बिहार की राजनीति में आने वाला है भूचाल

कानून की दृष्टि में और अपराध की प्रकृति के हिसाब से, दोनों घटनाओं में कोई समानता नहीं है। पहला मामला आर्थिक अनियमितता का है तो दूसरा जघन्य हत्या का

बिहार में दो बड़ी घटनाएं लगभग दो सप्ताह के अंतराल में हुईं। दोनों घटनाओं का बिहार के राजनीतिक व सामाजिक भविष्य पर गहरा असर पड़ेगा। पहली घटना है 30 सितंबर की। इस दिन चारा घोटाले के एक मामले में सीबीआई की अदालत ने पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को दोषी करार दिया। और दूसरी घटना है अरवल जिले के लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार के सभी आरोपियों को पटना हाईकोर्ट द्वारा दोषमुक्त कर दिया जाना। हाईकोर्ट का फैसला 13 अक्टूबर को आया। लक्ष्मणपुर बाथे गांव में 1 दिसम्बर, 1997 को भूमिहारों की रणवीर सेना ने 58 दलितों की हत्या कर दी थी, जिनमें से 26 महिलाएं और 15 बच्चे थे।

कानून की दृष्टि में और अपराध की प्रकृति के हिसाब से, दोनों घटनाओं में कोई समानता नहीं है। पहला मामला आर्थिक अनियमितता का है तो दूसरा जघन्य हत्या का। एक में पिछड़ी जाति के लालू प्रसाद यादव अभियुक्त हैं तो दूसरे मामले में उच्च जाति के लगभग दो दर्जन भूमिहार अभियुक्त थे। आर्थिक अनियमितता में लालू यादव को पांच वर्ष कारावास की सजा होती है तो हत्या के मामले में सभी अभियुक्तों को निर्दोष करार दे दिया जाता है, जबकि निचली अदालत ने इस मामले में 16 अभियुक्तों को फांसी और 10 को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।

इन दो घटनाओं ने दो बड़े सवाल खड़े किए हैं। पहला सवाल यह है कि 58 व्यक्तियों की हत्या के बावजूद प्रशासनिक तंत्र, दोषियों को सजा दिलवाने के लिए पुख्ता तथ्य, साक्ष्य और गवाह नहीं जुटा पाता है। क्या यह प्रशासनिक अराजकता या उदासीनता नहीं है? दूसरा सवाल यह है कि लालू यादव को दोषी करार दिलवाने में जुटा तंत्र मियांपुर, बथानी टोला, नगरी और लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहारों के दोषियों को सजा दिलाने में नाकाम क्यों हो गया?

लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार के बाद, जनवरी, 1998 में, तत्कालीन मुख्यमंत्री राबड़ी देवी द्वारा रणवीर सेना के राजनीतिक और प्रशासनिक संबंधों की जांच के लिए अमीर दास आयोग का गठन किया गया था। इस आयोग ने काफी मशक्कत के बाद अपनी रिपोर्ट तैयार की थी। लेकिन रिपोर्ट र्सावजनिक होने के पहले ही आयोग को सन् 2006 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भंग कर दिया। राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा है कि आयोग की रिपोर्ट में यह बात उभरकर आ रही थी कि भाजपा और भूमिहार नेताओं का संबंध रणवीर सेना से है। इससे भाजपा परेशान थी और भाजपा के दबाव में ही अमीर दास आयोग को भंग किया गया।

रणवीर सेना को अभयदान

भूमिहारों की रणवीर सेना का गठन और इसकी पहली बैठक 1994 में भोजपुर जिले के बेलौर गांव में हुई थी, जिसका नेतृत्व खोपरा पंचायत के मुखिया ब्रम्हेश्वर सिंह को सौंपा गया था। इसने पहला बड़ा नरसंहार भोजपुर जिले के बथानी टोला में किया था, जिसमें 21 दलितों की हत्या कर दी गई। बथानी टोला नरसंहार के सभी 23 अभियुक्तों को पटना उच्च न्यायालय ने 16 अप्रैल, 2012 को बरी कर दिया। औरंगाबाद जिले के मियांपुर नरसंहार में 16 जून, 2000 को रणवीर सेना ने 32 लोगों की हत्या की थी। इस मामले के 10 में से 9 अभियुक्तों को 3 जुलाई, 2013 को पटना हाईकोर्ट ने बरी कर दिया। भोजपुर जिले में नगरी नरसंहार 10 नवंबर, 1998 को हुआ था, जिसमें 10 लोगों की हत्या रणवीर सेना ने की थी। इस मामले के सभी 11 अभियुक्तों को 1 मार्च, 2013 को पटना हाईकोर्ट ने बरी कर दिया।

