हमारी भावनात्मक आवश्यकताओं में टकराव

जीवनसाथी की मूल भावनात्मक आवश्यकताओं को समझना, वैवाहिक संबंधों की बेहतरी का एक महत्वपूर्ण गुर है – एक ठोस वैवाहिक मंत्र

पति-पत्नि, सामान्यत:, इस तथ्य से वाकिफ नहीं होते कि उनकी अलग-अलग और बदलती हुई भावनात्मक आवश्यकताएँ होती हैं। परन्तु सच यही है और इसलिए, जहाँ तक एक दूसरे की आवश्यकताएँ पूरी करने का प्रश्न है, केवल सहजवृत्ति से काम नहीं चलता। पति-पत्नि अक्सर एक दूसरे को वह देने का प्रयास करते हैं, जो वे स्वयं पाना चाहते हैं और इस तरह, दोनों असंतुष्ट बने रहते हैं और कभी-कभी एक दूसरे के प्रति द्वेष पाल लेते हैं। कई मौकों पर यह भी होता है कि पति या पत्नि को ऐसा लगता है कि उनका जीवनसाथी, उनके प्रेम की न तो अभिस्वीकृति कर रहा है और ना ही सराहना। एक व्यक्ति देता है परन्तु दूसरा व्यक्ति उसे पाता नहीं है। यह परिस्थिति कब-जब दोनों में निराशा का भाव पैदा कर देती है।

पत्नि जब पति के बारे में अपनी चिंता उसके सामने व्यक्त करती है या ऐसे प्रश्न करती है, जिनसे यह जाहिर होता हो कि वह उसके प्रति फिक्रमन्द है, तब उसे लगता है कि वह अपने पति के प्रति अपना प्रेम व्यक्त कर रही है। परन्तु इससे पति को चिड़चिड़ाहट होती है विशेषकर तब, जब वह थका हुआ हो या अपने में ही कैद रहना चाहता हो। पुरूष कब-जब अपनी ‘गुफा’ में घुसे रहना चाहते हैं। वे अकेलापन चाहते हैं ताकि वे अपनी भावनात्मक ऊर्जा को ‘रीचार्ज’ कर सकें। समाजविज्ञानी इसे ‘केव’ (गुफा) मन:स्थिति कहते हैं। पति को लगता है कि पत्नि उसे नियंत्रित करना चाहती है। इससे पत्नि विभ्रम में फंस जाती है क्योंकि उसे लगता है कि यदि उसके पति ने उससे वही प्रश्न पूछे होते, तो उसे बहुत अच्छा लगता। बल्कि वह चाहती है कि पति ऐसा करे। उससे उसी प्रकार का व्यवहार करे, जैसा वह अपने पति के साथ कर रही है।

इसी तरह, कभी-कभी पति के प्रेम व्यक्त करने के तरीके से पत्नियां स्वयं को असुरक्षित महसूस करने लगती हैं। जब पति ऐसा कुछ कहते हैं कि “चिंता न करो, सब ठीक हो जायेगा” तब पत्नियां अक्सर व्याकुल और चिंतित हो उठती हैं। कभी-कभी पति, पत्नि को नजरअंदाज करते हैं, यह मानकर कि वे उसे उसकी गुफा में रहने का मौका दे रहे हैं। पति समझते हैं कि वे अपनी पत्नि की मदद कर रहे हैं, जबकि पत्नि को लगता है कि उसे नजरअंदाज किया जा रहा है और उसे वह प्रेम नहीं मिल रहा, जिसकी वह हकदार है। पत्नि जब परेशान होती है तो उसकी इच्छा होती है कि कोई उसकी बात सुने और समझे। परन्तु ऐसी ही स्थिति में पति चाहता है कि उसे अकेला छोड़ दिया जाए। जाहिर है कि उसे यह लगता है कि पत्नि को अकेला छोड़कर वह उसके साथ कुछ अच्छा कर रहा है।

