साहित्य का विभाजन अनुचित : अब्दुल बिस्मिल्लाह

भाषा सिर्फ एक शब्द नहीं है, बल्कि हर भाषा के पीछे उसकी एक संस्कृति होती है। अर्थात भाषा संस्कृति की वाहिनी है जैसे कि अरबी भाषा में अरब की संस्कृति समाहित है। मलयालम में केरल की संस्कृति है। अत: एक भाषा के शब्दों का अनुवाद तो संभव है किन्तु उसकी संस्कृति का अनुवाद नामुमकिन है।

साहित्य में किसी भी प्रकार के विभाजन से मैं सहमत नहीं हूं। किन्तु जब विभाजन जैसी बात सामने आई है तो खासकर दलित विमर्श और स्त्री विमर्श को रेखांकित किया जा सकता है। लेकिन अब यह तीसरी बात जो बहुजन साहित्य के रूप में सुनने को मिल रही है, यह ठीक नहीं है। निश्चित रूप से हमारे देश में लम्बे समय तक दलितों और स्त्रियों की अवहेलना होती रही है। उनका शोषण होता रहा है, जो दलित वर्ग के लेखक हैं, वो अब खुलकर अपनी पीड़ा व्यक्त कर रहे हैं, क्योंकि वो अब इसमें सक्षम हैं। यह एक शुभ लक्षण है, किन्तु जब साहित्य का विश्लेषण किया जाएगा तो इन खांचों से अलग साहित्य के मानदंडों पर ही वर्गीकरण किया जाएगा। हालांकि इस संदर्भ यह कहा जाता है कि जो पीड़ा भोगने वाला वर्ग है, वही ठीक तरह से अपनी बात को व्यक्त कर सकता है। नारा दिया गया, भोगा हुआ यथार्थ, लेखक जो भोगेगा वही लिखेगा। यह बात तो सही है किन्तु इसे कैसे प्रमाणित किया जाएगा।

मेरी समझ से भोगना दो प्रकार का होता है..पहला भौतिक तौर पर भोगना और दूसरा भावनात्मक तौर पर भोगना। रचनाकार समाज के भोगे हुए यथार्थ को भावनात्मक तौर पर भोगता है और उसी के आधार पर वह सर्जनात्मक कार्य करता है। यही वजह है कि लेखक बिना चोर बने या बिना चोरी किए चोर पर कहानी लिख सकता है। उदाहरण के तौर पर मेरी प्रसिद्ध एवं चर्चित कृति झीनी-झीनी बीनी चदरिया बनारस के बुनकरों के जीवन पर आधारित है। अब सवाल उठता है कि क्या मैं बुनकर समुदाय से हूं। जवाब है-नहीं। इतना जरूर है कि मुझे 10 वर्षों तक बुनकरों के बीच रहने का अवसर मिला और उनकी जीवन-पद्धति, उनके रहन-सहन को बारीकी से मैंने जाना और समझा। उसी भौतिक रूप से भोगे हुए यथार्थ को मैंने अपनी रचना में व्यक्त किया। इसी तरह के भावनात्मक जीवन को लेखक अपने भीतर जीता रहता है और जो व्यक्ति इस तरह का आंतरिक जीवन न जी सके वो लिख नहीं सकता, यानी लेखक नहीं बन सकता।

मेरा यह भी मानना है कि साहित्य भाषाओं का वर्गीकरण जाति, धर्म या वर्ग के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। दुर्भाग्य की बात है कि हिंदी और उर्दू के साथ ऐसा ही होता है। मैं कहता हूं कि यदि हिन्दी, हिन्दुओं की और उर्दू, मुस्लिमों की भाषा है तो फिर अंग्रेजी को ईसाईयों से क्यों नहीं जोड़ा जाता या फिर बांग्ला में सिर्फ  बंगाली ही क्यों नहीं लिखते आदि। अत: भाषा उसी की है जो उसका प्रयोग करता है। भाषा तब बनेगी जब वह खून बनकर रगों में दौड़ेगी। मातृभाषा का सही मतलब भी यही हुआ। उत्तर भारत के बहुत से मुसलमान उर्दू न जानते हुए भी अपनी मातृभाषा उर्दू ही लिखते हैं। यह कतई दुरुस्त नहीं है। जैसे कि हमारी मातृभाषा उर्दू न होकर हमारे गांव की भाषा या बोली भोजपुरी है। अर्जित भाषाएं, जैसे कि अंग्रेजी, फ्रेंच, जापानी, रूसी, अरबी आदि अभ्यास में न रहने पर भूल जाती हैं। जबकि मातृभाषा हमारी रगों में खून बनकर दौड़ती रहती है। एक बात और मैं कहना चाहूंगा कि हिंदी और उर्दू को लेकर भी कोई तकरार नहीं होनी चाहिए, क्योंकि ये दोनों एक जैसी भाषाएं हैं और हमारी बोलचाल की भाषा हिन्दुस्तानी है।

यह जानना बेहद ज़रूरी है कि भाषा सिर्फ एक शब्द नहीं है, बल्कि हर भाषा के पीछे उसकी एक संस्कृति होती है। अर्थात भाषा संस्कृति की वाहिनी है जैसे कि अरबी भाषा में अरब की संस्कृति समाहित है। मलयालम में केरल की संस्कृति है। अत: एक भाषा के शब्दों का अनुवाद तो संभव है किन्तु उसकी संस्कृति का अनुवाद नामुमकिन है। उदाहरण के तौर पर नमाज के लिए दी जाने वाली नमाज को प्रार्थना की पुकार नहीं कह सकते। उसी प्रकार हम आत्मा का अनुवाद नहीं कर सकते, क्योंकि आत्मा, रूह और वसम तीनों का अर्थ अलग-अलग है। कुल मिलाकर भाषा और साहित्य को अगर हम धर्म, जाति और वर्ग के आधार पर विभाजित करने लगेंगे तो उसका परिणाम अच्छा नहीं होगा। अंत में मेरा यही कहना है कि साहित्य को विशुद्ध साहित्यिक दृष्टि से देखना चाहिए।

(फारवर्ड प्रेस के अप्रैल, 2013 अंक में प्रकाशित )

About The Author

Reply