आर्थिक कलयुग और प्रगति में विश्वास

खाद्य अधिनियम गरीबों को उनके पड़ोसी की संपदा का लालच करने के लिए उकसाता है। उन्हें सरकार रिश्वत देती है कि वह उस सरकार के लिए वोट दें जो उत्पादनशील नागरिकों पर कर लगाएगी ताकि सरकार अपना खुद का और गरीबों का पेट भर सके।

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013, भारतीय अर्थव्यवस्था के असफल हो जाने का सबसे बड़ा कुबूलनामा है।

  • पचहत्तर प्रतिशत ग्रामीण और 50 प्रतिशत शहरी आबादी को प्रति माह पाँच किलो बुनियादी खाद्यान्न खरीदने के लिए एक भ्रष्ट नौकरशाही पर निर्भर होना होगा।
  • यह भयावह है कि वे जो हमारे बुनियादी खाद्यान्न का उत्पादन करते हैं वे अपने जीवनयापन के लिए जरूरी वस्तुओं का खर्च नहीं उठा सकते। लेकिन,
  • यदि सरकार उत्पादक को बाजार से कम कीमत देती है तो फिर किसान पैदावार ही क्यों करेगा? या,
  • आयकर देने वाले 3 प्रतिशत भारतीयों को सरकार को समर्थन मूल्य मुहैया करवाना होगा ताकि सरकार संतोषप्रद कीमत पर खाद्यान्न खरीदे, भंडारन करे, सुरक्षा करे, आवागमन करे और नुकसान उठाते हुए 67 प्रतिशत ‘गरीबों’ को दुबारा बेचे?
  • और नौकरशाह जो उत्पादन करते ही नहीं, वे क्यों उस खाद्यान्न को डाकुओं, चूहों और बरसात से बचाने का कष्ट उठाएँगे?

इस अधिनियम के पीछे जो करुणा का भाव है वह प्रशंसनीय है। यह कांग्रेस की अगुवाई वाले यूपीए को लगातार तीसरी बार सत्ता में ला सकता है। लेकिन इस बात की संभावना अधिक है कि यह देश को उन्नति के विचार से परे ले जाए। जहाँ तक कांग्रेस का सवाल है, इस अधिनियम का बौद्धिक स्रोत, जैसा कि हम आगे देखेंगे, 1904 तक पीछे जाता है, जब गाँधी का सामना जॉन रस्किन की पुस्तक ‘अनटू दिस लास्ट’ (इस पिछले को भी, या इस अंतिम व्यक्ति को भी) से हुआ। यह पुस्तक परमेश्वर के राज्य विषय पर ईसा मसीह के एक दृष्टांत को अर्थव्यवस्था पर लागू करती है।

 

निराशा की अर्थव्यवस्था

हम भारतीयों ने बड़े उत्साह से साल 2013 का स्वागत किया था। हम निकट भविष्य में दुनिया की महानतम अर्थव्यवस्थाओं में से एक बनने के मार्ग पर अग्रसर थे (बशर्ते हम किसी तरह से अपने भ्रष्टाचार पर काबू पा लेते)। लेकिन कल के आशावादी, आज भारत में निवेश करने के प्रति कोई उत्साह नहीं दिखा रहे। वार्षिक वृद्धि दर 9 प्रतिशत (2003-2008) से 4.5 प्रतिशत पर आ गई है। (डॉलर की कीमत के अनुसार) स्टॉक मार्केट 25 प्रतिशत नीचे आ चुकी है। व्यापार घाटा 169.81 अरब डॉलर (2011-12) से बढ़ कर 182.09 अरब डॉलर (2012-13) हो चुका है। विदेशी मुद्रा कोष 1991 के स्तर पर नहीं हैं लेकिन उस दिशा में बढ़ते नजर आ रहे हैं।

कलयुग, कोई शक?

आर्थिक आँकड़े निराशावाद की दलील दे रहे हैं। आशा का आधार आर्थिक व्यवहार के मूल में मौजूद गैर-आर्थिक कारक होंगे। क्या भारत की केंद्रीय धार्मिक मान्यता को खारिज करने का हमारे पास कोई विश्वसनीय आधार है – इस मान्यता को कि हम सामाजिक-आर्थिक कलयुग की ओर अग्रसर हैं।

वैसे कलयुग के हमारे पारंपरिक सिद्धांत को खारिज करने वालों में कुछ भारतीय भी शामिल हैं क्योंकि उन्होंने क्रमिक विकास (इवोल्यूशन) की पश्चिमी थ्योरी को अपना लिया है। जीवों का निरंतर क्रमिक विकास हो रहा है, इसलिए, वे तर्क देते हैं कि अर्थव्यवस्था की भी क्रमगत प्रगति हो ही जाएगी।

