आंखों के सामने नामकरण

प्रेमकुमार मणि ने स्वीकारा है कि आज जो ओबीसी साहित्य की बात उठ रही है उसके पीछे दलित साहित्य की संकीर्णतावादी सोच है। इसे मिल-बैठकर, विमर्श कर दूर करना ही श्रेयस्कर है

हिंदी साहित्य जगत में पिछले कुछ समय से ओबीसी साहित्य की चर्चा आरंभ हुई है। इसे लेकर अनेक मत सामने आ रहे हैं। इस अवधारणा के विरोधियों का कुतर्क है कि ‘ओबीसी साहित्य’ की अपनी कोई सैद्धांतिकी नहीं है, जबकि अनेक विद्वानों ने सुचिंतित तर्कों द्वारा यह साबित किया है कि ओबीसी साहित्य की अवधारणा का जन्म अनायास नहीं हुआ है, इसके पीछे कबीर, मखली गोसाल, जोतिबा फुले आदि अनेक असाधारण चिंतकों का वैचारिक बल है।

इस तरह हम देखते हैं कि हिंदी में ओबीसी साहित्य और बहुजन साहित्य की कोटि प्रस्तुत करने वाली पहली पत्रिका ‘फारवर्ड प्रेस’ बनी।

पत्रिका की ‘बहुजन साहित्य वार्षिकी 2013’ में प्रबंध संपादक प्रमोद रंजन ने लिखा है कि ‘बहुजन साहित्य’ की अवधारणा का जन्म ‘फारवर्ड प्रेस’ के संपादकीय विभाग में हुआ तथा इसका श्रेय हमारे मुख्य संपादक आयवन कोस्का, आलोचक व भाषाविज्ञानी राजेन्द्र प्रसाद सिंह तथा लेखक प्रेमकुमार मणि को है और आयवन कोस्का ने ‘बहुजन साहित्य वार्षिकी 2012’ में इसकी पुष्टि भी की है। अपने संपादकीय में उन्होंने लिखा है कि ‘पिछले साल जुलाई में प्रोफेसर राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने ‘ओबीसी साहित्य’ पर अपने आलेख के द्वारा इस विमर्श की शुरुआत की थी। दरअसल यह आलेख ‘ओबीसी साहित्य की अवधारणा’ है जो ‘फारवर्ड प्रेस’ के जुलाई, 2011 अंक में प्रकाशित है। मराठी में ओबीसी साहित्य का जन्म पहले हो चुका था।’ आयवन कोस्का ने ‘फारवर्ड प्रेस’ के जुलाई, 2011 के संपादकीय में लिखा है कि फरवरी, 2008 में मुझे नासिक में दूसरे अखिल भारतीय ओबीसी साहित्य सम्मेलन में वक्तव्य देने के लिए निमंत्रित किया गया था और उस दौरान मुझे यह अहसास हुआ कि उस मराठी जमावड़े में शायद ही किसी को मालूम था कि ‘ओबीसी साहित्य’ किस बला का नाम था, है या होना चाहिए, मराठी में भी।.. बिहार के प्रोफेसर राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने ओबीसी साहित्य पर एक संजीदा लेख लिखा है। ओबीसी साहित्य विषय पर गंभीर चर्चा एवं बहस की शुरुआत करने हेतु ‘फारवर्ड प्रेस’ यह आलेख प्रस्तुत करते हुए फख्र महसूस करती है। ‘मोहल्ला लाइव’ ने प्रस्तुत लेख को ‘ओबीसी साहित्य का मैनिफेस्टो’ कहते हुए इस पर बहस चलाई।

‘फारवर्ड  प्रेस’ के सितम्बर, 2011 अंक में ललन प्रसाद सिंह ने ‘ओबीसी साहित्य : मार्क्सवादी परिप्रेक्ष्य’ शीर्षक आलेख लिखा। इसमें उन्होंने बताया कि न्याय के लिए संघर्ष तो ओबीसी की नियति है। उसी संघर्षशील सांस्कृतिक चेतना की सृजनात्मक तथा आलोचनात्मक अभिव्यक्ति ओबीसी साहित्य में होती है। इसी अंक में आयवन कोस्का, प्रमोद रंजन, राजेन्द्र यादव एवं संजीव का ओबीसी साहित्य पर आपसी विमर्श छपा है। इस विमर्श में राजेन्द्र यादव ने कहा कि ओबीसी साहित्य नामक जैसी कोई चीज नहीं है। परंतु संजीव ने माना कि विमर्श शुरू होना चाहिए।

‘फारवर्ड  प्रेस’ के नवंबर, 2011 अंक में ओबीसी साहित्य पर दो आलेख आए। एक कंवल भारती का और दूसरा प्रेमकुमार मणि का। प्रेमकुमार मणि ने स्वीकारा है कि आज जो ओबीसी साहित्य की बात उठ रही है उसके पीछे दलित साहित्य की संकीर्णतावादी सोच है। इसे मिल-बैठकर, विमर्श कर दूर करना ही श्रेयस्कर है। कंवल भारती ने लिखा है कि सिद्धांत और व्यवहार पक्ष में दलित और ओबीसी धारा समान हैं-दोनों का ही लक्ष्य जातिविहीन समाज की स्थापना करना है। इसलिए दलित साहित्य ओबीसी साहित्य का स्वागत करेगा।

