स्वस्थ जीवन पर सबका अधिकार

जीवन के अधिकार में स्वस्थ जीवन का अधिकार शामिल है और बिना स्वास्थ्य सेवाओं की पर्याप्त उपलब्धता के स्वस्थ जीवन जीना संभव नहीं है। परंतु यह आवश्यक है कि स्वास्थ्य के अधिकार को संविधान में स्पष्ट मान्यता दी जाए। इस अधिकार की अपरोक्ष संवैधानिक मान्यता से यह अधिकार न्यायालयों की व्याख्या पर निर्भर हो जाता है

वर्तमान में सरकार किसी स्तर की स्वास्थ्य सुविधाएं-चाहे वे प्राथमिक हों, द्वितीयक या तृतीयक-नागरिकों को अधिकार के बतौर उपलब्ध नहीं करवाती है। सरकार द्वारा स्वास्थ्य सुविधाएं परोपकार के तौर पर उपलब्ध करवायी जाती हैं, कर्तव्य के तौर पर नहीं। सरकार कई स्वास्थ्य योजनाएं चलाती है परंतु स्वास्थ्य संबंधी कोई कानून इस देश में नहीं है। इसलिए कोई भी नागरिक, बतौर अधिकार, स्वास्थ्य सुविधाओं की मांग नहीं कर सकता। जो कुछ सरकार उपलब्ध करवा रही है, उसे बिना किसी विरोध या प्रश्न के चुपचाप स्वीकार कर लेने केअतिरिक्त कोई विकल्प नागरिकों को उपलब्ध नहीं है।

जैसा कि कहा जाता है, ”बैगर्स आर नो चूजर्स” (दान की बछिया के दांत नहीं गिने जाते)। अधिकतर सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केन्द्रों में पूरे-पूरे दिन, कई लंबी-लंबी लाईनों में लगने के बाद, किसी गरीब मरीज के हाथ लगता है डाक्टर का केवल पर्चा और वह भी तब, जब उसे डाक्टर तक पहुंचने का मौका मिल जाये। उसके पूरे दिन की आमदनी तो डूब ही चुकी होती है। फिर वह एक दूसरी लंबी लाईन में खड़ा होता है, जिसके बाद अस्पताल की डिस्पेंसरी से उसे एकया दो दवाएं मिल जाती हैं। बाकि दवाओं के लिए अस्पताल के ठीकबाहर निजी मेडिकल स्टोर उपलब्ध रहते हैं। समय-समय पर दिल्ली आरोग्य निधि, राष्ट्रीय आरोग्य निधि, स्वास्थ्य मंत्री विवेकाधिकार अनुदान आदि जैसी कई स्वास्थ्य सहायता योजनाएं लागू की गईं परंतु इन सब में किसकी मदद की जानी है, यह चुनने का अधिकार सरकार का है और स्पष्टत: सरकार सब की मदद नहीं करना चाहती और न ही कर सकती है। इन योजनाओं के अंतर्गत केवल कुछ बीमारियों के मामले में सहायता प्रदान की जाती है और सहायता की राशि की ऊपरी सीमा तय होती है। इसकेअलावा, अन्य शर्तें भी होती हैं जैसे आवेदकका गृह राज्य, उसकी आय इत्यादि। देश में ऐसी कोई स्वास्थ्य सहायता योजना नहीं है जो सारे देश केसभी निवासियों पर लागू होती हो। और अगर इलाज का खर्च सरकार द्वारा निर्धारित सीमा से ऊपर चला जाता है तब मरीज को मरने के लिए छोड़ दिया जाता है।

गरीबों के लिए निजी अस्पतालों में बिस्तर

सामाजिक मसलों में दिलचस्पी रखने वाले एक विधिवेत्ता द्वारा दायर की गई जनहित याचिका पर अपना निर्णय सुनाते हुए उच्चतम न्यायालय ने 1 सितंबर 2011 को यह आदेश दिया किदिल्ली में जिन निजी अस्पतालों को सस्ती दर पर सरकारी जमीन उपलब्ध करायी गयी है, उन्हें आर्थिकरूप से कमजोर वर्ग के मरीजों का मुफ्त उपचार करना होगा और ऐसे मरीजों की ओपीडी में कम से कम 25 प्रतिशत और भर्ती होने वाले मरीजों में 10 प्रतिशत हिस्सेदारी होनी चाहिए। दिल्ली में कम से कम ऐसे 44 अस्पताल हैं, जिन्हें सस्ती दर पर सरकारी जमीन दी गई है और इसलिए उन्हें ओपीडी में कम से कम एक चैथाई और इंडोर मरीजों में कम से कम 10 प्रतिशत को मुफ्त इलाज उपलब्ध कराना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश से एकछोटा-मोटा आंदोलन खड़ा हो गया है। शहर के गरीबों में जैसे-जैसे अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ रही है, वैसे-वैसे इन अस्पतालों जिम्मेदारी से नहीं बच सकती। अदालत ने कहा किस्वास्थ्य सेवाओं के लिए धन का आवंटन करते समय इस संवैधानिक जिम्मेदारी का ख्याल रखा जाना चाहिए। यह मामला एक ऐसे व्यक्ति से संबंधित था जो चलती ट्रेन से गिर गया था और उसे गहरी दिमागी चोट आई थी। कई सरकारी अस्पतालों ने बिस्तरों और विशेषज्ञ डाक्टरों की कमी का हवाला देकर पर उसका इलाज करने से इंकार कर दिया। अंतत: उसे मजबूरी में एक निजी अस्पताल में अपना इलाज करवाना पड़ा। उसके बाद, उसने याचिका दायर कर सरकार से मुआवजे की मांग की।

सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा

हमारे देश में स्वास्थ्य, नागरिकों का मूल अधिकार तो छोडि़ए, कानूनी अधिकार भी नहीं है। स्वास्थ्य का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 में दिए गए जीवन के अधिकार से उद्भूत होना माना जाता है। उच्चतम न्यायालय ने इस विचार को आंशिक स्वीकृति प्रदान की है। परंतु संविधान में किसी भी प्रकार के स्पष्ट प्रावधान केअभाव केकारण कोई नागरिक यह दावा नहीं कर सकता कि स्वास्थ्य सुविधाएं पाना उसका मूल अधिकार है। इस सिलसिले में अब तक हुए अदालती निर्णय, मुख्यत: उन स्थितियों में की जाने वाली कार्यवाही पर केन्द्रित रहे हैं, जब किसी व्यक्ति का जीवन खतरे में हो। यद्यपि अनुच्छेद 21 द्वारा प्रदान किए गए जीवन केअधिकार को स्वस्थ जीवन के अधिकार के रूप में व्याख्यित करने पर कोई रोकनहीं है परंतु अब तक हमारे देश में इस तरह की बात किसी न्यायालय ने नहीं की है।

अभी कुछ समय पूर्व, हमने अदालतों में कुछ ऐसे मरीजों से संबंधित प्रकरण प्रस्तुत किए, जिनकी जान तो खतरे में नहीं थी परंतु उनकी शारीरिक स्थिति के कारण वे जीवन का आनंद उठाने में अक्षम थे। एक किशोर बालिका को ‘टर्नर सिंड्रोम’ नामक बीमारी है। उसकी शारीरिक वृद्धि सामान्य नहीं है और इस बात की काफी संभावना है कि वह किडनी या जननांगों संबंधी किसी रोग की शिकार हो जाएगी। उसे ग्रोथ हारमोन थैरेपी की जरूरत है जिस पर लगभग 12,500 रूपए प्रतिमाह का खर्च आता है। प्रधानमंत्री सहायता कोष से चार महीने के इलाज केलिए जरूरी रकम उपलब्ध करवायी गई परंतु चूंकि अधूरे इलाज से लड़की को कोई फायदा नहीं होना था इसलिए हमने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका लगाकर अदालत से मांग की कि वह सरकार को निर्देशित करे कि लड़की के इलाज का संपूर्ण खर्च सरकार उठाए। दिल्ली हाईकोर्ट ने सुनवाई की अगली तारीख 17 नवंबर तकइलाज जारी रखने का आदेश दिया है।

पश्चिम बंग खेत मजदूर समिति विरूद्ध पश्चिम बंगाल राज्य (1996) 4 एससीसी 37 में उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि लोगों को जरूरी स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करवाना सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है और वह आर्थिकसाधनों की कमी का हवाला देकर अपनी इस जिम्मेदारी से नहीं बच सकती। अदालत ने कहा कि स्वास्थ्य सेवाओं केलिए धन का आवंटन करते समय इस संवैधानिक जिम्मेदारी का ख्याल रखा जाना चाहिए। यह मामला एकऐसे व्यक्ति से संबंधित था जो चलती ट्रेन से गिर गया था और उसे गहरी दिमागी चोट आई थी। कई सरकारी अस्पतालों ने बिस्तरों और विशेषज्ञ डाक्टरों की कमी का हवाला देकर पर उसका इलाज करने से इंकार कर दिया। अंतत: उसे मजबूरी में एक निजी अस्पताल में अपना इलाज करवाना पड़ा। उसकेबाद, उसने याचिका दायर कर सरकार से मुआवजे की मांग की।

