बहुजन गॉडमदर

कुछेक मौकों पर आदिवासी, दलित और पिछड़ी जातियों के भी महानायकों की उपस्थिति दर्ज की जाने लगी है, मगर भूलना नहीं चाहिए कि करोड़ों के इस देश में चंद महानायकों का असर उस समाज पर नहीं हो सकता, जिस सामाजिक संरचना की ओर भारत तेजी से बढ़ रहा है

नायकों को आम आदमी के रूप में देखना ही ठीक लगता है और तभी हम उनसे अपनी परंपरा, संघर्ष और भविष्य का तालमेल बिठा पाते हैं। यही वजह है कि पहली नजर में यह समझ में नहीं आता कि देश के चौक-चौराहों पर खड़ी मूर्तियों के पीछे क्या कोई जातिवादी मनोविज्ञान रहा होगा? सवर्णी श्रेष्ठताबोध का संस्कार रहा होगा? लेकिन उन जातियों के गिनती के भी नायक नहीं मिलते, जिनके यहां श्रम और सरोकार, खून में समाये संस्कार की तरह हैं। क्या यह ऐतिहासिक बेईमानी सिर्फ  इसलिए हुई क्योंकि मेहनतकश जातियों के पास अपने कलमकार नहीं थे?

कुछेक मौकों पर आदिवासी, दलित और पिछड़ी जातियों के भी महानायकों की उपस्थिति दर्ज की जाने लगी है, मगर भूलना नहीं चाहिए कि करोड़ों के इस देश में चंद महानायकों का असर उस समाज पर नहीं हो सकता, जिस सामाजिक संरचना की ओर भारत तेजी से बढ़ रहा है। चंद आदर्श पूरे देश के दमित-दलित परिदृश्य को वह ऊर्जा नहीं दे सकते, जिस गति से यह आबादी समय को लांघने की ओर बढ़ रही है। ऐसे में जरूरी है कि छोटे-छोटे संघर्षों के जरिए समाज निर्माण में लगे बहुजन आदर्शों को हम रेखांकित करें, उनकी जिजीविषा को स्थान दें और वह कद्र भी जो उन्हें अब तक जातिवादी समाज नहीं दे सका है। यहां पत्रकार प्रेमा नेगी चार बहुजन नायिकाओं के नायकत्व को पेश कर रही हैं, जो अपने क्षेत्र में बेहतर कर रही हैं।

संपत पाल

संपत पाल

उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में संपत पाल पिछले कई सालों से सशक्त महिला संगठन ‘गुलाबी गैंग’ के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं में जागरुकता लाने का प्रयास कर रही हैं। संपत मानती हैं कि गुलाबी रंग महिलाओं का प्रिय रंग है और सही मायनों में गुलाबी साड़ी की एकरूपता ने ही इन्हें विश्व स्तर पर एक अलग और अनूठी पहचान दी है। पिछड़े तबके की गड़रिया जाति में वर्ष 1947 में जन्मीं संपत पाल ने ससुराल के खिलाफ  बगावत करने से लेकर गांव के दबंगों तक से भिडऩे में और अधिकारियों को उनकी औकात बताने से लेकर थानेदार के खिलाफ ‘कुत्ता रैली’ निकालने तक जो साहस दिखाया है, बाहर की दुनिया उसकी मुरीद हो गई। लेकिन स्थानीय स्तर पर चुनौतियां बढ़ती गईं और फिर संपत को सराहना के साथ विवाद भी झेलने पड़े और सवाल भी। मगर इन संकटों से संपत का संघर्षशील कद कहीं कम न हुआ और वह बड़े मौन तरीके से अपने समाज, युवाओं खासकर दलित-पिछड़ी औरतों की आदर्श बनती चली गईं और लंबी लड़ाई की तैयारी के साथ ही दलित-पिछड़ी जातियों की संघर्षशील महिलाओं को अपने साथ जोडऩे की पहल की। इसके बाबत संपत कहती हैं, ‘मैं सुबह खेत में गोबर डालने जाती थी। उसी संग एक थोड़ी नई जैसी साड़ी रख लेती थी। गोबर फेंकने के बाद उसे पहनकर दूसरे गांवों में निकल जाती थी। घरों में घुसने के लिए कभी किसी महिला की सहेली बनती, तो कभी कोई मेहंदी वाली, कभी मनीहारिन तो कभी औरतों कीे स्वास्थ्य संबंधी सलाह देने वाली। और जब औरत मिल जाती तो मैं उसके और वह मेरे दुख तो सबके एक से ही थे।’

