महात्मा फुले : भारतीय सामाजिक नाट्य परंपरा के पितामह

महात्मा जोतिबा फुले ने सन 1855 में अपने ‘तृतीय रत्न’ (जिसे ‘तृतीय नेत्र’ भी कहा जाता है) नाटक की रचना की। इस नाटक ने सामाजिक रंगमंच की मशाल प्रज्ज्वलित की

‘तृतीय रत्न’ : पहला आधुनिक भारतीय सामाजिक नाटक

मराठी रंगमंच का उद्भव विष्णुदास भावे के ‘सीतास्वयंवर आख्यान’ से माना जाता है। सन् 1843 में महाराष्ट्र के सांगली में श्रीमंत राजासाहब अप्पासाहब पटवर्धन के दरबार में इस नाटक का प्रथम मंचन हुआ था। चूंकि भावे पराजित ब्राह्मणों के नाटककार थे अत: इस नाटक का विषय पौराणिक था तथा यह ब्राह्मणवादी परंपरा का नाटक था।[1]

महात्मा जोतिबा फुले ने सन 1855 में अपने ‘तृतीय रत्न’ (जिसे ‘तृतीय नेत्र’ भी कहा जाता है।) नाटक की रचना की। इस नाटक ने सामाजिक रंगमंच की मशाल प्रज्ज्वलित की। इसलिए मराठी ही नहीं बल्कि भारतीय सामाजिक रंगमंच के वे प्रणेता माने जाते हैं। सामाजिक परिवर्तन का उद्देश्य लेकर फुले ने ‘तृतीय रत्न’ की रचना की। फुले सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता थे, चिंतक थे। उन्होंने केवल सामाजिक परिवर्तन का सिद्धांत ही नहीं लिखा, उस सिद्धांत के लिए कृति भी की और सामाजिक परिवर्तन का आंदोलन खड़ा किया। शूद्रातिशूद्र एवं स्त्रियों के लिए पाठशाला शुरू की।

हिंदू धर्म-प्रणित वर्णवादी, जातिवादी तथा मूलतत्ववादी व्यवस्था के खिलाफ उन्होंने संघर्ष किया। शूद्रों के लिए अपने घर का कुआं खोल दिया। ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना की। नई समाज रचना के लिए सार्वजनिक सत्यधर्म, जातिभेद विवेक सार, ब्राह्मणों का कसब (तरकिबे) गुलामगिरी, किसानों का चाबूक आदि ग्रंथों की रचना की। उन्होंने ‘तृतीय रत्न’ नाटक भी लिखा। सामाजिक परिवर्तन के इस कार्य हेतु सावित्रीबाई के साथ उन्हें घर से निकाल दिया गया। जानलेवा हमला भी उन पर किया गया, किंतु आजन्म वे सामाजिक परिवर्तन की जंग लड़ते रहे। महात्मा जोतिबा फुले मूलत: नाटककार नहीं थे। सामाजिक आंदोलन के एक लोकप्रिय माध्यम के रूप में 1855 में ‘तृतीय रत्न’ नाटक उन्होंने लिखा। सामाजिक-राजनीतिक आशय का यह नाटक क्रांतिकारी सत्यशोधक नाटक था।[2]

तत्कालीन सारे सामाजिक प्रश्नों का मूल, धर्म, वर्ण एवं जातिप्रथा में था। इस व्यवस्था में दलित, बहुजन, अस्पृश्य, पिछड़े समाज का बड़े पैमाने पर शोषण किया जा रहा था। मानवीय अधिकारों से उन्हे वंचित किया जा रहा था। अज्ञान, निरक्षरता, अंधविश्वास, सड़ी-गली परम्पराएं, वर्ण, जाति, अस्पृश्यता तथा आर्थिक शोषण ने इस समाज की उन्नति के सारे मार्ग बंद कर दिए थे। इस गुलामी से आजाद करने के लिए, सामाजिक परिवर्तन के उद्देश्य से, विकास से वंचित, शोषित-पीडि़त समाज को जगाने के लिए, उनमें चेतना निर्माण करने के लिए यह नाटक उन्होंने लिखा। शिक्षा का महत्व, शिक्षा के परिणाम, शिक्षा का लाभ उन्होंने इस नाटक के द्वारा प्रतिपादित किए। शोषण की व्यवस्था पर आधारित सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, दूषित पर्यावरण को उन्होंने इस नाटक द्वारा शुद्ध करने की कोशिश की। वे मानवतावादी, समतावादी, विज्ञानवादी, विवेकवादी, स्वतंत्र, गुलामी से मुक्त, मानव अधिकारयुक्त, एक नए पर्यावरण के निर्माण का उद्देश्य इस नाटक के माध्यम से पूर्ण करना चाहते थे। तात्पर्य यह कि मराठी सामाजिक रंगमंच का उद्भव फुले के सामाजिक विचार, भूमिका एवं कृति से हुआ है।

