जो सबका होता है, वह किसी का नहीं होता

जो सबका होता है, वह किसी का नहीं होता। बुद्ध संभवत: इस गुत्थी में उलझे होंगे। इसीलिए उन्होंने बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय का उद्घोष किया

प्रमोद रंजन ने जब दूरभाष पर बतलाया कि फॉरवर्ड प्रेस का बहुजन परंपरा पर एक अंक आ रहा है और उस पर आपके विचार अथवा टिप्पणी की दरकार होगी, तब मैं हल्का-सा परेशान हुआ। मेरी समझ में नहीं आया कि बहुजन परंपरा क्या होगी। भारत में श्रमण और ब्राह्मण परपंरा तो है और फिर छोटी-बड़ी हजारों परंपरायें हो सकती हैं, लेकिन बहुजन परंपरा! मेरी समझ में उलझन की गांठें पड़ गईं। मैंने अपनी उलझन से प्रमोद को अवगत भी कराया। तब प्रमोद का ‘आदेश’ था, आप जो भी चाहें लिखें, लेकिन लिखें। अब मेरी परेशानी और बढ़ गई। मटियाना चाहा। लेकिन मोबाइल और एसएमएस के जमाने में ऐसे तकादों से बचना मुश्किल होता है।

हिंदी में डॉ. रामविलास शर्मा ने परंपरा पर विमर्श की शुरुआत की और इसे अंतत: एक वाद में परिणत कर दिया। उनके इस परंपरा-विमर्श की भरपूर आलोचना भी हुई है और आज शायद ही किसी को यह बतलाने की जरुरत है कि उसका आशय क्या था। रामविलास जी अक्खड़ पुरुष थे। वह विमर्श से नतीजा नहीं निकालते थे। वकीलों की तरह लक्ष्य तय कर लेते थे और फिर अपनी मेधा से उसे सिद्ध कर देते थे। लेकिन परंपरा पर पहली दफा विमर्शनुमा हिंदी में कुछ आया, तो वह नामवर सिंह की छोटी-सी पुस्तक ‘दूसरी परंपरा की खोज’- थी, जिसे उन्होंने अपने गुरु पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी को समझते-समझाते हुए लिखा था। परंपरा पर एक सार्थक विमर्श की शुरुआत हिंदी में यहीं से हुई।

परिपाटियां परंपरा नहीं होतीं

पुस्तक का आरंभ करते हुए ही डॉ. नामवर सिंह ने एक कथा का जिक्र किया है, ”शांति निकेतन में एक विधवा अपनी कन्या का विवाह हिंदू विधि से करना चाहती थी। किसी ने कह दिया कि नान्दी श्राद्ध विधवा नहीं कर सकती। गुरुदेव (रवीन्द्र नाथ ठाकुर) ने नए-नए आये काशी के ज्योतिषाचार्य पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी को बुलावा भेजा। पूछा ‘हिंदुओं का हजारों वर्ष का इतिहास है, क्या उसमें पहली बार यह घटना हो रही है? पहले भी तो कभी ऐसी स्थिति आयी होगी?’ पंडित जी घर आए। स्मृतिग्रंथों की छानबीन की। देखा कि पूर्वपक्ष में ऐसे बहुत वचन हैं, जो विधवा के इस अधिकार को स्वीकार करते हैं। लेकिन वचनों की संगति लगाते समय निष्कर्ष रुप में यही कहा गया है कि विधवा को ऐसा अधिकार नहीं है। जाकर गुरुदेव को बताया तो हंसकर बोले, ‘क्या पूर्वपक्ष के वे ऋषि कुछ कम पूज्य हैं, जिनका खंडन उत्तरपक्ष में किया गया है?’ इस प्रश्र ने पंडित जी को झकझोर दिया। परंपरा क्या उत्तरपक्ष ही है? पूर्वपक्ष नहीं? जिस परंपरा को अब तक वे अखण्ड समझ रहे थे, देखते – देखते शिवधनुष के समान खंड-खंड हो गई। लगा कि परंपरा और भी हो सकती हैं।” (दूसरी परपंरा की खोज, डॉ. नामवर सिंह, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ- 11)

