असुर कथा का आदिवासी प्रतिकार

पहले दलितों का गुस्सा और आक्रोश फूटा और वह ब्राह्मणवादी व्यवस्था से घृणा की हद तक चला गया। और अब पिछले कुछ समय से आदिवासी समाज भी इस मुद्दे पर आंदोलित है

भारतीय उपमहाद्वीप के ज्ञात इतिहास में दानव, राक्षस व असुर जैसी किसी प्रजाति का जिक्र नहीं मिलता, लेकिन भारतीय वांड़मय-रामायण, महाभारत, पुराण आदि इस प्रजाति के जीवों के विवरण से भरे पड़े हैं। ये दानव भीमकाय, विकृत आकार के, काले व मायावी शक्तियों से भरे हुए ऐसे जीव थे जो देवताओं और मृत्युलोक में रहने वाले भद्र लोगों को परेशान करते रहते थे। इस बारे में विद्वान और इतिहासवेत्ता बहुत कुछ लिख चुके हैं और यह मानकर चलते हैं कि ये गाथाएं सदियों तक चले आर्य-अनार्य युद्ध की छायाएं हैं। परंतु इन कथाओं को इस रूप में देखने वाले और अन्य लोग भी सहज भाव से यह स्वीकार करते आए हैं कि दस सिर वाले रावण को मार कर राम अयोध्या लौटे होंगे और उस अवसर पर दिये जलाकर राम, लक्ष्मण और सीता का स्वागत अयोध्यावासियों ने किया होगा। तभी से दीपावली मन रही है और रावण वध का आयोजन हो रहा है। उसी तरह, पूर्वोत्तर भारत में महिषासुर का वध करने वाली दुर्गा की आराधना होती है। हाल के वर्षों में बंग समाज के लोग जिन राज्यों में गए, वहां भी अब दुर्गा पूजा होने लगी है। लेकिन सामान्यत: दुर्गा पूजा बिहार, बंगाल और ओडिशा का त्योहार है। कभी-कभी यह जिज्ञासा होती है कि दुर्गा पूजा पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत में ही क्यों होती है। इसी तरह, रावण वध का उत्सव उत्तर भारत में ही क्यों मनाया जाता है? रामलीलाएं इसी क्षेत्र में क्यों आयोजित होती हैं? दक्षिण भारत में क्यों नहीं?

छल के शिकार रहे हैं असुर

बहुधा यह भी देखने में आता है कि धार्मिक ग्रंथों, पुराणों आदि में दुष्ट तो दानवों को बताया जाता है, लेकिन धूर्तता करते देवता दिखते हैं। मसलन, समुद्र मंथन तो देवता और दानवों ने मिलकर किया लेकिन समुद्र से निकली लक्ष्मी सहित सभी मूल्यवान वस्तुएं देवताओं ने हड़प लीं। यहां तक कि अमृत भी सारा का सारा देवताओं के हिस्से गया और जब राहू-केतु ने देवताओं की पंक्ति में शामिल होकर अमृत पीना चाहा तो उन दोनों को अपने सर कटाने पड़े। महाभारत में लाक्षागृह से बचकर निकलने और जंगलों में भटकने के बाद, पांडवपुत्र भीम किसी दानवी से टकराए। उसके साथ कुछ दिनों तक सहवास किया और फिर वापस अपनी दुनिया में चले गए। बेटा घटोत्कच कैसे पला-बढा, इसकी कभी सुध नहीं ली। हालांकि उस बेटे ने महाभारत युद्ध में अपनी कुर्बानी देकर अपने पिता के कर्ज को चुकता किया। मर्यादा पुरुषोत्तम राम और रावण के व्यक्तित्व की तो बहुत सारी समीक्षाएं हुईं। रावण सीता को हर कर तो ले गया लेकिन उनके साथ कभी अभ्रद व्यवहार नहीं किया, जबकि राम ने अपनी पत्नी को लगातार अपमानित किया। छल से बालि की हत्या की। एकलव्य की कथा तो इस बात की मिसाल ही बन गई है कि एक गुरु ने अगड़ी जाति के अपने शिष्य के भविष्य के लिए एक आदिवासी युवक से उसका अंगूठा ही किस तरह गुरुदक्षिणा में मांग लिया। पौराणिक गाथाओं की ये सब बातें पिछले कुछ सालों से तीखी बहस का हिस्सा बनी हैं। पहले दलितों का गुस्सा और आक्रोश फूटा और वह ब्राह्मणवादी व्यवस्था से घृणा की हद तक चला गया। और अब पिछले कुछ समय से आदिवासी समाज भी इस मुद्दे पर आंदोलित है।

