धर्म के जुए को उतार फेंके पिछड़े : रमणिका गुप्ता

पिछड़ा हो या दलित, दोनों को ही अपने-अपने समाज के अति पिछड़े और अति दलित वर्ग के कल्याण और चेतना के विकास को अपना मुख्य लक्ष्य बनाकर चलना पड़ेगा

(सुप्रसिद्ध लेखिका रमणिका गुप्ता से रमेश कुमार की बातचीत)

ओबीसी साहित्य पर आपके क्या विचार हैं?

ओबीसी साहित्य हो या दलित साहित्य दोनों का लक्ष्य मनु के ब्राह्मणवादी वर्ण-व्यवस्था को तोडऩा है, तो दोनों का साहित्य अलग नहीं एक ही होगा। दलितों और पिछड़ों में ब्राह्मणवाद ने जो अंतर पैदा किया है, उसे एक करने के लिए बड़े प्रयास करने की जरूरत है। दोनों में जो अंतर है वे इस तरह हैं-दलित पंचम वर्ण में आता है, पिछड़ा शूद्र में। दलित अस्पृश्य है, उसका पानी नहीं चलता लेकिन शूद्र स्पृश्य हैं, उनका पानी चलता है। शूद्र चतुर्थ वर्ण में हैं, दलित पंचम वर्ण में। शूद्र, हिन्दू वर्ण व्यवस्था के रोजाना के काम-काज और अनुष्ठानों से जुड़े हैं, जबकि दलित बहिष्कृत हैं। इतना ही नहीं पिछड़ों और दलितों, दोनों में भी अति-पिछड़े और अति-दलित भी होते हैं। ये दोनों एक दूसरे को अपने से नीचे मानते हैं। इसलिए पिछड़ा हों या दलित, दोनों को ही अपने-अपने समाज के अति पिछड़े और अति दलित वर्ग के कल्याण और चेतना के विकास को अपना मुख्य लक्ष्य बनाकर चलना पड़ेगा, ताकि अति-पिछड़ों या अति-दलित वर्ग उपेक्षित महसूस न करें और खुद को अपने ही लोगों द्वारा उपेक्षित किए जाने के दंश से न गुजरें। वे यह उम्मीद करते हैं कि अपने जो लोग उनसे तनिक उन्नत हैं, पर सवर्ण की दृष्टि में निम्न ही हैं-उनसे विभेद न बरते, उनका अपमान न करें। ऐसा होने पर ही पिछड़ों व अति पिछड़ों, दलित और अति-दलित की एकता बरकरार रह सकती है और पिछड़े-दलित के अपने भीतर बैठा ब्राह्मणवाद टूट सकता है।

ओबीसी साहित्य दलित साहित्य से किस रूप में अलग होगा?