परंपराएं भी अनेक हैं, और परिपटियां भी। कुछ लोग परंपरा और परिपाटी का घाल-मेल कर देते हैं, परिपाटी को ही परंपरा मान लेते हैं। जैसे हिंदू परंपरा से उनका आशय हिन्दू परिपाटियों से होता है। उठने-बैठने, पहनने-संवरने के ढंग या इसी तरह के और कुछ। ये परिपाटियां हैं, परंपरा नहीं। जब हम परंपरा पर विमर्श कर रहे हों, तब इसका खयाल रखना चाहिए।

बहुजन-श्रमण परंपरा

लेकिन यह बहुजन परंपरा क्या हो सकती है? या क्या बला है? मैने प्रमोद रंजन से कहा, इसे ‘बहुजन-श्रमण परंपरा’ कहना ज्यादा सही होगा। कितना सही होगा, यह स्वयं मैं भी नहीं जानता। एक झटके में कह गया। लेकिन अब तक कायम हूं, कोई सार्थक जवाब मिले, तो अपनी बात को वापस लेने में देर नहीं करुंगा।

हमारे देश-समाज में सदियों से दो तरह की विचार-परंपराएं मुख्य रुप से चल रही हैं। एक है श्रमण परंपरा और दूसरी ब्राह्मण परंपरा। हमारे शब्दकोश श्रमण का अर्थ बतलाते है ‘परिश्रमी, मेहनती’ व सन्यासी और ब्राह्मण का अर्थ ‘चैतन्य’। ‘जन्मना जायते शूद्र: संस्कारै द्विज उच्यते’ – जन्म से सभी शूद्र होते हैं, संस्कार से द्विज या ब्राह्मण बनते हैं। ज्ञान का (प्रतीक में यज्ञोपवीत) संस्कार किसी को द्विज बनाता है। द्विज के शीर्ष ब्राह्मण हैं – पूर्ण चैतन्य।

लेकिन इस पूर्ण चैतन्य समूह की भौतिक परवरिश कैसे होगी, इसके लिए धर्म और राज सत्ता की रचना की गई। शोषण और पाखंड का पूरा चक्र रचा गया क्योंकि शारीरिक श्रम के बिना जीवन चलना मुश्किल होता है। ब्राह्मण चिंतन का मूल सूत्र है शारीरिक श्रम से दूरी। जो शारीरिक श्रम से जितना दूर है, वह उतना ही उंचा है। ब्राह्मण सबसे ऊपर और फिर क्रम से क्षत्रिय और वैश्य। क्षत्रिय और वैश्य को कुछ शारीरिक श्रम करने पड़ते हैं, इसलिए वे कमतर हैं। शूद्रों पर शारीरिक श्रम की इतनी जिम्मेदारी है कि उन्हें ज्ञानार्जन की बलात् मनाही है। ‘न शूद्राय मतिद्यात्’ – शूद्रों को मति मत दो। शूद्रों को चैतन्य मत बनने दो। कुछ लोगों को चैतन्य बने रहने के लिए बहुतों का जड़ या मूर्ख बने रहना जरुरी है। यही है मुख्य रुप से ब्राह्मण चिंतन। इस चिंतन की परंपरा अनेक रुपों में आज भी जारी है।

इस परंपरा से अनेक सन्यासियों और मनीषियों ने एतराज जताया था। पौराणिक आख्यानों की बात छोड दें तो ऐतिहासिक आख्यानों में इसका सबसे व्यवस्थित विरोध तथागत बुद्ध ने प्रदर्शित किया। अपने प्रशिक्षित भिक्षुओं को सभी दिशाओं में जाने का अनुरोध करते हुए उन्होंने संबोधित किया – ‘चरथ भिक्खवे, चारिकं, बहुजन हिताय बहुजन सुखाय, लोकानुकम्पाय…. अत्थाय हिताय, देव मनुस्सानं।’ (जाओ भिक्षुओं, चारों दिशाओं में जाओ, बहुतों के हित के लिए, बहुतों के सुख के लिए, लोगों पर अनुकंपा करने के लिए, उनके कल्याण के लिए, देवताओं और मनुष्यों के कल्याण के लिए।)

