कुलीनों का खूनी राजनीतिक द्वंद्व

आज भी गाहे-बगाहे दलित-पिछड़ा, वेद-पुराण और स्मृति से लेकर नए साहित्य और फिल्मों में जलील किए जाते रहे हैं। आखिर कब तक ऐसी रचनाएं दलित-बहुजन झेलता रहेगा

चुनावों का मौसम है और विभिन्न राजनीतिक दलों के दलित-बहुजन के प्रति नजरिए पर इन दिनों खूब चर्चा हो रही है। इसलिए, बेहतर होगा कि इस समय हम 2010 में बनी उस फिल्म की कथा के निहितार्थ पर नजर डालें, जिसका नाम ही ‘राजनीति’ था और जिसके निर्देशक प्रकाश झा भी खुद एक राजनेता बनने की ख्वााहिश रखते हैं और बिहार के बेतिया से जद यू के टिकट पर 16वीं लोकसभा का चुनाव भी लड़ रहे हैं।

राजनीतिक घरानों के खूनी अंतद्र्वंंद्व की कलई खोलती फिल्म ‘राजनीति’ भारतीय राजनीतिक परिदृश्य का चित्रण करती है। यह एक महत्वपूर्ण फिल्म है, इसलिए नहीं की  कि इसमें भारतीय राजनीति का अक्स उकेरा गया है बल्कि इसलिए भी कि यह फिल्म भारतीय समाज को भी प्रतिबिंबित करती है। लेकिन वास्तव में यह बिंब सामंतवादी नजरिए से उकेरा गया है।

इस फिल्म की कहानी कुछ इस तरह है, एक राजनेता की कुंवारी बेटी भारती, कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित होकर, अपने पिता की विरोधी हो जाती है तथा एक उम्रदराज कम्युनिस्ट कार्यकर्ता भास्कर सान्याल (नसीरुद्दीन शाह) से अनैतिक संबंध स्थापित कर लेती है। बाद में वह एक बेटे को जन्म देती है जिसे गंगा में बहा दिया जाता है। राजनीतिक फायदे के लिए उसकी शादी चंद्र प्रताप से कर दी जाती है।

देश के किसी हिंदी भाषी राज्य की राजधानी में प्रताप परिवार निवासरत है। इस परिवार के सदस्य राष्ट्रवादी नाम की राजनीतिक पार्टी में सक्रिय हैं। पार्टी की बागडोर भानु प्रताप के हाथों में है जो सत्ता में आने को बेताब है। भानु प्रताप के अचानक बीमार हो जाने से सत्ता की बागडोर के लिए खींचतान शुरू हो जाती है। भानु प्रताप अपने छोटे भाई चंद्र प्रताप को पार्टी का नेतृत्व सौंप देता है। भानु प्रताप का पुत्र वीरेंद्र प्रताप खुद अध्यक्ष बनना चाहता है और चंद्र प्रताप का विरोध करता है।

इस फिल्म का महत्वपूर्ण बिंदु है एक दलित-पिछड़े नेता सूरज कुमार (अजय देवगन) का बढता प्रभाव। आज के राजनीतिक परिवेश में किस प्रकार एक पिछड़ा या दलित अपने हित को लेकर जागरूक हुआ है, यहां उसको बखूबी दिखाया जाता है। वहीं यह भी बताया जाता है कि किस प्रकार वास्तविक नेतृत्व को कुचलने के लिए उनकी जगह दलित जाति के अपने चमचों को टिकट देकर छल की राजनीति की जाती है। यह फिल्म दो समूहों के बीच सिमटी हुई है। एक ओर पृथ्वी प्रताप सिंह (अर्जुन रामपाल), समर प्रताप सिंह (रणबीर कपूर) तथा बृजलाल (नाना पाटेकर) हैं तो दूसरी ओर वीरेंद्र प्रताप सिंह (मनोज वाजपेयी) और सूरज कुमार हैं। दोनों पार्टी के नेतृत्व को हथियाना चाहते हैं ताकि सत्ता में आ सके।

पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में पृथ्वी और समर को पार्टी से बाहर निकाल दिया जाता है। इसके बाद पृथ्वी प्रताप अपने साथियों के साथ नई पार्टी जनशक्ति का गठन कर लेता है। पृथ्वी और वीरेंद्र की खूनी लड़ाई के दौरान समर की विदेशी पत्नी एवं पृथ्वी प्रताप की मौत हो जाती है। इन सब हत्याओं में वीरेन्द्र प्रताप और सूरज का हाथ होता है। यहां यह बखूबी बताया गया है कि किस प्रकार राजनीतिक घराने अपने परिवार के सदस्यों की हत्या का बदला लेने के लिए जनता को वोट से जवाब देने के लिए कहते हैं और सत्ता में आने का सपना देखते हैं। देश की वास्तविक राजनीति में ऐसा होते देखा जाता है।

बृजलाल को जब इस तथ्य के बारे में पता चलता है कि दलित सूरज कुमार कोई और नहीं भारती की ही अवैध संतान है तो भारती को सूरज के पास भेजा जाता है ताकि सूरज को भावनाओं के जाल मे फंसाकर समर प्रताप के पक्ष में लाया जा सके। लेकिन सूरज नहीं मानता है। अंत में समर अपने राजनीतिक दुश्मन वीरेंद्र प्रताप और सूरज को मार देता है।

बृजलाल कहता है जब तक दुश्मन जीवित रहेगा तुम हारते रहोगे इसलिए दुश्मन को मार दो। राजनीतिक बिसात पर उनकी चालों से खून-खराबा होता है। एक ही तर्क और सिद्धांत है कि जीत के लिए जरूरी है कि दुश्मन जीवित न रहे।

यहां पर दलित-पिछड़ा नेता सूरज एक ऐसा किरदार है जो पूरी तरह सवर्ण नजरिए से गढ़ा गया है। सूरज बुद्धिमान है, चतुर है, राजनीति की समझ रखता है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह दलित-पिछड़ों में लोकप्रिय है। वह भारतीय राजनीति में भूचाल लाने का माद्दा रखता है। ऐसे किरदार को अंत में सवर्णों की अवैध संतान के रूप में दिखाना सवर्णों की पुरानी अदा है। इससे वे पूरे भारतीय परिदृश्य में यह संदेश देना चाहते हैं कि यदि कोई दलित-पिछड़ा व्यक्ति किसी ऊंचाई पर पहुंचता है, तो वह किसी न किसी रूप से सवर्णों का ही खून होगा। इससे सवर्णों के दो मंसूबे पूरे होते हैं। पहला दलित-बहुजन में उस व्यक्ति की लोकप्रियता को आघात पहुंचाना, दूसरा पूरे दलित बहुजन-समाज को बेइज्जत करना।

बेहतर होता इस फिल्म की कहानी सामंती मानसिकता से नहीं लिखी गई होती। सूरज और उसके पिछड़े समाज को जलील होने से बचाया जा सकता था। आज भी गाहे-बगाहे दलित-पिछड़ा वेद-पुराण और स्मृति से लेकर नए साहित्य और फिल्मों में जलील किए जाते रहे हैं। आखिर कब तक ऐसी रचनाएं दलित-बहुजन झेलता रहेगा।

फिल्म का नाम : राजनीति, अवधि : 167 मिनट,

निर्देशक : प्रकाश झा, बैनर : यूटीवी मोशन पिक्चर्स

(फारवर्ड प्रेस के अप्रैल 2014 अंक में प्रकाशित)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +919968527911, ईमेल : info@forwardmagazine.in

About The Author

Reply