फारवर्ड विचार, नवंबर 2013

उन्होंने कई अज्ञात तथ्य खोद निकाले हैं और उनका मौलिक विश्लेषण, निश्चय ही ब्राह्मणवादी मीडिया के रुख के ठीक विपरीत है, जो लालू को बहुजन ब्रिगेड का जोकर मानती है। उसने लालू के राजनीतिक जीवन के अंत की घोषणा करने में तनिक भी देरी नहीं की। दूसरी ओर, लक्ष्मणपुर बाथे मामले में सभी 26 अभियुक्तों की शर्मनाक दोषमुक्ति को ‘मुख्यधारा’ की मीडिया ने न्याय मानकर स्वीकार कर लिया!

जब मैं यह लिख रहा था, तभी खबर आई कि पटना में नरेन्द्र मोदी की सभा के कुछ मिनट पहले बम विस्फोट हुए, जिसके कारण बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को जद यू के दो-दिवसीय सम्मेलन में भाग लेने के लिए रवाना होने में देरी हुई। सितंबर, 2012 के फारवर्ड प्रेस में हमने ‘नीतीश कुमार और नरेन्द्र मोदी : दो मित्रों की कहानी’ शीर्षक से हमारे कॉलम लेखक प्रेमकुमार मणि का मौलिक विश्लेषण प्रकाशित किया था। स्पष्टत: हमारी इस माह की आवरण कथा ‘कहानी दो निर्णयों की’ को लिखने पर पहला हक उन्हीं को था। इसकी प्रेरणा भी हमें उनके एसएमएस से मिली, जो उन्होंने लक्ष्मणपुर बाथे में गरीब दलितों का नरसंहार करने वाले अपराधियों के दोषमुक्त किए जाने के तुरंत बाद भेजा था। इस निर्णय के कुछ ही पहले चारा घोटाले में लालू प्रसाद यादव को अपराधी ठहराया गया था। ऐसा लगता है कि, कम से कम बिहार में, न्याय हमेशा अंधा नहीं होता, विशेषकर जब मामला जाति से जुड़ा हो।

फारवर्ड प्रेस के प्रबंध संपादक प्रमोद रंजन और पटना ब्यूरो प्रमुख बीरेन्द्र यादव की दो खंडों में प्रकाशित आवरणकथा पर मुझे गर्व है। उन्होंने कई अज्ञात तथ्य खोद निकाले हैं और उनका मौलिक विश्लेषण, निश्चय ही ब्राह्मणवादी मीडिया के रुख के ठीक विपरीत है, जो लालू को बहुजन ब्रिगेड का जोकर मानती है। उसने लालू के राजनीतिक जीवन के अंत की घोषणा करने में तनिक भी देरी नहीं की। दूसरी ओर, लक्ष्मणपुर बाथे मामले में सभी 26 अभियुक्तों की शर्मनाक दोषमुक्ति को ‘मुख्यधारा’ की मीडिया ने न्याय मानकर स्वीकार कर लिया! फारवर्ड प्रेस, आज भी बहुसंख्यक बहुजनों के लिए सामाजिक न्याय की मांग को स्वर दे रही है, भले ही हमारी आवाज नक्कारखाने में तूती के समान हो।

इस अंक का ‘राष्ट्र निर्माण’ भी भारत में थोड़े अंतराल से घटी दो घटनाओं के बारे में है-चक्रवात फाइलिन और मध्यप्रदेश के रतनगढ़ में भगदड़। यह हमें बताती है कि किस प्रकार एक प्रकार की आध्यात्मिकता हमें सफलता की ओर ले जाती है तो दूसरे प्रकार की, त्रासदी की ओर। यह हमारे योगदानी संपादक विशाल मंगलवादी का इस शृंखला का सर्वश्रेष्ठ लेख है। अवश्य पढि़ए। मंगलवादी का लेख आपको अपनी आध्यात्मिकता के संबंध में विचार-मंथन करने और उसे एक नया कलेवर देने को उद्यत करेगा। उसी तर्ज पर हम समाजशास्त्री प्रो. जगदीश वर्मा का एक छोटा परंतु विचारोत्तेजक लेख छाप रहे हैं, ‘बहुजनों को दीपावली क्यों नहीं मनाना चाहिए?’ वे यह स्पष्ट करते हैं कि दीपावली के उद्भव के संबंध में हम चाहे जिस मिथक को माने, वे सभी इसे सुरों की आज के बहुजनों के पूर्वज असुरों पर विजय का उत्सव बताते हैं। अधिकांश कथाओं के अनुसार, यह विजय धोखे से हासिल की गई थी। हम दक्षिण भारत के घूमंतु बहुजनों पर रपट भी प्रकाशित कर रहे हैं जिनके लिए दीपावली, इहलोक से निष्कासित कर दिए गए उनके बलिराजा का शोक मनाने का दिन है। परंतु इस तरह के समुदायों की संख्या बहुत ही कम है। देशज संस्कृतियों पर ब्राह्मणवाद के सदियों से जारी तीखे हमलों का नतीजा यह हुआ है कि बहुजन ‘वृहद् परंपराएं’, ‘लघु पंरपराएं’ बन गई हैं। प्रो. वर्मा बहुजनों से इस प्रवृत्ति को पलटने का आह्वान करते हैं।

फारवर्ड प्रेस ने प्राचीन ग्रंथों और कथाओं के पुनर्पाठ और बहुजन परंपराओं को पुनर्जीवित कर प्रतिसांस्कृतिक क्रांति के बीज बोने का बीड़ा उठाया है। इस मामले में हम केरल से प्रेरणा ले सकते हैं। सन् 1940 में केरल में चले एक्य केरल आंदोलन के साथ ही, शनै: शनै: ब्राह्ममणवादी ओणम को, वामन अवतार पर केंद्रित त्योहार के स्थान पर उदार असुर राजा महाबली (बलिराजा) के उत्सव में परिवर्तित करने का क्रम शुरू हुआ। यह प्रक्रिया कविता व अन्य रचनात्मक सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों की प्रेरणास्रोत बनी और सरकारी पाठ्यपुस्तकों के जरिए, इसने आधिकारिक स्वरूप ग्रहण कर लिया। इस तरह, केरल का एक बड़ा त्योहार, ब्राह्मणवाद के चंगुल से मुक्त हो गया। जो केरल में ओणम के साथ हुआ, क्या वही शेष भारत में दीपावली के मामले में नहीं हो सकता?

(फारवर्ड प्रेस के नवंबर 2013 अंक में प्रकाशित)


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