पति-पत्नि को यदि यह अहसास नहीं होगा कि उनकी आवश्यकताएं न केवल अलग-अलग हैं वरन् समय-समय पर बदलती भी रहती हैं, तो उन्हें यह समझ में नहीं आएगा कि एक दूसरे की सहायता करने के उनके प्रयास असफल क्यों हो रहे हैं। इससे दोनों कुण्ठित और भावनात्मक दृष्टि से निढाल महसूस करने लगते हैं।

निकट के रिश्ते निभाने के लिए शारीरिक ऊर्जा के साथ-साथ भरपूर भावनात्मक ऊर्जा की भी आवश्यकता होती है। भावनात्मक आवश्यकताओं को संक्षेप में हम प्रेम पाने की आवश्यकता कह सकते हैं। पत्नियों और पतियों की 12 भावनात्मक या प्रेम-संबंधी आवश्यकताएं होती हैं। ये सभी मूल आवश्यकताएं हैं और पत्नियों और पतियों के मामले में अलग-अलग होती हैं।

अगर पतियों की अपनी मूल भावनात्मक आवश्यकताएं पूरी हो जाती हैं वे अपनी पत्नियों की छ:ह प्रकार की भावनात्मक आवश्यकताओं के महत्व को स्वीकार करते हैं और उन्हें पूरा करने का प्रयास करते हैं। इसी तरह, पत्नियां भी अपने पतियों की मूल आवश्यकताओं को पूरा करने की मन:स्थिति में तभी आती हैं जब उनकी आवश्यकताएं पूरी हो जाती हैं।

हर व्यक्ति की यही 12 प्रकार की भावनात्मक आवश्यकताएं होती हैं, केवल अलग-अलग व्यक्तियों के मामले में प्राथमिकता का क्रम अलग-अलग होता है। हमारे जीवनसाथी की मूल भावनात्मक आवश्यकताओं को समझना, वैवाहिक संबंधों की बेहतरी का एक महत्वपूर्ण गुर है – एक ठोस वैवाहिक मंत्र।

एक दूसरे की भावनात्मक आवश्कताओं की समझ विकसित करने का सबसे महत्वपूर्ण और व्यवहारिक पहलू यह है कि अलग-अलग प्रकार की ये भावनात्मक आवश्यकताएं, पारस्परिक लेनदेन पर आधारित हैं। जब कोई पति, अपनी पत्नि को समझने का प्रयास करता है और यह जाहिर करता है कि वह उसकी चिंता करता है तब पत्नि अपने आप उसे वह विश्वास और स्वीकार्यता देने लगती है, जो उसकी मूल आवश्यकताएं हैं। इसी तरह, जब पत्नि, पति में अपना विश्वास व्यक्त करती है तो पति अपने आप उसकी देखभाल किए जाने और उसकी बातों को समझे जाने की आवश्यकताओं को पूरी करने लगता है।

पहली नजर में ऐसा लगता है कि “अगर आप देंगे तो पायेंगे”, यह सिद्धांत आज की दुनिया में लागू नहीं होता। परन्तु पति-पत्नि के पवित्र और नजदीकी रिश्ते में यह एक ऐसा मंत्र है जो समय की कसौटी पर खरा उतर चुका है। परन्तु यह तभी प्रभावी होता है जब हम निस्वार्थ भाव से दें और अगर हमें कुछ मिले, तो हम उससे और प्रेरित, और प्रोत्साहित हों और देने का क्रम लगातार हर दिन जारी रखें।

अपने जीवनसाथी को बिना किसी शर्त के देने के प्रति प्रतिबद्धता से पति-पत्नि के रिश्ते में बड़ा परिवर्तन आ सकता है।

सच्चा प्यार आपको देने के लिए मजबूर करता है, त्याग करके देने के लिए, बिना किसी शर्त के देने के लिए और बिना किसी गलत इरादे के देने के लिए। हम किसी से प्रेम किए बिना उसे दे सकते हैं परन्तु हम दिए बिना, सच्चा प्रेम नहीं कर सकते।

(फारवर्ड प्रेस के सितंबर 2013 अंक में प्रकाशित)


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