दोनों का साहित्य अपने-अपने अनुभव का साहित्य है, तो अनुभव तो अलग होंगे ही। लेकिन दोनों का लक्ष्य अगर जाति तोड़कर मनुष्य के अधिकार पाने हैं, तो दोनों साहित्य के आयकॉन एक हो सकते हैं। दलितों ने जिस प्रकार पिछड़े सुधारकों को भी अपनाया, उसी तरीके से पिछड़े भी आम्बेडकर जैसे महान दलित क्रांतिकारी सुधारक को अपना सकते हैं। आम्बेडकर ने फूले से ही प्रेरणा ली थी। फूले पिछड़े थे। देश के पैमाने पर अभी तक पेरियार जो पिछड़ी जाति के थे, को नायक माना जाता है। देश के दलितों ने पेरियार को भी अपना आयकॉन बनाया है। हालांकि वे दक्षिण में ज्यादा प्रभावकारी रहे। राज्य स्तर पर अलग-अलग पिछड़ी जाति के नेता जरूर हुए हैं, जिनमें सबसे ज्यादा प्रभावशाली और सक्षम थे शहीद जगदेव प्रसाद। उन्होंने बिहार की पिछड़ी जातियों में रामायण तक को बहिष्कृत करवा दिया था। शादी-विवाह में भी पिछड़ी जातियों ने खासकर कुर्मी-कोइरियों ने ब्राह्मणों से अनुष्ठान करवाने बंद कर दिए थे। राजनीतिक स्तर पर कर्पूरी ठाकुर जैसा नेता देश के स्तर पर सर्वश्रेष्ठ थे। उन्होंने राममनोहर लोहिया के पिछड़ा पावे सौ में साठ की अवधारणा को लागू किया था। लोहिया राजनीतिक नेता थे। उन्होंने ही पिछड़ों के आरक्षण की बात उठाई थी। उनके पिछड़ों में दलित भी शामिल थे। पर दुख तो यह है कि इतने प्रभावकारी विचारक, चिंतक पिछड़े नेता अपने बीच से ही होने के बावजूद बाकी भारत के पिछड़े समाज ने इनको नहीं अपनाया। अन्यथा पिछड़ों की पहचान की बात उसी समय जोर पकड़ गई होती। पिछड़ों ने राजनीति में भागीदारी के लिए आंदोलन तो खूब किए, लेकिन सामाजिक सुधार के मुद्दे पर वे चुप रहे। वे ब्राह्मणवाद को ही अपना आदर्श मानकर वैसा ही बनने की चेष्टा करते रहे। ब्राह्मणवादी अनुष्ठानों, परंपराओं और रूढियों को वे ब्राह्मणों से भी ज्यादा श्रद्धापूर्वक मनाने लगे। इसलिए पिछड़ों का अगर कोई सबसे बड़ा उद्देश्य होना चाहिए तो वह धर्म से मुक्त होने का होना चाहिए। जाति-व्यवस्था पर धर्म की मुहर लगी हुई है। पिछड़े हों या दलित वे ही धर्म को ढोते रहे हैं। अब कंधों से धर्म के इस जुए को उतार फेंकने की बारी है। एक बात और, यदि पिछड़ों ने धार्मिक पुस्तकों से अपने आयकॉन बनाए, तो यह पुन: हिन्दू वर्ण-व्यवस्था की रस्सी को गले में डालकर फांसी चढने जैसा ही होगा।

ओबीसी साहित्य के आदर्श क्या वही होंगे, जो दलितों के आदर्श हैं या उसके आयकॉन अलग होंगे?

दोनों का आदर्श है जाति तोडऩा, फलत: दोनों के आयकॉन भी एक ही हो सकते हैं। बुद्ध, फूले, पेरियार, आम्बेडकर, लोहिया, जगदेव, कर्पूरी ठाकुर आदि सभी ने जाति तोडऩे की बात कही है। सभी ने अंतर्जातीय विवाह को भी अनिवार्य बताया। आयकॉन को अलग करने का अर्थ होगा विभेदों को बढाना। दलित और पिछड़ों की साझा एकता बढेगी तभी बहुजन साहित्य का निर्माण होगा। बहुत पहले आर्य और अनार्य में नस्लीय युद्ध हुए थे। आज हमारी लड़ाई वर्ण से है। आदिवासी आज भी अपनी नस्ल के कारण अलग से पहचाने जाते हैं। उनकी देह संरचना, भाषाएं व संस्कृतियां अभी भी मौजूद हैं। बाकी भारतीय समाज तो आर्यों-अनार्यों का मिश्रण है। हम सब संकर हैं। दलितों और पिछडों में भी गोरे लोग हैं, तो ब्राह्मणों में भी काले लोग होते हैं। सभी को एक जैसे कपड़े पहना देने से इनकी नस्ल नहीं पहचानी जा सकती। इनकी भी अपनी-अपनी क्षेत्रीय भाषाएं हैं। इसलिए पिछड़े हों या दलित, उनकी लड़ाई नस्लीय नहीं जातिगत है। आज तो आदिवासी भी भारत के कई क्षेत्रों में आंबेडकर को अपना आयकॉन मानकर आंदेालन चला रहे हैं। आरक्षण का आयकॉन रावण नहीं आंबेडकर हो सकते हैं। हां, रावणों, महिषासुरों ओर शंबूकों की शास्त्रों ने जो अवमानना की या अपमान किया, उसे नकारकर पिछड़ा साहित्य उनका पुनर्पाठ और पुनर्व्याख्या कर सकता है। वे अपने युग के नायक थे, उन्हें वही प्रतिष्ठा पिछड़ा-दलित साहित्य दिलवा सकता है। वर्ण-व्यवस्था के विरुद्ध लडऩे और मरने वाले वीरों या शहीदों को न्याय की इस मुहिम का आयकॉन बनाया जा सकता है। आज की लड़ाई सिद्धांतपरक है, व्यक्तिपरक नहीं। वह अवधारणापरक और तर्कपरक भी है। आदेशों या फतवों के पालन के लिए यह जंग नहीं लड़ी जा रही। दलित हो या पिछड़ा, उन्हें तो इन्हीं फतवों और आदेशों के खिलाफ जूझना होगा। इसलिए उनके हथियार या तरीके, उन्हें उसी अनुरूप गढने होंगे। इसके लिए किसी भी प्रकार के पूर्वाग्रह से मुक्त होना भी जरूरी है।

