जाति के आधार पर लेखकों का बंटवारा उचित नहीं : चौथीराम यादव

किसानों की पीड़ा और श्रमजीवियों के कर्म-सौंदर्य का चित्रण प्रगतिशील साहित्यकारों का प्रमुख विषय रहा है। चाहें वे सवर्ण समुदाय के हों या अवर्ण समुदाय के। प्रेमचंद, निराला, फणीश्वरनाथ रेणु, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, शिवमूर्ति, संजीव, राजेन्द्र यादव आदि लेखक और कवि एक ही कतार में खड़े हैं

दलित साहित्य पर आरोप-प्रत्यारोप का लगना कोई नई बात नहीं है, हमेशा से ऐसा ही होता आया है। यथास्थितिवादियों द्वारा विरोध का यह पुराना हथकंडा है। विरोध के तीन स्तर हैं..पहला यह कि क्रांतिकारी विचारों का जमकर विरोध करना, दूसरा यह कि उसे तोड़-मरोड़कर दुष्प्रचारित करना और तीसरा यह कि उसके बाद भी यदि समाज में वे विचार जीवित रह जाते हैं तो उनकी धार को कुंद बनाकर उन्हें आत्मसात कर लेना।

चार्वाक, आजीवकों, बौद्ध दार्शनिकों के क्रांतिकारी चिंतन और उसके प्रभाव में लिखे गए सिद्धों-नाथों तथा कबीर आदि शास्त्र-विरोधी निर्गुण संतों के साहित्य के साथ भी तो यही सलूक किया गया। वही सलूक आज दलित साहित्य के साथ भी किया जा रहा है। दूसरी बात यह कि जाति और वर्णों के आधार पर लेखकों का बंटवारा नहीं किया जा सकता। जातिगत प्रतिबद्धता को जीना लेखक की संकीर्णता का परिचायक है। यदि दलित समुदाय के किसी लेखक का साहित्य आम्बेडकरवाद के विरुद्ध जाता है तो न वह दलित लेखक है और न उसका साहित्य दलित साहित्य। जब तक दलित समुदाय में बोलने और लिखने की क्षमता नहीं थी तब तक हम उसके पक्ष में बोलते और लिखते रहे, लेकिन जब वह खुद बोलने और लिखने लगा है तो अनावश्यक उसमें टांग नहीं अड़ानी चाहिए। उसके लिखे का सम्मान करना चाहिए।

हिंदी की मुख्यधारा प्रगतिशील साहित्य की धारा है, जो हाशिए के समाज की चिंताओं से चिंतित जनपक्षधर विचारधारा पर आधारित है, जिसमें हर जाति-वर्ण के लेखक शामिल हैं। राजेन्द्र यादव, संजीव, शिवमूर्ति, चंद्रकिशोर जायसवाल, रामधारी सिंह दिवाकर, प्रेम कुमार मणि आदि लेखक उसी विचारधारा के लेखक हैं। किसानों की पीड़ा और श्रमजीवियों के कर्म-सौंदर्य का चित्रण प्रगतिशील साहित्यकारों का प्रमुख विषय रहा है। चाहें वे सवर्ण समुदाय के हों या अवर्ण समुदाय के। प्रेमचंद, निराला, फणीश्वरनाथ रेणु, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, शिवमूर्ति, संजीव, राजेन्द्र यादव आदि लेखक और कवि एक ही कतार में खड़े हैं। प्रेमचंद से बड़ा किसान जीवन का आख्याता और कौन हो सकता है। फणीश्वरनाथ रेण, नागार्जुन, शिवमूर्ति, संजीव के उपन्यास उसी श्रृंखला की अगली कडिय़ां हैं। दलित साहित्य का मूलाधार आम्बेडकरवाद है और आम्बेडकरवाद के निर्माण में बुद्ध, कबीर, जोतिबा फूले, पेरियार की महत्वपूर्ण भूमिका के साथ ही मार्क्सवाद की प्रेरणा भी रही है। आपके अनुसार यदि कबीर ओबीसी में आते हैं तो जोतिबा फूले और पेरियार भी उसी श्रेणी में आते हैं, जिन्होंने धार्मिक वर्चस्ववाद के विरुद्ध गैर-ब्राह्मण आंदोलन को विकसित किया। आगे चलकर हिन्दी पट्टी में रामस्वरूप वर्मा और ललई सिंह यादव का अर्जक संघ ने उसको आगे बढ़ाने के लिए प्रयास किया।

(फारवर्ड प्रेस के अप्रैल, 2013 अंक में प्रकाशित )

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