‘बहुजन साहित्य वार्षिकी’ 2012 में राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने बहुजन साहित्य को परिभाषित करते हुए लिखा कि वस्तुत: बहुजन साहित्य एक व्यापक अवधारणा है जैसे भक्ति काव्य। भक्ति काव्य में जैसे संत, सुफी, राम और कृष्ण काव्यधाराओं का समाहार है, वैसे ही बहुजन साहित्य में भी ओबीसी, दलित, आदिवासी और एक सीमा तक स्त्री विमर्श की साहित्य धाराओं का समाहार है। प्रमोद रंजन ने ‘बहुजन साहित्य वार्षिकी’ 2013 में दूसरे शब्दों में स्पष्ट किया कि ‘बहुजन साहित्य को उस बड़ी छतरी की तरह देखा जाना चाहिए जिसके अंतर्गत दलित साहित्य के अतिरिक्त शूद्र साहित्य, आदिवासी साहित्य तथा स्त्री साहित्य आच्छादित है। आंबेडकरवादी साहित्य, ओबीसी साहित्य आदि जैसी अनेक शब्दावालियों, विचार, दृष्टिकोण इसके आंतरिक विमर्श में समाहित हैं।’

‘फारवर्ड प्रेस’ के फ रवरी, 2012 अंक में अभय कुमार दुबे ने यह विचार रखा कि पिछड़े वर्ग का अपना कोई अलग साहित्य नहीं है, न ही उनके पास अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक अभिव्यक्तियां हैं। राजेन्द्र प्रसाद सिंह के दो आलेख अगस्त, 2012 एवं सितम्बर, 2012 के फारवर्ड  प्रेस में प्रकाशित हुए-ओबीसी नवजागरण का प्रथम चरण तथा ओबीसी नवजागरण का दूसरा चरण। इन लेखों में स्पष्ट किया गया कि भारतीय इतिहास में कई चरणों एवं कई रूपों में ओबीसी नवजागरण उपलब्ध है। अगस्त, 2012 के ‘फारवर्ड प्रेस’ में बजरंग बिहारी तिवारी ने स्वीकार किया कि राजेन्द्र प्रसाद सिंह ‘ओबीसी साहित्य’ के मान्य सिद्धांतकार हैं और उनका स्थान ओबीसी साहित्य में वही है जो दलित साहित्य में डॉ. धर्मवीर का है। ‘बहुजन साहित्य वार्षिकी 2012’ में वीरेंद्र यादव ने लिखा कि जब साहित्य की मुख्यधारा बहुजन समाज के सरोकारों से जुडऩे का जतन कर रही हो, तब ‘ओबीसी साहित्य’ की किसी भी अवधारणा की न तो कोई आवश्यकता है और न कोई औचित्य। परंतु इतना तो तय है कि बहुजन समाज के सरोकारों की ही एक धारा ओबीसी साहित्य है।

जयप्रकाश कर्दम ने ‘दलित साहित्य 2012’ की वार्षिकी में ओबीसी साहित्य पर संपादकीय लिखते हुए अपना मत दिया है कि गत् वर्ष के दौरान हिंदी साहित्य में जो भी बहस चली है, उसमें सर्वाधिक उल्लेखनीय राजेन्द्र प्रसाद सिंह द्वारा ओबीसी साहित्य को लेकर शुरू की गई बहस है…….यदि ओबीसी लेखक पृथक ओबीसी साहित्य की स्थापना करना चाहते हैं तो यह आपत्तिजनक नहीं है। महत्वपूर्ण है उनका ब्राह्मणवादी-सामंतवादी साहित्य और साहित्यकारों के प्रभाव और छाया से बाहर निकलना। जाहिर है कि कंवल भारती और जयप्रकाश कर्दम जैसे दलित सरोकारों के विचारकों ने ओबीसी साहित्य को कुछेक शर्तों के साथ मान्यता दी है। जबकि ओमप्रकाश वाल्मीकि ने इसका विरोध किया है। उनका मानना है कि आज भी ओबीसी में जन्मा रचनाकार अपने को ओबीसी कहलाने में अपमान समझता है, जबकि दलित सरोकारों के रचनाकार अपने को दलित लेखक कहने में गर्व महसूस करते हैं।

हिंदी के प्रखर आलोचक तथा ‘फारवर्ड प्रेस’ के प्रबंध संपादक प्रमोद रंजन ने ओबीसी साहित्य/बहुजन साहित्य पर कई विचारोत्तेजक लेख लिखे हैं। उनका एक महत्वपूर्ण लेख ‘आज के तुलसीगण’ है। रमणिका गुप्ता ने माना है कि दलित साहित्य प्रचुर मात्रा में आ चुका है। पिछड़ा साहित्य इसमें इजाफा ही करेगा। वे तो अपनी पत्रिका ‘युद्धरत आम आदमी’ का ओबीसी विशेषांक प्रकाशित करने की तैयारी में हैं। इधर 24-25 मई, 2013 को हरिनारायण ठाकुर ने बारा चकिया; बिहार में यूजीसी प्रायोजित एक राष्ट्रीय संगोष्ठी करवाई। इसमें ओबीसी साहित्य पर भी गंभीर विमर्श हुआ। कहना न होगा कि ओबीसी साहित्य अब स्थापित हो चुका है। इसे उखाड़ फेंकना आसान नहीं होगा।

(फारवर्ड प्रेस के जनवरी, 2014 अंक में प्रकाशित )


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