रमणिका गुप्ता

साहित्य में आरक्षण पर क्या सोचती हैं?

मेरा मानना है कि हमारे समक्ष दलित साहित्य प्रचुर मात्रा में आ चुका है। पिछड़ा साहित्य इसमें इजाफा ही करेगा। इसलिए जरूरी है कि इस साहित्य को दलित, पिछड़े या गैर-दलित, दोनों को पढाया जाए, ताकि बचपन से ही सभी का दृष्टिकोण बदले। इसलिए इस साहित्य का पाठ्यक्रम में सुनिश्चित करना जरूरी है। ऐसा साहित्य मानवता का साहित्य है। ये विभेद के खिलाफ बोलता है। मानव के पक्ष की बात बोलता है। जो व्यक्ति खुद को अन्य से ऊंचा माने या दूसरे को अपने से नीचा, वह मनुष्य कहलाने के काबिल ही नहीं है। पाठ्यक्रम में इस साहित्य को अनिवार्य बनाना साहित्य का आरक्षण तो नहीं होगा, हां इसे पाठ्यक्रम में आरक्षण जरूर कहा जा सकता है। ऐसा करना जरूरी भी है। ये मठाधीशी के लिए नहीं, विचारों के प्रसार और बदलाव के लिए अनिवार्य हैं। इसे मानवतावादी सोच का सुनिश्चितीकरण भी कहा जा सकता है। पाठ्यक्रमों में दलित-पिछड़े साहित्य का पढाया जाना अनिवार्य होना चाहिए, ताकि भारतीय मानस अपनी विकृृतियों को पहचाने और इतने बड़े वंचित समाज की अनजानी पर असीमित क्षमताओं को जाने।

राजेंद्र यादव जैसे लेखक ओबीसी साहित्य को नकारते हैं?