मध्य भारत में केन्द्रित

प्राचीन भारतीय इतिहास की अलग अलग व्याख्याएं हो रही हैं, खासकर उस क्षेत्र के इतिहास की जिसे अब बंगाल, बिहार और ओडिशा कहा जाता है। इतिहास की जिन पुस्तकों की मदद से यह बहस चल रही है, उनमें सबसे ज्यादा चर्चित है डब्ल्यू डब्ल्यू हंटर की ‘एनल्स ऑफ रूरल बंगाल।’ हंटर का मानना है कि वैदिक युग के ब्राह्मणों और मनु ने जिस हिंदू धर्म की स्थापना की वह दरअसल मध्यभारत का धर्म है : मध्यभारत, यानी हिमालय से विंध्याचल पर्वतमाला तक का भौगोलिक क्षेत्र। हिंदू धर्म की स्थापना मध्य एशिया से निकलकर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में कई सभ्यताओं को जन्म देने वाले आर्यों ने की जिन्होंने हिन्दुस्तान में सबसे पहले पश्चिमोत्तर क्षेत्र की दो नदियों-सरस्वती और दृश्यवती-के बीच पड़ाव डाला। वहां से वे दक्षिण-पूर्व दिशा में बढ़े और गंगा नदी के किनारे-किनारे बसते हुए बंगाल के मुहाने तक पहुंच गए। इन्हींं इलाकों को मनु अपना इलाका-हिंदू धर्म का इलाका-मानते हैं जो शुद्ध बोलता है, उसके बाहर राक्षस रहते हैं जो शुद्ध बोल नहीं सकते, अखाद्य पदार्थों का भक्षण करते हैं और जो आर्यों की तरह गौर वर्ण के नहीं हैं बल्कि काले हैं।

वर्णों का मिश्रण

मनु द्वारा व्याख्यायित हिंदू धर्म यहां अपनी जड़ें जमा पाता और उसका प्रचार-प्रसार हो पाता, उसके पहले ही बौद्ध धर्म उठ खड़ा हुआ जो इस इलाके के लोगों को सहज स्वीकार्य भी हुआ। यहां के राजा भी ब्राह्मण, क्षत्रिय नहीं बल्कि यहां के मूलवासी थे या वे लोग थे जो मनु की वर्णवादी व्यवस्था के बाहर थे। चाहे वे सम्राट अशोक हों या फिर गौड़ को अपनी राजधानी बनाकर 785 से 1040 ई. तक बंगाल पर शासन करने वाले राजा। उनमें से अधिकांश बौद्ध धर्म को मानने वाले थे। सन् 900 ई. में खुद को हिंदू मानने वाले बंगाल के राजा आदिश्वर ने वैदिक यज्ञ व पूजा-पाठ के लिए कन्नौज से पांच ब्राह्मणों को बुलवाया। वे पांचों ब्राह्मण गंगा के पूर्वी किनारे पर बसे। स्थानीय औरतों के साथ घर बसाया, बच्चे पैदा किए। जब वे यहां अच्छी तरह बस गए, उसके बाद कन्नौज से उनकी पत्नियां यहां आईं। वे स्थानीय पत्नियों और कथित रूप से अवैध संतानों को वहीं छोड़कर आगे बढ गए। उनकी अवैध संतानों से राड़ी ब्राह्मण पैदा हुए, साथ ही अनेक अन्य जातियां जैसे कायस्थ आदि। लेकिन जिन मिश्रित नस्ल और जातियों का भारत में आविर्भाव हुआ, वे सिर्फ मनु की वर्ण व्यवस्था के लोगों के बीच आपसी विवाह का नतीजा न होकर ब्राह्मणों और हिंदू वर्ण व्यवस्था के बाहर की जातियों के मिश्रण का भी नतीजा था। हिंदू वर्ण व्यवस्था का आभिजात्य तबका ब्राह्मण ही था। तो, तब के बंगाल में, जिसमें वीरभूम और मानभूम शामिल थे-की आबादी के मूल तत्व कौन कौन थे? हंटर ने पंडितों के हवाले से इस तथ्य का ब्योरा कुछ इस प्रकार दिया है-1.यहां के गैर आर्य आदिवासी 2.वैदिक व सारस्वत ब्राह्मण 3. छिटपुट वैश्य परिवारों के साथ परशुराम द्वारा खदेड़े गए मध्यभारत के क्षत्रिय जो बिहार से नीचे नहीं उतर पाए 4. सन् 900 ई. में कन्नौज से लाए गए ब्राह्मण और उनके वंशज और 5. उत्तर भारत से पिछले कुछ सालों में आए क्षत्रिय, राजपूत, अफगान और मुसलमान आक्रमणकारी। और ये सभी मनु की वर्ण व्यवस्था के हिस्सा नहीं थे। बंगाल के ब्राह्मणों को उत्तर भारत, यानी मनु के मध्यभारत के ब्राह्मणों ने राड़ी ब्राह्मणों की संज्ञा दे रखी थी और उनसे रोटी-बेटी का संबंध नहीं रखते थे।