बुद्ध अल्पसंख्यक (माइनरिटी) चिंतन को बहुजन (मेजारिटी) चिंतन में बदल देते हैं। यह उनकी जनतांत्रिक पहल थी। बहुतों के लिए, केवल कुछ के लिए नहीं। इस परंपरा को श्रमण परंपरा कहा गया। ब्राह्मण चिंतन ने जिस तरह शूद्रों की अवहेलना की थी, उनके शोषण का एक कुचक्र रचा था, वैसा श्रमण परपंरा ने नहीं किया। चैतन्य (ब्राह्मण) लोगों की कोई अवहेलना यहां नहीं थी। बुद्ध ने जिन देवताओं के कल्याण की बात की है, वे संभवत: ये चैतन्य ब्राह्मण ही हैं। श्रमण चिंतन समत्व की बात करता है। व्यापक विमुक्ति की बात करता है, सीमित विमुक्ति की नहीं।

सर्वजन बनाम बहुजन

सार-संक्षेप में यही इन दोनों परंपराओं का भेद है। हमारे देश में ब्राह्मण परंपरा इतनी मजबूत हो गई कि श्रमण परंपरा को विमर्श के दायरे से ही बाहर कर दिया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि देश लंबे अरसे तक गुलाम रहा। कई अर्थों में हम आज भी गुलाम हैं। हमारा सामाजिक-सांस्कृतिक पिछड़ापन आज भी बना हुआ है। इसके रहते हम अपेक्षित आर्थिक-राजनीतिक ताकत हासिल नहीं कर सकते। बहुजन श्रमण सांस्कृतिक परंपरा को वोट की राजनीति के लिए कभी-कभार सर्वजन परंपरा में तब्दील करने की कोशिश होती है। इसे पहली दफा बिनोबा ने किया था और फिर मायावती ने और अब नरेन्द्र मोदी यही राग अलाप रहे हैं। दरअसल, सर्वजन चिंतन, प्रच्छन्न रुप से ब्राह्मण चिंतन को बनाए रखने की एक होशियार कोशिश है। इस पर विमर्श के लिए बहुत समय चाहिए। इस छोटे आलेख में यह संभव नहीं होगा।

हां, इस आलेख के आखिर में मैं पाठकों को महाभारत का एक अंश बतलाना चाहूंगा। महाभारत के आखिर में द्रौपदी के सभी बेटे मारे जाते हैं और वह विलाप कर रही है। कृष्ण उसे चुप कराते हुए कहते हैं- ‘युद्ध में यह होता है, कृष्णा’। कृष्णा (द्रौपदी) कहती है – ‘कृष्ण! क्या इस छोटी बात को मैं नहीं समझती। अच्छी तरह समझती हूं। मेरा दुख केवल यह नहीं है कि मेरे बेटे मारे गए हैं। मेरा दुख यह है कि अपने बेटों की मृत्यु पर केवल मैं विलाप कर रही हूं। घटोत्कच मारा गया था तब भीम फूट-फूट कर रो रहा था। अभिमन्यु की मृत्यु पर अर्जुन। लेकिन मेरे बेटे पर रोने के लिए, पांच पिताओं के रहते, केवल मैं हूं। क्या जो सबका होता है, वह किसी का नहीं होता?’

कृष्ण ने हामी में सिर हिलाते हुए कहा – ‘कृष्णा, यही सच है।’
जो सबका होता है, वह किसी का नहीं होता। बुद्ध संभवत: इस गुत्थी में उलझे होंगे। इसीलिए उन्होंने बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय का उदघोष किया। हमारे राजनेताओं और सामाजिक दार्शनिकों को इस पर विमर्श करना चाहिए।

(फारवर्ड प्रेस के अक्टूबर 2014 अंक में प्रकाशित)


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