लेकिन विकासवादी स्वयं कहते हैं कि बेमेल या अनुपयुक्त जीव हमेशा नष्ट हो जाते हैं। लेकिन अगर आप विशालकाय डायनासोर भी हों तो भी अकस्मात संयोग से बच नहीं सकते। इसी तरह का कोई संयोग सीरिया की मूर्खतापूर्ण लड़ाई या ईरान के परमाणु खतरे को एक बड़े युद्ध में तब्दील कर सकता है। और केवल उसी से भारत की पहले से कमजोर मैनुफैक्चरिंग, प्रतिस्पर्धा में और पिछड़ जाएगी। संयोग पर भरोसा करेंगे तो वह घबराहट ही बढ़ाएगी, आशा नहीं।

आधुनिक भारत का प्रगति का विचार

प्रगति में हमारे आधुनिक विश्वास के वास्तविक स्रोत के मामले में इतिहासकारों ने अपने आप को छलावे में ही डाला है। महात्मा फुले उसे बलिराज कहते थे। गाँधी ने उसे रामराज्य का नाम दिया। लेकिन दोनों ने उस परिकल्पना का अध्ययन बाइबल में किया, जहाँ ईसा परमेश्वर के राज्य के विषय में शिक्षा देते हैं। और यही सोनिया गाँधी के खाद्य अधिनियम का भी मूल – हालाँकि अस्वीकृत – स्रोत है।

ईसा ने रोमी साम्राज्य समेत सभी दमनकारी, शोषणकारी राज्यों को शैतान के राज्यों के रूप में देखा (मसलन, लूका 4:5-7)। इसलिए उन्होंने अपने मिशन को यशायाह नबी के शब्दों में बयान किया: ‘कंगालों को सुसमाचार सुनाने के लिये … कुचले हुओं को छुड़ाऊँ’ (लूका 4:18)। उन्होंने कहा कि वह इसलिए आए कि ‘कंगालों’ और ‘भूखों’ की ओर से परमेश्वर के राज्य का उद्घाटन करें, उन लोगों की ओर से जिनकी आत्मा कुचली गई है, जो शैतान के राज्य के कारण ‘शोक’ करते हैं, जो ‘परिश्रम करने वाले और बोझ से दबे हुए हैं’, ‘उन भेड़ों के समान हैं जिनका कोई रखवाला नहीं है, जो व्याकुल और भटके हुए हैं’ जिनके शासक भेडि़ए बन चुके हैं (देखें, लूका 6:20-26, मत्ती 9:36, 11:28-30)। यूहन्ना 10 और यहेजकेल 34 बताते हैं कि ईसा ख्रीस्त की यहूदी संस्कृति में यह विचार कि ‘अगुवा एक चरवाहे के समान है’ खुशहाल जीवन, बरकत की बारिश से जुड़ा हुआ था जो प्रचुर मात्रा में खाद्यान्न और फल लाती थी।

भूखों और नंगों से जो खाने और कपड़े के लिए चिंतित थे प्रभु ईसा ने कहा, ‘पहले तुम परमेश्वर के राज्य और उसके धर्म की खोज करो तो ये सब वस्तुएँ भी तुम्हें मिल जाएँगी’ (मत्ती 6:32-34)। क्योंकि परमेश्वर के राज्य को खोजना हमारी जिम्मेवारी है, जो लोग शैतान के राज्य से हताश हो चुके हैं उनसे ईसा ने यह प्रार्थना करने के लिए कहा ‘तेरा राज्य आए। तेरी इच्छा जैसी स्वर्ग में पूरी होती है, वैसे पृथ्वी पर भी हो’ (मत्ती 6:10)।

‘परमेश्वर का राज्य’ है क्या?

बाइबल के दूसरे भाग, नया नियम, में ईसा के कई दृष्टांत दर्ज हैं जो परमेश्वर के राज्य का अर्थ समझाते हैं। सबसे पहले, बीज बोने वाले का दृष्टांत है और उसे समझना यीशु की बाकी की शिक्षाओं को समझने की कुंजी है।