अभिजन वर्ग की स्वार्थप्रेरित व्यवस्था में बहुजन समाज पराजित हो चुका था। इस पराजय के लिए वे वर्ण, जाति, धर्म एवं मुलतत्ववाद को जिम्मेदार मानते थे। ‘‘भावे-किर्लोस्कर के नाटकों द्वारा अभिजन वर्ग के ‘स्व’ रूप की खोज अवचेतना के माध्यम से व्यक्त हुई तो फुले ने सामाजिक पराजय के लिए अंदरुणी दुश्मनों को जिम्मेदार ठहराया और उनके खिलाफ जंग छेड़कर बहुजन समाज के ‘स्व’-रूप को आंदोलन के माध्यम से उजागर किया।’’[3] तात्पर्य ‘तृतीय रत्न’ की प्रेरणा सामाजिक थी। चेतना से उसका सरोकार था। विद्रोह, पुनर्रचना, पुनर्जागरण उसका उद्देश्य था। सामाजिक परिवर्तन एवं नए पर्यावरण की स्थापना उसकी परिणति थी।

‘तृतीय रत्न’ नाटक ने अपनी रचना द्वारा कई प्रयोग किए। विषय, आशय, शिल्प, शैली, चरित्र, भाषा, संवाद, नाट्यगत संघर्ष आदि की सारी कसौटियां ही बदल दीं। सामाजिकता को एक नया परिप्रेक्ष्य दिया। रंगमंचीय प्रस्तुति की सारी संभावनाओं को एक नया आकाश दिया। विद्रोह की नई परंपरा को जन्म दिया। सामान्य रूप से गोविंद बल्लाल देवल को तथा उनके ‘संगीत शारदा’ नाटक को आद्य सामाजिक नाटककार तथा नाटक कहा जाता है। किंतु इस नाटक की मूल भूमिका सामाजिक परिवर्तन की नहीं थी। ‘‘शारदा नाटक महाराष्ट्र में कहीं भी पाए जानेवाले किसी एक ब्राह्मण परिवार और समाज का यथार्थपूर्ण चित्रण है। इसके अलावा देशस्थ-कोंकणस्थ इन ब्राह्मण जातियों में शरीर संबंध प्रस्थापित करने की कोशिश इस नाटक में की गई है।’’[4] लोक जागरण, लोक उद्बोधन, एक सामाजिक प्रश्न, समाज परिवर्तन इस दृष्टिकोण से इस नाटक की रचना नहीं की गई। किंतु फुले का मूल उद्देश्य ही समाज परिवर्तन का था। ‘‘तत्कालीन मराठी नाटककारों के पास सामाजिक यथार्थ की दृष्टि नहीं थी। साथ ही इच्छाशक्ति का भी अभाव था। इसलिए इस परिप्रेक्ष्य में ‘तृतीय रत्न’ नाटक श्रेष्ठ नाटक है। भावे की परंपरा के नाटककार अपने परिवेश के सामाजिक-राजनीतिक परिस्थिति का प्रतिबिंब चित्रित करने में असफल रहे, क्योंकि वह यथार्थपूर्ण दृष्टि उनके पास नहीं थी, जो महात्मा फुले की जीवनदृष्टि थी।’’[5] इस यथार्थवादी जीवनदृष्टि का परिचय हमें ‘तृतीय रत्न’ में मिलता है।

मराठी के प्रसिद्ध आलोचक कमलाकर नाडकर्णी ने इस नाटक को ‘प्रथम सामाजिक समस्या प्रधान नाटक’ कहा है। डा. आनंद पाटील उसे ‘कृतिवादी सामाजिक नाटक’ कहते हैं। प्रोफेसर रोझलिण्ड ओहन्लन ने उसे ‘शूद्रातिशूद्र विद्रोही सामाजिक नाटक’ निरुपित किया है। डा. गंगाधर पानतावणे उसे ‘दलित सामाजिक नाटक’ कहते हैं। प्रोफेसर दत्ता भगत ने उसे ‘पहला आधुनिक सामाजिक नाटक’ बताया है। गिरीश कर्नाड, जीपी देशपांडे, सुधन्वा देशपांडे, डा. यशवंत मनोहर आदि महामना भी इस नाटक की सामाजिक शक्ति को रेखांकित करते हैं।

