फारवर्ड विचार, मई 2013

परंतु उनकी निगाहों में पिछड़े हुए बहुजनों के संघर्ष की कोई कीमत नहीं है, विशेषकर जब बात उनके अधिकारों की हो। वे ’80’ या ’90 प्रतिशत’ भारतीयों को किसी काम का नहीं समझते। हमारे नियमित लेखक कंवल भारती की शोधपरक आवरण कथा काटजू के उदारवादी मुखौटे के पीछे छिपे अभिजात चेहरे का पर्दाफाश करती है।

अगर मीडिया में चर्चा में बने रहना, भारतीय प्रेस परिषद् का अध्यक्ष बनने (और बने रहने) की अहर्ता होती तो न्यायमूर्ति मारकेण्डेय काटजू इस पर पूरी तरह खरे उतरते। उन्हें इस पद पर विधि के क्षेत्र में एक शानदार करियर के अंत में नियुक्त किया गया है। उन्होंने एलएलबी की परीक्षा में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया, वे एक सफल वकील थे और दिल्ली, मद्रास व इलाहाबाद उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश रहने के बाद उच्चतम न्यायालय में जज बने। यद्यपि उन्होंने (कम से कम अब तक) राजनीति में अपना करियर नहीं बनाया है परंतु विधि के साथ-साथ राजनीति भी इस कश्मीरी पंडित की रगों में बह रही है।

इन दिनों यह चर्चा आम है कि देश चुनाव के मुहाने पर खड़ा है। ऐसे में फारवर्ड प्रेस की आवरण कथा राजनीति पर केन्द्रित होनी चाहिए थी। फिर हमारे आवरण पर न्यायमूर्ति काटजू क्यों? क्या मैं कहूं कि इसलिए, क्योंकि हम उनका आवरण उतार फेंकना चाहते हैं। अपने वतर्मान अवतार में न्यायमूर्ति काटजू अपना उदारवादी चेहरा देश के सामने प्रस्तुत करने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं-चाहे वह फिल्म कलाकार संजय दत्त की सजा माफ करने की अपील हो या मौत की सजा पाए ‘आतंकवादी’ भुल्लर के प्रति दयाभाव। यहां तक कि कई निहायत घटिया लोगों, जिनमें एक पोर्न स्टार भी शामिल है, के प्रति भी काटजू के मन में दया और संवेदना का सागर हिलोरें ले रहा है। परंतु उनकी निगाहों में पिछड़े हुए बहुजनों के संघर्ष की कोई कीमत नहीं है, विशेषकर जब बात उनके अधिकारों की हो। वे ’80’ या ’90 प्रतिशत’ भारतीयों को किसी काम का नहीं समझते। हमारे नियमित लेखक कंवल भारती की शोधपरक आवरण कथा काटजू के उदारवादी मुखौटे के पीछे छिपे अभिजात चेहरे का पर्दाफाश करती है। कौन-सा काटजू असली है? इस मुद्दे के जज, सुधि पाठकगण, आप ही हैं।

अब, राजनीति पर वापस आएं। उचित समय आने पर फारवर्ड प्रेस राजनीतिक विश्लेषणों का सिलसिला शुरू करेगा। इस बीच केवल इतना कहना पर्याप्त होगा कि चुनाव के पहले (अगले 6 या 12 महीनों में) विपक्ष, स्वाभाविकत:, सरकार पर हमला करने का कोई मौका नहीं छोड़ेगा। आश्चर्यजनक यह है कि यूपीए-2 सरकार इस मामले में विपक्ष के साथ भरपूर सहयोग कर रही है। क्या यूपीए-2 की जिजीविषा समाप्त हो गई है? अगर हां, तो उसे उसके कष्टों से मुक्ति कौन दिलाएगा? इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि बहुजन भारत के लोगों को उनके कष्टों से मुक्ति कौन दिलाएगा?  यदि आप एक दोषदर्शी पत्रकार नहीं भी हैं तब भी आज के भारत में, चारों ओर नजर दौड़ाने पर भी आपको कोई मसीहा नजर नहीं आएगा। बाइबल कहती है कि ‘जहां दूरदृष्टि नहीं होती, वहां लोग नष्ट हो जाते हैं। क्या हमें आज देश में कोई ऐसी महिला, पुरुष या पार्टी नजर आ रही है जिसकी स्पष्ट दृष्टि और ईमानदार मूल्य हों? देश में इस समय सिर्फ गंदली राजनीति का बोलबाला है, जिसमें सभी परस्पर स्वार्थ से एक दूसरे से बंधे हुए हैं।

शायद जरूरत इस बात की है कि हम परिवर्तन के वाहकों की तलाश अन्यत्र करें। पेड़ की सबसे ऊंची टहनी पर खड़े होकर उन्हें ढूंढने की बजाय हम जमीन पर उन्हें ढूंढें। पिछले कुछ महीनों में, फारवर्ड प्रेस ने बड़ी संख्या में जमीन से जुड़े प्रतिनिधियों की भर्ती की है। ये लोग जिला/संभागीय मुख्यालयों और छोटे शहरों में फारवर्ड प्रेस के एक-सदस्यीय ब्यूरो चलाएंगे। वे खबरें भेजेंगे, विज्ञापन जुटाएंगे और ग्राहक बनाएंगे। हम इस अंक से उत्तर भारत के अनेक शहरों से प्राप्त खबरों को संक्षिप्त रूप में प्रकाशित करने का सिलसिला शुरू कर रहे हैं। अगर आप फारवर्ड प्रेस से जुड़े हुए हैं तो अपने क्षेत्र के हमारे प्रतिनिधि से संपर्क बनाए रखें। उन सबसे अपेक्षित है कि वे फारवर्ड प्रेस की आचार संहिता (पेज 26) का कड़ाई से पालन करें। हमें उम्मीद है कि इन प्रतिनिधियों के जरिए हम देश की नब्ज को पकड़ सकेंगे।

नई दिल्ली में 5 साल की एक बच्ची के साथ हुए पाशविक कृत्य से दिल्ली एक बार फिर हिल गई है। एक बार फिर बहस कानूनों और कानून लागू करने वालों के आसपास घूम रही है। शायद ही कहीं इस समस्या के समाजवैज्ञानिक पहलू पर चर्चा हो रही हो (अपनी पत्नियों और परिवारों से लंबे समय तक दूर, महानगरों में रह और काम कर रहे पुरुषों की बड़ी संख्या) और ना ही इस रुग्णता की सांस्कृतिक जड़ों पर कोई ध्यान दे रहा है। इस सामाजिक दु:स्वप्न पर फारवर्ड सोच की जरूरत है।

(फारवर्ड प्रेस के मई 2013 अंक में प्रकाशित)

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