नई गोलबंदी की बन रही जमीन

बिहार की पूरी राजनीति जाति के केंद्र के चारों ओर चक्कर काटती है। पार्टी, पार्टी के सिद्धांत व कार्यकर्ता से लेकर जनता तक सभी की गोलबंदी जाति के आसपास घूमती है। ऐसी स्थिति में इन दो घटनाओं का दूरगामी असर बिहार की राजनीति पर पडऩा स्वाभाविक है। क्या यह मात्र संयोग है कि चारा घोटाले में फैसला व सजा सुनाने वाले जज भी भूमिहार जाति के हैं और पटना हाईकोर्ट में लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार मामले में फैसला सुनाने वाले दो में से एक जज भूमिहार हैं?

बिहार की राजनीति में भूमिहार एक महत्वपूर्ण ताकत हैं। लालू प्रसाद यादव, भूमिहारों के निशाने पर रहने के बावजूद 15 वर्षों तक बिहार पर शासन करते रहे। और अब नीतीश कुमार, भूमिहारों से समझौता करके बिहार पर शासन कर रहे हैं। भाजपा-जदयू गठबंधन टूटने के बाद, भूमिहार जाति का समर्थन नीतीश कुमार की बजाय भाजपा के पक्ष में जाता दिख रहा है। जबकि लालू यादव को सजा होने और उनके जेल जाने के बाद, यादवों की एकजुटता फिर लालू के पक्ष में होने लगी है। वैसे भी, जनाधार को लेकर नीतीश कुमार के समक्ष गंभीर चुनौती पैदा होती जा रही है। भूमिहारों की रणवीर सेना के शिकार हुए मियांपुर, नगरी, बथानी और लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार के अभियुक्तों के बरी होने से दलित व पिछड़ी जातियों में नए सिरे से आक्रोश दिखने लगा है। उन्हें लगने लगा है कि नीतीश कुमार के पिछड़ा व दलित कार्ड का लाभ उन्हें नहीं मिला। इसी माहौल में भाजपा ने नरेंद्र मोदी के बहाने, अतिपिछड़ा कार्ड चला है और यह कार्ड अब चर्चा के केंद्र में आ गया है। इसका लाभ भाजपा को मिलने की उम्मीद है। उस स्थिति में नीतीश कुमार के लिए अपना जनाधार बांधे रखना मुश्किल हो रहा है।

सजा और बरी की राजनीति, बिहार के सामाजिक समीकरणों को गहरे तक प्रभावित करेगी। सामंती और शोषण की राजनीति में विश्वास रखने वाली भूमिहार जाति में नए सिरे से गोलबंदी संभव है। इसके समानांतर, पिछड़ी व दलित जातियों की गोलबंदी से इंकार नहीं किया जा सकता। राज्य के 17 प्रतिशत मुसलमानों को भी यह तय करना है कि उन्हें किस पार्टी का साथ देना है। ये लोग अब तक आरजेडी के एमवाय (मुस्लिम-यादव) गठबंधन के साथ थे। लेकिन नई गोलबंदी किस राजनीतिक दल के पक्ष में होगी, अभी से कुछ कहना मुश्किल है।

आठवें व नौंवे दशक की जातिवादी गोलबंदी के केंद्र में जमीन, जातीय संघर्ष व स्वाभिमान के मुद्दे थे, तो इस नई गोलबंदी के केंद्र में न्यायिक प्रक्रिया और न्यायिक निर्णय होगा। अब अदालतों के फैसलों पर भी सवाल उठने लगे हैं। अदालतों के जातीय चरित्र पर भी बहस हो रही है। यह स्पष्ट है कि बिहार की राजनीति में भूचाल आने के संकेत हैं। भूचाल के बाद नक्शे नए सिरे से बनाने होते हैं और इसके लिए कंपास की जरूरत होती है। बिहार में धुर उत्तर, सामाजिक न्याय की दिशा है।

(फारवर्ड प्रेस के नवंबर 2013 अंक में प्रकाशित)


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