नाटक में पांच अंक हैं। सरल, सीधी,  कथावस्तु, मुक्तनाट्य शैली, पारंपरिक नाट्य परम्पराओं का अभाव, व्ही-इफेक्ट अथवा अॅलिएनशन नाट्यशैली का अवलम्ब, नए शिल्प की रचना, नया नाट्य विधान, विदूषक पात्र के नूतनीकरण का नकार, नई भाषा के संवादों की रचना, नाट्यगीत, नाट्यसंगीत का अभाव, टोटल थिएटर की संकल्पना आदि इस नाटक की विशेषताएं हैं। किसान, उसकी पत्नी, जयराम जोशी ब्राह्मण, उसकी पत्नी,  ईसाई मिशनरी, मुस्लिम व्यक्ति, दामू जोशी एवं विदूषक इस प्रकार आठ चरित्र इस नाटक में हैं। किसान का घर, दामू का घर, जोशी ब्राह्मण का घर और मंदिर इन चार स्थानों पर यह नाटक घटित होता है।

वह गरीब किसान घर पर नही है, ऐसे समय पेटपूजक जयराम जोशी पंडित उसके घर पहुंचता है। उसकी गर्भवती पत्नी को, उसकी होनेवाली संतान पर बुरी ग्रहदशा है, ऐसा बताकर डराता-धमकाता है। दक्षिणा देने पर मजबूर करता है। ग्रह-शांति के लिए पूजा-विधि करने के लिए बाध्य करता है। उस किसान की माहवार कमाई केवल चार रुपये होती है। किंतु उस फटेहाल किसान को दस रुपये का कर्जा लेने का धर्मादेश जयराम पंडित देता है। झूठ-मूठ की पूजा करता है। पूजा-सामग्री और भोजन का सामान हथिया लेता है। किसान और उसकी पत्नी से शारीरिक श्रम करवाता है। भोजन न देकर केवल प्रसाद ही उन्हें दिया जाता है, वह भी दूर से। ईश्वर, धर्म, ग्रह-तारे, नसीब, विधिलिखित, शाप और बच्चे पर आनेवाले संकट के नाम पर उसके द्वारा आतंक का निर्माण किया जाता है।

अंत में वहां एक पादरी आता है। किसान और उसकी पत्नी की आंखें खोलता है। जोशी ने उन्हें कैसे और क्यों फंसाया है, उसकी सच्चाई बताता है। उन्हें फुले के रात्रिकालीन पाठशाला में पढने हेतु जाने का मशवरा देता है। अज्ञान, अशिक्षा, अंधविश्वास के कारण वे जोशी के षड्यंत्र मे फंस गए, यह अहसास उन्हें होता है। संपूर्ण नाटक में विदूषक निरीक्षक,  विश्लेषक के रूप में कार्य करता दिखाई देता है। वह सत्य की खोज कर, सत्य को लोगों के सामने निरुपित करता है। यह विदूषक फुले का प्रतिरूप है, जो अपने विचारों को रंगमंचीय प्रतिमान का रूप प्रदान करता है और सामाजिक परिवर्तन की दिशा को उजागर करता है।

समाज को शिक्षित करना, उसे जागृत करना इस नाटक का मूल उद्देश्य है। ‘‘विद्या के बगैर मति गयी, मति के बगैर गति गयी। गति बगैर वित्त गया। इतने अनर्थ एक अविद्या ने किये।’’ यह फुले का एक अखंड है, जो उनकी नाट्यभूमिका का परिचायक है। ‘‘हल जोतने के साथ किसानों ने शिक्षा ग्रहण की होती, तो ऐसे जोशी कब से भाग चुके होते’’, अगर जोशी मरने से इंसान को बचाते हैं, तो अंग्रेज सारे काम छोड़कर, अस्पतालों को ताले लगवाकर इंसान को बचाने का जिम्मा जोशी को क्यों नहीं सौंप देते?’’, अथवा ‘‘ग्रहों की पीड़ा झूठी है। जोशी और जोगाई बाई की राशि एक ही है। फिर जोशी को घी-रोटी और सारी तकलीफ, पीड़ा जोगाई को क्यो?’’