दृष्टांत कहानी नहीं होता। यह रोजमर्रा के जीवन से लिया गया कोई सादृश्य उदाहरण होता है। वह हमारी मदद करता है कि हम शिक्षा के गहरे अर्थ की परतों को समझ सकें। ईसा, जो परमेश्वर के राज्य के बीज बोने वाला किसान है (मत्ती 13:37), हमें पहला सुराग देते हैं कि परमेश्वर का राज्य बीज के समान है। यह बीज परमेश्वर का वचन है। सुनने वाले मिट्टी हैं। जो ‘अच्छी भूमि’ बीज को विश्वास से ग्रहण करती है और उसे प्रचुर मात्रा में फलों में गुणा करती है, वह पहले पाप से गहरे पश्चाताप के द्वारा तैयार की जाती है। ईसा हमें कई दूसरे सुराग भी देते हैं कि हम अर्थ की गहरी परतों तक पहुँच सकें। राज्य के बीज, ‘परमेश्वर के वचन’ (लोगॉस), को ग्रहण करने का अर्थ है स्वयं राजा को ग्रहण करना, और उसे, न कि शैतान को, अपने जीवनों का प्रभु बनाना।

ईसा ने यह भी कहा कि ‘परमेश्वर का वचन’ यह आज्ञा है कि हम परमेश्वर से अपने सारे हृदय, सारी सामर्थ्य, सारे मन से प्रेम करें और अपने पड़ोसी को अपने समान प्रेम करें। यह दो आज्ञाएँ, उन्होंने सिखाया, सभी दस आज्ञाओं को समावेश करती हैं – जो वास्तव में परमेश्वर के वचन हैं।

बाइबल में वर्णित दस आज्ञाएँ हमारे ‘मौलिक’ मानवाधिकारों का आधार हैं। परमेश्वर की आज्ञाओं, ‘तू हत्या न कर’ और ‘तू चोरी न कर’ का अर्थ है कि जीवन और संपत्ति का अधिकार हमें ईश्वर से प्राप्त होता है। कोई भी व्यक्ति या सरकार हमें इन अधिकारों से वंचित नहीं कर सकती। जो संपत्ति हम निर्मित करते हैं या विरासत में हमें मिलती है उसके बाबत हमारा अविच्छेद्य (जिससे हमें अलग न किया जा सके) अधिकार ही आर्थिक वृद्धि का आधार है।

ये दस आज्ञाएँ ही थीं जिन्होंने यह निषिद्ध किया कि जो दूसरे का है उसका न तो लालच करो और न उसे चुराओ, बल्कि सप्ताह में छह दिन काम करने के द्वारा धन-संपत्ति का निर्माण करो और उसे जरूरतमंदों के साथ साँझा करो। समाजशास्त्री मैक्स वेबर और अन्यों ने इसे ‘प्रोटेस्टेंट वर्क एथिक’ (प्रोटेस्टेंटवादी उद्यम नैतिकता) के नाम से लोकप्रिय किया और बताया कि यही पश्चिम की आर्थिक सफलता की कुंजी है। दरअसल, यह विचार परमेश्वर के वचन के रूप में यहूदियों के पास आया। और 16वीं सदी में यूरोप में आए प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार आंदोलन के बाद व्यापक और जनसाधारण के स्तर पर इसका पालन होना आरंभ हुआ।

करुणामय राज्य

इसी विषय को विस्तार से समझाते हुए ईसा ने कहा कि अंतिम न्याय के समय, ‘राजा उन्हें (धर्मी जनों को) उत्तर देगा, “मैं तुम से सच कहता हूँ कि तुमने जो मेरे इन छोटे से छोटे भाइयों में से किसी एक के साथ किया, वह मेरे ही साथ किया” (मत्ती 25:40)।

ईसा ने ‘इन छोटे से छोटे भाइयों’ के विषय को मत्ती 20 के दृष्टांत में भी समझाया। क्योंकि परमेश्वर प्रेम है, उनका राज्य सर्द आर्थिक न्याय का मामला ही नहीं है। यह ईश्वरीय करुणा की गर्माहट का भी वर्णन करता है। जॉन रस्किन (1819-1900) ने औद्योगिक क्रांति के भयावह परिणामों को देखा और 1860 के अपने एक निबंध में उसकी आलोचना भी की। उन निबंध का शीर्षक ‘अनटू दिस लास्ट’ ईसा के दृष्टांत (मत्ती 20:14) से लिया गया था। इस निबंध के आलोचकों को जवाब देते हुए उन्होंने इसे इसी नाम से एक पुस्तक (1862) लिखी जिसमें उन्होंने करुणाविहीन पूंजीवाद की आलोचना की।

‘अनटू दिस लास्ट’ से महात्मा गाँधी का साक्षात्कार मार्च 1904 में हुआ और इस पुस्तक ने उनका जीवन बदल दिया। उन्होंने इस पुस्तक का गुजराती में अनुवाद कर ‘सर्वोदय’ शीर्षक से प्रकाशित किया। आचार्य विनोबा भावे गाँधी के सर्वोदय के सबसे चर्चित समर्थक बने, जो परमेश्वर के राज्य पर ईसा की शिक्षाओं का सरलीकरण ही था। आज ईसा के दृष्टांतों के बीज ने कई कार्यक्रमों को जन्म दिया है जिन्हें सर्वोचित अंत्योदय भी कहा जाता है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम – चाहे नैतिकता की बजाय राजनैतिक कारणों से ही प्रेरित हो – इन्हीं कार्यक्रमों की कड़ी में आता है।