भवानी मुंडा

भवानी मुंडा

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जनपद की आदिवासी भवानी मुंडा आज वहां किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं। वे उस पेशेवर फुटबॉल टीम की कोच और कप्तान हैं जिसे उन्होंने अपने बलबूते पर जलपाईगुड़ी के चाय बागान वाले पिछड़े और निरक्षर इलाके में खड़ा किया है। मुंडा एक ऐसे इलाके से ताल्लुक रखती हैं जहां तकरीबन साठ फीसदी लड़कियों की शादी 18 से पहले ही कर दी जाती है। भवानी खुद इन हालातों से गुजर चुकी हैं। माता-पिता और भाइयों ने उनके फुटबॉल  खेलने पर पाबंदी लगाने की कोशिश की तो भवानी मुंडा ने धमकी दे दी कि अगर उससे जबरदस्ती की गई तो वह अपना पैर तुड़वा लेगी, ताकि कोई शादी के लिए हां न कहे। वर्ष 1995 में भवानी ने पहली बार महिलाओं की पेशेवर फु टबाल टीम को खेलते हुए टीवी पर देखा, तो अवाक् रह गईं कि जिस खेल को वह दीवानगी की हद तक चाहती हैं वह राज्य में इतना बड़ा खेल है। तमाम चुनौतियों का सामना करते हुए भवानी आदिवासी लड़कियों की अपनी आने वाली पेशेवर फु टबाल टीम को तैयार करने के लिए जी-जान से जुट गईं। ज्यादा चुनौतीपूर्ण था लड़कियों को शॉटर्श में खेलने  के लिए राजी करना। इसके लिए लोगों ने उन्हें तरह-तरह के ताने दिए, उन्हें बेशर्म, बेहया जैसी उक्तियों से नवाजा जाने लगा, पर उन्होंने हार नहीं मानीं। पहले उनकी टीम नंगे पांव टूर्नामेंट खेलती थी, मगर बाद में उनके खेल और आत्मविश्वास को देखते हुए जिले के अधिकारियों ने उन्हें जूते दान किए। अब तो विशेष अवसरों पर प्राइवेट क्लब उनकी टीम और मैचों को प्रायोजित कर रहे हैं और बतौर पुरस्कार उन्हें ठीक-ठाक पैसा भी मिलने लगा है।

सुमित्रा महरोल

सुमित्रा महरोल

‘स्त्री, दलित और शारीरिक विकलांगता, इन तीनों पीड़ाओं को मैंने एक साथ झेला है। जिजीविषा से आप अपनी विकलांगता पर विजय प्राप्त कर भी लें, तो भी समाज आपको समानता का दर्जा प्रदान नहीं करेगा। कदम-कदम पर आईना दिखाकर कहेगा कि आप अपूर्ण हैं।’ ये शब्द हैं युवा दलित कवि-कथाकार सुमित्रा महरोल के। ये सिर्फ  शब्द नहीं हैं, बल्कि उन्होंने ऐसी जिंदगी को जीया है और आज भी उसका डटकर सामना कर रही हैं। 9-10 महीने में ही पोलियो के चलते अपंग हो चुकीं सुमित्रा ने समाज-परिवार के तानों, बेचारगी के भाव को और मानसिक यंत्रणा को दरकिनार कर सिर्फ  पढ़ाई को ही अपने जीवन का एकमात्र उद्देश्य बना लिया। दिल्ली में ही पली-बढ़ीं सुमित्रा तीन भाइयों की इकलौती बहन थीं, मगर उन्हें लाड़-प्यार की बजाय तिरस्कार ही मिला। हां,उनकी दादी उन्हें जरूर प्रोत्साहित करती थीं कि तुम्हें कुछ करके दिखाना है। तमाम उपेक्षा-जिल्लतों को झेलते हुए उन्होंने बारहवीं में टॉप किया। ग्रेजुएशन करने के बाद उनकी सरकारी नौकरी एक बैंक में लग गई, मगर फि र भी उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखीं। नौकरी के साथ एमफि ल और पीएचडी पूरी कीं। सुमित्रा कहती हैं कि इतने संघर्षों के बाद समाज में एक मुकाम और करियर में सफ लता हासिल करने के बावजूद उन्हें जीवनसाथी के बतौर अपनाने के लिए कोई अच्छा लड़का तैयार नहीं था। काफ ी मुश्किलों के बाद उनकी शादी हुई। आज उनके परिवार में पति और दो बेटे हैं, एक हद तक वो अपनी शादीशुदा जिंदगी से संतुष्ट भी हैं, मगर कहीं न कहीं एक टीस भी है।

गीता

गीता

दलितों पर हमले के लिए ख्यात हरियाणा में एक दलित महिला का सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में उभार न सिर्फ  चुनौतीपूर्ण रहा, बल्कि आश्चर्यजनक भी था। गीता को संघर्षों का संस्कार अपनी मां से मिला। उनके पिता की मौत बचपन में ही हो गई थी और पूरे परिवार को पालने का जिम्मा मां पर रहा। नौ बहनों और एक भाई की गिनती में तीसरे नंबर पर आने वालीं गीता हरियाणा के जिंद जिले के नरवाना में पली-बढ़ीं। मां रेलवे ट्रैक पर मालगाड़ी में माल लादने वाले मजदूरों को दिन में पानी पिलाती थीं और सुबह-शाम घरों में बर्तन मांजने का काम करती थीं। इस काम में गीता भी मदद करती थीं। मां के संघर्षों और शोषण को खुली आंखों से देखते हुए गीता बड़ी हुईं और नजदीक से समाज बदलने की जरूरत को महसूस किया। गीता इसी दौरान ग्रामीण महिलाओं के बीच संघर्षरत् संगठनों के संपर्क में आईं और उन्होंने खेती-किसानी करने वाली महिलाओं और भट्ठा मजदूर महिलाओं के लिए लंबा संघर्ष किया। संघर्षों की इसी कड़ी में उन्होंने ‘महिला मुक्ति मोर्चा’ बनाया। इस संगठन पर हरियाणा सरकार ने माओवादी होने का आरोप लगाया और उसकी सदस्य होने के नाते वह करीब 3 साल 7 महीने जेल में भी रहीं,  लेकिन 2012 में बरी कर दी गईं। गीता कहती हैं, ‘मैं उन संघर्षों में हमेशा भागीदार रहूंगी जो सामाजिक-आर्थिक बराबरी के लिए लड़े जाएंगे। मेरी कोशिश होगी कि मैं एक ऐसे समाज को बनाने में ईंट का काम करूं, जिसमें लिंग और जातिभेद के कारण इंसानी दर्जा कम न किया जाता हो।’

(फारवर्ड प्रेस के फरवरी, 2014 अंक में प्रकाशित)


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