राप्त चमक ऐतिहासिक रूप से टिकाऊ होती है।

रचनात्मक दृष्टि से सवर्ण शब्द अनावश्यक है। वैसे आज इसका इस्तेमाल गलत अर्थ में भी लोग कर रहे हैं। अफवाह की तरह फैली हुई गलत मान्यता के प्रभाव में बड़े-बड़े लेखक यह नहीं देख पाते कि भारतीय समाज में जिनको पिछड़ा ओबीसी कहा जाता है वे भी सवर्ण हैं, क्योंकि भारतीय समाज में चार वर्ण हैं– ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। इन चारों वर्णों में आपसी रिश्ता सीढ़ी की तरह ऊपर-नीचे है और यह भेद न्यायपूर्ण नहीं है। सबसे नीचे स्थान है शूद्रों का, इसलिए उनके साथ सबसे अधिक अन्याय होता रहा है। इस व्यवस्था से अलग अछूत थे इसीलिए उन्हें अवर्ण कहा गया। आज पिछड़ों की राजनीति करने वालों को ध्यान देना चाहिए कि लोहिया समाज में भेदभाव को व्यक्त करने के लिए द्विज शब्द का इस्तेमाल करते थे। ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य ये तीन द्विज हुए और इन तीनों के अत्याचार का शिकार हुआ चौथा वर्ण शूद्र। इसी तरह ब्राह्मण जाति और ब्राह्मणवाद को समझ लेना चाहिए, क्योंकि दोनों में फर्क है। ब्राह्मण जातिवाद तो उसी तरह है, जैसे कि अन्य जातियों में है। जैसे, भूमिहार, कोइरी, चौधरी आदि। लेकिन ब्राह्मणवाद सामाजिक-वैचारिक व्यवस्था है, जिसका निर्माण करने वाले चार तत्व हैं-वर्ण व्यवस्था, पुनर्जन्म, कर्मफल और यज्ञ। मजे की बात यह है कि अधिकांश पिछड़े और अछूत भी इस ब्राह्मणवाद को मानते हैं। इसके विरुद्ध नहीं लड़ते, जबकि जीवन की मुक्ति के लिए इस ब्राह्मणवादी व्यवस्था को समाप्त करने के लिए लडऩा अनिवार्य है। यह व्यवस्था पुरोहितवाद को बढ़ावा देती है। इसे पुनर्जन्म और कर्मफल ने खासतौर से तमाम दलितों-पिछड़ों, गरीबों की चेतना को बांधकर उन्हें दिमागी तौर पर ग़ुलाम बना दिया है। कोई दलित या पिछड़ा नेता आज इस पुरोहितवाद के खिलाफ नहीं बोलता। जबकि इससे मानसिक मुक्ति के बिना जीवन की मुक्ति संभव नहीं है।

प्रस्तुति : इम्तियाज अहमद आजाद

(फारवर्ड प्रेस के अप्रैल, 2013 अंक में प्रकाशित )

About The Author

Reply