कर्मकांडी नहीं थे वे

अस्तु, बंगाल की आबादी दो बड़े खेमों में विभाजित थी। आक्रमणकारी आर्य, जिन्हें ब्राह्मणों जैसा दर्जा प्राप्त था और यहां के आदिवासी जिन्हें आक्रमणकारियों ने यहां पाया था और जिन्हें वे जंगलों में खदेड़ते जा रहे थे। आर्यों को अपनी श्रेष्ठता का इतना अहंकार था कि वे आदिवासियों को मनुष्य से नीचे का, जीव-जंतु का, दर्जा देने लगे। आदिवासियों से उनकी नफरत की अनेक वजहें थीं। एक तो उनका वर्ण काला था, दूसरा, वे ऐसी भाषा बोलते थे जिसका, उनके अनुसार, कोई व्याकरण नहीं था, तीसरा, उनके खान-पान का तरीका और चौथा, वे किसी तरह के कर्मकांड में विश्वास नहीं करते थे, इंद्र की पूजा नहीं करते थे और उनका कोई ईश्वर नहीं था। वैदिक ऋ चाओं में उन्हें दसानन, दस्यु, दास, असुर, राक्षस जैसी संज्ञाओं से संबोधित किया जाने लगा।

आदिवासी कवयित्री सुषमा असुर का कहना है कि दुर्गा पूजा के नाम पर असुरों की हत्या का उत्सव बंद होना चाहिए। महिषासुर और रावण जैसे नायक असुर ही नहीं बल्कि भारत के समस्त आदिवासी समुदायों के गौरव हैं। वेद-पुराणों और भारत के ब्राह्मण ग्रंथों में आदिवासी समुदायों को खल चरित्र के रूप में पेश किया गया है जो सरासर गलत है। आदिवासी समाज ने हमेशा हर तरह के भेदभाव और शोषण का प्रतिकार किया है। असुर, मुण्डा और संथाल आदिवासी समाज में कई ऐसी परंपराएं और वाचिक कथाएं हैं जिनमें उनका विरोध दर्ज है। चूंकि गैर-आदिवासी समाज, आदिवासी भाषाएं नहीं जानता है इसलिए उसे लगता है कि आदिवासी हिंदू मिथकों और उनकी नस्लीय भेदभाव वाली कहानियों के खिलाफ नहीं हैं।

बहुधा हम भारतीय समाज की ‘सामूहिक चेतना’ बात करते हैं लेकिन क्या वास्तव में हमारे समाज की कोई सामूहिक चेतना है? या इन नस्लीय भेदभाव के रहते बन सकती है? क्या हमने कभी विचार किया है कि आजकल जो दुर्गा पंडाल बनते हैं, भव्य प्रतिमाएं बनती हैं, सप्ताह दस दिन तक चलने वाले मेले-ठेले में ठगा-ठगा सा खड़ा एक आदिवासी विस्फारित नेत्रों से इन आयोजनों को देखकर क्या महसूस करता है? या हम इंतजार कर रहे हैं कि वह अपने ही पूर्वजों की हत्या के इस उत्सव का धीरे-धीरे आनंद लेने लगेगा? ऐसा लगता तो नहीं, क्योंकि आदिवासी और गैर आदिवासी समाज के बीच सांस्कृतिक मॉडल को लेकर एक तीखा युद्ध अभी भी जारी है।

(फारवर्ड प्रेस के अक्टूबर 2014 अंक में प्रकाशित)


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