मोहम्मद एहमद (अवयस्क) विरूद्ध भारत सरकार

हाल में गाउचर डिसीज से ग्रस्त मोहम्मद एहमद के मामले में अपना निर्णय सुनाते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ने स्वास्थ्य सुविधाओं का अधिकार, सरकार की आर्थिक सीमाएं, कारपोरेट सोशल रिस्पोंसिबिलिटी व यदाकदा होने वाली बीमारियों पर नीति आदि केविषय में विस्तार से अपने विचार प्रगट किए। न्यायालय ने कहा कि यद्यपि संविधान का अनुच्छेद 21 राज्य को जो जिम्मेदारियां देता है, उन्हें शनै: शनै:, संसाधनों की उपलब्धता बढऩे के साथ, पूरा किया जाना है, परंतु इनमें से कुछ, जैसे आवश्यक दवाओं को उचित कीमत पर उपलब्ध करवाना, ऐसी जिम्मेदारियां हैं जिन्हें तुरंत और बिना किसी शर्त के पूरा किया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि इस सिलसिले में उचित कार्यवाही न करके केंद्र और राज्य सरकारें संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन कर रही हैं।

मोहम्मद एहमद गाउचर डिसीज टाइप-1 से ग्रस्त था। उसके पिता रिक्शा चालक थे और वे उसके इलाज का खर्च उठाने में असमर्थ थे। एहमद के चार भाई-बहन पहले ही इसी बीमारी से मर चुके थे। उन सभी को सरकारी अस्पतालों में दवाओं के अभाव में दम तोडऩा पड़ा था। उसके पिता ने दिल्ली स्वास्थ्य सेवा में एक आवेदन देकर दिल्ली आरोग्य निधि केतहत अनुदान मांगा। उसे 5,00,000 रूपए का अनुदान दिया भी गया परंतु यह केवल उसके एक माह के इलाज का खर्च था। उस समय एंजायम रिप्लेसमेंट थैरेपी का खर्च 4,80,000 रूपए था और यह थैरेपी उसे हर माह करानी होती थी। जब उसके पिता ने मेरा ध्यान उसकी समस्या की ओर दिलाया तो मैंने उसकी ओर से दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर दी। अदालत ने दिल्ली सरकार से याचिका कर्ता को मुफ्त इलाज उपलब्ध करवाने का आदेश देते हुए अपने निर्णय में कहा कियह मामला सरकार के दोहरे मापदण्डों का उदाहरण है। यही सरकार अपने कर्मचारियों के परिवारजनों और विधानसभा के सदस्यों के इलाज पर करोड़ों रूपए खर्च करती आयी है।

आगे की राह

जीवन के अधिकार में स्वस्थ जीवन का अधिकार शामिल है और बिना स्वास्थ्य सेवाओं की पर्याप्त उपलब्धता के स्वस्थ जीवन जीना संभव नहीं है। परंतु यह आवश्यक है कि स्वास्थ्य के अधिकार को संविधान में स्पष्ट मान्यता दी जाए। इस अधिकार की परोक्ष संवैधानिक मान्यता से यह अधिकार न्यायालयों की व्याख्या पर निर्भर हो जाता है। एकमात्र रास्ता यह है कि सरकार केलिए सभी नागरिकों को मुफ्त इलाज उपलब्ध करवाना बंधनकारी बनाया जाए। यह मानना अनुचित होगा कि केवल आर्थिकरूप से कमजोर वर्ग के लोग इलाज कराने में असमर्थ होते हैं। इन दिनों इलाज का खर्च इतना ज्यादा है कि मध्यम वर्ग और यहां तक कि उच्च मध्यम वर्ग के लोग भी गंभीर बीमारियों का इलाज करवाने में सक्षम नहीं हैं।

अत: संविधान में संशोधन कर, लोक स्वास्थ्य केअ धिकार को मूल अधिकार का दर्जा दिया जाना आवश्यक है। इसके अलावा, संविधान की सातवीं अनुसूची में संशोधन कर लोक स्वास्थ्य, जो कि वर्तमान में राज्य का विषय है और दूसरी सूची में छठवें स्थान पर है, को तीसरी सूची अर्थात समवर्ती सूची में शामिल किया जाना चाहिए। केंद्र सरकार को शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 की तरह लोकस्वास्थ्य के अधिकार पर नया कानून बनाना चाहिए। जब तक यह नहीं होता तब तक भारत के नागरिक स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए बदलती सरकारी नीतियों के रहमो करम पर निर्भर रहेंगे।

यह आलेख ऐडवोकेट अशोक अग्रवाल द्वारा दिल्ली में आयोजित साउथ एशिया एल.एस.डी. संगोष्ठी में 31 अगस्त 2014 को दिए गए भाषण का संपादित अंश है।

(फारवर्ड प्रेस के  दिसम्बर 2014 अंक में प्रकाशित)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

About The Author

Reply