भारतीय त्योहारों के निहितार्थ

बहुजन उन सभी परम्पराओं का विरोध और बहिष्कार करने का संकल्प लें जो उनके नायकों की छलपूर्वक हत्या अथवा अन्य प्रकार से पराजय के प्रतीक के रूप में मनाये जाते हैं

दलित विमर्श और स्त्री विमर्श के इस दौर में जो अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दा विमर्श के दायरे से लगभग ग़ायब है, वह है— हिंदू त्योहारों के निहितार्थों और बहुजन समाज का अंतर्संबंध। इस संबंध को तलाशने की दिशा में ‘फारवर्ड प्रेस’ ने पिछले कुछ वर्षों में बहुत सार्थक और आशाजनक पहल की है।

इसी कड़ी में, फारवर्ड प्रेस पत्रिका के अक्टूबर 2011 अंक में ‘किसकी पूजा कर रहे हैं बहुजन?’ शीर्षक से प्रकाशित प्रेम कुमार मणि का लेख पढ़कर मेरे अन्दर वर्षों से दबे कई प्रश्नों ने सर उठा लिया। प्रेम कुमार का यह लेख महिषासुर और दुर्गा के मिथक को केंद्र में रखकर लिखा गया है। उनके अनुसार, महिषासुर मर्दन का उत्सव ही दशहरा है। इसी अंक में प्रकाशित प्रेमकुमार मणि के एक और लेख ‘दशहरे के त्योहार पर’ का यह वाक्य विचारणीय है- ‘हमें यह स्वीकार करना होगा कि इतिहास और पौराणिकता पर वर्चस्व प्राप्त और वंचित तबके की एक ही व्याख्या नहीं होती।’ इस एक वाक्य ने हमारे कंधो पर उत्तरदायित्यों का बहुत बड़ा बोझ डाल दिया है। इसमें कोई संशय नहीं होना चाहिए कि निर्माणाधीन इतिहास में हमारी पहचान इसी से होगी कि हमने कितनी ईमानदारी और निष्ठा से सम्यक व्याख्या करने के इस उत्तरदायित्व का निर्वहन किया है। हम ऐतिहासिक और पौराणिक आख्यानों की व्याख्या, वंचित तबके की दृष्टि से करें और अपने इतिहास, अपनी सभ्यता तथा अपनी संस्कृति के पुनरुद्धार में सार्थक भूमिका अदा करें।

प्रेमकुमार मणि ने महिषासुर और दुर्गा के आख्यान के मूल मंतव्य की व्याख्या करके प्रचलित मान्यताओं और धारणाओं पर कड़ा प्रहार किया। उनका यह लेख इतना परिवर्तनकामी सिद्ध हुआ कि आज देश के विभिन्न हिस्सों में अनेक लोग महिषासुर के पक्ष में क्रांतिकारी आन्दोलन चला रहे हैं। जगह-जगह महिषासुर शहादत दिवस मनाया जा रहा है।

आज भारत में हमें जो कुछ भी पढ़ाया और बताया जाता है उसकी शुरुआत वैदिक काल से होती है जबकि हम बहुजनों के इतिहास, सभ्यता और संस्कृति की जड़ें पूर्व वैदिक और प्राक् वैदिक काल में हैं। इस देश का सबसे बड़ा अभिशाप यह है कि इसने इतिहास लिखना नहीं सीखा। आर्यों ने इतिहास को पौराणिक आख्यानों में लपेट कर हमारे सामने वास्तविकता और कल्पना का काकटेल परोस दिया और इस काकटेल में तथ्य कम हैं और फंतासी अधिक। इन आख्यानों में बहुजन नायकों को खलनायकों की तरह गूंथ दिया गया। वस्तुत:, यह भौतिक युद्ध के समानांतर लड़ा गया एक सांस्कृतिक युद्ध था। भौतिक युद्ध के अलावा, बहुजन इस सांस्कृतिक युद्ध में भी परास्त हुए। सांस्कृतिक युद्ध में पराजय का अर्थ था अपनी पहचान शत्रुओं में विलीन कर, उन्हीं की तरह सोचने-समझने की मानसिकता का गुलाम हो जाना।

प्रेमकुमार मणि ने अपने उक्त लेख में कम्युनिस्ट नेता डाँगे के हवाले से दुर्गा को दलित और पिछड़े तबके की हत्यारिणी बताया था। यही बात ईश्वर का अवतार मानकर पूजे जाने वाले राम पर भी पूरी तरह लागू होती है। दशहरा राम के ऐसे ही कृत्यों के लाइसेंस का वार्षिक नवीनीकरण है। जरा सोचें, यदि किसी स्त्री का नाक-कान काटना कानूनन अपराध है तो दशहरा में शूर्पनखा के नाक काटने के प्रसंग का मंचन क्यों वैध है? इस पर प्रतिबंध लगाने की कार्रवाई क्यों नहीं की जाती? यहाँ विचारणीय तथ्य यह है कि शूर्पनखा स्त्री होने के साथ ही बहुजन समाज की बेटी भी थी। फिर क्या कारण है कि प्रत्येक वर्ग की स्त्री और बहुजन वर्ग इसका विरोध या इसके विरुद्ध विद्रोह नहीं कर रहा है? इसी प्रकार, केवट प्रसंग जिस रूप में प्रचारित है, वह तुलसी की रामचरितमानस के अलावा और यही है कि होलिका, असुर घराने की राजपुत्री थी अर्थात बहुजन समाज की अस्मिता का मर्दन मूल रूप से इस परंपरा का उद्देश्य है। लेकिन इसके लिए दलित बहुजन समाज भी कम दोषी नहीं है, जो सच्चाई से भिज्ञ होने की बजाय स्वयं इसी रंग में रंग कर शत्रु पक्ष का उत्साहवर्धन करता है।

बली राजा, बहुजन समाज का शक्तिशाली राजा और तीनों लोकों का अधिपति था। विष्णु ने उसे छल से परास्त किया। आज प्रतापी बली राजा के आख्यान को विस्मरण के स्थाई गर्त में दफऩ कर दिया गया है और बहुजन समाज को कुछ खबर ही नहीं है। महात्मा जोतिबा फुले ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘गुलामगिरी’ में बली राजा पर विस्तार से चर्चा की है।

अब समय आ गया है कि बहुजन अपनी अस्मिताओं और परंपराओं को पहचानें तथा उन सभी परम्पराओं का विरोध और बहिष्कार करने का संकल्प लें, जो उनके नायकों की छलपूर्वक हत्या अथवा अन्य प्रकार से पराजय के प्रतीक के रूप में मनाये जाते हैं। इसके लिए आवश्यक है कि बहुजन अपना साहित्य पढ़ें, अपनी संस्कृति की खोज करें और उसी रास्ते को अपनाकर भविष्योन्मुखी बनें। सांस्कृतिक वंचना झेल रही इस कौम की बेहतरी का इसके अलावा दूसरा विकल्प नहीं है।

(फारवर्ड प्रेस के अक्टूबर 2014 अंक में प्रकाशित)


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