फारवर्ड विचार, अगस्त 2013

एफपी, बेआवाज लोगों की आवाज तो है ही, वह उन बहुजनों को भी मंच प्रदान करती है जिन्हें मीडिया में जगह नहीं मिलती। एफपी तथाकथित मुख्यधारा के मीडिया की आलोचक भी है जो मुख्यत: कुलीन वर्ग की चिंताओं को स्वर देता है और बहुजनों से संबंधित समाचारों को भी कुलीन वर्ग के चश्मे से देखता है।

दूरी चाहे वह समय की हो या भौगोलिक – हमें लोगों और मुद्दों को अलग परिप्रेक्ष्य में देखने का मौका देती है। यह लेख मैं जुलाई के अंतिम सप्ताह में, उत्तरी अमेरिका से लिख रहा हूं। अभी कल तक मैं अमेरिका के अपने विश्वविद्यालय की वार्षिक लीडरशिप संगोष्ठी में हिस्सा ले रहा था। इस साल की संगोष्ठी का विषय था “नेतृत्व और विभिन्नता”। मुख्य वक्ता थीं सीएनएन की जानीमानी एंकर व विशेष संवाददाता सोलेडेड ओ. ब्रायन, जो कि एक बहुनस्लीय अश्वेत अमरीकी हैं। यह विस्मयकारी है कि उन्हें विशालकाय अमरीकी मीडिया में, उन लोगों की व्यथा के वर्णन के लिए स्थान और समय पाने के लिए कितना कठिन संघर्ष करना पड़ा, जिनकी आवाज की कोई सुनवाई नहीं थी। मैं उनके व फारवर्ड प्रेस के नजरिए और मिशन में काफी समानताएं पाता हूं – सिवाय एक महत्वपूर्ण कारक के। जहां पश्चिम, बल्कि एशिया में भी, संघर्ष अल्पसंख्यकों को स्वर देने का है, वहीं भारत में संघर्ष है मूक बना दिए गए बहुसंख्यक बहुजनों को स्वर देने का।

एफपी, बेआवाज लोगों की आवाज तो है ही, वह उन बहुजनों को भी मंच प्रदान करती है जिन्हें मीडिया में जगह नहीं मिलती। एफपी तथाकथित मुख्यधारा के मीडिया की आलोचक भी है जो मुख्यत: कुलीन वर्ग की चिंताओं को स्वर देता है और बहुजनों से संबंधित समाचारों को भी कुलीन वर्ग के चश्मे से देखता है।

परंतु हां, मुख्यधारा का (मुख्यत: आर्थिक) मीडिया, इन दिनों दलित उद्यमियों व विशेषकर डिक्की के बारे में काफी कुछ लिख रहा है। हमारे पहले ही वर्ष में एफपी ने दलित उद्यमियों पर एक श्रृंखला प्रकाशित की थी और हम आगे भी ऐसा करते रहेंगे। बहुजन मीडिया में भी एफपी इस मामले में औरों से अलग है कि हम लकीर के फकीर समाजवादी नहीं हैं। हमारा मानना है कि दलित-बहुजनों को आगे बढऩे के लिए शिक्षा और रोजगार के अलावा, उद्यमिता की भी आवश्यकता है। इसलिए हमने डिक्की के गठन का स्वागत किया था और डिक्की वेंचर केपिटल फंड की शुरूआत का भी (एफपी, जुलाई 2013)। हमें लगा कि डिक्की की इस प्रगति पर कई दलित बुद्धिजीवियों की नकारात्मक प्रतिक्रिया के पेशेनजर, हमें भारत के आर्थिक उदारीकरण को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखने और यह पता लगाने की कोशिश करनी चाहिए कि दलित, उदारीकरण को क्यों गले लगा रहे हैं।

प्रेम कुमार मणि दो भागों में प्रकाशित हमारी आवरण कथा में, इतिहास के अपने अद्भुत और विद्वतापूर्ण विश्लेषण के जरिए, यह बता रहे हैं कि दलित किस प्रकार भारतीय पूंजीवाद की दुनिया में प्रविष्ट हुए।

इस सिलसिले में मुझे एक दार्शनिक प्रश्न ने बहुत उलझन में डाल रखा है। वह यह कि क्या कारण है कि अल्पसंख्यक पारसी उद्योगपति, हिन्दू और जैन उद्योगपतियों की तुलना में कहीं अधिक परोपकारी हैं? क्या ब्राहम्णवाद ने भारत के बहुसंख्यक धनकुबेरों के दिलों और जेबों पर इतना नकारात्मक प्रभाव डाला है? डिक्की और दलित उद्यमिता को उनका समर्थन क्या उनके लिए परोपकार है या एक चतुर व्यवसायिक कदम या दोनों का मिश्रण? क्या कोई इन प्रश्नों के उत्तर देने का प्रयास करेगा?

पिछले अंक में विशाल मंगलवादी ने राष्ट्रनिर्माण में सच्चे इतिहास के महत्व को रेखांकित करते हुए यह प्रश्न उठाया था कि हिन्दुओं ने इतिहास लेखन को कोई महत्व क्यों नहीं दिया। इस बार के ‘जनमीडिया’ स्तंभ में, अनिल चामडिय़ा बता रहे हैं कि किस तरह आधुनिक हिन्दू “राष्ट्रवादी”, तरह-तरह के मिथकों और किवदंतियों को ‘ऐतिहासिक’ बताकर, इतिहास को अपने धर्मशास्त्र के अनुरूप बनाने के लिए उसे तोड़-मरोड़ रहे हैं। वे इन मुद्दों को युवा भारतीय पत्रकारों के प्रशिक्षण के संदर्भ में उठा रहे हैं। यह मुद्दा बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि आखिर पत्रकारिता, इतिहास का पहला मसविदा होती है। एफपी में हम अपनी इस भूमिका को गंभीरता से लेते हैं।

(फारवर्ड प्रेस के अगस्त 2013 अंक में प्रकाशित)

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