जाति की बेडिय़ों से मुक्ति की प्रतीक्षा

हिमाचली लेखक एसआर हरनोट कहते हैं, ‘यह शर्मनाक है कि आज भी राज्य में कम से कम ऐसे एक दर्जन मंदिर हैं जिनकी दीवारें तक दलित नहीं छू सकते।’

भारतीय संविधान ने अछूत प्रथा को आज से 64 वर्ष पहले गैर-कानूनी घोषित कर दिया था। परंतु व्यवहार में आज भी हिमाचल प्रदेश सहित देश के कई हिस्से इस अभिशाप से मुक्त नहीं हो सके हैं। दलितों को अपनी रोजाना की जिंदगी में आज भी भेदभाव, हिंसा, अमानवीयता और गुलामों-सा व्यवहार सहना पड़ता है। हिमाचल प्रदेश अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए जाना जाता है। राज्य की कुल आबादी 68.56 लाख का 89.97 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करता है।

दलित, राज्य की कुल आबादी का 35 प्रतिशत है।इतनी बड़ी आबादी होते हुए भी ग्रामीण क्षेत्रों में रहनेवाले दलितों को अपमान और अलगाव  सहन करना पड़ता है। उन्हें मंदिरों और ऊंची जाति के लोगों के घरों में प्रवेश की इजाजत नहीं है। सार्वजनिक स्थानों पर उन्हें अलग बर्तनों में खाना और पानी दिया जाता है। परंतु इस दमित वर्ग के प्रति न तो सरकारी तंत्र और ना ही सामाजिक संगठनों का रवैया सहानुभूतिपूर्ण है।

उल्टे, ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार इस भेदभाव को बनाए रखना चाहती है। वरना, क्या कारण है कि कई सरकारी स्कूलों में अनुसूचित जाति व जनजाति के विद्यार्थियों और ऊंची जातियों के विद्यार्थियों को अलग-अलग बैठाकर मध्यान्ह भोजन परोसा जाता है। शिमला जिले की रामपुर तहसील, मण्डी जिले के सैराज और कांगड़ा जिले में यह दृश्य आम है। दलित विद्यार्थियों को भोजन तभी मिलता है जब ऊंची जाति की छात्र-छात्राएं भोजन कर चुके होते हैं। कक्षाओं में भी दलित विद्यार्थियों को अलग लाइन में बैठाया जाता है।

बिलासपुर जिले के शिवमंदिर के बाहर एक बोर्ड लगा है जिस पर लिखा है,’शूद्र मंदिर में प्रवेश न करें।’ इस मंदिर का निर्माण एक साधु ने 15 वर्ष पहले किया था। ऐसा आरोपित है कि बाबा केवल गिरी, जो मंदिर से जुड़ी धर्मशाला का कामकाज देखते हैं, ने यह बोर्ड मंदिर के मुख्य द्वार और उस कमरे के बाहर लगवाया है, जिसमें लंगर चलता है। यद्यपि अदालत ने मंदिर प्रबंधन को इस बोर्ड को हटाने का निर्देश दिया है परंतु वह अभी भी लगा हुआ है।

हिमाचली लेखक एसआर हरनोट कहते हैं, ‘यह शर्मनाक है कि आज भी राज्य में कम से कम ऐसे एक दर्जन मंदिर हैं जिनकी दीवारें तक दलित नहीं छू सकते।’

नरेन्दर सिंह, जिनका रामपुर गांव में फलों का बागान है, कहते हैं, ‘हमें एक ही कुएं से पानी नहीं भरने दिया जाता, हम मंदिरों में नहीं घुस सकते, हम ऊंची जाति के लोगों की उपस्थिति में जूते-चह्रश्वपल नहीं पहन सकते, चाय की दुकानों में हमारे लिए अलग कप होते हैं। हमने कई बार जिला कलेक्टर से इसकी शिकायत की परंतु किसी के कान पर जूं तक नहीं रेंगी।’ बिलासपुर जिले के दलित राम चंदेल कहते हैं, ‘मैं उस दिन का इंतजार कर रहा हूं जब मैं स्वतंत्रतापूर्वक जी सकूंगा और जो चाहूं, कर सकूंगा। मेरे गांव में मुझे और मेरे परिवार को हर दिन  अपमान सहना पड़ता है। हम जब मंदिर जाते हैं या मंदिर के कुएं से पीने का पानी भरते हैं तो हमें दुत्कारा जाता है। सब लोग चुपचाप इस अन्याय को देखते रहते हैं। कोई कुछ नहीं कहता। हम भी मनुष्य हैं। क्या यह हमारी गलती है कि हम नीची जाति में पैदा हुए हैं?’

इसी तरह के मामले मंडी जिले में भी सामने आए हैं। दलित सोशल एण्ड फायनेन्शियल राईट्स मूवमेण्ट (दलित सामाजिक व आर्थिक अधिकार आंदोलन) के संयोजक बालक राम ने इस संबंध में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और जिला प्रशासन को विस्तृत रपटें भेजी हैं, जिनमें नीची जाति के लोगों के साथ भेदभाव की शिकायत की गई है। रिपोर्ट में राम लिखते हैं कि अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजातियों के लोगों के साथ भेदभाव बिना किसी रोक-टोक के जारी है। उनका कहना है कि स्कूलों, अन्य शैक्षणिक संस्थाओं, मंदिरों और मेलों आदि में छूआछूत का प्रचलन आज भी है। राम का कहना है कि शिवरात्रि और दशहरा जैसे त्योहारों पर आयोजित किए जाने वाले पारंपरिक मेलों में भी यही कुछ होता है। मण्डी के शिवरात्रि मेले, जो कि प्रदेश का एक प्रमुख मेला है, में आयोजक, नीची जाति और ऊंची जातियों के लोगों के लिए खाना अलग- अलग पकाते और परोसते हैं। यह भोज सरकारी प्राथमिक शाला के भवन में होता है। ‘इस भेदभाव पर न तो किसी सामाजिक संगठन और ना ही पशासनिक अधिकारियों ने कभी आपत्ति उठाई।’ उनका कहना है कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 17 अछूत प्रथा को प्रतिबंधित करता है परंतु राज्य में यह अभी भी जारी है। यह ऊंची जातियों के लोगों का कर्तव्य है कि वे वंचितों को धार्मिक समारोहों और सामूहिक भोजों में समान दर्जा दें और उनकी मानवीय गरिमा का हनन न करें।

 

(फारवर्ड प्रेस के जून, 2014 अंक में प्रकाशित)


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