इस प्रकार के संवादों के द्वारा फुले अपनी वैज्ञानिक तथा व्यवहारवादी दृष्टि का भी परिचय देते हैं। ‘शिक्षा’ इंसान का तीसरा नेत्र है। तीसरा रत्न भी है, जिसके प्रभाव से अज्ञान, अशिक्षा, अंधविश्वास, अन्याय से संघर्ष किया जा सकता है। यह बात फुले तब कह रहे थे जब ‘शिक्षा’ को अभिजन समाज ‘पाप’ कह रहा था। शूद्रों को विद्या का अधिकार नहीं था। एक सनातन प्रवृत्ति के ज्ञानी कवि उसी समय कहते थे। ‘‘अगर बच्चों को स्कूल भेजोगे तो कुल को कलंक लगेगा।’’ इस परिप्रेक्ष्य में फुले की शिक्षा के प्रति भूमिका, उनके क्रांतिकारी कार्य करने का परिचय करा देती है। इसलिए तृतीय रत्न एक क्रांतिकारी नाटक है।

भारतीय सामाजिक व्यवस्था वर्ण, जाति, संप्रदाय और मूलतत्ववादी तत्वों से बनी है। सामाजिक-सांस्कृतिक शोषण के यथार्थ से उसका गहरा नाता है। इस नाटक का स्त्री चरित्र जोगाई ‘स्त्री’ एवं ‘शूद्र’ इन दोनों भूमिकाओं में शोषित है। स्त्री व्यवस्था का मूलाधार है। जयराम पंडित सबसे पहले इसी मूल पर घात लगाते हैं। उसके ‘स्त्रीत्व’ एवं मातृत्व को लक्ष्य बनाते हैं। ‘‘उच्च वर्णीय स्त्री का संघर्ष और दलित-बहुजन स्त्री का संघर्ष में बहुत फर्क होता है। इस नाटक के ‘जोगाई’  स्त्री पात्र का संघर्ष बहुआयामी है। उसकी भावनिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, पारिवारिक सारी बातों को वर्ण, जाति एवं धर्म व्यवस्था नियंत्रित करती है।’’[6]

स्त्री विमर्श के संदर्भ मे भी यह नाटक बात करता है। सामाजिक परिवर्तन के परिप्रेक्ष्य में ‘स्त्री विमर्श का विचार इस नाटक की एक विशेषता है।

मराठी के प्रसिद्ध आलोचक अरविंद वामन कुलकर्णी ने मार्क्सवादी चिंतक ग्रामशी के ‘कल्चरल हेजिमनी’ के सिद्धांत पर इस नाटक की आलोचना कर एक नए अर्थ को स्थापित किया है।[7] ‘‘हमारे देश में पूर्वजन्म, पुनर्जन्म, कर्मविपाक, आचार-विधि आदि संकल्पनाओं के आधार पर सवर्णों ने, विशेषत: अध्ययन-अध्यापन कुशल ब्राह्मणों ने, तत्वज्ञान की एक चौखट खड़ी कर दी। ऊंच-नीच के सूत्र के अनुसार एक समाज व्यवस्था का निर्माण किया। स्मृतिग्रंथ के रूप में ब्राह्मण तथा अन्य सवर्णों की सुविधा के लिए एक नियमावली तैयार की, जिसने ब्राह्मणों को ‘भूदेव’ के रूप में स्थापित किया। उन्होंने शूद्रों को गुलाम बनाया। उन्हें शिक्षा, ज्ञान से वंचित रखा। धर्म के नाम पर, ईश्वर के नाम पर वे अपनी प्रभुता, अपना वर्चस्व कायम रखते रहे। भाग्य, नसीब श्रेष्ठ है। शूद्र का जीवन ईश्वरेच्छा है। इस भूमिका के आधार पर सवर्ण तथा ब्राह्मण, शूद्रों का सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और धार्मिक शोषण करते रहे। प्रतिरोध करनेवाले को नर्क में जाना होगा, यह आतंक भी उसके लिए फैलाया गया।’’[8]

