फारवर्ड विचार, अक्टूबर 2013

आधुनिक मानवशास्त्र यह स्वीकार करता है कि तथाकथित संस्कृतनिष्ठ ‘वृहद परंपराओं’ के अंदर और उनके पीछे, ‘लघु परंपराएं’ छिपी रहती हैं- ये वे बहुजन परंपराएं हैं, जिन्हें कभी उचित महत्व नहीं दिया गया और जो भारत की देसज संस्कृति की प्रतिनिधि हैं।

अक्टूबर 2010 के मेरे संपादकीय की अंतिम पंक्ति थी, “कभी-कभी ‘फारवर्ड’ सोचने के लिए इतिहास और ज्ञान के रियर व्यू मिरर में झांकना पड़ता है।” फारवर्ड प्रेस, हमारे वास्तविक इतिहास की खोज और इतिहास का पहला मसौदा (फारवर्ड प्रेस, सितंबर 2013, आवरण कथा) तैयार करने की अपनी जिम्मेदारी के निर्वहन के तहत इस बार बहुजन परंपराओं पर गहन दृष्टिपात कर रही है। आधुनिक मानवशास्त्र यह स्वीकार करता है कि तथाकथित संस्कृतनिष्ठ ‘वृहद परंपराओं’ के अंदर और उनके पीछे, ‘लघु परंपराएं’ छिपी रहती हैं- ये वे बहुजन परंपराएं हैं, जिन्हें कभी उचित महत्व नहीं दिया गया और जो भारत की देसज संस्कृति की प्रतिनिधि हैं।

हमारी आवरण कथा के लेखक हैं जाने-माने मानवशास्त्री प्रो. बद्रीनारायण। उन्होंने उन ऐतिहासिक दलित-बहुजन नायकों को चिन्ह्ति किया है, जो देश में एक नई दासताभाव-मुक्त संस्कृति के वाहक बन रहे हैं और जो न केवल ब्राह्मणवादी ‘वृहद परंपरा’ का ध्वंस कर रहे हैं वरन् भारत के आधुनिक इतिहास के ब्राह्मणवादी संस्करण पर भी प्रश्न उठा रहे हैं। आवरण कथा के बाद, देश के विभिन्न भागों की बहुजन पंरपराओं पर केन्द्रित खंड है, जिसमें शामिल है लोरिक, जिन्हें उत्तर भारत के कई इलाकों में आमजनों के रक्षक के रूप में याद किया जाता है। इसमें पंजाब के नायक रावण की चर्चा भी है और उस लोक संस्कृति की भी, जो नेपाल के तराई के इलाके और उत्तरपूर्वी बिहार में मैथिल राजा सलहेस की मधुर स्मृतियों के आसपास बुनी गई है। साथ ही खानदेश, महाराष्ट्र में होने वाले भालदेव-बलीराजा उत्सव की चर्चा भी है।

फारवर्ड प्रेस की अक्टूबर 2011 की दुर्गा व महिषासुर पर आधारित आवरण कथा के प्रकाशन के बाद से, देश में एक नया विमर्श और बहस तो शुरू हुई ही है, साथ ही महिषासुर शहादत दिवस मनाने का सिलसिला भी प्रारंभ हुआ है, जो धीरे-धीरे विस्तार पा रहा है। अरुण कुमार इस संदर्भ में ताजा घटनाक्रम से हमें अवगत करा रहे हैं। देश के विभिन्न हिस्सों में महिषासुर से जुड़ी ‘लघु परंपराओं’ पर गहन अनुसंधान की जरूरत है। तभी हम अपनी खोई हुई संस्कृति को पुनर्जीवित कर सकेंगे और उस मिथकीय ब्राह्मणवादी ज्वार से जूझ सकेंगे, जिसने सत्य-आधारित स्वदेशी परंपराओं को अपने में समाहित कर लिया है। केवल ब्राह्मणवादी कुटिलता में ही यह क्षमता है कि वह ऐतिहासिक तथ्यों को ‘मिथकों’ और ‘किंवदंतियों’ का स्वरूप दे दे और नितांत अविश्वसनीय व घोर अनैतिक कथाओं को ‘शुद्ध सत्य’ के रूप में हमारे सामने परोसे।

इस प्रवृत्ति का जीता-जागता उदाहरण है वामन-बलीराजा वृहद परंपरा। भारत-भर की ‘लघु परंपराओं’ की मान्यता है कि बलीराजा या महाबली, देश के बहुसंख्यक मूल निवासियों के एक महान और सदाचारी राजा थे। उन्हें धोखा देकर बौने वामन या बामन ने उनके राज्य पर अधिकार कर लिया। अब लोगों को अपने नेक राजा की वापसी का इंतजार है ताकि वह अपने दमित प्रजाजनों को स्वतंत्र कर सके। देश के विभिन्न भागों में मानवशास्त्रीय व नृवंशीय अनुसंधान के जरिए, इस कथा के विभिन्न हिस्सों को एक सूत्र में पिरोया जाना चाहिए ताकि इसके प्रभुत्वशाली, ब्राह्मणवादी संस्करण की असलियत का पर्दाफाश किया जा सके, जिसके जरिए बलीराजा और उनकी प्रजा का दानवीकरण किया गया है।

इसी अंक में हमारे घुमंतू संवाददाता संजीव चंदन ने राजीव सुमन के अनुसंधान की मदद से, उन ऐतिहासिक, वैचारिक धाराओं का सर्वेक्षण किया है, जो भारत के भौगोलिक केन्द्र में स्थित नागपुर में हर वर्ष अक्टूबर में एक-दूसरे से मिलती हैं। इनमें शामिल हैं सेवाग्राम आश्रम में गांधी जयंती और विजयदशमी पर आम्बेडकर द्वारा बौद्ध धर्म अपनाने का जश्न, जिसमें बड़ी संख्या में लोग भाग लेते हैं। इसी दिन आरएसएस, शक्ति पूजा आयोजित करता है, जिसमें हथियारों की पूजा की जाती है।

अनुसंधान और विमर्श का एक अन्य अछूता क्षेत्र है दो महात्माओं-फुले व गांधी-का तुलनात्मक अध्ययन। फारवर्ड प्रेस में अक्टूबर 2010 में इस विषय पर ब्रजरंजन मणि की पैनी कलम से इस विमर्श की शुरुआत हुई थी। इस चर्चा को अब कौन आगे ले जाएगा?

(फारवर्ड प्रेस के अक्टूबर 2013 अंक में प्रकाशित)


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