देखिए, अब दलित और पिछड़े संगठित हो रहे हैं। यह अच्छा है। पर पुराने इतिहास को दोहराते हुए पिछड़ों द्वारा दलितों के ही विरुद्ध खड़े हो जाने का खतरा भी है। वह इसलिए कि ब्राह्मणों व अन्य जातियों के बनिस्बत पिछड़ा समाज वर्ण-व्यवस्था का ज्यादा बड़ा और ताकतवर झंडाबरदार रहा है। दक्षिण में जब पेरियार, जो स्वयं पिछड़ी जाति के थे, ने पिछड़ों की लडा़ई छेड़ी, तो वहां पिछड़ा वर्ग सक्षम हुआ और अंग्रेजों के राज में ही दक्षिण में आरक्षण लागू हुआ। लेकिन आजकल दलितों पर जुर्म करने वाले पिछड़े ही ज्यादा हो गए हैं। सवर्ण जमात सिमट रही है। अगर वह कुछ करती भी है तो पिछड़ों को आगे रखकर करती है। खुद ही सक्षम हो जाने के कारण आज पिछड़े ही दलितों पर जुर्म ढाने लगे हैं। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान सभी जगह यही स्थिति है। बिहार में बेलछी कांड सब को याद होगा। वहां दलितों को आग में डालने वाले पिछड़े ही लोग थे। इसलिए पिछड़ा आंदोलन चलाना है, तो ऐसे तत्वों से सावधान रहना होगा। हर लड़ाई में दलितों को नेतृत्वकारी भूमिका में साथ लेकर चलना होगा। दलित हों या पिछड़ा इनकी लड़ाई समानता, भाईचारा और आजादी की ही है। ये आंदोलन ब्राह्मण के स्थान पर दलित या पिछड़े को बैठाने के लिए नहीं है बल्कि सभी को मानवीय अधिकारों से लैस मनुष्य बनाना है।

दलित साहित्य और ओबीसी साहित्य की जगह यदि बहुजन साहित्य की बात की जाए तो वह कैसा रहेगा?

जब सभी दलित और पिछड़े समाज आपस में मिलकर बेटी-रेाटी का रिश्ता कायम कर लेंगे, अंतर्जातीय विवाह करने लगेंगे ओैर अपने भीतर स्थापित मनु को निकाल बाहर करेंगे, तो वह एक आदर्श स्थिति होगी। उनके भीतर बैठा मनु उन्हें आपस में भी छोटा-बड़ा ठहराकर परस्पर लड़वाने की अपनी साजिश बरकरार रखे हुए है। पिछड़ा समाज, क्योंकि पढाई, धन-बल और जन में दलितों से अधिक सक्षम है, इसलिए उसका दायित्व हो जाता है कि वह दलितों या उनके साथ चले। इस लड़ाई की पहल दलितों ने बहुजन के नाम पर शुरू की थी। इसलिए साथ मिलकर ही ब्राह्मणवाद से निजात पाई जा सकती है। यदि अन्यथा न लिया जाए, तो आज तक पिछड़े ही लाठी और डंडे से लैस होकर ब्राह्मणों के साथ खड़े होते रहे हैं। वे ही विभिन्न बाबाओं को पूजते रहे हैं। उनकी लात खाते रहे हैं। पिछड़े मुख्यमंत्री ही भूमिपूजन हों या ब्राह्मणी अनुष्ठान, ब्राह्मणों से आगे रहने की होड़ में रहते हैं। इसलिए यदि पिछड़े साहित्य का मेनिफेस्टो बनाना है, तो बाबा साहेब की 22 प्रतिज्ञाओं को ही आधार बनाना होगा, जिसमें देवी-देवता, भगवान, भाग्य, पाप-पुण्य, पुनर्जन्म, आस्था, विश्वास का नकार है और तर्क, वैज्ञानिक सोच, श्रम, शिक्षा, संगठन और संघर्ष की अवधारणा है। चाहे अछूत हों या पिछड़ा, दलित शब्द सामाजिक स्तर पर कुचली गई जमातों के लिए प्रयुक्त होने लगा है। हालांकि आम्बेडकर के अनुसार ही दलित शब्द का प्रयोग फिलहाल सामाजिक स्तर पर अधिकारों से वंचित कर दी गई केवल अस्पृश्य जातियों के लिए ही होता है। अगर दलित और पिछड़े अवर्ण दोनों मिलकर बहुजन की अवधारणा को जमीन पर उतारना चाहते हैं, तो अति-पिछड़े और अति-दलित भी इस मुहिम में शामिल हो सकते हैं। बशर्ते पिछड़े या दलित अपने-अपने भीतर का विभेद खत्म कर, साझा लड़ाई लडऩे को तैयार हों।

(फारवर्ड प्रेस के अप्रैल, 2013 अंक में प्रकाशित )

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