हमारी व्यवस्था की यह ‘कल्चरल हेजिमनी’ थी इस ‘कल्चरल हेजिमनी’ (सांस्कृतिक स्वमान्यता) को पहली बार नाटक के माध्यम से तोडऩे की कोशिश महात्मा फुले ने ‘तृतीय रत्न’ में की। इस कल्चरल हेजिमनी का करारा जबाब उन्होंने ‘काऊंटर हेजिमनी’ (मान्यता विरोध का सिद्धांत) से दिया। तात्पर्य ‘तृतीय रत्न’ केवल एक नाटक ही नहीं बल्कि ‘काऊंटर हेजिमनी’ का प्रतीक भी है। सामाजिक परिवर्तन के लिए सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक स्वमान्यता के सिद्धांत का मुंहतोड़ जवाब देने का कार्य ‘तृतीय रत्न’ ने किया।

बर्टोल्ट ब्रेख्त का ‘व्ही इफेक्ट’ अथवा ‘एलिअनेशन’ सिद्धांत सारी दुनिया के कला-सांस्कृतिक क्षेत्र में प्रसिद्ध है। पूंजीवाद का प्रतिरोध करने के लिए, साम्यवादी, समाजवादी विचारधारा को नाटक के माध्यम से प्रतिष्ठित करने के लिए ब्रेख्त ने इस सिद्धांत का प्रवर्तन किया और दर्शकों में चेतना का निर्माण किया और उनकी विचारशक्ति को जागृत रखा। एपिक थिएटर के रूप में इस सिद्धांत को प्रत्यक्ष तौर पर ब्रेख्त ने पहचान दी। शिल्प, शैली, तंत्र, रचना भाषा, चरित्र, संवाद के स्तर पर ब्रेख्त ने कई प्रयोग किए। आश्चर्य की बात यह है की महात्मा फुले ने भी इस सिद्धांत को ‘तृतीय रत्न’ द्वारा प्रत्यक्ष रूप में पेश किया। इस सिद्धांत, इस नाट्य शैली के सारे तत्व, विशेषताएं इस नाटक में हम देख सकते हैं। वह भी बर्टोल्ट ब्रेख्त से 75 साल पूर्व। एक नाटक के रूप में इसमें कई कमियां हैं। पारंपरिक नाटक के मानदंड की कसौटी पर यह नाटक उतरता नहीं। रस परिपाक, नाटकीयता, कलात्मकता, भावनिक अभिव्यक्ति इसमें नहीं है। किंतु इसका आशय और प्रदर्शन की ‘प्रायोगिक’ संभावनाएं इसकी खासियत है। कई संकल्पनाओं में इस नाटक का मंचन किया जा सकता है। कुल मिलाकर सामाजिक परिवर्तन के रंगमंच के संदर्भ में ‘तृतीय रत्न’ का महत्व अतुलनीय है। भारतीय सामाजिक रंगमंच का सूत्रपात भी इसी नाटक ने किया है। दुर्भाग्यवश 125 साल तक यह नाटक अंधेरे में खो गया था। 1979 मे इसको पहली बार खोजा गया। विगत 30 सालों से यह नाटक चर्चा व अनुसंधान का विषय बना हुआ है।

[1] ‘नाटकी निबंध’, गो.पु. देशपांडे, लोकवांड्य गृह मुंबई

[2] ‘नाटक ठेवणीतली’, कमलाकर नाडकर्णी, पंडित पब्लिकेशन कणकवली।

[3] ‘विस्मरणात गेलेली नाटके’, अरविंद वामन कुलकर्णी, पद्मगंधा प्रकाशन, पुणे

[4] ‘तृतीय रत्न-आद्य मराठी नाटक’, डा. सतीष पावडे, नभ प्रकाशन, अमरावती

[5] ‘तृतीय रत्न’, अनुवाद-सुशीला भारती, विश्वभारती प्रकाशन, नागपुर।

[6] ‘आधुनिक मराठी वांड्मयाचा इतिहास’ (भाग-एक), संपादक-डा. अ.ना. देशपांडे

[7] ‘तृतीय रत्न एवं स्फूट रचनाएं’. संपादक-हरी नरके, म. जो. फु. च.सा. महाराष्ट्र शासन, मुंबई।

[8] ‘महात्मा फुले समग्र वांड्मय’, संपादक-धनंजय किर, डा. स. ग. माल।

(फारवर्ड प्रेस के अप्रैल, 2013 अंक में प्रकाशित )

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