बहुजन साहित्य की संकल्पना रुचिकर नहीं : डा. महीप सिंह

आप देख ही रहे हैं कि ज्यादातर राज्यों में सत्ता सवर्णों के हाथ से खिसककर पिछड़ी जाति के लोगों के हाथ में आ गई है। कहीं जाट, कहीं यादव, कहीं कुर्मी, कहीं मराठा, कहीं मोदी तो कहीं अन्य पिछड़ी जाति के लोग सत्ता पर काबिज हैं और इन सभी राज्यों में दलितों के साथ ज़ुल्म-ज्यादती की खबरें बराबर आती रहती हैं। ऐसे में यह कैसे संभव है कि सिर्फ साहित्य को लेकर दलित और पिछड़े एक प्लेटफार्म पर आ जाएं

मैं दलित साहित्य का समर्थक रहा हूं, क्योंकि इसमें कोई संदेह नहीं है कि दलित साहित्य अब स्वीकृत और स्थापित हो गया है। अपनी साहित्यिक पत्रिका संचेतना का एक विशेषांक साहित्य और दलित चेतना नाम से सन् 1983 में मैंने निकाला था। ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा जूठन के विमर्श पर भी मैंने संचेतना का सितंबर, 2011 अंक निकाला था और संचेतना का ताजा अंक दलित आत्मकथाओं पर ही आधारित है।

दलित वर्ग को जो यातना वर्षों से सहनी पड़ी है उसका वर्णन पढ़े-लिखे दलित अपनी भाषा में करने लगे हैं। ज्यादातर दलित लेखकों ने जो स्वयं भोगा है उसे ही अपनी रचनाओं में व्यक्त किया है। खासतौर से उनकी आत्मकथाएं इसका सटीक उदाहरण हैं। ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा “जूठन”, तुलसीराम की “मूर्दहिया”, मोहनदास नैमिशराय की “अपने-अपने पिंजरे” आदि। सबसे पहले मराठी लेखकों ने इस सिलसिले में अपनी आवाज बुलंद करने की परंपरा शुरू की। किंतु हिंदी में दलित साहित्य को मनवाना एक टेढ़ी खीर थी, क्योंकि यहां हिंदी में तुलसी की मानसिकता है और ब्राह्मण निर्गुण संतों तक की। चमार, नाई, जुलाहा आदि की निंदा तुलसी दास ने की है। जिस समाज में दलितों से शरीर छू जाने मात्र से सवर्ण अपवित्र हो जाते थे, इसीलिए ऐसे समाज में नामदेव, रैदास और कबीर जैसे लोगों की स्वीकृति भी मुश्किल से हो पाई। मुझे नहीं लगता कि दलित और पिछड़ों का कोई साझा मंच बन सकेगा, क्योंकि आजकल दलितों को ब्राह्मणों और ठाकुरों से ज्यादा पिछड़ी जाति के लोग प्रताडि़त करते हैं।

आप देख ही रहे हैं कि ज्यादातर राज्यों में सत्ता सवर्णों के हाथ से खिसककर पिछड़ी जाति के लोगों के हाथ में आ गई है। कहीं जाट, कहीं यादव, कहीं कुर्मी, कहीं मराठा, कहीं मोदी तो कहीं अन्य पिछड़ी जाति के लोग सत्ता पर काबिज हैं और इन सभी राज्यों में दलितों के साथ ज़ुल्म-ज्यादती की खबरें बराबर आती रहती हैं। ऐसे में यह कैसे संभव है कि सिर्फ साहित्य को लेकर दलित और पिछड़े एक प्लेटफार्म पर आ जाएं। इसलिए जो दलित साहित्य स्थापित हो चुका है उसके लिए ही काम करना चाहिए और उसके प्रति ही प्रतिबद्ध होना चाहिए। ऐसा कतई नहीं है कि दलित साहित्य सिर्फ दलित ही लिखेगा। चेतना आई है तो गैर-दलित भी अच्छा दलित साहित्य लिख सकते हैं। प्रेमचंद का “ठाकुर का कुआं”, “कफन”, “सवा सेर गेहूं”, “पूस की रात” आदि रचनाएं दलितों के जीवन पर ही आधारित हैं जबकि प्रेमचंद दलित नहीं थे।

(फारवर्ड प्रेस के अप्रैल, 2013 अंक में प्रकाशित )

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