यीशु की शिक्षा और खाद्य अधिनियम में एक अंतर उस समय स्पष्ट हो जाता है जब हम उनके चौथे दृष्टांत पर गौर करते हैं। इसमें ईसा बीज और राज्य के उदाहरण को एक अन्य स्तर पर ले जाते हैं। वह कहते हैं कि वे जो राज्य के बीज के रूप में परमेश्वर का वचन ग्रहण करते हैं, स्वयं परमेश्वर के राज्य के बीज बन जाते हैं। और जब वे गेहूँ के दाने के रूप में मर जाना चुनते हैं तो वे स्वयं अत्यधिक (फल और) बीज उत्पन्न करने वाले बन जाते हैं।

परमेश्वर के राज्य पर ईसा की शिक्षा और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम में एक प्रमुख अंतर स्पष्ट है: परमेश्वर चाहते हैं कि हम संपदा का निर्माण करें और गरीबों की देखभाल करें। खाद्य अधिनियम गरीबों को उनके पड़ोसी की संपदा का लालच करने के लिए उकसाता है। उन्हें सरकार रिश्वत देती है कि वह उस सरकार के लिए वोट दें जो उत्पादनशील नागरिकों पर कर लगाएगी ताकि सरकार अपना खुद का और गरीबों का पेट भर सके।

उन्नति की रुहानियत

परमेश्वर का करुणामय राज्य राजनीति का रूपांतरण करता है। लेकिन वह राजनीति के रास्ते नहीं आता। ईसा के अनुसार, हम उसमें प्रवेश करते हैं जब हम ‘नये सिरे से जन्म’ लेते हैं (यूहन्ना 3:1-18)। यह नया जन्म होता है जब हम परमेश्वर के आत्मा को आमंत्रित करते हैं कि वह हमारे भीतर परमेश्वर के वचन का रूपांतरणकारी बीज बोएँ। यह रुहानी जन्म हमें हमारे पाप से विमुख करता है और एक नई रुहानी यात्रा पर हमारी शुरुआत करता है – ऐसे मार्ग पर जो आशाविहीनों को आशा प्रदान करता है।

चार्ल्स ग्रांट और विलियम कैरी (जिनका मैंने कहीं और भी उल्लेख किया है) पहले व्यक्ति थे जिन्होंने 1792 में पहली बार भारत के लिए इस आशावादी दृष्टिकोण को प्रस्तुत किया। उनकी पुस्तकों और उदाहरणों ने हजारों शिष्यों को प्रेरित किया कि वे भारत में आशा लाएँ। फुले और गाँधी ने ईसा की शिक्षा को देसी मिथकों में ढांप कर और भी आकर्षक बनाने का प्रयास किया।

लेकिन ईसा के शिष्यों के लिए शैतान का राज्य कोई मिथक नहीं था। उन्होंने इतिहास को बदल डाला क्योंकि वे मृतकों में से जी उठे राजा के चश्मदीद गवाह थे। उनकी आशा, जो इतिहास की चट्टान पर आधारित थी, ने उन्हें इस काबिल बनाया कि शैतान के निराशा पैदा करने वाले राज्य का सामना कर पाए। सत्य के उनके ज्ञान और परमेश्वर के आत्मा ने उन्हें सामर्थ्य दी कि वे परमेश्वर की सेवा करें चाहे इसके लिए उन्हें गेंहू के दाने के रूप में मरना ही क्यों न पड़े। वे जानते थे कि वे अत्यधिक फल लाने वाले बनेंगे। और उन्होंने ऐसा ही किया, और आज भी कर रहे हैं, भारत में भी।

(फारवर्ड प्रेस के अक्टूबर 2013 अंक में प्रकाशित)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

फारवर्ड प्रेस की किताबें किंडल पर प्रिंट की तुलना में सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। कृपया इन लिंकों पर देखें 

मिस कैथरीन मेयो की बहुचर्चित कृति : मदर इंडिया

बहुजन साहित्य की प्रस्तावना 

दलित पैंथर्स : एन ऑथरेटिव हिस्ट्री : लेखक : जेवी पवार 

महिषासुर एक जननायक’

महिषासुर : मिथक व परंपराए

जाति के प्रश्न पर कबी

चिंतन के जन सरोकार

About The Author

Reply