फारवर्ड विचार, सितंबर 2013

ऐसा लगता है कि मायावती की बसपा और मुलायम की सपा, दोनों उत्तरप्रदेश में ‘सोशल इंजीनियरिंग-ब्राह्मण मतदाताओं को आकर्षित करना जिसका एक मुख्य लक्ष्य है-में इतने खो गए हैं कि वे इसके लिए अपने प्रति वफादार वर्गों के हितों की बलि चढ़ाने के लिए तैयार हैं

एक बार फिर मैं यह आलेख उत्तरी अमेरिका से लिख रहा हूं और भौगोलिक दूरी के कारण मुद्दों को एक नए परिप्रेक्ष्य में देख पा रहा हूं। यहां रहकर यह स्पष्ट हो जाता है कि वैश्विक मीडिया में भारत को कोई खास तव्वजो नहीं मिलती, जब तक कि वहां कोई बड़ी आपदा न आ जाए या मानवीय संवेदनाओं को छूने वाली कोई घटना न घटे। मेरे शहर मुंबई में 22 अगस्त को एक फोटो पत्रकार के साथ हुए क्रूर बलात्कार ने पूरी दुनिया, विशेषकर, यहां उत्तरी अमेरिका में, सुर्खियों में जगह पाई। परंतु इससे भी बड़ी घटना, जिससे बहुत बड़ी संख्या में भारतीयों का प्रभावित होना सुनिश्चित है, को विश्व मीडिया तो छोड़, भारतीय मीडिया में भी पर्याप्त कवरेज नहीं मिला।

मेरा इशारा हाल में उत्तरप्रदेश लोकसेवा आयोग द्वारा लागू किए गए नए आरक्षण नियमों की ओर है, जिन्हें बाद में वापस ले लिया गया। इन नए नियमों से चयन प्रक्रिया के हर स्तर पर ओबीसी प्रतिनिधित्व बढ़ गया था। जैसी कि उम्मीद की जा सकती थी, इस निर्णय की उच्च जातियों के युवाओं में रोषपूर्ण व हिंसक प्रतिक्रिया हुई, जिसे ब्राहम्णवादी मीडिया व विशेषकर हिन्दी अखबारों ने परोक्ष रूप से औचित्यपूर्ण ठहराया। इससे कड़क बोलने के लिए मशहूर मुलायम सिंह यादव सहित, समाजवादी पार्टी के संपूर्ण नेतृत्व में खलबली मच गई और उन्होंने अपना निर्णय रातों-रात बदल दिया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने, प्रक्रियानुसार, राज्य सरकार को कारण बताओ नोटिस जारी किया और नए नियमों के अंतर्गत चयनित उम्मीदावारों की नियुक्ति पर रोक लगा दी। परंतु इसके पहले ही, समाजवादी पार्टी ने आत्मसमर्पण कर दिया था। यह इस तथ्य के बावजूद कि ओबीसी युवाओं ने यूपीपीएससी के नए नियमों का समर्थन करते हुए विशाल और मुख्यत: शांतिपूर्ण प्रदर्शन किए।

क्या सपा अपने मूल समर्थकों-यादव और ओबीसी, को नजरअंदाज कर, देश के सबसे बड़े राज्य में सत्ता में बनी रह सकती है और 2014 में मुलायम सिंह यादव की प्रधानमंत्री पद पाने की अंतिम कोशिश में सफलता की उम्मीद कर सकती है? ऐसा लगता है कि मायावती की बसपा और मुलायम की सपा, दोनों उत्तरप्रदेश में ‘सोशल इंजीनियरिंग-ब्राह्मण मतदाताओं को आकर्षित करना जिसका एक मुख्य लक्ष्य है-में इतने खो गए हैं कि वे इसके लिए अपने प्रति वफादार वर्गों के हितों की बलि चढ़ाने के लिए तैयार हैं। अगर ओबीसी युवाओं के प्रदर्शनों के दौरान लगाए गए ‘आरक्षण नहीं तो वोट नहीं’ के नारे को गंभीरता से लिया जाए तो ऐसा लगता है कि वे मतदान के समय, सपा और बसपा को सबक सिखाएंगे। इन युवाओं का मायावती और मुलायम दोनों से मोहभंग हो चला है और वे फुले के बहुसंख्यकवादी दर्शन और कांशीराम की बहुजन राजनीति की ओर लौट रहे हैं। प्रश्न केवल यह है कि क्या मायावती और मुलायम समय रहते चेतेंगे? या, क्या अब समय आ गया है कि एक तीसरी, सही अर्थों में दलित-बहुजन शक्ति उदित हो और बहुजनों के मत पर अपना दावा प्रस्तुत करे?

मीडिया के उच्च जातियों की ओर झुकाव और इस बहस में पिछड़ों के पक्षधरों की राय को स्थान न देने की भरपाई करने की दृष्टि से फारवर्ड प्रेस अब तक की अपनी सबसे लंबी आवरण कथा प्रस्तुत कर रहा है जिसकी बैनर हेडलाईन है ‘उत्तरप्रदेश : मंडल 3.0’। इसमें अखिल भारतीय पिछड़ा वर्ग छात्र संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष जितेन्द्र यादव की रपट सबसे बड़ी है। वे उत्तरप्रदेश में थे, जहां यह सब कुछ घट रहा था। इस विस्तृत रपट के अलावा, हमारे इलाहाबाद संवाददाता बंजारा गंवार ने इस पूरे घटनाक्रम के दौरान मीडिया के पूर्वाग्रहपूर्ण रूख का पर्दाफाश किया है। फारवर्ड प्रेस के दिल्ली संवाददाता अशोक चौधरी ने इस मामले में विभिन्न राजनीतिक दलों और नेताओं की भूमिका को रेखांकित किया है। अंत में हैं डायवर्सिटी मिशन के एचएल दुसाध का गहन विश्लेषण, जिसमें उन्होंने ओबीसी युवाओं द्वारा कांशीराम की बहुजन दृष्टि को गले लगाने की बात कही गई है।

मैंने अपने पिछले संपादकीय के अंत में लिखा था ‘…क्योंकि आखिर पत्रकारिता, इतिहास का पहला मसविदा होती है। एफपी में हम अपनी इस भूमिका को गंभीरता से लेते हैं’। यह आवरण कथा इसका उदाहरण है।

(फारवर्ड प्रेस के सितंबर 2013 अंक में प्रकाशित)


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